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आदमी की जड़ें

आदमी की जड़ें
जब, जमीन से जुड़ती हैं,
वह पेड़ों में तब्दील हो जाता है।

पेड़ों के बारे में
बस, इतना ही कहना है मुझे
कि उनमें
जंगल
और पहाड़ बनने की संभावनायें होती हैं,
उम्मीदें जीती और बढ़ती हैं उनके होने से।
बदलते मौसम से उन्हें डर नहीं लगता
क्योंकि
वे होते हैं, जितना जमीन के ऊपर
जमीन के नीचे भी वे, उतना ही होते हैं।

आदमी की जडें,
जब जमीन से जुड़ती हैं
वह पेड़ों में तब्दील हो जाता है।

पेड़ होते हैं बया का घोसला,
पेड़ों की बस्ती
खुले आसमान के नीचे बसती है।
सुबह होते ही
वे हंसते-बोलते हैं, किरणों की सोन चिरर्इया से,
उनकी सांझ
परिन्दों के कलरव से होती है।
रात वे ही
आने वाले कल के सपने बुनते हैं।
सपनों की बुनावट
रेशम के बारीक रेसों से नहीं
मजबूत जड़ों से होती है।
अपनों से जुड़ी बाहें
जड़ों के जुड़ने से मजबूत होती हैं।

आदमी की जड़ें
जब जमीन से जुड़ती हैं
वह पेड़ों में तब्दील हो जाता है।

आदमी ही अपनी जमीन बो कर
अपने लिये जमीन की फसल उगा सकता है,
पेड़ों को जंगल
और जंगल को पहाड़ पर चढ़ा सकता है,
खेल सकता है किरणों की सोन चिरर्इया से,
घोसलों को प्यार करता हुआ
सपने बुन सकता है।
उसके ही पास
अपनी जड़ों के साथ
पांव के नीचे की जमीन छोड़ कर
आगे बढ़ने की होती है सहुलियतें।
क्योंकि बरगद एक पेड़ नहीं,
पेड़ों की बस्ती है,
जिसकी बाहें जड़ों में तब्दील होती रहती हैं।

आदमी की जड़ें
जब जमीन से जुड़ती हैं,
वह पेड़ों में तब्दील हो जाता है।

-आलोकवर्धन

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