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वित्तीय पूंजी का वर्चस्व और भ्रष्ट सरकार को स्वर्णयुग

rashtriya vicharमनमोहन सिंह की जितनी मिटटी पलीत हो चुकी है, इस देश के किसी भी प्रधानमंत्री के साथ ऐसा नहीं हुआ। ऐसा भी नहीं हुआ कि किसी देश की चुनी हुर्इ सरकार ने अपने देश और आम जनता को इतना बड़ा नुक्सान पहुंचाया हो, जितनी बड़ी हानि कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने पहुंचायी है। जनतंत्र और उसकी वित्तीय एवं राजनीतिक संरचना को उसने खोखला कर दिया है। आज देश की हर एक प्रशासनिक इकार्इ, विभाग, मंत्रालय और यहां तक कि देश के सुरक्षा की जिम्मेदारी जिस सेना पर है, सभी सवालों के दायरे में हैं। हमारा संवैधानिक ढांचा टूट गया है, और राज्य के नियंत्रण से बाहर होती वित्तव्यवस्था है। और यही सारे फसादों की जड़ है, बोतल से निकला हुआ ऐसा जिन्न है, जिसकी भूख कभी खत्म नहीं होती।

आज देश में जितनी भी आर्थिक एवं राजनीतिक समस्यायें हैं, उनमें से ज्यादातर समस्याओं की वजह, ‘मनमोहन सिंह की उदारीकरण की नीति’ है। वह मुक्त बाजारवाद है, जिसने वैश्विक मंदी को जन्म दिया, और जिसे उससे उबरने की राह मान ली गयी। जिसने अमेरिका के दर्जे को घटा दिया और यूरोपीय वित्तव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है। जिसने अमेरिकी एकाधिकारवाद को जन्म दिया और तीसरी दुनिया के देशों के लिये साम्राज्यवादी खतरों को बढ़ा दिया है। मगर, भारत में अपनी रोज बढ़ती मुसीबतों और खतरों का जिक्र इस रूप में नहीं होता। बाजारवाद और अर्थव्यवस्था के निजीकरण को बचा लिया जाता है। उदारीकरण को सही ठहराया जाता है। राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये अपनी वित्तव्यवस्था में जगह देने को भी जायज करार दिया जाता है। यह प्रमाणित किया जाता है कि नव उदारवादी वैश्वीकरण की सोच गलत नहीं है।

हां, इस बारे में चर्चा जरूर की जाती है कि-

• संसद की गरिमा का अंत हो गया है

• देश की यूपीए सरकार, अब तक की सबसे भ्रष्टतम सरकार है

• संवैधानिक व्यवस्था टूट गयी है

• और भारतीय लोकतंत्र खतरे में है। यह सवाल कभी नहीं किया जाता कि ऐसा क्यों है?

क्योंकि, इस सवाल से टकराते ही, जिस व्यवस्था को बनाये रखने की जी तोड़ कोशिशें की जा रही हैं, उस व्यवस्था को बदलने की अनिवार्यतायें बढ़ जायेंगी। यह प्रमाणित हो जायेगा कि, अब सुधार की संभावनायें खत्म हो गयी हैं। आम जनता के लिये राहतें नहीं हैं। असंतोष का बढ़ना तय है। जिसे जाया करने या उलझा कर रखने की कोशिशों का ही परिणाम है, कि भ्रष्टाचार या काले धन का मामला हो, या सामाजिक सुरक्षा का मुददा, जन उभार का अंत परिवर्तनविहीन स्थितियों का ही निर्माण करती है। मुददे हार्इजैक हो जाते हैं। उन्हें सामाजिक बदलाव और राजनीतिक परिवर्तन की ओर मुड़ने ही नहीं दिया जाता। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण को, ”आर्थिक विकास की दिशा” के रूप में प्रचारित किया जाता है, जबकि बाजारवादी वित्त व्यवस्था का सीधा प्रभाव समाज व्यवस्था और उसकी राजनीतिक संरचना पर पड़ता है।

राजनीतिक भ्रष्टाचार, काले धन का मामला हो या सामाजिक सुरक्षा का सवाल, बाजारवादी अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है, किंतु मुददों को एक दूूसरे से काट कर अलग कर दिया जाता है। बढ़ती हुर्इ महंगार्इ और अनियंत्रित बाजार भाव का मुददा अलग खड़ा रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लड़ी जाने वाली लड़ार्इयां, किसानों की समस्यायें, औधोगिक एवं संगठित मजदूरों का संघर्ष, असंगठित ग्रामीण एवं शहरी मजदूर की मुसीबतें, अलग-अलग हैं। स्थितियां ऐसी बना दी गयी हैं, कि सामाजिक एवं राजनीतिक संघर्षों को आपस में जुड़ने नहीं दिया जाता। जनअसंतोष और जनसंघर्ष तो है, मगर उनकी दिशा आपस में जुड़ कर व्यवस्था को बदलने की नहीं है, परिस्थितियां विपरीत हैं, किंतु सकारात्मक स्थितियां अपरिपक्व हैं। दुश्मनों की सही शिनाख्त नहीं हो पा रही है।

संसद की गरिमा खत्म हो गयी है, और देश की सबसे भ्रष्टतम सरकार केंद्र की यूपीए सरकार है, इसमें किसी को कोर्इ शक नहीं है। यहां तक, कि उन्हें भी शक नहीं है, जिन्होंने संसद और सरकार को इस मुकाम पर पहुंचाया, मगर आम जनता के सामने उनकी सही पहचान नहीं है। सही पहचान कराने वाले राजनीतिक दल और सही समझ विकसित करने वाली राजनीतिक संस्कृति ही नहीं है।

संसद की गरिमा का सवाल उसकी सर्वोच्चता से जुड़ा हुआ है। इसलिये उसकी सर्वोच्चता के सामने सवाल है, कि व्यावहारिक रूप से संसद, वास्वत में देश की सर्वोच्च कार्यपालिका है?

क्या कर रहे हैं, हमारे देश के प्रधानमंत्री और संयुक्त जिम्मेदारी के संवैधानिक प्रावधानों से बना उनका मंत्रीमण्डल और माननीय मंत्रीगण?

देश की संसद के निर्माण की संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर कहा जा सकता है, कि लगभग पिछले दो दशक से देश की आम जनता की स्पष्ट सहमति नहीं है। किसी भी एक राजनीतिक दल या आम चुनाव से पहले बने संयुक्त मोर्चे को संसद में बहुमत हासिल नहीं है। अल्पमत और जोड़-तोड़ से बनी सरकारें ही सरकार बनाती रही हैं। गठबंधन की सरकार का स्पष्ट प्रावधान हमारे संविधान में नहीं है।

आज देश की संसद, मंत्रीमण्डल और जिनको हम देश की चुनी हुर्इ सरकार कहते हैं, उस पर वित्तीय पूंजी का कब्जा है। राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और कारपोरेशनों के द्वारा उनका संचालन हो रहा है। मनमोहन सिंह के उदारीकरण ने पूंजी को राज्य के नियंत्रण से बाहर जाने का रास्ता दिया है, और उत्पादन के साधन पर निजी स्वामित्व की नयी परिभाषायें रच दी है। उसने आर्थिक विकास को ही सामाजिक विकास के आदर्श के रूप में स्थापित कर दिया है। राज्य के द्वारा संचालित सार्वजनिक क्षेत्र इतने निरीह हो गये हैं, राज्य के संसाधन को इतना सीमित कर दिया गया है कि आर्थिक विकास के लिये निजी राष्ट्रीय एवं विदेशी पूंजी निवेश के लिये देश के प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री कारपोरेट जगत की गलियों की खाख छानते फिर रहे हैं। यह खाख छानना देश में ही नहीं, विदेश में भी हो रहा है।

क्या यह किसी देश के राष्ट्रीय और उस देश की सर्वोच्च संसद की गरिमा के अनुकूल है?

क्या राज्य को वित्तीय इकार्इ और सरकार को बिचौलिया बना देना, संसद की गरिमा के अनुकूल है?

क्या यह संसद की सर्वोच्चता के साथ किया गया सबसे बड़ा और सबसे भददा मजाक नहीं है?

मगर, देश की मौजूदा राजनीतिक संरचना में संसद की गरिमा और उसकी सर्वोच्चता को इस रूप में नहीं देखा जा रहा है, क्योंकि, उसे वित्तीय पूंजी के सामने घुटनों के बल बैठाया जा रहा है।

संसद की गरिमा को नोटों के बण्डल लहराने, सांसदों के द्वारा गाली-गलौज और धक्का-मुक्की करने या हाय-तौबा मचाने के दायरे में समेट दिया गया है। उसकी सर्वोच्चता वित्तीय रूप में अब समाप्त हो गयी है।

प्रधानमंत्री से लेकर उनके मंत्रीमण्डल का हर एक सिपहसालार, मंत्रालय से लेकर हर एक प्रशासनिक विभाग आकंठ आर्थिक एवं राजनीतिक घपले और घोटालों में डूबा हुआ है। यह सोचना तो चाहिये कि ऐसा क्यों है? भ्रष्टाचार का विकास इतनी तेजी से क्यों हुआ?

कम से कम भारत में तो, दिन और तारीख के साथ बताया जा सकता है, कि बड़े घोटालों की नींव कब रखी गयी है।

टाटपटटी घोटाले से लेकर बोफोर्स तोप दलाली और चारा घोटाला के किस्से, राजनीतिक रसूख के परिणाम हैं। मिश्रित अर्थव्यवस्था ने घोटालों की पृष्टभूमि बनायी थी, मगर मनमोहन सिंह के कार्यकाल में घोटालों ने जिन ऊंचार्इयों को छुआ और जितने घोटाले हुए हैं, वह भ्रष्ट सरकार का स्वर्ण युग है।

यदि आप खुद से सवाल पूछें कि मनमोहन सिंह के एक दशक के कार्यकाल में ऐसा क्या हुआ, जो पिछली सरकारों के कार्यकाल में नहीं हुआ था, कि भ्रष्टाचार इतनी ऊंचार्इयां छू सकी? तो जवाब आपको मिल जायेगा। मनमोहन सिंह ने मिश्रित अर्थव्यवस्था को तोड़ दिया, उनके उदारीकरण ने वित्तीय पूंजी की अनिवार्यता बढ़ा दी और निजीकरण को विकास की अनिवार्यता में बदला गया। राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अर्थव्यवस्था का पहले हिस्सेदार बनाया गया और अब देश की वित्त व्यवस्था को उनके हवाले किया जा रहा है। भ्रष्टाचार की जड़ यही है। जहां भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जाती हैं, जहां भी कारपोरेट जगत का विस्तार होता है, वहां आर्थिक एवं राजनीतिक भ्रष्टाचार व्यवस्था का चरित्र बन जाता है।

rashtriya vichar (2)भारत में भी यही हुआ है। इस मामले में मनमोहन सिंह चक्रवर्ती प्रधानमंत्री हैं। और वो अकेले नहीं हैं। मंत्रीमण्डल और यूपीए के सहयोगी दलों, और विपक्ष ने भी उनका साथ भरपूर ढंग से दिया है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह ह,ै कि मुक्त बाजारवाद को उन्होंने राष्ट्रीय कार्यक्रम में बदल दिया है। किसी भी राजनीतिक दल के पास इस कार्यक्रम के अलावा और कोर्इ कार्यक्रम नहीं है। देश के वाममोर्चा को भी बरी नहीं किया जा सकता, जो बातें समझदारी की करते हैं, मगर न हाथ-पांव हिलाते हंै, न आगे बढ़ते हैं, इसलिये उनसे पत्ता भी नहीं हिलता।

राजनीति ने सामाजिक जीवन को जरूरत से ज्यादा गंदा कर दिया है, उसने ऐसे वर्ग को पैदा कर दिया है, जिसके बारे में आप यकीन के साथ कह सकते हैं, कि ”इसे खरीदा और बेचा जा सकता है।” रूपये लेकर नाच दिखाने वालों या रूपये लेकर नाजायज करने वालों की कमी नहीं है। मानसिक रूप से हम स्वीकार कर चुके हैं, कि रूपये से बड़ा न तो आदमी का जमीर है, ना ही आदमी है। देश और समाज रूपये और बाजार के बीच की कोर्इ चीज है, जिसे खरीदा भी जा सकता है, बेचा भी जा सकता है, और जिसकी बातें करके लोगों को ठगा भी जा सकता है। ठगी सम्मानित धंधा है। और यह धंधा अब सरकार भी करने लगी है।

कल तक मनमोहन सिंह जरूरत से ज्यादा पाक-साफ थे, मगर नहीं होते, मगर आज ऐसा नहीं कहा जा सकता। कोयले की दलाली में उनके हाथ शायद गंदे नहीं होते, मगर कोल ब्लाक आबंटन घोटाले पर सीबीआर्इ की स्टेटस रिपोर्ट के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय और कोयला मंत्रालय तथा कोयला मंत्री ने जो किया, और सीबीआर्इ के द्वारा जो हलफनामा सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल किया गया, उसे देखते हुए, यही प्रमाणित होता है, कि बदमाशों का सरगना शरीफ नहीं हो सकता है। डकैतों का सरदार बड़ा डकैत ही होगा। सीबीआर्इ यह कहती है, कि ”वह सरकार के नियंत्रण में है’ और अदालत यह चाहती है कि ‘सीबीआर्इ को स्वायत्तता मिलनी चाहिये।’

हमारे लिये इससे बड़ा मुददा यह है, कि प्राकृतिक संसाधन को, खनिज संपदा को, राज्य के नियंत्रण से बाहर निकालना गलत है। उसे निजी कम्पनियों के हवाले करना गलत है। सरकार के द्वारा राष्ट्रीयकरण के विरूद्ध, उसका निजीकरण गलत है। राष्ट्रीयकरण की ओट में कोयला खदानों का निजीकरण आम जनता की आर्थिक समृद्धि के स्त्रोत को निजी कम्पनियों को देना गलत है। जिसे मनमोहन सिंह के द्वारा कोयला मंत्री होने के दौर किया गया। यह राष्ट्रीय क्षति उस क्षति से बड़ी है, जो दलाली और खदानों को अपने नियंत्रण में लेने की छीना-झपटी के लिये खर्च किया गया। यही छीना-झपटी उनके एक दशक लम्बे प्रधानमंत्री के कार्यकाल में हुए घोटालों की वजह है, जहां बहती गंगा में हाथ-पांव धोने और नहाने का काम लोकतंत्र के प्रति पूरी आस्था और विश्वास के साथ किया गया। जो जहां है, वह वहीं डुबकी लगा रहा है।

भारतीय जनतंत्र पर इसी वित्तीय पूंजी का खतरा बढ़ा हुआ है। अमेरिकी सरकार पर कारपोरेट जगत और बहुराष्ट्रीय पूंजी ने अपना कब्जा जमा लिया है। यूरोपीय संघ के जरिये अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक ने यूरोपीय देशों पर अपना अधिकार कायम कर लिया है। दुनिया के सभी विकसित देशों की वित्त व्यवस्था पर उनकी पकड़ है। और जहां भी ऐसी स्थितियां हैं, वहां आम जनता के ऊपर कर्ज का बढ़ता बोझ है। मुक्त बाजारवादी आर्थव्यवस्था ने सरकार के द्वारा आम जनता के हितों में चलायी जाने वाली सामाजिक विकास योजनाओं एवं जनकल्याणकारी कार्यों को लगभग खत्म कर दिया है। लोगों को दी जानेवाली सरकारी सहायता एवं सुविधायें सीमित कर दी गयी हैं। उनके संवैधानिक अधिकारों का अंत हो गया है। लोग नाराज हैं और सड़कों पर हैं। पूरी व्यवस्था के प्रति गहरा जनअसंतोष है। भारत में भी निजीकरण के साथ यही हो रहा है। जैसे-जैसे वित्तीय पूंजी का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है, उसी अनुपात में आम जनता की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं। लोकतंत्र के प्रति आम जनता का विश्वास टूट गया है। मगर उसके सामने कोर्इ विकल्प नहीं है। स्थितियां ऐसी बन गयी हैं, कि मनमोहन सरकार के रहने-न-रहने से मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था और नवउदारवादी वैश्वीकरण के सेहत पर अब कोर्इ फर्क पड़ने को नहीं है, क्योंकि चुनी हुर्इ सरकारों के बदलने से व्यवस्था में परिवर्तन की सोच अभी कोसों दूर है।

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