Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / कारोबारी रिश्तों से तय होती राजनीतिक दिशा

कारोबारी रिश्तों से तय होती राजनीतिक दिशा

rashtriya antarrashtriyaचीन से भारत के रिश्ते में महत्वपूर्ण सुधार हुए हैं, और यह मानने की स्थितियां बन गयी हैं, कि औपनिवेशिक ताकतों के द्वारा विवादास्पद मैकमोहन लार्इन का मुददा तथा साम्राज्यवादी ताकतों के द्वारा पैदा की जा रही युद्ध की लगातार आशंकाओं के बीच वार्ताओं की सकारात्मक सोच है। संभवत: चीन और भारत एशिया के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने लगे हैं। जिनसे उनका आपसी हित भी जुड़ा हुआ है।

र्इरान, पाकिस्तान और हिन्दुस्तान पार्इप लार्इन की योजना के प्रति, अपनी उदासीनता दिखाने के बाद, अब भारत को अपना राष्ट्रीय हित नजर आने लगा है। मार्च में, भारत के अलावा शेष दोनों देशों की सीमाओं पर इस पार्इप लार्इन का उदघाटन हुआ। र्इरान अपने क्षेत्र में पार्इप लार्इन बिछा चुका है और पाकिस्तान में काम की शुरूआत हो गयी है। जिसके लिये चीन के द्वारा पाक को आर्थिक सहयोग देने का प्रस्ताव भी है। भारत के प्रधानमंत्री ने जर्मनी में अपने राष्ट्रीय हितों को महत्व देते हुए, अमेरिका और यूरोपीय संघ की असहमति के बाद भी, र्इरान से तेल की खरीदी और अपने सम्बंधों को बढ़ाने की बात की और विदेशमंत्री ने र्इरान की यात्रा के दौरान दोनों देशों के सम्बंधों को बढ़ाने और प्रस्तावित पार्इप लार्इन के प्रति न सिर्फ अपनी उत्सुकता दिखायी, बल्कि उसमें शामिल होने का प्रस्ताव भी रखा।

माना यही जा रहा है, कि अपनी नवउदारवादी-मुक्त बाजार व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता रखते हुए, भी भारत अपने राष्ट्रीय हितों को वरियता देने की नीति की ओर लौट रहा है।

गये महीने यूरोपीय संघ से अपने रिश्तों को वित्तीय मोड़ देने के लिये मनमोहन सिंह ने जर्मनी की यात्रा की। 6 समझौते हुए, मगर वह नहीं हुआ, जो भारत चाहता था।

उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने तजाकिस्तान की यात्रा कर, सम्बंधों की नयी पहल की।

नेपाल के माओवादी नेता प्रचण्ड की भारत यात्रा से दोनों देशों के बीच के रिश्तों में सुधार की संभावनायें बढ़ी हैं, क्योंकि इससे पहले प्रचंड की चीन यात्रा के बाद दिये गये उनके वक्तत्यों में भारत-नेपाल और चीन के त्रिपक्षीय सम्बंधों को महत्व दिया। भारत अपनी गुटनिर्पेक्षता एवं तटस्थता की नीति से हटता चला गया। जिसका सीधा सा मतलब था कि, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बनते साम्राज्यावादी विकल्पों से वह कटने लगा। दो ध्रुवि विश्व और बहुध्रुवि विश्व के बीच उसकी उपस्थिति, एकाधिकारवादी यूरोपीय देश एवं अमेरिका के बीच दर्ज की जाने लगी। यह स्थिति रूस और चीन के बनते द्विध्रुवि विकल्प के विपरीत थी। भारत गुटनिर्पेक्ष देशों का संस्थापक सदस्य एवं बि्रक्स देशों का भी संस्थापक सदस्य है। गुटनिर्पेक्ष देशों के प्रति रूस एवं चीन की नीतियां काफी सकारात्मक रही हैं। और बि्रक्स देशों में भारत एक महत्वपूर्ण देश है, जो विश्व राजनीति में नये धु्रव की रचना कर रही है। चीन की वित्तीय एवं रूस की सामरिक क्षमता यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद के राह की सबसे बड़ी बाधा है।

यदि भारत और चीन के रिश्तों में तनाव रहता है, तो अमेरिका की मौजूदगी को उसका लाभ ही नहीं मिलेगा, रूस और चीन तथा बि्रक्स देशों का हित भी प्रभावित होगा। दोनों देशों के सम्बंधों के बीच रूस की मौजूदगी महत्वपूर्ण है।

भारतीय सीमा क्षेत्र लददाख दौलत बेग गोल्डी में चीन की सेना का घुस आना और तीन सप्ताह के तनाव तथा कर्इ फ्लैग मिटिंग की असफलता के बाद, जिस खामोशी से चीन की वापसी हुर्इ वह बिना किसी कूटनीतिक दबाव के सम्भव नहीं है। यह दबाव मौजूदा विश्व एवं एशिया की स्थिति और रूस के अलावा कहीं और से नहीं बन सकता है। इसलिये, भारतीय विदेशमंत्री की दो दिवसीय चीन यात्रा से पहले ही यह तय था, कि स्थितियां सकारात्मक होंगी और समस्या का स्थायी समाधान, वार्ताओं की मेज पर ही होना है।

भारतीय विदेशमंत्री की चीन यात्रा और मंत्री स्तर की बातचीत के बाद जो सच उभर कर सामने आ रहा है, उसका मंतव्य सिर्फ एक है, कि ”सीमा विवाद की वजह से मजबूत होते सम्बंधों को रोका नहीं जा सकता और दोनों देशों को अपने आर्थिक एवं क्षेत्रीय सम्बंधों को बढ़ाने की नीति पर चलना चाहिये।” चीन ने सीमा विवाद और नदियों के पानी, बांध एवं अन्य संवेदनशील मुददों पर भारत की चिंता के प्रति अपने रूख में बदलाव के संकेत दिये हैं। उसके द्वारा सीमा सुरक्षा सहयोग समझौता -”बार्डर डिफेन्स को-आपरेशन एगि्रमेण्ट”- का प्रस्ताव भी रखा गया है। जिसके प्रति भारत का रूख सकारात्मक है। भारत और चीन के विदेश मंत्रियों ने चीनी प्रधानमंत्री ली केजियांग की भारत यात्रा के समय कर्इ समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावनायें व्यक्त की थी। और चीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग की भारत यात्रा वास्तव में महत्वपूर्ण प्रमाणित हुर्इ है। वैसे भारतीय मीडिया और चीन के मामलों के पूर्व राजनीतिक एवं विश्लेषकों ने, विश्व के बदलते परिदृश्यों की अनदेखी कर, अपनी आशंकायें ही ज्यादा व्यक्त की है। उनका आंकलन अमेरिकी हितों की ओर झुका हुआ है। उन्होंने इस ओर से नजरें बचा कर रखी है कि-

• चीन दुनिया के वित्तीय ध्रुविकरण का नया केंद्र बन रहा है, जो मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था का ही संस्करण है।

• चीन की राजनीतिक साझेदारी, वित्त की तरह ही, रूस से जुड़ गयी है, और रूस दुनिया के राजनीतिक ध्रुविकरण के केंद्र में आता जा रहा है। सीरिया के संकट ने उसे महत्वपूर्ण बना दिया है।

• एशिया की शांति एवं स्थिरता के लिये रूस, चीन और भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है, क्योंकि अमेरिका और पश्चिमी देशों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी संयुक्त रूप से ही निभार्इ जा सकती है।

• चीन एशिया का सबसे महत्वपूर्ण देश है और भारत के लिये अमेरिकी खेमें में बने रहना, उसकी सेहत के लिये घातक है। उसे वहां होना चाहिये जहां उसकी स्वतंत्र छवि है।

• जी-8 की गिरती हुर्इ शाख और सदस्य देशों की लचर होती अर्थव्यवस्था ने खबर दे दी है, कि बि्रक्स देशों का महत्व बढ़ना तय है। रूस, चीन और भारत जिसके प्रभावशाली देश हैं। ब्रजील और द0 अफ्रीका के महत्व को भी आंका जा सकता है।

चीन और रूस अपने वित्तीय, राजनीतिक एवं सामरिक शक्ति से मुक्त बाजार का जो नया क्षेत्र बना रहे हैं, उससे हमारी सहमति हो या न हो, मगर पतनशील अमेरिकी एवं यूरोपीय साम्राज्य के मुक्त बाजारवाद से जुड़े रहने के बजाये, नयी संभावनाओं से जुड़ना ही भारत के हित में है। यूरो-अमेरिकी शक्ति के पतन की शुरूआत हो चुकी है।

भारत बहुध्रुवि विश्व की समाजवादी अवधारणा से जुड़े, यह हम चाह सकते हैं, मगर, भारत के विकास की दिशा एवं राजनीतिक स्थितियों में इसकी संभावनायें नहीं हैं। भारत की मौजूदा राजनीतिक एवं वित्तीय प्रणाली डूबते जहाज पर सवार है। जिसे संभालने की ऐसी कोशिशें हो रही हैं, जिसके बारे में यकीन के साथ कहा जा सकता है, कि ”जो व्यवस्था अपनी विसंगतियों से टूट और बिखर रही है, उसे कील ठोंक कर बचाया नहीं जा सकता।” यूरोप और अमेरिका में उसकी असफलता सुनिश्चित हो गयी है। जिसका प्रभाव सारी दुनिया के देशाें पर पड़ा है।

चीन की आर्थिक समृद्धि और बढ़ती सामाजिक एवं आर्थिक असमानता, अपने प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन, राज्य के संरक्षण में निजी पूंजी को दी गयी छूट और अमेरिका तथा यूरोपीय देशों से औधोगिक पलायन की वजह से है। वह दुनिया का सबसे बड़ा निवेशक देश तो बनात जा रहा है, मगर, उसकी सामाजिक एवं वित्तीय संरचना का स्वरूप बदल गया है। वह पूंजीवादी विश्व की वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा बन गया है, जिस पर मंदी की गहरी छाया पड़ रही है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था का विकास रूक गया है, और यूरोपीय अर्थव्यवस्था में विकास दर के नाम पर कहीं कोर्इ ठहराव नहीं है, वह गोते पर गोता लगा रही है।

भारत का बाजार और भारत के प्राकृतिक संसाधन का महत्व, चीन के लिये इन्हीं कारणों से बढ़ गया है।

यह कड़वी सच्चार्इ है कि कारोबारी रिश्ते ही आज राजनीतिक सम्बंधों को नियंत्रित कर रहे हैं।

वैश्विक मंदी ने सामाजिक एवं राजनीतिक सम्बंधों के समिकरण को बदल दिया है।

भारतीय वित्तव्यवस्था को विदेशी पूंजी निवेश की सख्त जरूरत है। जिन कारोबारी अनिवार्यताओं से चीन संचालित हो रहा है, उन्हीं अनिवार्यताओं से भारत भी संचालित हो रहा है। इसलिये, राजनीतिक मुददों को लेकर गढ़ी जा रही आशंकाओं के बारे में न तो भारत सरकार सोच रही है, ना ही चीन की नयी सरकार। यही कारण है कि भारत की सरकार सीमा विवाद, ब्रम्हपुत्र नदी पर बांध की योजना से लेकर व्यापारिक घाटे का जिक्र करती रही और चीन के प्रधानमंत्री ली केजियांग उसे आश्वस्त करते रहे। चीनी प्रधानमंत्री दोनों देशों की ऐतिहासिक पृष्टभूमि से लेकर भावी स्वरूप का शानदार खाका खींचते रहे। उन्होंने कहा- ”इतिहास ने सीमा विवाद दोनों देशों पर थोपा है। इसे आपस में मिल कर ही सुलझाना होगा।” उन्होंने दोनों देशों के अच्छे सम्बंधों को विश्व शांति और खुशहाली के लिये जरूरी बताया।

दोनों देशों के बीच आर्थिक एवं सामरिक क्षेत्रों में 8 करारों पर हस्ताक्षर किये गये। जिसके तहत विश्व बाजार में दोनों देश एक दूसरे के हितों का खयाल रखेंगे। इस ‘खयाल रखने’ का ठोस आधार अभी इन दोनों देशों के बीच नहीं है। इसका ठोस होना इस बात पर निर्भर करता है, कि दोनों देश अपनी समस्याओं के साथ कैसा सुलूक करते हैं? वो अपनी तात्कालिक अनिवार्यताओं से संचालित होते हैं, या उनका हित दूरगामी भी है?

चीन भारत सम्बंधों के राजनीतिक विश्लेषक एवं पूर्व राजनयिक भी यह मानते हैं कि ”आर्थिक एवं राजनीतिक सम्बंधों में मजबूती दोनों देशों के हित में है।”

भारत बाजारवादी वित्तीय संकट से घिरा हुआ है। उसकी राजनीतिक संरचना भी संकट ग्रस्त है। आर्थिक एवं राजनीतिक भ्रष्टाचार अपने चरम पर है और सामाजिक असंतोष भी बढ़ता जा रहा है। चीन की आंतरिक स्थिति भी खास अच्छी नहीं है। उसके पांव के नीचे से विचारों की जमीन खिसक गयी है, और समाजवादी समाज के निर्माण की दिशा दुर्घटनाग्रस्त हो गयी है। बाजारवादी अर्थव्यवस्था और नव उदारवादी वैश्वीकरण ने उसे भी उन्हीं विसंगतियों के जाल में फंसा दिया है, जिसमें भारत फंसा हुआ है। उसकी विस्तारवादी नीतियों की वजह से ही उसकी विश्वस्नियता आज भी संदेहों के दायरे में है। भारत के अलावा जापान, द0कोरिया, वियतनाम, कम्बोडिया और फिलिपिन्स से भी उसके सम्बंध उलझे हुए हैं। उसके सामने अपने आर्थिक एवं राजनीतिक हितों को सुरक्षित रखने की ऐसी जिम्मेदारी है, जिसे वह अकेले पूरा नहीं कर सकता। यही कारण है, कि वरियता के आधार पर वह अपनी समस्याओं के समाधान के लिये पड़ोसी देशों से सम्बंधों की नयी पहल कर रहा है। एशिया प्रशांत क्षेत्र एवं कोरिया प्रायद्वीपों में अमेरिकी सक्रियता, उसके लिये चुनौती बन गयी है।

आज एशिया की जैसी स्थितियां बन गयी हैं, वह आज से पहले कभी नहीं थी। अरब जगत की समस्याओं ने विस्तार पा लिया है। आर्थिक जटिलताओं ने नयी सामरिक उलझनें पैदा कर दी हैं। यदि चीन अपने पड़ोसी देशों से अपने संंबंधों को मजबूत नहीं कर सका तो इसका लाभ अमेरिका को मिलना तय है, जिसके प्रति भारत सरकार का रवैया बड़ा ही नरम है। जबकि सारी दुनिया के लिये वह सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। एशिया में क्षेत्रीय संतुलन के लिये भारत का महत्व पहले से ज्यादा बढ़ गया है। यदि भारत अपनी आंतरिक समस्याओं का समाधान कर ले, तो अंतर्राष्ट्रीय स्थितियां उसके विकास के लिये अनुकूल हैं।

भारत और चीन के बीच सुधरते सम्बंधों को अमेरिका अपने सुरक्षित क्षेत्र में चीन की घुसपैठ के रूप में भी देख सकता है। जहां उसकी आर्थिक एवं सामरिक पैठ मजबूत है। भारतीय बाजार में चीन के उत्पाद का होना, और भारतीय वित्त व्यवस्था में चीन की सरकार और चीनी कम्पनियों के द्वारा पूंजीनिवेश उसकी लड़खड़ाती वित्त व्यवस्था के लिये बड़ी चुनौती होगी। दोनों ही देश अपने आपसी कारोबार को अपनी मुद्रा में करने के पक्ष में हैं, जोकि वैश्विक मुद्रा के रूप में प्रचलित डालर के लिये खतरा है। वैसे भी बि्रक्स देश अपने बैंक एवं अपनी साझा मुद्रा के निर्माण में लगे हैं, जहां रूस और चीन की वरियता है। ब्रजील जिसके पक्ष में है, और भारत तथा द0 अफ्रीका सतर्कता के साथ अपनी सहमति दे चुके हैं।

हम कह सकने की स्थिति में हैं कि भारत और चीन के द्विपक्षीय सम्बंधों का महत्व रूस और बि्रक्स देशों के लिये भी जरूरी है। इसका आर्थिक एवं सामरिक प्रभाव दूर तक पड़ेगा।

इसी दौरान अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजर्इ ने भी भारत की यात्रा की, जिनके सामने तालिबान और बहुराष्ट्रीय सेनाओं से ध्वस्त हुए अफगानिस्तान के निर्माण और सुरक्षा की जिम्मेदारी है, जो भारत से अपने परम्परागत रिश्तों के साथ आज की जिम्मेदारियों के तहत रिश्तों में नयी शुरूआत चाहते हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी एवं पश्चिमी देशों की सेना की वापसी के बाद, आतंकवाद की आशंकाओं से निपटने के लिये चीन ली की यात्रा से पहले ही भारतीय प्रतिनिधि मण्डल से संयुक्त कार्यक्रम चाहता है। अफगानिस्तान की आज भी सबसे बड़ी परेशानी अमेरिका एवं उसके समर्थक आतंकी संगठन हैं। जहां आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी ड्रोन हमले हो रहे हैं। जिसके खिलाफ पाक-अफगान आवाम है, और पाकिस्तान भी इसे अपनी सम्प्रभुत्ता का उल्लंघन मानने लगा है।

इस बीच भारत के प्रधानमंत्री ने जापान और थार्इलैण्ड की यात्रा की। मनमोहन सिंह चीन के प्रधानमंत्री से हाथ मिलाते हुए जितने खामोश थे, जापान के प्रधानमंत्री से हाथ मिला कर वो उतने ही खुश नजर आये। उन्होंने हिंद महासागर और एशिया प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य सक्रियता पर चिंता ही व्यक्त नहीं की जापान के साथ व्यावसायिक एवं सामकिर समझौते भी किये। उन्होंने एशिया प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी मौजूदगी को अपनी स्वीकृति दी। यदि अमेरिकी सक्रियता बढ़ती है -जोकि तय है- तो भारत और चीन के सम्बंधों के तनाव का बढ़ना भी तय है। मनमोहन सिंह की दांव-पेंच भरी अमेरिकी प्रतिबद्धता ही जापान की यात्रा के दौरान नजर आयी। सवाल यह है, कि क्या भारत का हित अमेरिकी साम्राज्यवाद से जुड़ कर सध सकता है? क्या भारत अमेरिकी खेमा और रूसी-चीनी खेमा के बीच से अपने लिये सुरक्षित रास्ता निकाल सकता है? सवाल यह भी है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की शांति एवं स्थिरता के लिये अमेरिकी साम्राज्य से बड़ा कोर्इ और खतरा है?

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top