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समाजवाद के साथ शावेज और समाजवाद के बिना गददाफी – 1

soch ki jameenलीबिया के कर्नल गददाफी और वेनेजुएला के हयूगो शावेज को सिर्फ लीबिया और वेनेजुएला का कहना गलत है, मगर उनकी पहचान इस रूप में भी की जाती है, क्योंकि आदमी को उसकी जमीन, उसके अपनों और उसकी अपनी सूरत से काट कर, नहीं की जा सकती। दरख्त की तरह वह अपनी जमीन से जुड़ा होता है। प्राकृतिक वातावरण और सामाजिक स्थितियों की उपज होता है। दोनों का वजूद मेरे जेहन में उनकी भव्यता, उनकी उपलबिधयों के साथ एक मासूम बच्चा और एक बूढ़ी औरत के रूप में भी है, जिन्हें मैं नहीं जानता।

एक लीबियायी लड़का, जिसके कण्ठ अभी फूट ही रहे थे, जिसके मस्से अभी भीग ही रहे थे, जिसकी किशोर आंखें अभी जवान हो ही रही थी, वह त्रिपोली छोड़ने से पहले मुअम्मर गददाफी को सुन रहा था। उसे इस बात की फिक्र नहीं थी, कि त्रिपोली पर हो रहे नाटो के हवार्इ हमलों में वह मारा जायेगा, या उसकी शिनाख्त उसकी मौत की सबब भी बन सकती है। वह अपने देश, अपने मुअम्मर के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार था, और चाहता था, कि यह बात वह मुअम्मर को बता सके, उन्हें छू और देख सके। उसकी बाहें उठी हुर्इ थीं, उसके चेहरे पर जोश था, उसकी आंखें चमक रही थीं, वह लाखों की भीड़ का हिस्सा, मगर कुछ खास था। उसने मुअम्मर को कहते सुना- ”बच्चे! मैं तुम्हे देख रहा हूं।”

मुअम्मर गददाफी के लबादों से वह लिपट नहीं सका, उन्हें छू नहीं सका। आज लीबिया मलबों में बदल चुका है। वह लड़का मारा गया, या आज भी कहीं लड़ रहा है? मैं नहीं जानता। उसने जो सुना और जो देखा वह खौफनाक है कि गददाफी के साथ लीबिया की भी हत्या हो चुकी है। कर्नल गददाफी और अफ्रीकी एकजुटता के सपनों की हत्या हो चुकी है।

गददाफी अफ्रीकी महाद्वीप के लिये, एक असफल शावेज हैं, मगर शावेज लातिनी अमेरिका के लिये एक सफल गददाफी कहे जा सकते हैं। शावेज अपने शुरूआती दौर में असफल हुए, मगर गददाफी को असफलता तब मिली, जब वो लीबिया के आम लोगों की समृद्धि और अफ्रीकी एकजुटता के बहुत ही करीब थे। मगर, यह असफलता उनकी अपनी नहीं थी, अमेरिकी साम्राज्यवाद और नाटो देशों के द्वारा उन पर थोपी गयी थी। ताकि, अफ्रीकी महाद्वीप को घुटनों के बल रखा जा सके। उसके प्राकृतिक संसाधन, अकूत सम्पदा और मानव श्रमशक्ति का शोषण और दोहन किया जा सके। निजीकरण के खिलाफ खड़े होने की उसकी सोच को तोड़ा जा सके।

गददाफी को पर्याप्त सफलता सिर्फ इसलिये नहीं मिल सकी, कि उन्होंने अमेरिकी एवं पश्चिमी देशों पर सीधे तौर पर हमला करने से पहले, अफ्रीकी देशों को और अरब देशों को, सामाजिक एवं आर्थिक विकास के सामूहिक एकजुटता का निर्माण पूरी तरह नहीं कर सके। अफ्रीकी संध में यह प्रस्ताव भले ही पास करा लिया गया कि ”किसी भी अफ्रीकी देश पर किया गया हमला, अफ्रीका के सभी देशों पर किया गया हमला माना जायेगा”, किंतु अफ्रीकी देश और अरब जगत साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ एकजुट नहीं हो सके। और नाटो सैन्य संगठन के खिलाफ लीबिया को अपनी लड़ार्इ एक सीमा तक, अकेले ही लड़नी पड़ी। संगठित अमेरिकी एंव पश्चिमी ताकतों के खिलाफ कर्नल गददाफी अकेले पड़ गये। अफ्रीका की आम जनता तो उनके साथ थी, मगर अफ्रीकी देशों का राजनीतिक एवं सैन्य सहयोग उन्हें नहीं मिल सका। वैश्विक स्तर पर भी कुछ ऐसा ही हुआ। राष्ट्रसंघ में लीबिया पर सैन्य हमले की कार्यवाही के प्रस्ताव को चीन या रूस के ‘विटो पावर’ का सामना नहीं करना पड़ा, और ऐतिहासिक भूल हो गयी। आज रूस भले ही यह कह रहा है कि ”वह सीरिया में लीबिया के अनुभव को दुहराने की इजाजत नहीं देगा।” मगर, लीबिया में जो हुआ, और कर्नल गददाफी हत्या से, वो अपने को बरी नहीं कर सकता। सच तो यह है कि रूस और चीन अमेरिका और यूरोपीय देशों का विकल्प बनना चाहते हैं, उन्हें गददाफी का विकल्प बनना मंजूर नहीं था। उन्होंने भी नाटो सेना और विद्रोहियों के जरिये कर्नल गददाफी की हत्या की।

इराक हो या लीबिया, या आज की दुनिया, एकध्रुवी विश्व का ही परिणाम है। सोवियत संघ के रहते यह संभव नहीं था। चीन का पूंजी निवेश, भले ही अफ्रीकी महाद्वीप में भारी है, और तेल के लिये वह अरब जगत में अपनी पैठ बना चुका है, उसने समानांतर वैश्विक वित्तव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये अपनी मुद्रा को विकसित कर लिया। भले ही रूस की सामरिक क्षमता अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप और नाटो सेना के लिये, स्पीड बे्रकर की तरह है, मगर अफ्रीकी महाद्वीप में माली जैसी घटनायें भी घट रही हैं, जहां की सरकार -जिसे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है- अपने देश की आंतरिक समस्याओं के समाधान के लिये, विदेशी सेना को आमंत्रित कर लेती है। जिसके आगे अफ्रीकी संघ और रूस जैसी शक्तियों के लिये, उन्हें रोकना मुश्किल हो जाता है।

अफ्रीका की आम जनता सदियों से विदेशी हस्तक्षेप और अमानवीय दमन एवं शोषण की शिकार रही है, इसलिये, वह अपने देश की सरकार और औपनिवेशिक एवं साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ रही है। किंतु इन देशों की सरकारें ज्यादातर विदेशी ताकतों का साथ दी हैं। अपनी जमीन और अपनी जनता के खिलाफ ऐसे करार की है, कि उन्हें उखाड़ कर फेंकने से पहले, विदेशी हस्तक्षेप एवं सैन्य कार्यवाहियों को रोक पाना आसान नहीं है। साम्राज्यवादी ताकतों ने लुटेरों की अवैध सेना और इस्लामी आतंकवादियों को अपने पक्ष में खड़ा कर लिया है। टयूनीसिया से शुरू हुए जनआंदोलनों और जनप्रदर्शनों की दिशा को मोड़ने के लिये उन्होंने विद्रोहियों को खड़ा कर लिया, क्योंकि, राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर सरकारें अफ्रीका में साम्राज्यवादी हितों के लिये जरूरी है। शांति और स्थिरता के नाम पर विद्रोह और राजनीतिक अस्थिरता फैलाना ही उनका मकसद है। जिसमें उनका साथ इस्लामी संगठन, आतंकी और कमजोर सरकारें दे रही हैं।

अफ्रीका और अरब जगत में, यदि तेल के कुवें और प्राकृतिक संपदा का विशाल भण्डार नहीं होता, तो औपनिवेशिक एवं साम्राज्यवादी ताकतें, अमेरिकी साम्राज्य और पश्चिमी शक्तियां, उसके विकास के लिये मर नहीं रही होती। लीबिया के कर्नल गददाफी ने इस समिकरण को बदलने की र्इमानदार पहल की। दशकों लम्बी लड़ार्इ लड़ी है, उन्होंने अमेरिकी साम्राज्य और पश्चिमी ताकतों से। वो अफ्रीकी महाद्वीप और अरब जगत के तेल उत्पादक देशों के पहले ऐसे राष्ट्राध्यक्ष हैं, जिन्होंने तेल उत्पादन और उसके निर्यात से मिले लाभ को सीधे तौर पर आम जनता के बैंक खातों तक पहुंचाया और निजी कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण किया। विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और यूरोपीय देश और अमेरिकी ‘विकास के जरिये शोषण’ को लीबिया से बाहर का रास्ता दिखाया और वो पूरे अफ्रीकी महाद्वीप में यही करना चाहते थे। विकास के जरिये अफ्रीकी महाद्वीप की एकजुटता का आदर्श उन्होंने अपने सामने रखा।

‘गोल्डन दीनार’ से लेकर ‘अफ्रीकी मुद्राकोष’ और पानी-संचार माध्यमों के अफ्रीकीकरण से लेकर, अफ्रीका के लिये महाद्विपीय सेना के निर्माण की शुरूआत भी उन्होंने बड़े ही प्रभावशाली ढंग से किया। उनकी कोशिश अफ्रीकी महासंघ, अरब जगत और मित्र देशों की एकजुटता थी। हर स्तर पर अमेरिका और पश्चिमी ताकतों के खिलाफ एकजुटता। मुअम्मर गददाफी ने आम जनता की हिस्सेदारी को राजनीतिक रूप से ही नहीं, आर्थिक रूप से अनिवार्य माना। उनके सम्बंध अमेरिका और पश्चिमी देशों से जितने खराब थे, तीसरी दुनिया के देशों से उतने ही अच्छे थे। सोवियत संघ के पतन के बाद भी, उन्होंने लातिनी अमेरिकी देशों के साम्राज्यवादी पक्षधरता से, अपने को जोड़े रखा। लीबिया को उन्होंने साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ गंभीर चुनौती ही नहीं, अफ्रीकी एकजुटता के केंद्र बिंदु में बदल दिया।

जिसे साम्राज्यवादी ताकतों ने ध्वस्त कर दिया है। कर्नल मुअम्मर गददाफी की हत्या हो चुकी है।

किंतु, गददाफी की सोच, अफ्रीकी देशों की एकजुटता की अनिवार्यता और सारी दुनिया में हो रहे धु्रवीकरण को रोका जा सकता है?

क्या हयूगो शावेज के बाद, वेनेजुएला और लातिनी अमेरिकी महाद्वीप में विकास के जरिये समाजवाद के बनते प्रारूप और संभावनाओं की हत्या की जा सकती है? खास कर तब, जब उन्होंने ‘समाजवाद की बांह’ मजबूती से पकड़ रखी थी। गददाफी ने अपनी शुरूआत- ”शांति, समाजवाद और एकजुटता” से की थी, मगर सोवियत संघ के पतन के बाद अपने पतन से पहले ‘समाजवाद’ से उनकी पकड़ ढ़ीली पड़ गयी थी, और उन्होंने अमेरिका, पश्चिमी देशों से सम्बंधों को सुधारने के लिये निजी-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये लीबिया के दरवाजे खोल दिये। ऐतिहासिक भूल की उन्होंने। और अपनी भूल को सुधारने की कोशिश भी की उन्होंने, मगर यह भूल उनकी आखिरी भूल प्रमाणित हुर्इ समाजवाद के बिना ”शांति, समाजवाद और एकजुटता” का सपना टूट गया। गददाफी एक सबक बन गये। और इस सबक को भूला नहीं जा सकता। यह सच है कि गददाफी सिर्फ, गुजरा हुआ कल नहीं हैं।

क्या कर्नल गददाफी की तरह राष्ट्रपति शावेज वास्तव में अब नहीं रहे?

”शावेज अब नहीं रहे”, और ”शावेज जिंदा हैं”, आज का सच यही है।

वेनेजुएला और लातिनी अमेरिका के देशों तथा आम जनता के लिये उन्होंने जो किया है, वह गुजरा हुआ कल नहीं है। स्थितियां ऐसी बन गयी हैं कि राज्य और उनकी सरकारों को आम जनता के पक्ष में खड़ा होने के अलावा, लातिनी अमेरिका में और कोर्इ विकल्प नहीं है। ‘जन सरकार की व्यवस्था’ और ‘द गे्रट पेटि्रयाटिक पोल’ की पुर्नवापसी से ही विकास के जरिये समाजवाद पर हो रहे हमले को रोकने की कोशिश हो रही है।

‘सरकारें आम जनता की फिक्र कर सकती हैं, और उन्हें यही करना चाहिये’, की सोच फैल गयी है। मौजूदा वैश्विक मंदी ने, चाहे जितनी भी परेशानियां दी हो, मगर आम जनता पर बोझ लादने वाली सरकारें और आम जनता की फिक्र करने वाली सरकारों के बीच के बंटवारे को साफ कर दिया है। यह प्रमाणित कर दिया है, कि जन समस्याओं के समाधान से ही मंदी के भयानक दौर को पार किया जा सकता है। शावेज ने वेनेजुएला के माध्यम से एक विकल्प रखा। उनकी सोच में वेनेजुएला लातिनी अमेरिकी महाद्वीप का हिस्सा है।

आप इस घटना की कल्पना नहीं कर सकते, कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग की कोर्इ बूढ़ी औरत, अपने देश के राष्ट्रपति के सीने से, बच्चों की तरह दुबक सकती है और बेटे के उम्र का राष्ट्रपति, उसे पिता की तरह प्यार कर सकता है। मगर, शावेज ऐसे ही थे।

अमेरिकी सरकार के सहयोग से, वेनेजुएला की दक्षिणपंथी ताकतों ने जब, पहली बार तख्ता पलट किया, आम जनता सड़कों पर उतर आयी। जन मिलिशिया और सेना ने 48 घण्टे के अंदर पाशा पलट दिया। शावेज को सत्ता से बेदखल करने की अमेरिकी साजिशें नाकाम हो गयीं। पिछले दो दशकों से इराक, र्इरान, सीरिया, लीबिया, उत्तरी कोरिया, क्यूबा और अब शावेज के सत्तारूढ़ होने के बाद से, वेनेजुएला की वित्त व्यवस्था साम्राज्यवादी ताकतों के निशाने पर है। इराक के बाद लीबिया पर हमले की साजिश जार्ज डब्ल्यू बुश की थी, मगर अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में उलझी रही। लीबिया के बाद सीरिया, र्इरान और वेनेजुएला उनके निशाने पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति के लिये क्यूबा की समाज व्यवस्था स्थायी चुनौती है। अमेरिकी सरकार यह मानती है कि वेनेजुएला के ध्वस्त होते ही, क्यूबा की वित्त व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है। शावेज क्यूबा और लातिनी अमेरिकी देशों की एकजुटता के लिये वास्वत में महत्वपूर्ण थे। उन्होंने निजी तेल कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर न सिर्फ अपने देश की वित्तव्यवस्था को संभालने का काम किया, बल्कि लातिनी अमेरिकी देशों की सामाजिक विकास योजनाओं के वो महत्वपूर्ण सहयोगी बने। महाद्वीप के 18 देश ऐसे हैं, जिन्हें तेल का निर्यात 40 से 60 प्रतिशत कम कीमत पर किया जाता है। शावेज का लक्ष्य महाद्वीप की आम जनता के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन करना था। और यह परिवर्तन हुआ।

तख्तापलट की नाकाम कोशिशों के बाद जब उनसे पूछा गया- ”उस दौरान आप क्या महसूस कर रहे थे?”

उनके सामने लाखों-लाख उन लोगों की सूरतें घूम गयीं, जिन्हें सब कुछ पाने का अधिकार है, मगर जिनके पास कुछ भी नहीं है।

उन्होंने छोटा सा जवाब दिया- ”मेरे जीवन का हर एक पल अब उनके लिये है, जो समाज के सबसे कमजोर और गरीब लोग हैं।”

और उन्होंने वास्तव में यही किया। वो अपने देश के राष्ट्रपति भवन में कम, अपने देश की आम जनता के बीच ज्यादा रहे। यही कारण है, कि उनकी कोशिशें अमेरिकी विरोध और दक्षिणपंथी भितरघात के बाद भी, नाकाम नहीं रहीं। उन्होंने उन सपनों को पूरा किया, जिन सपनों को बोलिवर ने देखा था, लातिनी अमेरिकी और कैरेबियन देशों की एकजुटता की फिदेल कास्त्रो, चेग्वेरा की नीतियों की बांह थाम ली। वो माक्र्स का उल्लेख ऐसे करते थे, जैसे उनसे उनकी गहरी छनती हो। शावेज ने ”विकास के जरिये समाजवाद” की नयी सोच को विकसित किया। जिसका प्रभाव समाजवादी विश्व और लोगों पर ही नहीं पड़ा, बल्कि पूंजीवादी देशों के उन लोगों पर भी पड़ा, जो अपने देश की बाजारवादी नीतियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। तीसरी दुनिया के उन देशों पर भी पड़ा जो वित्तीय साम्राज्यवाद और साम्राज्यवादी सैन्य हस्तक्षेप के शिकार हैं। उन्होंने नवउदारवादी वैश्वीकरण और बाजारवादी पूंजी के निजीकरण के विरूद्ध समाजवादी वैश्वीकरण और राष्ट्रीयकरण की नीतियों से अपनी सोच और समझ को विकसित किया। बोलिवर कहा करते थे- ”किसी भी देश की अंतर्राष्ट्रीय नीति उसके राष्ट्रीय नीति का विस्तार होना चाहिये।” और शावेज ने यही किया। उनके राष्ट्रीय नीति का आधार, समाजवादी समाज का निर्माण था, और उनकी अंतर्राष्ट्रीय नीति का आधार समाजवादी वैश्वीकरण था। उन्होंने एकध्रुवी विश्व के स्थान पर बहुधु्रवी विश्व की अवधारणा विकसित की।

गददाफी और शावेज एक ही कालखण्ड के मिलते-जुलते चेहरे हैं। जिनकी पृष्टभूमि अलग है, सोच का परिवेश भी एक नहीं है, मगर, अपने देश और अपने महाद्वीप के प्रति उनकी नीतियां लगभग एक हैं।

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