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क्या माओवाद समाजवाद की गलत दिशा है?

rashtriya vicharभारत में माओवाद ने राजनीतिक विभाजन की गहरी लकीर खींच दी है, जिसमें बारूदी सुरंगें और हथियार भी है, गुरिल्लायुद्ध और जनसंघर्ष भी है। यह सोचना या कहना, खुद को धोखा देना है, कि ”उसके पांव के नीचे जमीन नहीं है।” यदि माओवाद की जड़ें इस जमीन में नहीं होतीं, तो पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से होते हुए छत्तीसगढ़ के सुकमा तक वह नहीं पहुंच पाता। किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं के जत्थे पर इतना बड़ा हमला नहीं हो पाता। हालांकि, कांग्रेस भाजपा की प्रदेश सरकार को शक से देख रही है और भाजपा सरकार सुरक्षा में हुर्इ चूक को स्वीकार कर रही है। मुददा एक-दूसरे की पोल खोलने वाले आरोपों से घिरा है। चुनावी मुददे को अभी से पाला पोसा जा रहा है।

एक बार यदि हम इन मुददों को छोड़ दें, तो कहा जा सकता है कि भारत में माओवाद का जन एवं भू क्षेत्र विस्तार हुआ है। पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल, उत्तराखण्ड और महाराष्ट से लेकर आंध्र प्रदेश तक उन्होंने सुरक्षा के कर्इ क्षेत्र एवं ठिकानों को बना लिया है। रेड कारिडोर नेपाल तक बन गया है। केंद्र एवं राज्य सरकारें उनके विस्तार को रोक नहीं सकी हैं। उन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं का समाधान उनके पास नहीं है, जिनकी वजह से माओवाद का विस्तार हुआ। और सबसे बड़ी बात यही है।

ऐसा नहीं है, कि उन्हें खुली छूट मिली और माओवादी बढ़ते चले गये। उनके खिलाफ कर्इ सख्त कार्यवाहियां की गयीं।

केंद्र सरकार ने माओवादियों को आंतकी और भाकपा-माओवाद को आतंकवादी संगठन घोषित किया।

केंदि्रय पूर्व गृहमंत्री पी0 चिदम्बरम ने आपरेशन ग्रीन हंट की शुरूआत की।

नक्सलवाद प्रभावित राज्य की सरकारों ने सख्त कार्यवाहियां की।

छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम के तहत आदिवासियों को हथियारबद्ध कर नक्सलवादी एवं माओवादियों के खिलाफ खड़ा किया गया।

झारखण्ड में सेंदरा (शिकार) अभियान चलाया गया।

आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के मुददे से जुड़े माओवादियों को जंगल से बेदखल करने की कोशिशें नाकाम रहीं। सरकार को न तो सख्त कदम का कोर्इ लाभ मिल सका, ना ही विकास योजनाओं के पांव उग सके। राज्य की सरकारें केंद्र पर और केंद्र की सरकार माओवादियों से निपटने की जिम्मेदारियां एक-दूसरे पर डालती रही। आज तक केंद्र और नक्सल प्रभावित राज्य सरकारों के बीच साझा कार्यक्रम नहीं बन सका है। उन्हें आतंवाकदी घोषित करके जिस वैधानिक संघर्ष की शुरूआत की गयी, देश की आम जनता ही उन्हें खारिज कर दी है। यदि सरकार इसे सवाल की तरह ले कि ”ऐसा क्यों है?” तो उसे अपने जनसमस्याओं से कटे होने, और जनविरोधी होने का ही नहीं, बल्कि, इस बात का भी पता चल जायेगा, कि नक्सलवादी एकजुटता और भारत में माओवादियों को निर्णायक लकीर खींचने देने की परिस्थितियां उसने ही बनायी है। उसने ही भारतीय लोकतंत्र की अवधारणओं और लोक कल्याणकारी राज्य की सोच को बाजार के हवाले कर दिया है। यह कड़वी सच्चर्इ है, कि राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हित और सरकार की नीतियों आपस में मिल गर्इ हैं। खनिज सम्पदा को इन कम्पनियों को सौंपने की नीतियों के खिलाफ, ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार को माओवाद के प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। यही कारण है, कि जन प्रतिरोध को कुचलने के लिये उन्हें माओवादी करार दिया जाता रहा है। सरकार अंजाने ही माओवादियों को नया जनाधार देती जा रही है। जनप्रतिरोध की भी माओवादियों के नाम से दर्ज कर दिया जाता है। ताकि, उनके खिलाफ कठोर कार्यवाहियां संभव हो सकें। ग्रामीण क्षेत्रों में आज जहां भी जनप्रतिरोध है, वहां जमीन के नीचे खनिज सम्पदा है, और देश की ग्रामीण जनता अपनी जमीन को बचाने की लड़ार्इ लड़ रही है, जिसे सरकारी विरोध और माओवादियों का सहयोग हासिल है।

यही कारण है, कि देश के प्रधानमंत्री जिस नक्सलवाद और माओवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा मानते हैं, नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों की आम जनता ऐसा नहीं मानती। वर्तमान गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे माओवादियों को आतंकवादी कहने में हिचकते हैं। 30 मर्इ को हुर्इ सर्वदलीय बैठक में नक्सलियों से निपटने के लिये सुरक्षा बल को और मुस्तैद करने तथा राजनीतिक एवं विकास गतिविधियों को जारी रखने का निर्णय लिया गया। इस बैठक में भाकपा और माकपा जैसे वामपंथी राजनीतिक दल भी शामिल थे, जिन्होंने नक्सलवाद और भाकपा-माओवाद का प0 बंगाल में भारी विरोध किया है, और लालगढ़ की घटना के बाद हुए विधान सभाा चुनाव में वाममोर्चा को 33 साल बाद बड़ी पराजय का सामना करना पड़ा। आज माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव से पहले तीसरे मार्चे के खिलाफ है, मगर वाममोर्चा तीसरा मोर्चा कब बनेगा? का जवाब उसके पास नहीं है। पार्टी महासचिव बने प्रकाश करात और वाम मवोर्चा में शामिल राजनीतिक दलों को यह सोचना तो चाहिये, कि दशकों के राजनीतिक संघर्ष का हासिल क्या है?

हम माओवादियों का समर्थन नहीं कर सकते, मगर वाममोर्चा में शामिल प्रजातंत्रवादी राजनीतिक दलों से यह सवाल तो कर सकते हैं, कि जन समस्याओं के समाधान के लिये उन्होंने निर्णायक संघर्ष की शुरूआत क्यों नहीं की? विकास के जरिये समाजवाद की सोच ने, लातिनी अमेरिकी देशों में ”21वीं सदी के समाजवाद” के नये संस्करण का विकास किया और पूंजीवादी विश्व में वर्तमान वैश्विकमंदी से लेकर नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्तबाजारवादी नीतियों में जन सापेक्ष नीतियों से राजसत्ता में आम जनता की हिस्सेदारी को बढ़ाने का काम किय, भारतीय वामपंथ अपने देश में भी जन लोकतंत्र या समाजवादी लोकतंत्र की अवधारणा को विकसित क्यों नहीं कर सकी?

क्या सही विकल्पों का न होना माओवादियों के होने की बड़ी वजह नहीं है? ग्रामीण क्षेत्रों में जारी जनसंघर्षों में उनकी हिस्सेदारी कितनी है?

आज जनता के हाथ से व्यवस्था में परिवर्तन के लिये आम चुनाव और मतपत्रों के विकल्प को खत्म करने की गलितयां किसने की है?

कांग्रेस और भाजपा और उनके राजनीतिक गठबंधन यूपीए और एनडीए की आर्थिक नीतियां एक हैं। वो आज भी 2014 के आम चुनाव के लिये राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित करने में लगी है। वित्तीय पूंजी को खुली छूट देना ही उनकी नीति है। जिसने आम जनता को बेलगाम महंगार्इ और उसके हिस्से की रोटी को छीनने के अलावा और कछ नहीं किया। आर्थिक एवं राजनीतिक भ्रष्टाचार की अटूट श्रंृखलाएं दी। जिसके खिलाफ व्यापक जनअसंतोष है। मगर आप तो वित्तीय पूंजी के खिलाफ हैं। मनमोहन सिंह के उदारीकरण के खिलाफ है। आपकी प्रतिबद्धता तो आम जनता के प्रति है, फिर जनअसंतोष को सही दिशा देने मे,ं आपकी हिस्सेदारी कितनी है?

हमें मनना ही होगा, कि नक्सलवादी गलत नहीं सही सवाल है। भले ही हम उनकी कार्यनीतियों से सहमत न हों। मगर, मुददों से तो हमें टकराना ही होगा। अविश्वास के राजनीति के बीच, अपने विश्वास को टिकाने की परिस्थितियां तो बनानी ही होगी। राजनीतिक अनास्था का लाभ हमेशा से यथास्थितिवादी और प्रतिक्रियावादी ताकतों को ही मिला है। भारतीय संसदात्मक व्यवस्था के साढ़े छ: दशक लम्बे कार्यकाल में यह अनास्था लगातार बढ़ती रही है। पिछले लगभग तीन दशक से गठबंधन की जो व्यवस्था विकसित हो गयी है, यह इसका प्रमाण है, आज देश में ऐसी एक भी राजनीतिक पार्टी नहीं है, जो केंद्र में सरकार बना सके। सरकार बनाने के लिये गठबंधन की सांसे कितने दिनों तक चलेंगी? नहीं कहा जा सकता, हां विकास की जो दिशा है, उसका आने वाला कल खास अच्छा नहीं है। वह कर्इ मोर्चे की राष्ट्रीय सरकार बनाने की ओर बढ़ रही है। इसलिये देश में राजनीतिक विकल्पों का होना जरूरी है। ऐसा न होने पर लोकतंत्र की सांसें थम जायेंगी। जिस वित्तीय पूंजी ने राजसत्ता पर बढ़त हासिल कर ली है, और निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों के जरिये देश की संसद चला रही है, वह खुल कर सामने होगी। वित्तीय तानाशाही का खतरा भारतीय लोकतंत्र के सिर पर सवार है। राजनीतिक अनास्था लगातार बढ़ रही है। देश की यूपीए सरकार ने इसे अपने चरम पर पहुंचा दिया है। सामाजिक एवं राजनीतिक विकास की स्वाभाविक अवस्थायें अवरूद्ध हो गयी हैं, और आर्थिक हितों को मिली वरियता ने आने वाले कल में विदेशी हस्तक्षेप की स्थितियां भी पैदा कर दी है। जन सहयोग के बिना यह सोचना भी गलत होगा, कि साम्राज्यवादी ताकतों को भारत में घुसने से रोका जा सकता है। वैश्विक स्तर पर पूंजीवादी जनतंत्र पर वित्तीय पूंजी ने अपनी पकड़ मजबूत बना ली है। यूरोपीय संघ के देशों की सरकारों पर यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक का कब्जा है। अमेरिकी सरकार पूरी तरह उनके नियंत्रण में है। जो तीसरी दुनिया के देशों में आर्थिक एवं सामरिक लड़ार्इयां लड़ी जा रही है। और वास्तव में यह लड़ार्इ इन्हीं कारपोरेशनों के लिये लड़ी जा रही है, जिनके हाथों में वित्तीय पूंजी है। और भारत उनकी गिरफ्त से बाहर नहीं है।

मनमोहन सिंह ने भारत को वित्तीय समर क्षेत्र में बदल दिया है। अमेरिकी साम्राज्यवाद और पश्चिमी ताकतों के साथ दुनिया को अपने लिये मुक्त बाजार का नया क्षेत्र बनाने वाले रूस और चीन की शक्तियां भी भारतीय बाजार और उसके प्राकृतिक संपदा पर अधिकार जमाने के लिये सक्रिय है। मनमोहन सिंह जिनके सामने अमेरिका की ओर झुक कर खड़े हैं। भारत में व्यवस्था परिवर्तन अब उसका आंतरिक मामला भर नहीं है, इसलिये आसान भी नहीं है।

नक्सल विरोधी अभियान में लगी सुरक्षा एजेसियों ने जो खुलासा किया है, उनके आधार पर भाकपा माओवाद को जर्मनी, तुर्की और फिलिपिन्स, फ्रांस और क्यूबा सहित 27 देशों के माओवादी संगठनों का समर्थन हासिल है। यह जानकारी करीब दो महीने पहले छत्तीसगढ़ के गोलकुण्डा में की गयी छापामारी में प्राप्त कटकम सुदर्शन (पोलित ब्यूरो सदस्य) के लिखे पत्र से मिली है। सुरक्षा एजेनिसयों का अनुमान है, कि 25 मर्इ को कांग्रेसी नेताओं पर किया गया हमला -जिसमें सलवा जुडूम के महेंद्र कर्मा और नन्दकुमार पटेल सहित 29 लोगों की हत्या की गयी- कटकम सुदर्शन के देखरेख मे की गयी है। वैसे, माओवादियों ने अपने प्रेस विज्ञपित में इसकी जिम्मेदारी ली है, और दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के द्वारा इसे अंजाम देने की बात कही है। माओवादी प्रवक्ता उसेंडी ने इसे सलवा जुडूम के अंर्तगत आदिवासियों पर किये गये अत्याचार, हत्याकाण्ड और बेअंत आतंक तथा कांग्रेसी नेताओं पर किये गये हमले के लिये यूपीए सरकार द्वारा राज्य सरकारों के साथ मिल कर चलाये गये ‘आपरेशन ग्रीन हंट” के प्रति प्रतिक्रिया माना है। उन्होंने इनके साथ मारे गये लोगों के लिये अफसोस भी जाहीर किया है। प्रेस विज्ञपित में साम्राज्यवादी ताकतों, पूंजीपतियों और सामंती दलालों का जिक्र भी है। जो अपने आप में एक सवाल है।

• क्या सर्वहारा क्रांति बंदूक की नाल से निकली हुर्इ गोली है?

• क्या भारत जैसे विशाल देश में सशस्त्र संघषोर्ं से सत्ता हासिल किया जा सकता है?

• क्या गुरिल्ला युद्ध को जनयुद्ध में बदले जाने की परिस्थितियां देश में हैं?

• क्या जनवाद के बिना सर्वहारा क्रांति संभव है?

• और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसी स्थिति में साम्राज्यवादी विदेशी हस्तक्षेप को रोका जा सकता है? जिनका वित्तीय और सामरिक हित भारत से जुड़ चुका है।

सर्वहारा क्रांति के स्वरूप का निर्धारण राजनीतिक दल नहीं, उस देश की आम जनता करती है। जनशक्ति और वर्गगत राजनीतिक चेतना ही सर्वहारा क्रांति का आधार होता है, और क्रांति निर्माण की सतत प्रक्रिया है।

भारतीय माओवादियों के पास इन सवालों का कितना सटिक जवाब है? हम नहीं जानते। हम सिर्फ इनता जानते हैं, कि कोर्इ भी भूमिगत संगठन सर्वहारा क्रांति का नेतृत्व नहीं कर सकती। उसे देश की आम जनता के बीच खुलेआम आना ही होगा।

देश के खुफिया विभाग के उच्चाधिकारी के मुताबिक उत्तर-पूर्व में सक्रिय ”पीपुल्स लिबरेशन आर्मी” के गिरफ्तार आतंकियों ने नक्सलियों को संवेदनशील सुचना तकनीक उपकरणों और हथियारों की आपूर्ति की बात स्वीकार किये है। जो उन्हें चीन के माओवादी संगठनों से मिलता है। चीन में अभी भी माओवादी संगठन है। तुर्की और फिलिपिंस में भी माओवादी संगठन है। जर्मनी, फ्रांस और क्यूबा तथा दक्षिण अमेरिका के कर्इ देशों में सक्रिय संगठन भी आपस में जुड़े हैं। इस बात के भी प्रमाण मिले हैं, कि फ्रांस के माओवाद समर्थक जान मृडल पिछले साल छत्तीसगढ़ के माओवादियों को मध्यम वर्ग में अपनी पैठ बढ़ाने की सलाह दी थी। इस तरह कहा जा सकता है, कि माओवादियों के अंतर्राष्ट्रीय सम्बंध है। नेपाल के माओवादी सत्ता के बहुत करीब पहुंचने के बाद अब समाजवाद के लिये लोकतंत्र की ओर मुड़ गये हैं। जबकि भारत के माओवादियों ने राजनीतिक दलों पर हमले की पहल शुरू कर दी है। प0 बंगाल में माकपा पर हमले होते रहे है। झारखण्ड में माले पर हमले हुए हैं। छत्तीसगढ़ का यह मामला फिर भी नयी पहल है। केंद्र में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल पर हमले से विभाजन की कैसी रेखा खिंचेगी? यह तय नहीं है। मगर, वार्ताओं की पेशकश कहीं नहीं है। सैन्य कार्यवाही के साथ गृहमंत्रालय एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय, छत्तीसगढ़ में विकास योजना शुरू की है।

किंतु, आंतरिक सुरक्षा के मुददे पर आयोजित नर्इ दिल्ली बैठक निराशाजनक है। प्रधानमंत्री और आपरेशन ग्रीन हंट के समर्थक वर्तमान वित्तमंत्री पी0 चिदम्बरम नेशनल काउण्टर टैरेरिज्म सेण्टर -एनसीटीसी- के पक्ष में हैं, जबकि नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारों के मुख्यमंत्री इसे केंद्र सरकार का ऐसा हथकण्डा मानती है, जो देश के संघीय ढांचे के खिलाफ है। मनमोहन सिंह अपने रीढ़ की हडडी -इस मामले में- सीधा करने में लगे हैं। वो अधिसूचना जारी करना चाहते है। राजनीतिक दलों के लिये लोकतंत्र और जनहित की तरह आंतरिक सुरक्षा का मुददा भी आम चुनाव के लिये टांग कर रखने की नीति है। यही कारण है, कि आम जनता अपने ही देश के राजनेता और रजानीतिक दलों पर यकीन नहीं करती। वैसे भी, सरकार सामाजिक विकास योजनाओं और आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से हाथ खींचती जा रही है। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण ने सामाजिक विकास की दिशा को अवरूद्ध कर दी है, और वह लोकतंत्र की संरचना को भी तोड़ रही है। इसलिये बंदूक की नाल से खींची गयी लकीरों से हमारी सहमति भले नहीं है, मगर जन असंतोष और जन समस्याओं से जुड़े मुददे खड़े हैं, और मौजूदा समाज व्यवस्था से भी सहमत नहीं हुआ जा सकता।

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