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केंद्र की बिचौलिया सरकार

rashtriya mudda (2)यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल की सफलता और असफलता का आंकलन हो रहा है। सरकार श्वेत पत्र जारी कर 4 साल पूरे होने का जश्न मना रही है, तो प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ‘काला चिटठा’ खोलने की तैयारियां कर रही है। सोनिया गांधी कहती हैं- ”हमने अच्छा काम किया है।” मनमोहन सिंह भी कुछ ऐसे ही बुदबुदाते हैं। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि ”अपने पहले कार्यकाल में मनमोहन सिंह ने जितनी वाहवाही पायी थी, चार साल में उसे उन्होंने गवां दिया है।” यदि एक बार हम इस बात को मान भी लें तो, क्या इसका मतलब यह नहीं हुआ कि पांच साल की नेकनामी और चार साल की बदनामी के बीच समय का कोर्इ तालमेल नहीं है। जो चीज पांच साल में हासिल हुर्इ, वह छठे साल में ही चूकने लगी? क्या यह नहीं कहा जा सकता कि ”वाहवाही झूठी थी।” आंकलन का आधार सही नहीं है।

कुछ लोग यह मानते हैं कि ”कांग्रेस सर्वाजनिक क्षेत्रों को बचा कर निजीकरण की नीतियों को लागू करना चाहती थी, यही कारण है, कि मनमोहन सिंह के उदारीकरण की नीतियां, अपने निर्धारित लक्ष्य को पा नहीं सकीं।” वो यह मानते हैं, कि नीतिगत अपंगता की वजह से ही भारत की वित्तव्यवस्था में देशी और विदेशी पूंजी निवेश नहीं हुआ। वो यह भी मानते हैं, कि कारपोरेट घरानों को आकर्षित करने में यूपीए-2 की सरकार सफल नहीं हो सकी।

खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश, बैंकिग क्षेत्रों में सुधार और संस्थागत विदेशी निवेशकों को दी गयी छूट को वो अच्छा कदम मानते हैं। राज कोषीय घाटे को घटाने के लिये उठाये गये कदमों को वो अच्छा कदम मानते हैं जिसमें पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि से लेकर कृषि एवं खाद जैसे चीजों की सब्सीडी की समापित है। लगे हाथ वो भ्रष्टाचार और बढ़ती हुर्इ महंगार्इ को यूपीए-2 सरकार की असफलता का कारण बताते हैं।

यहीं आकर वो अपनी पाली बदलते हैं, या कुछ और करते हैं? बताना मुश्किल है।

मनमोहन सिंह सरकार को सिर्फ आर्थिक आधार पर आंका जा रहा है। और वो दुखी होते हैं, कि एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री नाकाम हो गया। देश की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। घरेलू उधोगों की हालत खराब है। दम तोड़ती अर्थव्यवस्था के लिये वित्तमंत्री का अपने देश के कारपोरेट घरानों के यहां चकराना और बहुराष्ट्रीय कारपोरेशनों के दरवाजे मत्था टेकने को वो राहत देने वाली नीतियां मानते हैं।

उदारीकण का मामला मनमोहन सिंह, और सिर्फ भारत से नहीं जुड़ा है। बल्कि यह विश्व मुक्त बाजारवाद से जुड़ा है। जहां अमेरिकी मंदी है, यूरोप का कर्ज सकंट है और बाजार के लिये मारा-मारी है।

अमेरिकी सरकार को अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये मुद्रा और निजी पूंजी निवेश की कमी कभी नहीं पड़ी।

यूरोपीय संध के पास भी भरपूर पूंजी थी। उन्होंने अपनी वित्तव्यवस्था को बिना किसी हिचक के वित्तीय पूंजी के हवाले कर दिया। वो बड़े ही धूमधाम से सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण करते चले गये। उन्होंने सामाजिक जिम्मेदारियों से हाथ खींच लिया और आम जनता पर नये कर लगाये, कटौतियां की। विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक से कर्ज लिये। मगर उनकी वित्तव्यवस्था संभल नहीं सकी। लड़खड़ाना और गोते लगाना आज भी जारी है। जिन वित्तीय इकार्इ एवं कारपोरेट घरानों को वैश्विक मंदी के पहले दौर में बेल आउट दिये गये, उन्होंने अपनी उत्पादन इकार्इयों को चीन में स्थापित किया। उन्होनें औधोगिक पलायन से अपने देश की सरकार को गहरा आघात दिया। अमेरिका ‘डेट्रायट’ बन गया और यूरोप ग्रीस की तरह अपने सरकारी क्षेत्रों की नीलामी कर रहा है। आम जनता अपने देश की सकरार के खिलाफ सड़कों पर है। इस साल का विकास दर शून्य है। चीन में भी आर्थिक एवं सामाजिक असमानतायें विस्फोटक हो रही हैं। क्या इसका मतलब यह नहीं है, कि मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था जहां टूट और बिखर रही है, और जहां पुर्नजीवित हो रही है, जन असंतोष और गिरावट वहां भी है। वित्तीय संकट और राजनीतिक संरचनायें टूट रही हैं। मतलब मुक्त बाजारवाद विकास की ऐसी दिशा है जहां मंदी और गिरावट और जन समस्याओं का बढ़ना स्वाभाविक है।

मनमोहन सिंह के उदारीकरण का यही विश्व परिदृश्य है। विकास की यही स्थिति है। भारत में स्थिति अभी इतनी बुरी नहीं है। हां, घपले और घोटालों की लम्बी फेहरिश्त है। राजनीतिक एवं आर्थिक भ्रष्टाचार की कोर्इ कमी नहीं है। जिसके मूल में अर्थव्यवस्था का निजीकरण और बेलगाम वित्तीय पूंजी है। राज्य के नियंत्रण से पूंजी का बाहर होते जाना और प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण बड़ी भूल है। और देश के यूपीए सकरार की यही सबसे बड़ी ‘उपलबिध’ है, जिसके सूत्रधार मनमोहन सिंह हैं।

राज्य के नियंत्रण से बाहर हुर्इ वित्तीय पूंजी सिर्फ अर्थव्यवस्था को ही प्रभावित नहीं करती, राजनीतिक प्रणाली और सामाजिक संरचना को भी प्रभावित करती है। बाजारवाद सिर्फ सामाजिक मूल्यों को ही नहीं तोड़ता, मानवीय मूल्यों की भी हत्या कर देता है।
मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जितने भी राजनीतिक एवं आर्थिक घपले और घोटाले हुए हैं, उसमें राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लाभ पहुंचाने के लिये राजनीतिज्ञों की सौदेबाजी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। जिसने विपक्ष को इस सीमा तक प्रभावित किया है, कि कहा जा सकता है कि सभी राजनीतिक दलों के आर्थिक कार्यक्रमों का उदारीकरण हो गया है। जिसमें राजनीतिक भ्रष्टाचार और आर्थिक घोटालों का होना स्वाभाविक है। ऐसा नहीं होता तो हमें आश्चर्य होता है। इसलिये ‘कोल ब्लाक आबंटन’ में कोयला मंत्री रहे मनमोहन सिंह की हिस्सेदारी है या नहीं? मसला सिर्फ यह नहीं है, बल्कि इस दौरान कामनवेल्थ खेल घोटाले से लेकर क्रिकेट के आर्इपीएल खेलों में स्पाट फिकिसंग सटटेबाजी में उनकी नीतिगत सम्बद्धता बनती है, क्योंकि उन्होंने ही बाजारवाद को इस देश में विकसित किया है। 2 जी स्पेक्ट्रम, मनरेगा, किसानों को सब्सीडी, हैलीकाप्टर खरीदी, रेलवे घूस काण्ड से लेकर खुदरा क्षेत्र में पूंजीनिवेश के लिये दी गयी दलाली और सलमान खुर्शीद, राबर्ट वाड्रा और नितिन गड़करी और सीबीआर्इ के रिपोर्ट और कैग रिपोर्ट को भुलाने और अधिकारों का उपयोग कर उसमें ताक-झांक करने तक में, उनकी सम्बद्धता सवाभाविक रूप से बनती है। पहले कार्यकाल की वाहवाही वास्तव में दूसरे कार्यकाल की पृष्टभूमि है, जिसके तहत श्वेत पत्र सफेद कागज का टुकड़ा होने के लायक भी नहीं है। भाजपा जिन काले कारनामों का खुलासा अभियान चलाना चाहती है, वह राजनीतिक लाभ उठाने का अवसर भर है।

राजनीति को कारोबार बना दिया गया, इसलिये कारोबार की तमाम बुरार्इयां पहले से ही बुरी राजनीति को इस सीमा तक बिकाऊ बना चुकी है, कि राजनेता, कैबिनेट, संसद और सरकार की प्रशासनिक इकार्इ ही नहीं, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका की औकात भी घट गयी है। रूपये की तरह राजनीति का भी अवमूल्यन हो गया है। वित्तीय पूंजी ने भारतीय गणतंत्र की राजनीतिक संरचना को तोड़ना शुरू कर दिया है। आज एक भी मंत्रालय और प्रशासनिक विभाग ऐसा नहीं है, जहां घपले और घोटालों की खुल या दबी फार्इलें नहीं हैं।

हम यह मानते हैं, कि राज्य, और उसके प्राकृतिक संसाधन पर आम जनता का अधिकार होता है, और सरकार को राज्य और आम जनता के प्रति जिम्मेदार होना चाहिये। देश की यूपीए सरकार इसी जिम्मदारी को घटाते-घटाते, उसे तोड़ चुकी है। संसद और सरकार को वित्तीय पूंजी का बिचौलिया बना दिया गया है। एक बिचौलिया सरकार जो कर सकती थी, मनमोहन सिंह की सरकार ने वही किया है। इसलिये, उसकी सफलता-असफलता को विश्लेषित करने का नजरिया वह नहीं है, जो होना चाहिये। उसने खुद को आम जनता के खिलाफ खड़ा किया है।

इसलिये, आम जनता और देशहित के नजरिये से मनमोहन सरकार का विश्लेषण करें तो दो टूक शब्दों में कहा जा सकता है, कि वह इन दोनों की घोर विरोधी है। नरेगा, मनरेगा और किसानों के कर्ज माफी का कार्यक्रम भी, आम जनता और सामाजिक एवं आर्थिक विकास के नाम पर विदेशी कर्ज लाद कर, उसमें सेंधमारी है। जिसका लाभ उन्हें नहीं मिला, जिसके नाम पर योजनायें बनीं। हां, हम विश्व बैंक से भारी कर्ज लेने वाला देश जरूर बन गये।

जो सरकारी खजाने में आने वाले धन के उपयोग में संतुलन और करारोपण को अमीरों की जेब से कुछ पैसा निकाल कर उसका कुछ हिस्सा गरीबों को देने के बाद निवेश की बात करते हैं, वो वास्तव में शातीर हैं। वो आम जनता को भिखमंगा और लुटेरों को सरकारी खजाना भरने वाला समझते हैं। देश की सरकार का हित बदल गया है। जिस भ्रष्टाचार और महंगार्इ की वजह से सरकार डूब रही है, वह इस व्यवस्था का स्वाभाविक चरित्र है, इसे रोका नहीं जा सकता। यूरोपीय देश और अमेरिका में इसे एक सीमा तक वैधानिक बना दिया गया है, आने वाले कल में भारत में भी इसे वैधानिक बना दिया जायेगा।

मौजूदा सरकार ने ”कोयला, जमीन, प्राकृतिक गैस से लेकर लोहा तक के प्राकृतिक संपदा की लूट को वैधानिक बनाया, आम आदमी को भ्रष्टाचार के साथ अनियंत्रित महंगार्इ दी। राजनीतिक विश्लेषक परंजय ने लिखा- ”खुले बाजार की आर्थिक नीति और पूंजीवाद में यकीन रखने वाली यूपीए सरकार ने इस लूट के जरिये एक नया ही ‘वाद’ पेश किया। कुल मिला कर महंगार्इ, भ्रष्टाचार और अहंकार के साथ बेवकूफी भरे कदमों ने यूपीए-2 के चार साल के कार्यकाल के रिपोर्ट कार्ड को काफी खराब कर दिया है।” उनका आंकलन है कि ”मुझे नहीं लगता कि यूपीए की तीसरी सरकार बन पायेगी।”

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