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समस्याओं को गलियां दिखायी जा रही हैं

saval dar savalराजपथ को खाली कराने के लिये समस्याओं को गलियां दिखायी जा रही हैं। पहले सामाजिक समस्याओं का निजीकरण किया जाता है, और फिर निजीकरण को राष्ट्रीय नीति में बदल दिया जाता है। नदी की धारा ऊपर से नीचे बह रही है, या नीचे से ऊपर बह रही है? पता ही नहीं चलता। पता चलता है कि देशों की सरकारें अपने ही देश के लोगों की जिम्मेदारी उठाने से भाग रही हैं। हमारी समझ में नहीं आता, कि हम अपनी मुसीबतों को रोयें, या सरकार की मुसीबतों का रोना सुनें? बड़ी मुश्किलों से घिरे हैं हम भार्इ, कि जो न अपना बोझ उठा सकती है, ना हमारी जिम्मेदारियों को उठाने के लायक है, हम उसका बोझ क्यों उठायें?

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राष्ट्रसंघ कहता है- ”कीड़े खार्इये।”

नाराज मत होर्इये, उन्हें आपकी फिक्र है। वो आपको भूख से मरता हुआ नहीं देख सकते हैं, इसलिये उनका मशविरा है, कि ”ज्यादा से ज्यादा कीड़े खाने से वैश्विक भुखमरी की समस्या से निबटा जा सकता है।” वो कीड़ों की खेती करने की सलाह भी देते हैं। मगर, वो अनाज को गोदामों में सड़ने या उन्हें आम जनता तक पहुंचाने की राह नहीं सुझा सकते। ऐसा करना उनके लिये मुनासिब नहीं है। जो मुफ्त में मिले और जिससे बाजार के लिये नयी संभावनायें बनें वही सुझाव अच्छा होता है।

संयुक्त राष्ट्रसंघ के खाध एवं कृषि संगठन ने कहा है कि ”कीड़े खाने से पौषिटक आहार मिल सकता है, और प्रदूषण कम करने में मदद भी मिल सकती है।”

आपको ऐसा नहीं लगता, कि यह बड़ी अच्छी बात है। वालमार्ट अब डब्बों में बंद कीड़े बेच सकता है। शाही दावतों में कीड़ों को भी शामिल किया जा सकता है। फिल्म अभिनेता विज्ञापन करेंगे- ”कीड़े खार्इये, खाधान्न संकट को भगार्इये।” मगर यह मशविरा भुक्खड़ लोगों के लिये है। ऐसे लोगों के लिये है, जो भूख और कुपोषण से बेवजह मर जाते हैं। जबकि मरने के लिये सैंकड़ों बीमारियां हैं। युद्ध है, अपराध है। हादसे, धमाके और हमले हैं।

रिपोर्ट के आंकड़ों में कहा गया है कि ”दुनिया भर में लगभग 2 अरब लोग अपने भोजन में कीड़ों को इस्तेमाल करते हैं।” मतलब खाते हैं। 1900 कीड़ों की ऐसी प्रजातियां हैं जिन्हें खाया जाता है। और सबसे बड़ी बात कीड़े सर्वव्यापी हैं। वैज्ञानिकों का कहना है, कि ”कीड़े पौषिटक होते हैं, इनमें प्रोटिन, फैट और मिनरल भरपूर होते हैं। ये कुपोषण के शिकार बच्चों के लिये पोषक तत्वों का काम कर सकते हैं।”

भारत में उदारीकरण के मसीहा डा0 मनमोहन सिंह के लिये यह खबर काम की हो सकती है, क्योंकि कम वजन और कुपोषण की वजह से अविकसित और ठिगने रह गये बच्चों की तादाद भारत में सबसे ज्यादा है। राष्ट्रसंघ की एजेन्सी यूनिसेफ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ”दुनिया में कुपोषण की वजह से अविकसित रह गये बच्चों में से 38 प्रतिशत बच्चे भारत में रहते हैं।” कुपोषण की वजह से ठिगने रह गये 5 साल तक के 80 प्रतिशत बच्चे 14 देशों में रहते हैं, जिसमें भारत सबसे आगे है। नाइजीरिया, पाकिस्तान, चीन, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, इथोपिया, कांगो, फिलिपिंस, तंजानिया, मिस्त्र, केन्या, यूगांडा और सूडान में संयुक्त रूप से कुल 42 प्रतिशत बच्चे हैं, जबकि भारत में यह 48 प्रतिशत है। इस तरह भारत में इस तरह की समस्या से पीडि़त लगभग हर दूसरा बच्चा है। इनकी कुल आबादी हमारे यहां 6.17 करोड़ है।

‘गरीबों की स्थिति’ विश्व बैंक की रिपोर्ट है

विश्व बैंक ने ‘गरीबों की स्थिति’ के नाम से एक रिपोर्ट जारी किया है, जिसमें 65 रूपये (1.25 डालर) प्रतिदिन की आय वाले 120 करोड़ लोग ऐसे है, जो गरीबी के शिकार हैं। और मापदण्ड के आधार पर एक तिहार्इ गरीब भारत में रहते हैं।

यह आंकड़ा विश्व बैंक का है। जिन्हें वह भारत में एक तिहार्इ मान रहा है, वस्तुत: वह उससे कर्इ गुणा है, हमारे देश में ऐसे लोगों की आबादी लगभग 68 करोड़ है। आपको पता है या नहीं, कह नहीं सकता बिहार में ‘गोबरा भात’ खाने वाले लोग भी हैं। झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में ऐसे आदिवासी हैं, जो पूरी तरह जंगलों पर निर्भर हैं। उन्हें कभी-कभार ही खुददी (चावल का टुकड़ा) खाने को मिल पाता है। कंद-मूल, पत्ते और छाल और कुछ जंगली जानवरों से ही उनका गुजारा होता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में एक बस्ती ऐसी भी है, जहां के बच्चे भूख से परेशान हो कर एक विशेष स्थान से निकलने वाली मिटटी खाते हैं, जिनमें थोड़ा-बहुत स्वाद भी है।

आंकड़ों के हिसाब से विकासशील देशों में गरीबी लगभग 21 प्रतिशत कम हुर्इ है। जबकि सच यह है कि इनकी तादाद 59 प्रतिशत बढ़ी है। मतलब 38 से 40 प्रतिशत इजाफा हुआ है।

रिपोर्ट के आधार पर लातिनी अमेरिकी देशों में 20 साल में 12 प्रतिशत से घट कर 6 प्रतिशत रह गयी है। चीन में यह 43 प्रतिशत से घट कर 13 प्रतिशत रह गयी है। मतलब, गरीबी की सबसे जर्बदस्त मार अफ्रीका और एशिया के गरीब देशों को झेलना पड़ रहा है। तीसरी दुनिया के इन बासिंदों का साथ उनके देश की सरकारें भी नहीं दे रही हैं। वित्त व्यवस्था का निजीकरण, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बढ़ती दखल, विश्व बैंक की जानलेवा योजनायें और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की मदद का सीधा प्रभाव वहां की आम जनता पर, नकारात्मक रूप से पड़ रहा है। वित्त व्यवस्था में उनकी बढ़ती हिस्सेदारी इन देशों की आम जनता के खिलाफ है। मगर सरकारें कहती हैं, कि विकास हो रहा है।

अफ्रिका के उप-सहारा क्षेत्र की स्थिति ऐसी है कि उन देशों की आम जनता पर वह कर्ज लद जाता है, जो उनकी सरकारें लेती हैं, जिसका एक पैसा भी उनपर खर्च नहीं होता। यूरोपीय देश और अमेरिकी सरकारें विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के जरिये, वहां की सरकारों को कर्ज, ऐसी शर्तों के तहत देती है, कि आधे कर्ज की राशि तत्काल उन तक पहुंच जाती है और जो बचा वह मुनाफे के साथ वापस आने की राह पर होता है। उन देशों को दिये गये कर्ज से, विकास के नाम पर और राजनीतिक स्थिरता के लिये खाधान्न एवं हथियारों की खरीदी करार्इ जाती है, जिसके विक्रेता देश यूरोप और अमेरिका होते हैं।

विश्व बैंक अपने रिपोर्ट में कहती है कि ”अफ्रीकी देशों की गरीबी दूर करने के लिये बहुत कुछ किया जा रहा है।” उनका यह करना ही अफ्रीकी महाद्वीप की सबसे बड़ी समस्या है। क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता और गरीबी का बने रहना ही उनके लिये जरूरी है, ताकि उनके प्राकृतिक सम्पदा का दोहन अपनी शर्तों पर किया जा सके। आज लातिनी अमेरिकी देशों में गरीबी, भुखमरी और कुपोषण की समस्याओं का जो अंत नजर आ रहा है, उसकी सबसे बड़ी वजह निजीकरण के विरूद्ध राष्ट्रीयकरण की समाजवादी नीतियां हैं। उन्होंने राज्य एवं उनकी सरकारों को आम जनता के पक्ष में खड़ा करने का निर्णय लिया है।

कुपोषण के खिलाफ निजी कम्पनियों की भागिदारी

मगर, हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सपनों में भी निजी कम्पनियां चक्कर लगाती रहती हैं। गरीबी और बच्चों के कुपोषण के खिलाफ वो निजी कम्पनियों को अपने साथ रखना चाहते हैं। उनकी मान्यता है, कि जो सरकार नहीं कर सकती, वो निजी कम्पनियां कर सकती हैं, इसलिये वो सरकार की योजनाओं में, उनकी भागीदारी चाहते हैं। वो चाहते हैं कि ”स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा’ बच्चों के संरक्षण पर सक्रियता का आव्हान योजना के अंतर्गत निजी कम्पनियों की भागीदारी हो। प्रधानमंत्री कार्यालय के विशेषज्ञों एवं चंद अधिकारियों ने उन्हें आगाह किया है कि ”निजी कम्पनियों की हिस्सेदारी किसी भी कीमत पर नहीं होनी चाहिये।”

”भारत की पोषण संबंधी चुनौतियों पर प्रधानमंत्री की समिति” के सदस्य अरूण गुप्ता सहित चार दर्जन से ज्यादा विशेषज्ञों ने कहा है कि ”पोषण संबंधी नीतियां बनाने में उन पक्षों को किसी कीमत पर शामिल नहीं किया जाना चाहिये जिनका स्वार्थ इसने जुड़ा है। बिसिकट से लेकर कर्इ तरह के फोर्टिफाइड खाध पदार्थ बनाने वाली कम्पनियां इन नीतियों को प्रभावित करने के लिये बड़ी रकम खर्च करने को तैयार रहती हैं।” इस योजना का विरोध सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली ”राष्ट्रीय सलाहकार परिषद” की सदस्य अरूणा राय व पूर्व सांसद ज्यां द्रेज ने भी किया है।

संयुक्त राष्ट्र की साझेदारी में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ”स्केलिंग अप न्यूट्रीशन (सन) मूवमेंट” की गतिविधियों के बारे में भी जानकारी दी गयी है कि ”सन के अंतर्राष्ट्रीय संयोजक डेविड नबारों भारत में योजना आयोग, स्वास्थ्य मंत्रालय, तथा महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के प्रमुख लोगों से मुलाकातें कर रहे हैं। ”ब्रेस्ट फीडिंग प्रमोशन नेटवर्क आफ इणिडया” ने कहा है कि ”सन मूवमेंट निजी क्षेत्र के साथ सरकारी भागीदारी के नाम पर इन कम्पनियों को बाजार दिलाने का काम करती हैं।”

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आर्इये, अब हम कुछ चीजों को एक सीध में खड़ा करके देखें।

संयुक्त राष्ट्रसंघ का खाध एवं कृषि संगठन कहता है कि ”कीड़े खाने से खाधान्न संकट से निपटा जा सकता है।”

वह यह नहीं कहता कि खाधान्न के विशाल एवं संचित भण्डार को -जो पर्याप्त से ज्यादा है- उसका समान वितरण इस समस्या का सही समाधान है।

सवाल होना चाहिये- क्यों?

विश्व बैंक ”गरीबों की स्थिति” पर रिपोर्ट जारी करती है कि ”1.5 डालर पाने वाले 120 करोड़ गरीबी के शिकार हैं”, वह यह नहीं बताती कि उसमें उसकी भूमिका कितनी जबर्दस्त है? वह यह भी नहीं बताती कि नवउदारवादी देश, मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था, कारपोरेट जगत और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों की भूमिका कितनी बड़ी है?

फिर सवाल खड़ा होता है- क्यों?

हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा बच्चों के कुपोषण के खिलाफ बनायी जा रही योजना में अपने ही प्रधानमंत्री समिति की चेतावनी कि ऐसी योजना में निजी कम्पनियों की भागीदारी खतरनाक होगी की बात नहीं सुनते।

सवाल एक बार फिर खड़ा हो गया कि ‘क्यों?’

राष्ट्रसंघ, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और उनके पीछे खड़ी यूरो-अमेरिकी शक्तियां, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और कारपोरेट जगत -जिन्हें तीसरी दुनिया के देशों में रहने वाले गरीब और भुखमरी तथा कुपोषण के शिकार लोगों की बड़ी फिक्र है- क्यों वर्ष 2012 में युद्ध पर 1735 बिलियन डालर खर्च करते हैं, मगर गरीबी को खत्म करने के नाम पर मात्र 135 बिलियन डालर ही खर्च करना पसंद करते हैं?

ऐसा क्यों है, कि दुनिया के 100 अमीरों का 2012 का मुनाफा इतना है कि दुनिया की गरीबी को 4 बार खत्म किया जा सकता है, मगर वो ऐसा नहीं करते हैं?

ऐसा क्यों है, कि सरकारें अब आम जनता की नहीं उनकी फिक्र करती हैं, जो गरीबी, भुखमरी और कुपोषण की वजह हैं?

हर एक सवाल का सीधा और सटिक जवाब है, यदि आप जानना चाहें। आज नहीं तो कल, आपको यह जानना ही होगा।

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