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लड़ने के लिये

लड़ने के लिये
तुम्हारे पास हथियारों की कमी नहीं
मरने,
मारने वालों की भी, कमी नहीं है।
तुमने, बहुतों को मारा है
और अपने लिये, आगे भी
हमें मारते रहने का तुममें हौसला है,
चलो, अच्छी बात है,
मगर
हौसले से
जीने वालों के बारे में सोचना
पता चल जायेगा तुम्हें
कि ‘तुम कितने डरे हुए हो’?

डर लगता है तुम्हें हथियारों से,
उनकी परछार्इयों से तुम्हें डर लगता है,
हर खयाल,
हर सोच से तुम डरते हो।
हमारे मिलने
मिल-बैठ कर बोलने-बतियाने से
तुम्हें डर लगता है।
तुम जुलूस और जलसों से डरते हो।
थक कर लस्त होती,
अपने ही बोझ से
टूटती-बिखरती तुम्हारी दुनिया
अब, तुम्हें डराने लगी है।
हमें, डराते-डराते
तुम खुद से डरने लगे हो।

नेक सलाह दें तुम्हें-
”डरो नहीं”
अपनी हदों से बाहर निकलो,
आदमी की तरह
बांये बाजू से चलना सीखो,
चार कदम चलते ही
तुम्हें पता चल जायेगा
कि हम सिर्फ लड़ते नहीं,
अपनों के लिये जीते, अपनों के लिये मरते हैं।
लड़ने-भिड़ने वाले लोग
और हमें मार कर जीने वाले लोग,
आदमी की तरह जीने वालों से
बहुत कम हैं।

 

-आलोकवर्धन

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