Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / आम जनता, चुनाव पहले ही हार चुकी है

आम जनता, चुनाव पहले ही हार चुकी है

rashtriya mudda2014 का आम चुनाव परिणाम की दृष्टि से, कोर्इ खास महत्व नहीं रखता! या तो यूपीए की सरकार फिर से बन जायेगी, या फिर एनडीए की सरकार केंद्र में होगी। इसके अलावा कुछ और नहीं होना है। कांग्रेस का चेहरा सोनिया गांधी और राहुल जी से बना रहेगा, और भाजपा नरेंद्र मोदी को अपनी सूरत बना चुकी है। या, यूं कहिये, कि ऐसा करने के लिये वह विवश है। ‘हिंदू सेना’ और ‘मोदी आर्मी’ लालकृष्ण अड़वाणी के ‘गोवा सम्मेलन’ में भाग न लेने से, अड़वाणी जी के नर्इ दिल्ली आवास के सामने प्रदर्शन करती है। तखितयों पर लिखा होता है- ”अडवाणी से निवेदन -राष्ट्र के खातिर मोदी को आगे आने दें।” गोवा के भाजपा कार्यकारिणी बैठक में। आग्रह को आदेश बना दिया गया और अडवाणी पके आम सा भाजपा की थाली में है।

बाद में, जनता से निवेदन किया जायेगा, और चुनाव की गाड़ी पटरी पर आ जायेगी।

कांग्रेस अपनी एकजुटता दिखा रही है, और भाजपा अपनी एकजुटता दिखा रही है। गठबंधन उनकी एकजुटता की दूसरी कड़ी है, जो ढ़ीली-ढ़ाली है। राजसत्ता के करीब पहुंचने की कोशिश है। यह एक राजनीतिक दल का अपना घरेलू मामला है। सभी अपनी छावनी में बैठ कर देश और राष्ट्र की फिक्र कर रहे हैं। इन सभी देशभक्तों और राष्ट्रवादियों के पास अपना गौरव, अपनी कारगुजारियां और अपने कारनामें हैं। मगर, सभी की प्रतिबद्धता एक है। मुक्त बाजारवाद की डोर से सभी बंधे हैं। इसलिये, होने वाले चुनावी समर में कहीं, कोर्इ घमासान नहीं है। घमासान की बस खबरें हैं। जिसे जीतना है, उसके जीत की वैधानिक औपाचरिकतायें पूरी होनी है। आम जनता चुनाव पहले ही हार चुकी है। जनतंत्र अब कुछ ऐसा ही बचा है।

यह हारना पहले किश्तों में होता था, क्योंकि राज्य के पास वित्तीय शक्तियां होती थीं, प्राकृतिक संसाधन पर उसका अधिकार होता था, राजस्व का लाभ थोड़ा ही सही, मगर लोक कल्याणकारी विकास योजनाओं के जरिये उसे भी मिलता था, मगर निजी वित्तीय पूंजी को मिली बढ़त ने, इस हार को एकमुस्त कर दिया है। केंद्र की यूपीए सरकार और देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह बड़ी उपलबिध है।

अभी छत्तीसगढ़ में ‘परिवर्तन रैली’ से वापस हो रहे कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर माओवादियों ने जानलेवा हमला किया था। उसी के बाद किसी कांग्रेसी नेता ने कहा था कि ”भारत के माओवादियों को नेपाल के माओवादियों से सबक सीखना चाहिये। जिन्होेंने हथियार को छोड़ कर चुनाव का रास्ता अखितयार किया और आज वो सरकार का हिस्सा हैं।”

हम तो समझते हैं, कि माओवादियों के लिये सबक की कोर्इ कमी नहीं है। उन्हें नेपाल ही नहीं चीन से भी सबसक सीखना चाहिये। जहां नवउदारवाद पांव पसार चुका है। जहां माओत्सेतुंग की तस्वीरें तो लगी हैं, मगर माओवाद दम तोड़ चुका है। वैश्विक स्तर पर भी समाजवाद की वापसी तो हुर्इ है, मगर माओवाद की राहें बंद सी हैं। इसलिये, भारतीय माओवादियों को सबक लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों से भी लेना चाहिये। यह अच्छी बात होगी, कि वो लेनिन के जनवाद और वेनेजुएला के स्ट्रीट गर्वमेण्ट के बारे में भी जानें और सोचें। लेकिन, यह सबक क्या सिर्फ माओवादियों को लेना चाहिये? कांग्रेस या शेष राजनीतिक दलों को नहीं? जो आम जनता के नाम की राजनीति निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों के लिये कर रहे हैं।

क्या यह सोचने की जरूरत नहीं है, कि वैश्विक मंदी के खिलाफ वित्तीय एवं औधोगिक इकार्इयों को बचाने के बजाये, लातिनी अमेरिका के कर्इ गैर पूंजीवादी देशों ने अपने देश और महाद्वीप की आम जनता को बचाने का निर्णय लिया और अपनी वित्त व्यवस्था पर पड़ने वाले नाकारात्मक प्रभावों का भी हल निकाल लिया। उन्होंने राजसत्ता में आम जनता की हिस्सेदारी पर यकीन किया और निजीकरण के बजाये उधोगों और खनिज का राष्ट्रीरकरण किया।

क्या यूरोपीय देश और अमेरिका से सबक लेने की जरूरत नहीं है, जहां मुक्त बाजावादी अर्थव्यवस्था उखड़ी सांसें ले रहा है, और जिसे बचाने के लिये, तीसरी दुनिया के देशों को युद्ध और वित्तीय संकट में धकेला जा रहा है? भारत भी उन देशों में एक है। क्या यह सोचने की जरूरत नहीं है, कि जिन कारणों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था चरमरा गयी, यूरोपीय देश कर्ज से डूब गये और उनकी वैश्विक संरचना तक टूट कर बिखर रही है, उन्हीं नीतियों से, पूंजीनिवेश और निजीकरण से, कर्ज के बोझ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के जानलेवा सहयोग से अपनी अर्थव्यवस्था का निर्माण कैसे किया जा सकता है? एक पतनशील जनविरोधी व्यवस्था के पीछे-पीछे आंख मूंद कर चलने का क्या अर्थ है?

मनमोहन सिंह जी, आपके चेले ही हैं, नरेंद्र मोदी, आपकी तरह उन्हें भी समाजवाद से परहेज है।

हम तो कहते हैं, कि आप समाजवाद से परहेज रखिये, यह समाजवाद के लिये भी अच्छा होगा, क्योंकि आप जैसे लोग यदि समाजवादी हो जायें तो, मुलायम सिंह के समाजवादी पार्टी का क्या होगा? जो आपके ही दूसरे लार्इन के चेले हैं। उनका क्या होगा जो माक्र्सवादी समाजवाद के पक्षधर हैं। इसलिये, आप समाजवाद से परहेज ही न रखें, उसका विरोध करें, उससे दूर ही रहेंं। मगर यह जरूर सोचें, कि अमेरिकी व्यवस्था की गत ऐसी क्यों बन गयी है? और यूरोपीय देशों की जो हालत हो गयी है, उसकी वजह क्या है? हम जानते हैं, कि आप सूखे बांस हैं महाशय, और आपके पनपने की गुंजार्इशें खत्म हो गयी हैं। आप सिर्फ भीग कर झुक सकते हैं। मगर वहां झुकें जहां से अभिशाप न मिले। क्योंकि आपने तो देश को अभिशप्त कर दिया है। चरागाह बना दिया है आपने। सामाजिक असमानतायें बढ़ रही हैं। आर्थिक दीवालियापन करीब है। राजनीतिक संरचनायें टूट रही हैं। घपले और घोटालों की कमी नहीं है। मुक्त बाजारवाद की सटटेबाजी को आपने राजनीतिक चालबालियों में बदल दिया है। देश की आपने ऐसी सेवा की है हुजूर, कि कोर्इ आये, कोर्इ जाये, निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों का हित तब तक सधता रहेगा, जब तक देश की आम जनता सड़कों पर उतर नहीं जाती है।

और यह कब होगा? हममें से कोर्इ नहीं जानता। अभी वह धोखे में रहने और धोखा खाने के लिये तैयार है।

किसी भी राजनीतिक दल या राजनीतिक गठबंधन का अंतिम लक्ष्य सरकार बनाना होता है। ताकि, वह अपनी योजनाओं को कार्यरूप में बदल सके। उसके सामने देश और समाज के निर्माण का लक्ष्य होता है। राजसत्ता को पाने का संघर्ष भी, इन्हीं उददेश्यों के तहत होता है। लोकतंत्र में जनसत्ता को सैद्धांतिक मान्यता दी और राजसत्ता को पाना आसान बना दिया गया। यह मान लिया गया, कि उस देश की आम जनता वहां सरकार बनाती है, यह अधिकार उसका है।

वैचारिक रूप से यह स्वीकृति आज भी मिली हुर्इ है, किंतु उसके वर्गीय ढांचा और वित्तीय व्यवयस्था ने स्थितियां बदल दी हैं। पूंजीवाद वित्तीय साम्राज्यवाद में बदल गया है और वित्तीय पूंजी ने राज्य की सरकारों पर अपनी पकड़ बना ली है। नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवाद इसी सोच का नया संस्करण है। भारत जिसकी गिरफ्त में है।

वित्तीय पूंजी एवं उस पर अपना वर्चस्व बना कर बैठे लोगों ने राज्य एवं उनकी सरकारों के सहयोग से ही आम जनता पर अपनी बढ़त बनाने में सफलता पायी है। अब राज्य की सरकारों ने पूंजी पर अपनी पकड़ ढ़ीली कर दी है। हमारा आज इन्हीं विसंगतियों का परिणाम है। उसने लोकतंत्र को अपने विस्तार का जरिया बना लिया है, जहां आम जनता के द्वारा चुनी हुर्इ सरकार का भरम बना रहा है, और वास्तविक सत्ता आम जनता के हाथ से निकल जाती है। वह कम्पनी और कारपोरेशनों में बंट जाती है। सरकारें राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों से संचालित होने लगती है। पहले सरकारें साझेदार होती हैं और बाद में वित्तीय पूंजी का कृतदास हो जाती है।

देश की यूपीए सराकर और मनमोहन सिंह ने लोकतंत्र को इसी दर्जे पर पहुंचा दिया है। आम जनता का दर्जा भी घट गया है।

देश की मिश्रित अर्थव्यवस्था गायब हो गयी। संविधान में घोषित लोक कल्याणकारी राज्य के निर्माण का सपना लापता हो गया, उसके समाजवादी तत्वों का अब कही कोर्इ पता-ठिकाना नहीं है। राज्य एवं समाज के प्राकृतिक संसाधन, धन सम्पदा में सेंधमारी की जा चुकी है। कोयला, लोहा, ऊर्जा जैसे राष्ट्र निर्माण के स्थायी स्त्रोतों में राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये सम्मानित जगह बनायी जा चुकी है। कोल ब्लाक आबंटन, उनके इसी कारनामें की शुरूआत है। हमारी राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता को तोड़ दिया गया है। शिक्षा एवं संचार माध्यमों के साथ भी यही किया गया। वित्तीय पूंजी निवेश के लिये इतने दरवाजे खोल दिये गये हैं, कि सरकार अब चौकीदार की वकत भी खोती जायेगी। कहने को वार्ताओं की मेज पर वह बराबर की कुर्सी पर बैठी है, मगर वह उस बिचौलिया की तरह है, जिसे कमीशन के साथ शेयर भी हासिल है। आम जनता के संचित निधि से उस आधारभूत ढांचे का निर्माण किया जा रहा है, जो वित्तीय पूंजी निवेश के लिये जरूरी है। आम जनता की जरूरतों को, अपनी मौत आप मरने के लिये, स्थगित किया जा चुका है। आम जनता के लिये सरकार की चिंता चुनावी बेचैनी है। बचे हुए 1 साल को मनमोहन सिंह इसी बेचैनी में गुजारना चाहते हैं।

आज भाजपा की सूरत बने नरेंद्र मोदी से पूछा जाये कि वो सत्तारूढ़ होने के बाद क्या करेंगे? तो उनके सामने गुजरात का माडल है, जिसे वो ‘मिशन 2014’ कहते हैं। जिसका सूत्र सिर्फ एक है- देश की वित्तीय व्यवस्था का निजीकरण। जिसमें आम जनता की हिस्सेदारी श्रम के स्त्रोत और उत्पादन का साधन बने रहने में है। उत्पादन के साधन पर उसके वैधानिक अधिकार को खारिज करना ही नरेंद्र मोदी का मिशन 2014 है।

मनमोहन सिंह के उदारीकरण और नरेंद्र मोदी क मिशन 2014 में कोर्इ फर्क नहीं है।

अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का जो प्रभाव देश की राजनतिक संरचना पर जो पड़ा है, वह संसद की गरिमा और लोकतंत्र में आम जनता की हिस्सेदारी का क्रमिक ह्रास है। वह पतन है, जो मनमोहन सिंह के कार्यकाल की विशेषता है, कि हर एक मंत्रालय और हर एक प्रशासनिक विभाग बिचौलिया की भूमिका निभा रहा है। राजनीतिक भ्रष्टाचार और आर्थिक घपले और घोटालों के मूल में राष्ट्रीय-बहहुराष्ट्रीय कम्पनियों और कारपोरेशनों की बड़ी भूमिक है। जिसे न मनमोहन सिंह बदल सकते हैं, न नरेंद्र मोदी। 2014 के चुनाव परिणामों से भी इसे नहीं बदला जा सकता है। हां, इसे वैधानिक जरूर बनाया जा सकता है। इसलिये ”कांग्रेस मुक्त भारत” हो, या ”भाजपा मुक्त भारत” हो, दोनों में कोर्इ फर्क नहीं है। 2014 का आम चुनाव नकली चुनावी संघर्ष है, जिसमें आम जनता चुनाव पहले ही हार चुकी है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top