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चारपार्इ होना टांग पसार कर जीना है

जहां मैं रहता हूं, वहां चारपार्इ जी रहते हैं।

हंसोड़ हैं, बात चुभती हुर्इ करते हैं। जिससे पटरी बैठ गयी, तो बैठ गयी और नहीं बैठी तो उस पर टूट पड़े। इसलिये, शोफा कम बेड’ के जमाने में चारपार्इ रह गये। जिसका उन्हें मलाल नहीं खुशी है।

कि ”चारपार्इ होना, टांग पसार कर जीना है।”…….कि ”माल से बेहतर परचून की दुकान है।”

उनकी जिंदगी में इत्मिनान ही इत्मिनान है।

कोर्इ बैठा, तो चूं से बोलते हैं।

कोर्इ उठा, तो चूं से बोलते हैं।

बच्चे उछल-कूद करने लगें तो चूं…..चूं….चूं….. का रटटा मारने लगते हैं। चारपार्इ जी की हंसी और बेखयाली एक है।

उन्हें बड़ों के बजाये छोटों की सोहबत अच्छी लगती है।

यदि आपने पूछ लिया- ”क्यों?” तो बताना मुश्किल होगा, कि वो सवाल से लड़ रहे हैं, या सवाल पूछने वाले से?

मगर, अभी उन पर शराफत का भूत सवार है, और वो सलीकेदार आदमी बने हुए हैं। इसलिये- ”क्यों” का जवाब उन्होंने बड़े ही ढंग से दिया।

”क्योंकि, जो बड़े होते हैं, वो शिकायत करते रहते हैं।”

हमें मनमोहन सिंह जी याद आ गये कि-

”दुनिया हंस रही है।”

हमने चारपार्इ जी से कहा- ”दुनिया हंस रही है।”

”बड़ी अच्छी बात है। हंसेंगे, तभी न फंसेंगे।”

”यह मैं नहीं, देश के प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं।” वो संजिदा हो गये-

”जरा उनसे पूछें, उन्हें हंसी से परहेज क्यों है?” चारपार्इ जी की शराफत धारदार होने लगी।

मैंने समझाया- ”यह हंसी हंसने वाली हंसी नहीं है। यह हंसी हंसी उडाने वाली हंसी है।”

”अच्छा…! हंसी उड़ती भी है।” उन्होंने हैरत जताया भला वह कैसे?”

मैंने खुलासा किया- ”दुनिया हंसी उड़ा रही है चारपार्इ जी, क्योंकि संसद नहीं चल रही है।”

खुराफात न अब शराफत की जगह ले ली- ”जरा उनसे पूछ कर बतार्इये कि संसद चलती कब थी?”…..हम तो जब से देख रहे हैं, वह दिल्ली में जहां थी, वहीं डंटी हुर्इ है। बिना हिले-डुले मर रही है।

”यह वह चलना नहीं है, यह जहां है, वहीं रह कर चलने वाली बात है।”

अब वो भड़के- ”फिर वही बात। का गोल-गोल घुमा रहे हैं? हंसी हंसी नहीं है, चलना, चलना नहीं है। आदमी हैं कि घनचक्कर?”

हमें सकपकाना चाहिये था, हम सकपका गये।

उन्होंने ठहर कर पूछा- ”अब आप एक बात बतार्इये।”

”जी..!”

”संसद चलती तो कहां पहुंचती? आपके घर आती कि आपको दाना-पानी देती?”

”मतलब?” मैंने समझने की कोशिश की।

”लगे दांये-बांये बतियाने।” उन्होंने तंज किया। और आपे से बाहर हो गये।

”घपला करते हैं। घोटाला करते हैं। और कहते हैं संसद नहीं चलती। दुनिया हंस रही है। हंसार्इयेगा तो हंसेगी नहीं। विकास करेंगे। घनश्याम दास घनश्याम दास रहेगा, और ललुआ साला ललुआ। तो काहे का विकास? विकास का मतलब जानते हैं?

”नहीं!” कहना पड़ा।

”विकास का मतलब है उदारीकरण। उदारीकरण का मतलब है, निजीकरण। और निजीकरण का मतलब है घपला और घोटाला। समझे। मनमोहन सिंह जी जहां खड़े हो जाते हैं वहीं विकास होने लगता है।” और चारपार्इ जी खिलखिला कर हंसने लगे।

मुझे लगा चारपार्इ जी, कहीं न कहीं, मुझसे बेहतर हैं।

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