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फ्रांस- यूरोप की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में

यूरोप की सबसे बड़ी दूसरी अर्थव्यवस्था -फ्रांस भी अब संकट ग्रस्त है। वर्ष 2013 की पहली तिमाही में उसका सकल घरेलू उत्पाद 0.2 प्रतिशत घटा है। 2012 के आखिरी तिमाही में भी 0.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी थी। फ्रांस नेशनल इन्स्टीच्यूट आफ स्टेटिसटिक्स एण्ड इकोनामी स्टडी ने 15 मर्इ को यह जानकारी दी। इस गिरावट के साथ ही यूरोपीय संघ के प्रति समर्थन और देश के राष्ट्रपति हालंदे की लोकप्रियता में भी भारी गिरावट आयी है। अब फ्रांस यूरोपीय संघ को निराश करने वाला देश बन गया है। 2014 में यदि 60 प्रतिशत फ्रांसवासी यूरोपीय संघ के समर्थक थे, तो आज बमुश्किल 41 प्रतिशत लोगों का समर्थन उसे हासिल है। राष्ट्रपति हालंदे तो अपनी अलोकप्रियता के चरम पर हैं।

5 मर्इ को फ्रांस की हालंदे सरकार का एक साल पूरा हुआ। फ्रांस के 50 साल के इतिहास में यह पहली घटना है, कि किसी राष्ट्रपति की लोकप्रियता में इतनी बड़ी गिरावट आयी हो। आज की तारीख में 25 प्रतिशत से भी कम लोगों का समर्थन उन्हें हासिल है। इस बढ़ते जन असंतोष की सबसे बड़ी वजह तेजी से बढ़ती बेरोजगारी है। 3.2 मिलियन लोग काम की तलाश में हैं, और उनके पास कोर्इ काम नहीं है।

हालंदे ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान देश की जनता से वादा किया था, कि ”वो फ्रांस के सबसे अमीर लोगों पर 75 प्रतिशत आम कर लगायेंगे।” मगर एक साल पूरा होने के बाद भी उन्होंने इस बारे में कोर्इ पहल नहीं की। देश की जनता इस बात को समझ चुकी है कि ”सरकार चाहे जिसकी भी हो वह अमीरों के हितों को प्रभावित नहीं होने देगी।” पिछले साल औधोगिक घरानों पर नये करों का प्रावधान पेश किया गया था, जिसने औधोगिक विकास को इस रूप में प्रभावित किया, कि वहां से उधोगों के पलायन के साथ, पूंजी निवेश भी घट गया।

फ्रांस के बजटमंत्री जेरोम के द्वारा यह स्वीकार करने पर कि ”उन्होंने अपने स्वीस बैंक एकाउण्ट में 6,00,000 यूरो जमा कर रखा है” ने होलांदे की शाख को और खराब कर दिया है। उनकी लोकप्रियता में इजाफा तब हुआ था, जब फ्रांस के द्वारा अफ्रीकी देश माली पर हमला किया गया था। मगर यह बढ़त धीरे-धीरे वित्तीय संकट की वजह से अलोकप्रियता में बदलती चली गयी।

फ्रांस की सरकार ने यह घोषणा की है कि 2019 तक सेना में भी 34,000 नौकरियों में कटौतियां की जायेंगी। देश की आम जनता और सेना के विश्वास को बनाये रखने की नयी कवायतें शुरू हो गयी हैं। फ्रांस के रक्षामंत्री ने कहा है कि ”उनका देश अमेरिका अैर इस्त्राइल से सर्विलांस ड्रोन की खरीदी पर बात कर रहा है, ताकि फ्रांसीसी सेना की सैन्य क्षमता को बढ़ाया जा सके।”

17 मर्इ को एयर ए कासमास पत्रिका में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि ”वाशिंगटन और पेरिस के बीच एक सैन्य सौदा हुआ है। फ्रांस ने अमेरिका से दो ड्रोन विमानों की खरीदी माली में अपनी सेना को मजबूती देने के लिये करेगा।” रिपोर्ट में कहा गया है, कि ”फ्रांसीसी एयरफोर्स, जिसने पहले से ही इस्त्राइली ड्रोन पश्चिमी अफ्रीकी देशों में तैनात कर रखा है, अब जल्द से जल्द और आधुनिकतम ड्रोन खरीदना चाहता है।”

18 मर्इ को ली मोण्डे ने रिपोर्ट दी है, कि पेरिस कुल 5 या 7 अमेरिकी अनआर्मड रिपर सर्विलांश ड्रोन खरीदने पर विचार कर रहा है, जिसकी कीमत 300 मिलियन यूरो (384,72 मिलियन डालर) होगी।

हालंदे सरकार की योजना है, कि मध्य-पूर्व एशिया और अफ्रीकी देशों के अपनी राजनीतिक उपस्थिति मजबूत करने के लिये, वह अपने दूतावास एवं राजनयिकों की सुरक्षा की मजबूत व्यवस्थ करेगा। उसके लिये 20 मिलियन यूरो का प्रस्ताव है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने 22 मर्इ को कहा कि ”बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय संकट और खतरों की वजह से यह कदम उठाया जा रहा है।” जहां अमेरिका औ पश्चिमी देशों के खिलाफ जनप्रदर्शन हो रहे हैं।

अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की तरह ही फ्रांस भी अपनी आंतरिक समस्याओं के समाधान के लिये तीसरी दुनिया के देशों -एशिया और अफ्रीका विशेष रूप से, जहां उनके उपनिवेश रहे हैं- को निशाने पर ले रहे हैं। उनकी आयातित समृद्धि इन्हीं देशों के शोषण और दमन पर टिकी है।

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