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सार्इप्रस- का गहराता वित्तीय संकट

europe (3)सार्इप्रस ने अपने वित्तीय संकट को टालने के लिये यूरेापीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से कर्ज ले, उससे बड़े संकट में अपने को फंसा लिया है। 17 मर्इ को अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने एक रिपोर्ट जारी किया है, जिसमें सार्इप्रस के बारे में कहा गया है, कि ”सार्इप्रस में इस साल और अगले साल भयानक मंदी रहेगी। यह मंदी और भी भयानक हो सकती है, यदि 13 बिलियन डालर के बेल आउट करार के शर्तों को सख्ती से लागू नहीं किया गया।”

अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का अनुमान है कि ”तीन साल तक भयानक मंदी झेलने के बाद ही 2015 में सार्इप्रस का वित्तीय विकास की शुरूआत हो सकती है।” अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने आगे कहा है, कि ”सार्इप्रस सरकार को यह आश्वस्त करना चाहिये, कि वह करार की शर्तों का सख्ती से पालन करेगी, और कटौतियों को लागू करेगी।”

सार्इप्रस की सरकार जिन वित्तीय संकट से घिरी है, और यूरोपीय संघ में बने रहने के लिये बेल आउट के करार को उसने जिस तरह स्वीकार किया है, उससे इस बात की संभावनायें जरूर बनती हैं, कि वह उन शर्तों का पालन करेगी। मगर यह सवाल जरूर पैदा होता है, कि क्या उन शर्तों के तहत अपनी वित्तीय व्यवस्था को संभालने की थोड़ी सी भी संभावनायें बनती हैं? अब तक यूरोपीय संघ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक के द्वारा यूरोपीय देशों को वित्तीय संकट से उबरने के लिये, जिन संकटग्रस्त देशों को बेल आउट पैकेज दिये गये हैं, जिन शर्तों को उन पर लादा गया है, उसके तहत एक भी ऐसा देश नहीं है, जिसने अपनी वित्त व्यवस्था को बचाया हो। सभी की स्थिति ग्रीस की तरह ही होती चली गयी।

सार्इप्रस पर लदी शर्तें शेष देशों के अलावा इस रूप में कठोर हैं, कि अपने बैंकों में जमाकर्ताओं की धनराशि पर उसे नये टैक्स से भी अपने लिये कर्ज की व्यवस्था करनी है। यूरोपीय संघ ने उसके बैंकों की शाख घटाने और उसके प्रति अविश्वास पैदा करने में, कोर्इ कसर नहीं छोड़ी है। आज जिन देशों पर कर्ज का बोझ है, उनके लिये सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण करने और सरकारी सम्पत्ति को बेचने का दबाव है। उनकी वित्तव्यवस्था पर बैंकों एवं वित्तीय इकार्इयों का अधिकार हो गया है। खर्च में कटौतियों के नाम पर सामाजिक योजनाओं को बंद किया जा चुका है। परिणाम हमारे सामने है -बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी, रूका हुआ विकास दर और खत्म होती संभावनाओं के अलावा उन देशों में व्यापक जन असंतोष है। यूरोपीय मंदी को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इ एवं कारपोरेशनों ने लाभ का जरिया बना दिया है।

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