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चीन की वित्तीय सक्रियता और यूरो-अमेरिकी युद्ध की तैयारियां

africaअफ्रीका में बड़े पैमाने पर युद्ध और संगठित युद्ध की तैयारियां चल रही हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका अफ्रीका के 35 देशों में अपनी सेना तैनात कर रहा है। जिसकी शुरूआत लीबिया, सूडान, अल्जीरिया और नाइजर से हो गयी है। जहां राजनीतिक अस्थिरता और गृहयुद्ध जैसी स्थितियां हैं। प्रचूर मात्रा में खनिज सम्पदा है। जहां उग्रवादी संगठन और इस्लामी आतंकवादी गुटों ने अपनी पैठ बना ली है, जिन्हें अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देशों का सहयोग और समर्थन हासिल है। यही कारण है कि पश्चिमी मीडिया इन्हें अलग-अलग समय में अलग-अलग नजरिये से पेश करती रहती है। जो वास्तव में अमेरिकी सेना का हाथ बंटा रहे होते हैं। अलकायदा और अलकायदा से जुड़े आतंकी संगठन लीबिया में टीएनसी विद्रोही होते हैं, अब जिनकी सरकार है, तो माली, यमन, सूडान और अल्जीरिया में वे ही आतंकवादी हो जाते हैं, जिनकी अंगुलियां थाम कर अमेरिका और पश्चिमी देशों की सेनायें वहां घुसती हैं। इस्लाम या इस्लामी लोगों से उनका कोर्इ लेना-देना नहीं होता, वो वहां के प्राकृतिक संसाधन और खनिज भण्डार पर अपनी पकड़ बनाना चाहते हैं, जहां चीन के साथ बढ़ती प्रतिद्वनिदता है।

‘अमेरिकी-अफ्रीकी कमाण्ड’ (अफ्रीकाम) ने अफ्रीकी देशों का ऐसा नेटवर्क बनाया है, जो अमेरिकी सैन्य सहयोग और आर्थिक सहायता पर निर्भर है, और अमेरिकी आदेशों का पालन करते हैं। 2012 में अफ्रीकाम ने ‘आपरेशन अफ्रीकन इण्डेवर’ का आयोजन किया था, जिसमें अफ्रीकी महाद्वीप के 35 देशों ने, अमेरिकी सैन्य कमान की देख-रेख में सैन्य अभ्यास किया था।

अमेरिकी डिफेन्स एण्ड स्टेट डिपार्टमेण्ट के सलाहकार डा0 जे0 पीटर काम के अनुसार- ”अफ्रीकाम का मुख्य उददेश्य अफ्रीका के हार्इड्रोकार्बन और अन्य सामरिक महत्व के प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, उसे निर्धारित स्थान तक सुरक्षित पहुंचाना है, ताकि किसी अन्य अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों की हिस्सेदारी न हो सके।”

आज भले ही अफ्रीकाम की सक्रियता चीन के बढ़ते दखल को रोकने के लिये नजर आ रहा है, मगर, वास्तव में यह कर्नल गददाफी के द्वारा अफ्रीकी देशों की संयुक्त सेना के खिलाफ था। जिसका मकसद अमेरिकी और पश्चिमी ताकतों के लिये अफ्रीका में बनते चुनौतियों को खत्म करना था। प्राकृतिक गैस, यूरेनियम, लोहा और सोना जैसे आर्थिक एवं सामरिक महत्व के प्राकृतिक एवं खनिज संसाधनों पर अधिकार जमाने की प्रतिद्वनिदता ही अफ्रीकी महाद्वीप के आनेवाले कल और आज के संघर्षों का कारण है। अमेरिका एवं पश्चिमी देश, जिस पर अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं, मगर चीन और रूस की सक्रियता अब उनके लिये नयी मुश्किलें खड़ी कर रही है। वो किसी भी कीमत पर उन्हें महाद्वीप से बाहर रखना चाहते हैं। साम्राज्यवादी ताकतें अफ्रीकी देशों के प्राकृतिक संसाधन एवं खनिज सम्पदा तक इन देशों की पहुंच को रोके रखना चाहती हैं।

पिछले दशक में अफ्रीकी महाद्वीप के देशों में चीन की आर्थिक सम्बद्धता काफी तेजी से बढ़ी है। बीजिंग अपना पूरा ध्यान अफ्रीकी देशों के आर्थिक विकास के नाम पर दीर्घकालिक समझौते कर रहा है, ताकि उनके प्राकृतिक संसाधन, खनिज संपदा तक अपनी पहुंच बना सके। चीन का उदार सहयोग एवं उदार कर्ज अमेरिकी सहयोग एवं कर्ज से इस मामले में भिन्न है कि उदार कर्ज और आर्थिक सहयोग के साथ अफ्रीकी देशों को सड़क, स्कूल, अस्पताल, हाउसिंग और रेल जैसे मूलभूत ढांचा भी चीनी समझौतों से मिलता है।

चीन अपने रोज खपत में आने वाले 2.6 मिलियन बैरल खनिज तेल का आधा हिस्सा आयात करता है। जिसका एक-तिहार्इ हिस्सा अफ्रीकी महाद्वीप के देशों से आता है। वर्ष 2011 में चीन और अफ्रीका का व्यापार 166.3 बिलियन डालर का था। बीजिंग ने जुलार्इ 2012 में अफ्रीकी देशों में 2012-15 तक के लिये 20 बिलियन डालर के लोन की पेशकश की है।

चीन के उदार आर्थिक सहयोग एवं कर्ज ने अफ्रीकी देशों को प्रभावित किया है। इन देशों की मान्यता है, कि चीन के सहयोग में कोर्इ पेंच नहीं होता और उसका बड़ा हिस्सा उस देश के आधारभूत ढांचे के विकास के लिये खर्च किया जाता है। जिसका सीधा लाभ उस देश की आम जनता को भी मिलता है, जिनके पास जीने की परिस्थितियां तक नहीं हैं, जो शिक्षा, चिकित्सा, आवास ही नहीं खाधान्न की समस्या से जूझ रहे हैं, और भूख, गरीबी, और अभाव के बीच जीने के लिये विवश हैं। जिनके खनिज सम्पदा पर अमेरिका और यूरोपीय देशों की आयातित समृद्धियां सदियों से टिकी है। जिसके एवज में उन्हें अभाव और अस्थिरता की सौगात दी जाती है।

चीन की स्टेट आयल कम्पनी- सिनापेक ने अंगोला में तेल भण्डार को अधिग्रहित किया है। उसने अंगोला के परिवहन ढांचा, अस्पताल और सरकारी भवनों के पुर्ननिर्माण का काम किया है। जिसका सकारात्मक प्रभाव अफ्रीका के अन्य देशों पर यह हुआ कि अमेरिका और पश्चिमी देशों के बजाये चीन उनके लिये ज्यादा विश्वस्निय वित्तीय साझेदार देश बन गया है। चीन के सहयोग से अंगोला की वित्तीय स्थिति में आये सुधार और विकास कायोर्ं ने अफ्रीकी देशों को चीन की ओर झुकाना शुरू कर दिया है। अफ्रीकी देशों को अमेरिका और चीन की नीतियों का फर्क नजर आने लगा है।

अफ्रीकी महाद्वीप के बारे में अमेरिकी सरकार की स्थायी नीति है कि राजनीतिक रूप से अस्थिर, आर्थिक रूप से अविकसित और सामाजिक रूप से लाचार अफ्रीका ही उसके लिये उपयोगी है। उसने उसके विकास को रोकने के लिये आपसी संघर्ष और युद्ध को अपना हथियार बना लिया है। अफ्रीका की तबाही ही उसका मकसद है। अमेरिकी नीतियां इस बात पर केंदि्रत रही हैं, कि ”कम से कम मूल्य पर अफ्रीका की समृद्धि बड़ी से बड़ी मात्रा में निकाल ली जाये।” इसके लिये उसने कर्इ विध्वंसक योजनायें बनार्इ और उन योजनाओं को अंजाम तक पहुंचाने के लिये 14 लड़ार्इयां लड़ी। उसने विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के साथ मिल कर 36 देशों पर ‘स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेण्ट प्रोग्राम’ को थोप दिया। जो वास्तव में अफ्रीका पर आर्थिक हमला था। लड़े गये 14 युद्धों में 8.5 मिलियन से भी ज्यादा अफ्रीकी मारे गये और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष एवं विश्व बैंक के आर्थिक कार्यक्रमों से कम से कम 21 मिलियन अफ्रीकियों की क्रमिक हत्या कर दी गयी। लोग भूख, गरीबी, कुपोषण और चिकित्सा के अभाव में मारे गये। इस सैन्य एवं वित्तीय हमले ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं कारपोरेशनों के लिये, अफ्रीका के लूट के द्वार को खोलने का काम किया। सैंकड़ो बिलियन डालर अफ्रीका से उत्तरी अमेरिका और यूरोपीय देशों में पहुंच गया। अफ्रीकी देशों की स्थिति बुरी से बुरी होती चली गयी।

अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय देशों ने चौतरफा लूट मचा दिया। अफ्रीका का ज्यादातर निर्यात अमेरिका और पश्चिमी देशों को कच्चे माल के रूप में होता है। लगातार चलने वाले युद्ध की वजह से, जिनकी कीमत कम रखने में बड़ी मदद मिली। युद्धरत अफ्रीकी देशों ने हथियारों की खरीदी के लिये अपने खनिज सम्पदा को न सिर्फ सस्ते में बेच दिया, बल्कि उनके उत्खनन के लिये आत्मघाती करार भी किये। उन हथियारों की खरीदी भी अमेरिका और पश्चिमी देशों के हथियार उत्पादक कम्पनियों से की गयी।

‘स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेण्ट प्रोग्राम’ को अमेरिका के प्रभाव वाले विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने लागू किया था। जिसने 1980 से 229 बिलियन डालर अफ्रीका के उप सहारा क्षेत्र से पश्चिमी बैंकों में ट्रांसफर किया है और ये सारे पैसे कर्ज का भुगतान हैं। जो 1980 के कर्ज का चार गुणा है। यही नहीं, युद्ध की वजह से और स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेण्ट प्रोग्राम की वजह से खनिज एवं कच्चे माल के दामों में कोर्इ वृद्धि नहीं हुर्इ, वो पूर्ववत ही सस्ती बनी रहीं।

अमेरिका और यूरोपीय देशों की तुलना में चीन लूट और आतंक के स्थान पर अफ्रीकी देशों के खनिज एवं कच्चे माल का उचित मूल्य और मुआवजा दे रहा है।

यदि हम कांगो सरकार की ही बात करें तो अमेरिका ने 1998 में रवांडा और युगांडा को उकसा कर कांगो पर हमला करा दिया, जिसमें 6 मिलियन से ज्यादा कांगोवासी मारे गये। इसी बीच कांगो पर स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेण्ट प्रोग्राम थोप दिया गया, जिसने कांगो को कंगाल कर दिया। कांगो पूरे अफ्रीकी महाद्वीप में खनिज भण्डार की दृष्टि से सबसे समृद्ध देश है। जिसकी खनिज सम्पदा को अमेरिकी सरकार और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों ने मिल कर लूटने का काम बड़े ही सुनियोजित और निर्मम ढंग से किया। यही कारण है कि अमेरिकी विरोध के बाद भी अफ्रीका में चीन के निवेश की परिस्थितियां बनी हुर्इ हैं।

2007 में चीन ने डेमोक्रेटिक-रिपबिलक आफ कांगो की सरकार से उसके खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन के लिये 20 बिलियन डालर के करार पर हस्ताक्षर किया। जिसमें आधारभूत ढांचागत निवेश एवं विकास योजनाओं पर अनिवार्य खर्च की शर्तें हैं। जो निश्चय ही कांगो सरकार और वहां की आम जनता के पक्ष में है।

चीन और कांगो के बीच के इस समझौते में दोनों देशों की खनिज स्टेट कम्पनियां शामिल हैं। जिसके अंतर्गत दोनों कम्पनियां सौकोमिन के नाम से काम करेंगी, जिसमें चीन का 68 प्रतिशत शेयर और कांगो का 32 प्रतिशत शेयर होगा। ऐकिजम बैंक ने इसमें 9 बिलियन सौकोमिन को भुगतान कर दिया है। जिसमें से 3 बिलियन डालर खनिज क्षेत्र के विकास पर खर्च किया जायेगा और 6 बिलियन डालर आधारभूत ढांचा के निर्माण पर खर्च होगा। 9 बिलियन डालर उस 20 बिलियन डालर के लोन का हिस्सा है। जिसका भुगतान 2011 से 2014 के दौरान किया जायेगा। 3 बिलियन डालर खनिज क्षेत्र के विकास के लिये है और 6 बिलियन डालर से नये रोड, रेल, 32 अस्पताल, 145 स्वास्थ्य केंद्र और वोकेशनल ट्रेनिंग सेण्टर पर खर्च किया जायेगा। इसे बदले में चीन को 10 मिलियन टन ताम्बा और 4 लाख टन कोबाल्ट मिलेगा। यह एक तरह का विनिमय समझौता है। जो पश्चिमी ताकतों द्वारा कांगो से किये गये समझौतों से पूरी तरह भिन्न है। जो एक कर्ज को चुकाने के लिये दिया गया दूसरा कर्ज नहीं है, जिससे सहायता एवं कर्ज की श्रृंखला इतनी बड़ी हो जाती है कि सरकारें दीवालिया होने लगती हैं और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जाता है।

कांगो के एक पत्रकार एनटोनी रिगर लोकोंगो ने अफ्रिकन पालिटिकल अफेयर्स के सबसे प्रमुख वेबसार्इट पाम्बाजूका न्यूज में लिखा है, कि चीन से किया गया समझौता वास्तव में आधारभूत ढांचे के विकास के लिये अपने संसाधन को बढ़ाने के लिये किया गया समझौता है। जो एक तरह का विनिमय है। जो कांगो पर कर्ज लाद कर उसे छोड़ नहीं देता बल्कि उसके विकास की परिस्थितियों का निर्माण भी करता है। यह सोचा जा सकता है कि 15 साल के आक्रामक युद्ध के बाद कोर्इ देश नयी शुरूआत कैसे कर सकता है? चीन कांगो में किसी अन्य देशों की तुलना में ज्यादा पूंजी निवेश करने को तैयार है। हम मानते हैं कि चीन कांगो को नव उपनिवेशवाद में उलझाने के होड़ को तोड़ कर उसे स्वतंत्र होने में सहयोग देगा।

अमेरिका के द्वारा कांगो के खनिज एवं प्राकृतिक संसाधन की लूट का अंत 6 मिलियन लोगों की मौत और देश में चारो तरफ फैली दरिद्रता के रूप में हुर्इ।

अमेरिका, पश्चिमी शक्तियां, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने चीन और कांगो सरकार के इस समझौते का भरपूर विरोध किया। जिम्बांबे में जर्मनी के राजदूत अल्बरेत्च कोन्जो ने कहा- ”दुनिया में वित्तीय शक्ति के रूप में उभरते चीन के द्वारा उठाया गया यह कदम -कि बिना शर्त और नियंत्रण के खनिज और प्राकृतिक संसाधन के लिये, करोड़ों का कर्ज देना, परेशानियां पैदा कर सकता है।” उन्होंने कहा- ”बीजिंग ने कांगो के पड़ोसी देश अंगोला में अपने इस पद्धति का उपयोग किया, जहां से खनिज तेल उत्पादन पर उसका नियंत्रण पहले से है।”

अंगोला में अमेरिका ने 27 साल लम्बे गृहयुद्ध को बढ़ावा दिया था, जो अप्रैल 2002 में खत्म हुआ। जिसमें 5 लाख लोग मारे गये। और अंगोला की पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो गयी। जिसकी वजह से अंगोला की एक तिहार्इ आबादी विस्थापित हुर्इ और 15 मिलियन बारूदी सुरंगों ने अंगोला के कृषि योग्य जमीन को जोखिमों से भर दिया। जिसकी वजह से आज अंगोला को अपने जरूरत के 50 प्रतिशत खाधान्नों का आयात करना पड़ता है। और 82 प्रतिशत आम अंगोलावासी गरीबी में जीने के लिये विवश हैं। कांगो की तरह ही अंगोला भी खनिज सम्पदा सम्पन्न देश है और अफ्रीका का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है।

अप्रैल 2002 से अंगोला में शांति है और इतने लम्बे युद्ध को झेलने के बाद 5 साल में ही उसने अपनी अर्थव्यवस्था को संभाल लिया है। वह उप सहारा क्षेत्र की एक सफल अर्थव्यवस्था है। जिसकी वजह अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में आयी वृद्धि है। चीन ने अंगोला के इस विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभार्इ है। उसके सहयोग से अंगोला में 100 से ज्यादा प्रोजेक्टस शुरू हुआ, जो ऊर्जा, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, टेलिकाम, मच्छली पालन और सामाजिक विकास से जुड़े हैं।

2002 में चीन के द्वारा अंगोला को 15 बिलियन डालर का उदार कर्ज दिया गया था। जिससे देश की अर्थव्यवस्था और आधारभूत ढांचे के पुर्नउत्थान का काम किया गया। आज अंगोला अफ्रीका में चीन का सबसे बड़ा व्यावसायिक मित्र देश है। और उसके विदेशी तेल आयात का सबसे बड़ा स्त्रोत है।

अफ्रीकी महाद्वीप में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिये अमेरिका अपनी सैन्य क्षमता का विस्तार कर रहा है। उस अमेरिकी-अफ्रीकी कमाण्ड -अफ्रीकाम को विस्तार दे रहा है, जिसे लीबिया के कर्नल गददाफी के रहते अफ्रीकी महाद्वीप में मुख्यालय के लिये भी जगह नहीं मिली थी। यह लीबिया के पतन का ही परिणाम है कि अमेरिका अपनी सैन्य क्षमता का विस्तार कर पा रहा है, और लीबिया में अमेरिकी सेना की तैनाती हो रही है।

लीबिया के प्रधानमंत्री ने कहा है कि ”नाटो लीबिया की सरकारी सेना को प्रशिक्षण के मामले में टेकनिकल सलाह देगा।” लीबिया के प्रधानमंत्री ने यह वक्तव्य ब्रुसेल्स में नाटो सेक्रेटरी जनरल से हुर्इ वार्ता के बाद दिया। सेक्रेटरी जनरल ने कहा कि ”यह सहयोग लीबिया की सरकार के द्वारा आग्रह पर ही दिया जायेगा, जिसे औपचारिक रूप से नाटो की स्वीकृति भी लेनी होगी।”

27 मर्इ को लीबियायी प्रधानमंत्री यूरोपीय संघ के अध्यक्ष और यूरोपीय कमीशन के प्रसिडेण्ट से भी मिले। उन्होंने लीबिया के साथ यूरोपीय यूनियन एसोसियेशन एग्रीमेण्ट पर भी चर्चा की।

अफ्रीका में अमेरिका एवं पश्चिमी ताकतों के हस्तक्षेप की नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है। नार्इजर में हुए कार बम धमाके में 26 लोग मारे गये, जिसमें 20 सैनिक हैं। जिसकी जिम्मेदारी माली के एक ग्रूप ने ली है। ग्रूप के प्रवक्ता अबु वालिद ने कहा है कि ”23 मर्इ को किया गया यह हमला नार्इजर की सेना को फ्रांस के साथ मिल कर माली युद्ध में दिये गये सहयोग की सजा है।”

फ्रांस की योजना 2014 में भी माली में बने रहने की है। 25 मर्इ को फ्रांस के डिफेन्स मिनिस्टर ने कहा कि ”आज की तारीख में माली में फ्रांस के 3700 सैनिक हैं। और हम यहां अपनी सेना को साल के अंत तक तैनात रखेंगे।” इससे पहले उन्होंने लंदन में कहा था कि ”फ्रांस अपनी 1000 टुकडियां माली में अनिश्चित समय अवधि तक के लिये रखेगा।” फ्रांस की मीडिया ने जानकारी दी है कि फ्रांस अमेरिका से माली में अपनी मजबूती के लिये 2 रिपेयर ड्रोन खरीदेगा।

अफ्रीका में चीन की वित्तीय सक्रियता को रोकने के लिये अमेरिका और पश्चिमी ताकतें संगठित युद्ध की तैयारियां कर रही हैं।

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