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कोल ब्लाक आबंटन से जुड़े मुददे

rashtriya muddaभारत की संसदीय व्यवस्था पेशेवर राजनीतिक और कारोबारी जमात की उन बुरार्इयों से घिर गयी है, जिनमें सुधार की गुंजार्इश ही नहीं है। सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्षी गठबंधन ने ऐसी स्थितियां बना दी है, कि संसद की कार्यवाही स्थगित रहे और आम जनता के सामने संसदात्मक व्यवस्था के अलावा और कोर्इ विकल्प भी न हो। एक ऐसी व्यवस्था जो चल नहीं सकती, उसे ही बनाये रखने की विवशता की नुमार्इश होती रहे। देश की आम जनता नाराज है, मगर राजनीतिक रूप से सोयी हुर्इ है। वह अर्थव्यवस्था के उदारीकरण को राजनीतिक संकट के रूप में देख नहीं पा रही है। वह यह भी देख नहीं पा रही है, कि सत्तारूढ़ गठबंधन हो या विपक्षी गठबंधन, दोनों के आर्थिक कार्यक्रम एक हैं। मतलब राजनीतिक संकट का सुलगते रहना तय है। आम चुनाव उसका विकल्प नहीं है। एक भ्रष्ट सरकार के बाद दूसरी भ्रष्ट सरकार को चुनना ही चुनावी प्रक्रिया का लक्ष्य है।

अघोषित रूप से आम जनता से अपील की जा रही है, कि वह हममें से ही किसी एक को अपना प्रतिनिधि बनाये। जो आम जनता का प्रतिनिधित्व भी करे और उसका दमन भी करे। वह संवैधानिक प्रक्रिया से सत्ता का सुख भी भोगे और आम जनता के अधिकारों का हनन भी करे। वह राज्य की चुनी हुर्इ सरकार भी हो और वह राज्य की संपदा को निजी कारोबारियों के हवाले भी करती रहे। जो वास्तव में सरकार की नहीं राज्य, समाज और आम जनता की सम्पतित है।

कोल ब्लाक आबंटन का मुददा सीबीआर्इ की जांच रिपोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की वजह से सुर्खियों पर है।

सुर्खियां इस बात की बनी हुर्इ हैं, कि कोयला मंत्री रह चुके मनमोहन सिंह आज प्रधानमंत्री हैं, जिनके कार्यकाल में कोल ब्लाक आबंटन हुआ। जिसमें कोयला मंत्री की सम्बद्धता है। सीबीआर्इ न्यायालय में जांच रिपोर्ट पेश करने से पहले कानून मंत्री, कोयला मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों को अपनी रिपोर्ट दिखा कर, उसमें ‘आवश्यक संशोधन’ भी की। जनतंत्र के लिये यह बड़ा मुददा है। भारतीय संसद की यह ‘धुर्त नेक नियत’ है। और विपक्ष के लिये सरकार को घेरने का बड़ा मुददा है। मगर, मीडिया दो सवाल कभी नहीं उठाती-

1. राष्ट्रीयकरण होने के बाद भी, निजी कम्पनियों को कोयले की खदानों का अबंटन क्यों किया गया?

2. कोयले के खदानों का आबंटन नीतिगत आधार पर सही है या गलत?

यह सिर्फ मनमोहन सिंह, यूपीए या एनडीए सरकार का मामला नहीं है। कोयले की खदानों का आबंटन निजी कम्पनियों को एनडीए सरकार ने भी किया है।

इस सवाल का मतलब है, कि अनियमित्ता बरती गयी, सरकारी खजाने को भारी नुक्सान हुआ और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार भी हुआ। मगर मुददे को हर बार बदला गया है, और इस तरह बदला गया है, कि राष्ट्रीयकरण और निजीकरण की नीतियों का सवाल खड़ा न हो। यहां तक, कि कैग रिपोर्ट और सीबीआर्इ की विवादास्पद जांच रिपोर्ट भी इस मामले में खामोश है। कैग ने आबंटन में बरती गयी अनियमित्ता और सरकारी खजाने को हुर्इ हानि का आंकलन किया। अदालत के द्वारा निर्देशित सीबीआर्इ कोयला मंत्रलाय और आरोपियों की सम्बद्धता की जांच कर रही थी। अब मसला यह हो गया है, कि सर्वोच्च न्यायालय में रिपोर्ट पेश करने से पहले कानून मंत्री अशिवनी कुमार, कोयला मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों को रिपोर्ट क्यों दिखायी गयी?

सीबीआर्इ के द्वारा न्यायालय में दिये गये शपथपत्र ने सरकार की उलझनें और बढ़ा दी है। जिसमें ‘स्टेटस रिपोर्ट’ में बदलाव कराने की बात स्वीकार की गयी है। दो बदलाव कानून मंत्री और दो बदलाव कोयला मंत्रालय तथा प्रधानमंत्री कार्यालय के संयुक्त सचिवों के द्वारा कराये गये। छोटे-मोटे बदलाव कर्इ हैं। सीबीआर्इ निदेशक रंजीत सिन्हा के हलफनामें से सरकार और सरकारी अधिकारियों के दावे गलत प्रमाणित हुए हैं, कि ‘रिपोर्ट नहीं देखी गयी’ और ‘बदलाव नहीं कराया गया’। कानून मंत्री अशिवनी कुमार, अटार्नी जनरल वाहनवती, तत्कालीन एडिशनल सालिसिटर जनरल हरेन रावल, प्रधानमंत्री कार्यालय के संयुक्त सचिव शत्रुघन सिंह और कोयला मंत्रालय में संयुक्त सचिव ए0के0 भल्ला ने न सिर्फ रिपोर्ट को देखा, बल्कि उसमें ‘आवश्यक’ बदलाव भी कराया।

हलफनामें में निदेशक महोदय ने सरकार का बचाव करने में कोर्इ कसर नहीं छोड़ी है, मगर सर्वोच्च न्यायालय मानती है कि ”सीबीआर्इ सरकारी पिंजरे में बंद तोता है”, जो अपने मालिकों की बात दुहराता है। उसने कहा कि ”जांच रिपोर्ट के ‘मूलतत्व’ को ही बदल दिया गया है।” ”रिपोर्ट में परिवर्तन के सुझाव” को न्यायालय, सरकार के द्वारा सीबीआर्इ के मामले में दखल मानती है, उसने 10 जुलार्इ तक -सीबीआर्इ को सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त करने के लिये- सरकार को कानून बनाने का निर्देश दिया है।

‘कोल ब्लाक आबंटन’ का मुददा अब सीबीआर्इ की स्वायत्तता के मुददे से जुड़ गया है। मगर, मूल मुददा जहां था, वहीं खड़ा है। न्यायालय भी मानती है, कि ”जांच में कोर्इ प्रगति नहीं हुर्इ है।” क्योंकि, सरकार इस बात को जानती है और विपक्ष भी, कि मुददों को टांग कर रखना जनतंत्र के लिये जरूरी है। कीचड़ से कीचड़ को धोते रहने से आम जनता की उम्मीदें बची रहती हैं। मनमोहन सिंह अशिवनी कुमार के पक्ष में थे, मगर सोनिया गांधी हाथ पकड़ कर अपना दबाव बना लीं और अशिवनी कुमार के साथ रेलमंत्री पवन बंसल से भी इस्तीफा मांग ली, जो रेलवे में प्रमोशन के लिये रिश्वतखोरी के आरोपों से घिरे हुए हैं। रेल मंत्रालय का खुलासा देश के मंत्रियों के द्वारा एक से बढ़कर एक किये जाने वाले कारनामों का नया खुलासा है।

हम यह नहीं कह सकते, कि ”सरकार के पतननामा” का यह आखिरी अध्याय है या आखिरी खुलासा है। इसके बाद भी हम कोल ब्लाक आबंटन और निजी कम्पनियों की दखल को वित्तव्यवस्था में बढ़ाने की नीतियों का ही जिक्र करेंगे, क्योंकि इसने देश की अर्थव्यवस्था की ही नहीं, उसकी राजनीतिक बुनावट की भी बखिया उधेड़ दी है। संसद, मंत्रीमण्डल, सचिवालय, प्रशासनिक विभाग, यहां तक कि संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच, बिना दखल दिये काम करने की स्थितियां भी गड़मड़ हो गयी है। सरकार अपनी आर्थिक नीतियों से, देश, समाज और आम जनता को कमजोर बनाने में इतनी लगन से लगी है, कि उसने अपनी ही व्यवस्था एवं प्रावधानों को तोड़ दिया। वित्तीय पूंजी का मूल चरित्र यही है।

सरकार कानून मंत्री से इस्तीफा ले कर कोयला मंत्री और प्रधानमंत्री को बचाने की नीति पर चल रही है। उसकी शराफत सिर्फ इतनी है, कि दोनों बचे रहें। अशिवनी कुमार तो मनमोहन सिंह से वफादारी निभाने में कुर्बान हुए। मुददा कोयला मंत्रालय और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का है, जो कि अपनी जगह बने हुए हैं, और भारतीय जनता पार्टी कहती है कि, ”उन्हें नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र दे देना चाहिये।” वैधानिक क्यों नहीं? जिस राजनीति में आदर्श एवं नीतियों का महत्व नहीं है, और साक्ष्य पूरी तरह खिलाफ है, तो नैतिकता क्यों?

सरकार, कांग्रेस, विपक्ष और मीडिया मनमोहन सिंह को भले ही बेदाग मानती है, कि उनके खिलाफ -उनके भ्रष्ट होने का- विशेष प्रमाण नहीं है। मगर, सोचना यह चाहिये, कि क्या वास्तव में प्रमाण नहीं है? यदि कोर्इ प्रमाण नहीं है, तो वो संदेह और जांच के घेरे में क्यों हैं? क्या जिस समय कोल ब्लाकों का आबंटन निजी कम्पनियों को हुआ, वो कोयला मंत्री नहीं थे? और कोयला मंत्रालय की जिम्मेदारी उन पर नहीं आती है? क्या निजी कम्पनियों को वित्तव्यवस्था में बड़ी जगह देने की नीति उनकी नहीं है? क्या उदारीकरण निजीकरण का दूसरा नाम नहीं है? आज जितने भी घोटाले हुए हैं, प्रधानमंत्री की हैसियत से उनकी हिस्सेदारी और जिम्मेदारी उनकी नहीं है?

एक सीधा सा सवाल हम और कर सकते हैं कि, कानून मंत्री, कोयला मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय, ”सीबीआर्इ की स्टेटस रिपोर्ट” में, जो परिवर्तन करायी, वह कोल ब्लाक आबंटन में मनमोहन सिंह की सम्बद्धता को घटाने-मिटाने वाले संशोधन नहीं हैं?

आप कह सकते हैं कि ”इस बात की स्पष्ट जानकारी नहीं है।”

हम भी मानते है। कि ”स्पष्ट जानकारी नहीं है”, मगर जांच यदि उनके कोयला मंत्री के कार्यकाल में हुए निजी कम्पनियों को आबंटित खदानों के खिलाफ चल रही है, तो सरकार किसे बचाने की कोशिश कर सकती है?

तत्कालिन कोयला मंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री?

जिन निजी कम्पनियों को कोयले की खदानें सौंपी गयीं उन्हें?

मतलब साफ है, कि मनमोहन सिंह और निजी कम्पनियां संदेहों के दायरे में हैं। और सरकार उन्हें ही बचाने की कोशिश कर रही है।

सर्वोच्च न्यायालय का रवैया सख्त है, मगर न्यायालय के कटघरे में कौन खड़ा होगा? यह बताया नहीं जा सकता, क्योंकि वित्तीय पूंजी की ताकत इतनी बढ़ गयी है, कि भारत की संसदीय व्यवस्था उनके बैठकखाने की मेहमान है, और न्यायालय इसी व्यवस्था का अंग है।

हम यह नहीं भूल सकते हैं, कि न्यायालय संवैधानिक प्रावधानों के अधीन है, और इसी महीने उसने खुदरा क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को सरकारी पक्ष में मंजूरी दी है। वह यह मानती है, कि सरकार की नीतियां और उसके तर्क सही हैं, इससे देश की वित्तव्यवस्था और आम जनता के हित प्रभावित नहीं होते। उसने उन तर्कों को खारिज कर दिया है, जो सरकार की नीतियों के विरूद्ध थे।

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के परिणामों ने भी यह प्रमाणित कर दिया है, कि देश की आम जनता विकल्पहीन है। राजनीतिक रूप से उसके सामने सिर्फ दो ही विकल्प हैं। भारतीय जनता पार्टी के भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की नीतियों के विरूद्ध केंद्र की भ्रष्टतम सरकार की सबसे बड़ी पार्टी कांगे्रस को सरकार बनाने की इजाजत मिल गयी है। भाजपा परेशान है कि वहां ‘नरेंद्र मोदी कार्ड’ नहीं चला और कांग्रेस की परेशानी यह है, कि यदि भ्रष्टाचार ही मूल मुददा है तो 2014 के आम चुनाव का क्या होगा?

हमारी परेशानियों का कोर्इ अंत नहीं है। पेशेवर राजनीतिक और कारोबारियों की जमात से घिरी जो व्यवस्था चल नहीं सकती, उसे और कब तक चलाया जायेगा?

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