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सामाजिक दासता और विध्वंस की नयी खोज- अमेरिकी सर्विलांस प्रोग्राम

vishesh aalekhसड़क के किनारे समाज है और बाजार भी। लोग कहते हैं- ”सड़कें जहां जाती हैं, सड़कों के साथ सभ्यता भी वहां पहुंचती है।” मतलब, सड़कें सभ्यता को ढ़ोती हैं। रोम की सड़कें जहां पहुंचीं, उनके साथ रोम की सेना भी पहुंच गयी और उनके साथ सलीब था। दासों के दुखते कंधों पर सवार व्यवस्था थी। कहा गया- ”रोम की सभ्यता महान थी।” यूनानियों की महानता भी कुछ ऐसी ही थी। जो सामने है, उसे जीतने का जुनून था। हमलावर होना ही महान सभ्यता की पहचान थी। स्पेन से लेकर पुर्तगाल और फ्रांस से लेकर बि्रटिश साम्राज्य की महानता का आधार यही रहा है, जिन्होंने समुद्र में सड़कें बिछार्इ और उत्तरी अमेरिका के साथ तीसरी दुनिया के महाद्वीपों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने वास्तव में दुनिया की महान सभ्यताओं का नाश किया, और उपनिवेशों को अपना बाजार बना लिया। अमेरिकी साम्राज्य युद्ध और बाजार की चरम अवस्था है, जो अब चरमरा रही है। डालर चुनौतियों से दरक रहा है, और पूंजीवाद का पाशविक चेहरा अपनी वित्तीय पूंजी और अपनी सेना के साथ, अपना ही बोझ उठा नहीं पा रही है। दीवालियापन वैश्विक मंदी के साथ पसरता जा रहा है।

सड़क के बांये बाजू बसे समाज और दांये बाजू के बाजार का सच बदलता जा रहा है। दुनिया में, बाजार ने कमाल कर रखा हे, उसका मुंह फैलता जा रहा है, वह प्रकृति की अकूत सम्पदा को निगलने और अब तक के सामाजिक विकास को अपने नाम दर्ज कराने पर आमादा है। आप चाहें तो कह सकते हैं, कि उसने अपनी दावेदारी पक्की कर ली है। मगर, उसके सामने आम जनता की ही चुनौतियां नहीं हैं, बल्कि उसकी अपनी चुनौतियां ऐसी हैं, जिसका समाधान उसके पास नहीं है।

जिसके खिलाफ एक ऐसे युद्ध की शुरूआत हो गयी है, जो आर्थिक नाकेबंदी, प्रचार युद्ध और सैन्य हस्तक्षेप के तरह नजर नहीं आता। यह उस सार्इबर वार की तरह है जिसमें एनोनिमस हैकर्स, विकिलिक्स और अमेरिकी सर्विलांस प्रोग्राम ‘बाउण्ड लेस इंफार्मेट’ शामिल है, जो सर्विलांस उपकरण से कम्प्यूटर और टेलीफोन नेटवर्क की जानकारियां हासिल करता है। बि्रटिश अखबार ‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2013 में अमेरिकी नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी ने दुनिया भर के कम्प्यूटर नेटवर्क से 97 अरब खुफिया सूचनायें जमा की है।

जानकारियों के आधार पर अमेरिकी एजेन्सी ने भारत के कम्प्यूटर नेटवर्क से 6.3 अरब सूचनायें जमा की है। एजेन्सी ने दुनिया भर में अपने इस जाल को फैला रखा है। र्इरान से 14 अरब गुप्त जानकारियों की सुफियागिरी की गयी है। जिनकी जानकारी न सिर्फ व्हार्इट हाउस को है, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ‘बाउण्ड लेस इन्फार्मेट’ के बारे में कहा है कि ”इसमें लोगों की बातचीत नहीं सुनी जाती और नाही र्इ-मेल पढ़े जाते हैं।”’ मगर सारी दुनिया के लोगों पर खुफिया नजर रखना आसान हो जाता है। उसने डिजिटल कम्यूनिकेशन को साधन की तरह इस्तेमाल कर अप्रत्यक्ष रूप से हमारे डिजिटल सम्पत्ति का मालिकाना हक हासिल कर लिया है। कल तक जो काम वह आम अमेरिकी के साथ कर रहा था अब दुनिया भर के लोगों के साथ करने लगा है। इस तकनीक से किसी भी व्यकित का आर्इपी एड्रेस जाना जा सकता है। यदि आर्इपी एड्रेस छुपाया गया है, तो उस व्यकित के देश, प्रांत और शहर की जानकारियां मिल जाती हैं।

सारी दुनिया पर नजर रखने का यह अधिकार भी उसने आतंकवादी मंसूबों को नाकाम करने के लिये अपनी कोशिशों में शामिल कर रखा है। अमेरिकी सरकार के लिये यह सवाल ही नहीं है, कि किसी भी देश के खिलाफ और उस देश की आम जनता के जीवन में यह ऐसा हस्तक्षेप है, जिसे बर्दास्त नहीं किया जा सकता। मगर, अमेरिकी सरकार दुनिया पर अपने वर्चस्व को बनाये रखने की जी-तोड़ कोशिशें कर रही है। उसकी सेनायें और 1000 से अधिक सैन्य अडडे, जहां सामरिक आतंक का पर्याय बन गये हंैं, वहीं अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी एजेन्सी के सर्विलांस प्रोग्राम की जानकारी ने असुरक्षा की नयी सोच पैदा कर दी है। तीसरी दुनिया के लिये यह खतरा सबसे ज्यादा है, जहां अमेरिकी सहयोग से आतंकवाद को फैलाया जा रहा है, और उन्हें अमेरिका तथा यूरोपीय देश कूटनीतिक समर्थन भी दे रहे हैं, नाटो सेना उनके पीछे लामबंद है। अफ्रीकी देशों में जो हो रहा है, और एशिया के देशों में जिसे दुहराया जा रहा है, वह लीबिया के बाद सीरिया की दास्तां है, और यह कर्इ देशों में अलग-अलग तरीके से भी आजमाने की नीतियां चल रही हैं।

गुगल और फेसबुक के लिये जो कयास लगाये जा रहे थे, कि वो सीआर्इए और एफबीआर्इ को जानकारियां उपलब्ध कराते हैं। सर्विलांस प्रोग्राम की जानकारी के साथ यह खुलासा भी सामने आया है, कि गूगल, एओएल, एप्पल, याहू, मार्इक्रोसाफ्ट, स्काइप, फेसबुक, यू-टयूब और पल टाक अमेरिकी सरकार को यूजर डाटा मुहैया करा रही है। हालांकि, इन कम्पनियों ने इस बात से इंकार किया है कि ”वे अमेरिकी खुफिया एजेन्टों को यूजर डाटा तक पहुंचने की अनुमति देते हैं।” लेकिन जुकरबर्ग और लेरी पेज के इन बातों का विशेष महत्व इसलिये नहीं है, कि यह अब प्रमाणित सच में बदल गया है।

अमेरिका के सर्विलांस प्रोग्राम की जानकारी एडवर्ड स्नोडेन विहसलब्लोअर ने सार्वजनिक किया। जो पूर्व सीआर्इए के तकनीक सहायक कर्मचारी और वर्तमान में अमेरिका की मैनेजमेण्ट और तकनीकी कन्सलटेंसी कम्पनी बूज एलेन के कर्मचारी के रूप में नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी के लिये काम कर रहे थे। उन्होंने इस खुलासे से तीन सप्ताह पहले नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी के हवार्इ सिथत कार्यालय में खुफिया दस्तावेजों की प्रतियां तैयार की और छुटटी लेकर हांगकांग चले गये, जहां अभिव्यकित की स्वतंत्रता का कानून है।

एडवर्ड स्नोडेन ने अपने नाम को सार्वजनिक करने की अनुमति देने से पहले कहा कि ”मैं ऐसी दुनिया (अमेरिका) में रहना नहीं चाहता जहां मेरी गतिविधियों पर नजर रखी जाती है, और जहां मेरी बातों को रिकार्ड किया जाता है।” उन्होंने कहा- ”मैं ऐसे समाज में, रहना नहीं चाहता।” स्नोडेन को अमेरिका में रह रहे अपने परिवार की चिंता है, जहां अमेरिकी सीनेटर उसे ‘देशद्रोही’ करार दे रहे हैं, और उसके खिलाफ अनगिनत आरोप लगा रहे हैं, कि उसने अमेरिका के सर्विलांस प्रोग्राम की खुफिया जानकारी को सार्वजनिक कर, उसे विवादास्पद बना दिया है। वो हांगकांग से उसे अमेरिका को सौंपने की मांग कर रहे थे।

विकिलिक्स के संस्थापक जूलियन असांजे, उनके सहयोगी ब्रेडली मेनिन, पायरेसी एक्ट और सूचना पर निजी अधिकार को चुनौती देने वाले एरान स्वार्डज के बाद एडवर्ड स्नोडेन का मामला, इस बात का प्रमाण है, कि अमेरिका में भी सुरक्षा एवं आतंकवाद के नाम पर जारी कार्यक्रमों के खिलाफ गहरा असंतोष है। आस्टे्रलियायी नागरिक जूलियन असांजे, झूठे आरोपों से घिरे, बि्रटेन में लातिनी अमेरिकी देश इक्वाडोर के दूतावास में राजनीतिक शरण पिछले साल से लेने को विवश हैं। उनके सहयोगी रहे ब्रेडली मेनिन पर अमेरिका में न्यायिक कार्यवाही की शुरूआत हो रही है। जिन्होंने मानसिक एवं शारिरक यातना के लम्बे दौर को पार किया है। एरान स्वार्डज अपने फ्लैट में मृत पाये गये। जिनके बारे में यह धारणा है कि या तो उन्हें आत्महत्या करने के लिये विवश किया गया, या उनकी हत्या हुर्इ है। और अब, एडवर्ड स्नोडेन।

अमेरिका अपनी सेना, खुफिया तंत्र और आयुद्ध उत्पादन एवं शोध इकार्इयों को बढ़ाने के लिये करोड़ों-करोड़ डालर खर्च करता है, यह देखे एवं समझे बिना कि यह खर्च उसकी अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ा बोझ है। जिसने न सिर्फ विकास करना बंद कर दिया है, बल्कि उसकी वैश्विक संरचना टूट गयी है और वह गोते-पर-गोते लगा रही है। यह तय है, कि अमेरिकी साम्राज्य की सामरिक क्षमता और उसकी गुप्तचर व्यवस्था, सबसे बड़ी है, मगर यह भी तय है कि चीन की वित्तीय वरियता और रूस की सामरिक क्षमता उसके लिये बड़ी चुनौतियां हैं। यह ऐसी चुनौतियां हैं जिसे न तो खत्म किया जा सकता है, ना ही जिसे लड़ कर जीता जा सकता है। हथियारों की होड़ और मारक क्षमता में विस्तार एक अंतहीन गलियारा है। यदि वह रूस पर पूर्व सोवियत संघ की विदेश नीतियों और शीतयुद्ध की नयी शुरूआत का आरोप लगाता है, तो चीन पर अपनी सामरिक जानकारियों के चोरी का आरोप भी लगाता रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीन के नये राष्ट्रपति शी जिंपिंग की मुलाकात के बारे में न्यूयार्क टार्इम्स लिखता है, कि ”चीन राष्ट्रपति की दो दिवसीय यात्रा (जून के दूसरे सप्ताह में) आपसी सम्बंधों का नया माडल तैयार करने के लिये हुर्इ थी, मगर खुफिया जासूसी (अमेरिकी वेब सार्इट के हैकिंग) एवं पुराने विवादों पर आम सहमति नहीं बन सकी।” इसके बाद भी अखबार कहता है कि ”सामरिक मजबूती की वजह से दोनों साथ-साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं।” अमेरिकी सरकार चीनी हैकर्स पर यह आरोप लगाता है कि ”वो उसे सामरिक गुप्त जानकारियों को हैक करते रहे हैं।”

जिस सार्इबर वार की शुरूआत अमेरिका कर चुका है, और जिस पर करोड़ो-करोड़ डालर वह प्रतिवर्ष खर्च करता है, उसके खिलाफ विकिलिक्स के साथ ही एनोनिमस हैकर्स ग्रुप भी सक्रिय हो गया है। जिन पर चाह कर भी अमेरिकी सरकार अपना नियंत्रण कायम नहीं कर पा रही है, ना ही उन पर वह कारगर हमला कर पा रही है। उनकी क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि वो फेसबुक जैसे सोशल सार्इट को भी चंद घण्टों के लिये जाम कर सकते हैं।

अमेरिकी सरकार इन अनाम हैकर्स ग्रूप के खिलाफ अपनी सक्रियता और प्रचार अभियान के तहत चाहे जितने भी आरोप लगाती रहे, मगर ऐसी एक भी घटना नहीं है, जिसके बारे में कहा जा सके, कि इन हैकर्स ने सारी दुनिया में भारी अव्यवस्था पैदा करने की कोशिश की है। जबकि, चाहने पर वो ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं। देखा जाये तो उन्होंने राज्य और उनकी जनविरोधी सरकारों के द्वारा आम जनता को अंधेरे में रख कर जो साजिशें रची जा रही है, उन्हीं जानकारियों को सार्वजनिक किया है। जिसे जानने का अधिकार दुनिया की आम जनता को है। आज भी वो गुआंतानामें में भूख हड़ताल कर रहे 100 से अधिक उन बंदियों के लिये दुनिया भर के लोगों को जानकारियां दे रहे हैं, जिनके ऊपर कोर्इ आरोप नहीं है, और जो लगभग 4 महीने से भूख हड़ताल पर हैं। अमेरिकी सैन्य प्रशासन और बराक ओबामा जिसके बारे में लगातार झूठ बोल रहे हैं। एशियायी मूल के इन बंदियों के साथ, अमेरिकी सैन्य एवं जेल अधिकारी जिंदा रखने के नाम पर अमानवीय व्यवहार कर रहे हैं। मानवाधिकार के उल्लंघन का यह मामला आज यदि विश्व स्तर पर चर्चा में है, तो इन्हीं ‘अनाम हैकर्स’ की वजह से।

विकिलिक्स के अनगिनत केबलों से ही इराक युद्ध का सच और अमेरिकी प्रचार का झूठ हमारे सामने आ सका है। अमेरिकी सरकार के आतंकवाद के खिलाफ जारी युद्ध का सच हमारे सामने आ सका है। अलकायदा और अलकायदा से जुड़े आतंकी गुटों से सीआर्इए, अमेरिकी सेना और अमेरिकी प्रशासन से निकटतम सम्बंधों का खुलासा होता रहा है। सीरिया का सच भी हमारे सामने है, जहां अमेरिकी एवं पश्चिमी समर्थक आतंकी विद्रोही बशर-अल-असद सरकार का तख्ता पलटने के लिये संघर्ष कर रहे हैं, जिसका एकमात्र मकसद उसके प्राकृतिक सम्पदा पर अधिकार जमाना है, जो राष्ट्रपति बशर-अल-असद के सत्ता में रहते संभव नहीं है। यह सच्चार्इ भी हमारे सामने है कि आज भी सीरिया की 70 प्रतिशत आम जनता बशर-अल-असद के साथ है।

दुनिया की शांति और सुरक्षा तथा स्थिरता के लिये सबसे बड़ा खतरा बन चुका अमेरिकी साम्राज्य आतंकवाद के खिलाफ युद्ध और अपनी आंतरिक सुरक्षा के नाम पर जरूरत से ज्यादा अनधिकृत सहुलियतें हासिल कर चुका है। अब वह अपने खुफिया तंत्र के जरिये आम लोगों के जीवन में, उनके संवैधानिक एवं मानवाधिकार तथा अभिव्यकित की निजी स्वतंत्रता में, हस्तक्षेप कर चुका हैं उसने उस राह को खोल दिया है, जो अंतहीन है। और जिसके होने का मतलब है, आम जनता को उसके निजी से निजी पलों को उसकी सोच और समझ को, अपने सिकंजे में रखना। उसके सर्विलांस प्रोग्राम का सीधा सा मतलब है- आम जनता के जीवन में हस्तक्षेप। किसी भी देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप का ही यह विस्तार है। जिससे आने वाले कल की उलझनों का बढ़ना तय है।

कल तक सरकारें एक-दूसरे की खुफियागिरी कर रही थीं, आज स्थितियां बदल गयी हैं। दुनिया की ज्यादातर सरकारों के खिलाफ उस देश की आम जनता है, और सबसे बड़ी बात यह है कि दुनिया की संघर्षरत आम जनता उनके साथ है! सरकारें एक ओर खड़ी हो गयी है। और दूसरी ओर अपने होने की लड़ार्इ लड़ती हुर्इ आम जनता है। जिन्हें अपने नियंत्रण में लेने की अमेरिकी कोशिश जारी है। वह एडवर्ड स्नोडेन के जरिये यह प्रमाणित करने में लगा हुआ है कि अमेरिकी सरकार से असहमत लोगों के लिये दुनिया में कोर्इ जगह नहीं है। स्नोडेन हांगकांग से निकल कर मास्को के हवार्इ टर्मिनल में पड़े हैं। वो कहां जायेंगे?

अमेरिका से हांगकांग निकल लेना उनकी अनिवार्यता थी, नहीं तो उनकी भी लाश उनके फ्लैट में मिलती। हांगकांग से मास्को निकल लेना इस बात का प्रमाण है कि चीन की सरकार अपने हितों के लिये अमेरिकी सरकार से समझौता कर सकती थी। जिनके बीच सार्इबर वार जारी है। मास्को राजनीतिक शरण दे सकता है, मगर उसकी अपनी शर्तें हैं। इक्वाडोर जूलियन असांजे को राजनीतिक शरण दे चुका है, विकिलीक्स स्नोडेन के लिये वैधानिक स्थितियां बनाने में लगा है। स्नोडेन के सामने रूस, इक्वाडोर और वेनेजुएला है। अमेरिकी सरकार इस बात की घोषणा कर चुकी है कि वह किसी भी कीमत पर स्नोडेन को अमेरिका में चाहती है। ऐसा होगा नहीं, यह तो तय है, मगर स्नोडेन कहां होंगे? यह तय होना बाकी है। बस अच्छी खबर यह है कि दुनिया की आम जनता उनके साथ है, वो लोग उनके साथ हैं, जो अमेरिकी हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। मुददा राजनीतिक हो चुका है।

अमेरिकी सभ्यता उस मुकाम पर पहुंच गयी है, जिसमें दशकों से सकारात्मक विकास की सड़कें गुम हैं। उसकी सोच और खोज में सामाजिक दासता और विध्वंस के अलावा और कुछ नहीं है।

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