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यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था, इस साल भी नहीं संभलेगी

europeयूरोपीय देश, यूरोपीय संघ और यूरो जोन के देशों के बारे में कुछ भी अच्छा सोच पाना मुश्किल हो गया है। सरकारें अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये सिर्फ एक काम कर रही हैं- अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों से कर्ज लेना और उनकी शर्तों को मानना। शर्तों के तहत सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण, सरकारी सम्पत्ति की नीलामी और सामाजिक क्षेत्रों में कटौतियों के साथ करों में भारी वृद्धि। इसके बाद भी, किसी भी यूरोपीय देश की अर्थव्यवस्था में संभलने की थोड़ी सी भी संभावनायें नजर नहीं आ रही हैं। यूरोपीय संघ की पांच में से तीन बड़ी अर्थव्यवस्था -फ्रांस और जर्मनी- की हालत अब गंभीर होती जा रही है। फ्रांस खुद को बचाने की ऐसी लड़ार्इ लड़ रहा है, जिसमें उसका हारना तय है। जर्मनी भी अपनी स्थिति खोता हुआ, शेष चार बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ खड़ा होने की स्थिति में है। जर्मनी का डूबना यूरोपीय संघ का डूबना प्रमाणित होगा।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की भविष्यवाणी है कि ”इस साल यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था में विकास नहीं होगा।” विकास का न होना, किसी ठहराव का नहीं, बल्कि, उसके लगातार गिरावट की भविष्यवाणी है। 15 मर्इ को जारी ‘यूरो स्टेट डाटा” के अनुसार साल 2013 के पहली तिमाही में यूरोजोन के सदस्य देश मंदी से जूझते रहे हैं। 17 सदस्यीय यूरोजाने की अर्थव्यवस्था जनवरी से मार्च के बीच 0.1 प्रतिशत और घट गयी है। पिछले 4 तिमाही से इन देशों की अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। 3 मर्इ को जारी यूरोपीय कमीशन का अनुमान है, कि अर्थव्यवस्था में 0.4 प्रतिशत की और गिरावट आयेगी। स्पेन, इटली और निदरलैण्ड मंदी से जूझते रहेंगे। अनुमान के अनुसार, साइप्रस भयानक मंदी में चला जायेगा। उसके सकल घरेलू उत्पाद में 2 सालों में 12.6 प्रतिशत का संकुचन तय है।

बढ़ती महंगार्इ और काम के अवसर की कमी।

आर्थिक अनिश्चयता और गिरता हुआ जीवनस्तर।

सरकारी सहयोग में कटौतियां और करों का बढ़ता बोझ।

सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण और बंद होती औधोगिक इकार्इयां।

अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट और जनप्रदर्शनों का लगातार बढ़ना यूरोपीय देशों की अपनी पहचान बन गयी है। यूरोपीय संघ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, और अपने देश की सरकार प्रदर्शनकारियों के निशाने पर है। अब यह विरोध एवं जनप्रदर्शन मौजूदा यूरोपीय व्यवस्था को बदलने के संघर्ष में बदलता जा रहा है। ज्यादातर लोग अपने देश को यूरोपीय संघ से अलग करने के पक्षधर है।।

14 मर्इ को जारी ‘पीयू ग्लोबल’ के रिपोर्ट से यह बात सामने आयी है, कि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में उसकी शाख और उपादेयता घट गयी है। यदि 2012 में 60 प्रतिशत लोग उसके पक्ष में थे, तो 2013 में यह प्रतिशत घट कर 45 प्रतिशत रह गया है। रिसर्च सेण्टर ने 8 यूरोपीय संघ के देश -जर्मनी, बि्रटेन, फ्रांस, इटली, स्पेन, ग्रीस, पोलैण्ड और चेक रिपबिलक के 7646 लोगों से सवाल पूछे थे। फ्रांस में यूरोपीय संघ के बारे में उनकी सोच सबसे ज्यादा बदली है। 2012 में 60 प्रतिशत फ्रांसीसी यूरोपीय संघ के पक्षधर थे, मगर, अब 41 प्रतिशत लोगों ने ही यूरोपीय संघ के प्रति अपना विश्वास व्यक्त किया। वर्तमान में पूरे यूरोप में, 54 प्रतिशत जर्मन के लोग ही यूरोपीय संघ को समर्थन देते हैंं, यह सबसे बड़ा समर्थन है। ग्रीस और इटली में तो मात्र 11 प्रतिशत लोग ही है, जो यूरोपीय संघ के पक्षधर हैं।

पीयू ग्लोबल ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि ”यूरोप के वित्तीय संकट ने एक ऐसी ताकत का निर्माण कर दिया है, जो एक यूरोपीय देश को दूसरे यूरोपीय देशों के लोगाें से दूर ले जा रही है।” सर्वे के अनुसार- ”स्पेन, इटली और ग्रीस के लोग यूरोपीय संघ के सबसे ज्यादा निराश हैं, यही स्थिति ज्यादातर देशों की है।”जहां वित्तीय संकट का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है। यूरोपीय संघ में बने रहने के प्रति, भले ही सदस्य देशों के लोगों की सोच का अनुपात अलग है, किंतु अपनी समस्याओं के समाधान के प्रति, उनका नजरिया लगभग एक है। यूरोपीय वित्तीय संकट ने उन्हें काफी करीब ला दिया है। ‘हम सब ग्रीक हैं’ का नजरिया बढ़ गया है, और एक देश के जनप्रदर्शनों को दूसरे देशों का व्यापक समर्थन हासिल है। लोगों का व्यवस्था विरोधी दृष्टिकोण गैर पूंजीवादी हो गया है। लोगों की नाराजगी और रोज बढ़ता जनअसंतोष सिर्फ अपने देश की सरकार के प्रति नहीं है, बल्कि वो यूरोपीय कमीशन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक के प्रति हैं, जिनके दबाव में सरकारें काम कर रही हैं। जिसने यूरेापीय देशों के सामने ऐसी परेशानियां खड़ी कर दी है, जिसका सामना उन्होंने पहले कभी नहीं किया था- 1930 के वैश्विक मंदी के दौरान भी। भूख, गरीबी, और बेरोजगारी की भयावह स्थितियां उन्होंने तीसरी दुनिया के लिये छोड़ रखा था, जिसमें वो फंस गयी है।

यूरो स्टेट के आंकड़ों से पता चलता है कि 17 सदस्यीय यूरोजोन में अधिकृत रूप से बेरोजगारी दर 12.1 प्रतिशत हो गयी है, जो पिछले साल की तुलना में 1.1 प्रतिशत अधिक है। कुल मिला कर 19.21 मिलियन लोग पूरी तरह बेरोजगार हैं।

27 सदस्य देशों वाली यूरोपीय संघ के 19 देशों में बेरोजगारी बढ़ी है। ग्रीस में यह 27.2 प्रतिशत हो गयी है। जो पिछले साल की तुलना में 5.7 प्रतिशत ज्यादा है। सार्इप्रस में बेरोजगारी दर 14.2 प्रतिशत है, जबकि पिछले साल 10.7 प्रतिशत थी। यूरोपीय संघ में युवा बेरोजगारी दर में भारी इजाफा हुआ है। 5.5 मिलियन युवा बेरोजगार हैं। ग्रीस में 64.2 प्रतिशत, स्पेन में 55.9 प्रतिशत और इटली में 38.4 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं।

यूरोपीय संघ में 26 मिलियन लोग ऐसे हैं, जिनके पास कोर्इ काम नहीं है। इनमें 6 मिलियन लोग स्पेन में और 5 मिलियन लोग फ्रांस में हैं। वैसे जर्मनी में बेरोजगारी दर मात्र 7 प्रतिशत है, मगर जिनके पास काम है, उनकी स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं है -खास कर कम वेतन पाने वाले लोगों की। हातर्ज ला ने एक कम वेतन पाने वाले वर्ग की रचना कर दी है। 42 मिलियन कर्मचारियों में से 29 मिलियन लोगों को तो सोसल इन्स्योरेन्श से सुरक्षा मिली है, मगर शेष लोगांें के पास अनिश्चयता और जोखिमों से भरा काम है। इनमें से 4 मिलियन लोगों की आय 7 यूरो प्रति घण्टे से भी कम है। उनकी स्थिति ऐसी है, कि अपनी मूलभूत जरूरतों को पूरा कर पाना, उनके लिये संभव नहीं है। और ऐसे वर्ग के लोगों के लिये चलाये जा रहे सामाजिक कार्यक्रमों के जरिये जो सहायता सरकार के द्वारा दी जाती थी, उनके शिक्षा, चिकित्सा और पेंशन की जो व्यवस्था की जाती थी, उसमें भारी कटौतियां कर दी गयी हैं। साथ ही सरकारी करों में न सिर्फ भारी वृद्धि की गयी है, बल्कि नये कर भी लगाये गये हैं। ऐसे जमा धनराशि का उपयोग अब इन सामाजिक कार्यक्रमों के लिये नहीं किया जाता है। बल्कि 1.6 टि्रलियन यूरो -एक बड़ी धनराशि- का भुगतान सरकार के द्वारा दिवालिया हो रहे बैंकों को संभालने और सरकारी कर्ज का भुगतान के लिये खर्च किया गया है। जिसका लाभ आम जनता को नहीं मिला, वह दिवालिया होती चली गयी। कर्ज के बोझ से दब गयी है।

यूरोपीय देशों के वित्तीय संकट का पूरा लाभ, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इ और यूरोप के प्रमुख बैंकों ने उठाया। जिन्होंने संकटग्रस्त देशों की अर्थव्यवस्था पर, बैंकों एवं वित्तीय इकार्इयों के जरिये, अपना अधिकार जमा लिया है। वर्ष 2012 के आखिरी तिमाही में यूबीएस, स्वीस बैंक और लायडस बैंकिंग ग्रुप आफ बि्रटेन ने उम्मीदों से बड़ा मुनाफा कमाया है। जबकि पूरा यूरोप भयानक मंदी के दौर से गुजर रहा है।

यूरोपीय संघ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक एवं अन्य अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों और उनके पीछे खड़े विशालतम कारपोरेशनों ने ‘यूरोपीय संकट’ को ‘कर्ज के संकट’ में बदल कर, अब लूट का नजरिया बना लिया है। जिसमें संकटग्रस्त देशों की सरकारें भी शामिल हैं। यूरोपीय संघ का टूटना और यूरोजोन का बिखरना रोज सुनिश्चित होता जा रहा है, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था के पास जन समस्याओं का समाधान नहीं है।

यूरोप का आम आदमी अपनी समस्याओं का समाधान चाहता है। वह सोचने लगा है कि सरकारें उसे लूट रही हैं, और अब वह लुटना नहीं चाहता। उसकी प्रतिक्रिया जनप्रदर्शनों, जनआंदोलनों और जनसंघर्षों का रूप ले ली है। वह निजी तौर पर भी अब प्रतिरोध करने लगा है। पुर्तगाल के पीटर ओलिवर ने अपने मेडिकल बिलों का भुगतान करने के लिये बैंक डकैती की। वह भी मात्र एक हजार यूरो की। उसे खाना और अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिये पैसों की जरूरत थी। वह दाने-दाने को मुहताज था। भूख, गरीबी, और अपनी पत्नी के इलाज के लिये, उसे अपने तीन दशक से भी लम्बे र्इमानदार और मेहनती जीवन को छोड़ कर अंतत: अपराध को स्वीकार करना पड़ा।

उसने कहा- ”घर में कर्इ दिनों से कुछ खाने को नहीं था, मेरी पत्नी बीमार थी। मैंने अपने ही बैंक को चुना और बच्चों के असली दिखने वाले (खिलौने) गन से लगभग एक हजार यूरो की डकैती की।” उसने बताया मैंने खाने के लिये सामान खरीदे और मेडिकल बिलों का भुगतान किया।” उसने अपने इस काम की व्याख्या इस रूप में की कि ”उन्होंने जैसे मुझे लूटा है, मैंने भी उन्हें वैसे ही लूट लिया। मुझे खुद पर गर्व नहीं हैं, मगर मैं मानता हूं, कि राज्य ने मुझे ऐसा करने के लिये विवश किया है।” पीटर ओलिवर जैसे लोगों की तादाद रोज बढ़ रही है। यूरोप के वित्तीय संकट झेल रहे देशों में, ऐसे अपराध का बढ़ना जारी है, जिसके लिये राज्य और उनकी सरकारें जिम्मेदार हैं। वो लोग जिम्मेदार हैं, जो वित्तीय संकट के नाम पर आम लोगों को लूट रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार यूरोपीय संघ को हर साल 1000 बिलियन यूरो का घाटा आर्थिक घोटालों की वजह से होता है। यूरोपीय संघ की पांच में से चार बड़ी अर्थव्यवस्था की हालत गंभीर है और छोटी अर्थव्यवस्था की हालत उससे भी बुरी है। यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जनविरोधी नीतियों ने यूरोपीय देशों के सामाजिक जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। यूनिसेफ के रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीस में 6 लाख बच्चे गरीबी की रेखा के नीचे का जीवन जी रहे हैं। जिसका विस्तार पूरे यूरोप में होता जा रहा है। समाज नकारात्मक परिस्थितियों से घिरा है और जनविरोधी सरकारें युद्ध और दमन से अपने को बचाने में लगी हैं।

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