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दोध्रुवि विश्व के बीच

rashtriya antarrashtriyaभारत राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है। उसकी नीतियां अपने लिये मुक्त बाजार का क्षेत्र बनाने और अपनी वित्त व्यवस्था में मुक्त बाजारवादियों को ज्यादा जगह देने की है, मगर, मुक्त बाजार का नया क्षेत्र बनाने वाले पूर्व समाजवादी देश रूस और चीन की विश्वस्नियता कमतर है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके मंत्रियों की टीम के लिये यूरोप और अमेरिका ज्यादा महत्व रखते हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था में चीन की बड़ी हिस्सेदारी है, मगर जिनके लिये चीन की वित्तीय एवं सामरिक शक्ति एशिया प्रशांत क्षेत्र में बड़ी चुनौती है। और वो इस चुनौती को भारत के जरिये भी नियंत्रित करना चाहते हैं। साथ ही वो भारत की अर्थव्यवस्था में अपनी दखल भी बढ़ा रहे हैं, और चीन के प्रति असुरक्षा की भावना भी भर रहे हैं यही कारण है, कि भारत का मौजूदा नेतृत्व अपनी सुरक्षा के लिये चीन और पाकिस्तान को ही सबसे बड़ा खतरा समझता है। इसलिये, वह अपनी वित्तीय नीतियों को विस्तार देने के साथ सुरक्षा समझौतों पर जोर दे रहा है। उसकी अंतर्राष्ट्रीय नीतियां दो ध्रुवि विश्व में संतुलित सम्बंधों को बनाये रखते हुए, राष्ट्रीय आंदोलन और समाजवादी संघर्षों को समर्थन की रही है। उसकी नीतिगत -वैचारिक- सम्बद्धता प्रगतिशली समाजवादी विश्व के प्रति रही है, और उसने गुटनिर्पेक्ष देशों के आंदोलन की शुरूआत की। किंतु, आज स्थितियां बदल गयी है। उसकी सम्बद्धता बहुध्रुवि विश्व की अवधारणाओं को पूरी तरह जुड़ नहीं पायी है, और देश के यूपीए सरकार की सम्बद्धता अमेरिकी एकाधिकारवादी ताकतों से बढ़ती जा रही है।

पिछले महीने चीन के प्रधानमंत्री ली के चियांग की भारत यात्रा के बाद, भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जापान एवं थार्इलैण्ड की राजकीय यात्रा ने, अपनी सुरक्षा के लिये जो दिशा तय की है, वह एकाधिकारवादी ताकतों के विरूद्ध बनते नये समिकरण के पक्ष में उतना नहीं है, जितनी एकाधिकारवादी ताकतों से जुड़ने की है। पिछले एक दशक से जिस ओर वह बढ़ रहा है, यह उसी की अभिव्यकित है। जिनके लिये चीन की आर्थिक एवं सामरिक क्षमता एशिया प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका एवं क्षेत्र के उसके मित्र देशों के लिये रोज बढ़ती चुनौतियां हैं। बाजार के लिये युद्ध और युद्ध के बढ़ते खतरों के बीच भारत अमेरिका की ओर झुका हुआ है। यूपीए सरकार के सामने यह सवाल ही नहीं है, कि नवउदारवादी वैश्विकरण और तीसरी दुनिया के देशों में बढ़ती साम्राज्यवादी सक्रियता, एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिये बड़ा खतरा है। एक सीमा तक यह कहा जा सकता है, कि ”भारत, चीन के बढ़ती वित्तीय एवं सामरिक शक्ति के विरूद्ध है।” जो खुले तौर पर भले ही न कही जाये, मगर भारत का यह दृष्टिकोंण अमेरिकी नीतियों का समर्थन है।

भातर को आर्थिक एवं राजनीतिक रूप भले ही मनमोहन सिंह ने अमेरिकी सरकार के करीब ला दिया है, और ओबामा सरकार भारत की हिस्सेदारी एवं महत्व का जिक्र करती रही है, मगर सच यह है, कि भारत अमेरिका स्वाभाविक मित्र देश आज भी नहीं है। इसी महीने एडवर्ड स्नोडेन के द्वारा अमेरिका के ‘सर्विलांस प्रोग्राम’ की जानकारी को सार्वजनिक करते ही, यह बात खुल कर सामने आ गयी है, कि अमेरिकी खुफिया विभाग भारत की सरकार एवं देश की आम जनता के गतिविधियों पर गहरी नजर रखती है। ‘नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी’ के द्वारा मार्च 2013 में 6.3 अरब सूचनायें जमा की गयी हैं। भारत के कम्प्यूटर नेटवर्क और मोबार्इल मैसेज के जरिये जानकारियां खुफिया तौर पर जमा की जाती हैं।

भारत सरकार के लिये यह गहरा आघात है, कि अमेरिकी सरकार अपने मित्र देशों की गतिविधियों पर नजर रखती है। इस सिलसिले में मनमोहन सरकार ने अपना विरोध दर्ज कराया है। सोवियत संघ के पतन के बाद, बदलते विश्व परिदृश्य में भारत की नीतियां अमेरिका या पश्चिमी देशों का खुला विरोध कभी नहीं रही। उसने इराक, अफगानिस्तान पर हुए बहुराष्ट्रीय सेनाओं के हस्तक्षेप का स्पष्ट विरोध नहीं किया, जबकि वो उसके मित्र देश थे। लीबिया के मामले में भी उसने अमेरिकी समर्थन की तटस्थता से काम चला लिया। जिस समय विश्व जनमत अमेरिकी सरकार और तात्कालीन राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के खिलाफ थी, उसने अमेरिका से परमाणु करार किये। मनमोहन सिंह ने भारत को अमेरिकी खेमें में इस तरह खड़ा कर दिया है, कि गुटनिर्पेक्ष देशों के संगठन, बि्रक्स देशों में भी, मौजूदगी होने के बाद भी, वह अमेरिकी परस्त है। सीरिया के बारे में उसकी नीतियां आज तक स्पष्ट नहीं हैं, और र्इरान के मामले में वह अमेरिकी दवाब में है। अमेरिकी विदेश मंत्री जान कैरी ने इसी महीने भारत की यात्रा की और स्नोडेन के खुलासे के खिलाफ अपने सर्विलांस प्रोग्राम को जायज ठहराया। उन्होंने इसे आतंकवाद के खिलाफ जरूरी बताया। भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की आपतित बेदम थी। इस बात की जानकारी भी अब खुलेआम हो गयी है कि अमेरिका की तरह भारत भी अपने देश के नागरिकों के प्रति निगरानी कार्यक्रम चला रहा है। उसके पास भी आतंकवाद से संघर्ष का तर्क है। जान कैरी भारत से आर्थिक एवं सामरिक संबंधों के पक्षधर है।, और मानते हैं कि दोनों देशों की निकटता एक और एक ग्यारह है!

भारतीय पेट्रोलियम मंत्री एम0 वीरप्पा मोइली ने जून के दूसरे सप्ताह में खुलासा किया था कि ”देश में तेल एवं प्राकृतिक गैस का अकूत भण्डार होने के बाद भी, तेल और गैस आयात करने वाली लाबी हर पेट्रोलियम मंत्री पर नीतियों में बदलाव न करने का दबाव बनाती है।” मतलब? तेल का आयात और तेल की नीतियां मंत्रालय नहीं लाबी के दबाव से तय होते हैं।

यह बात भले ही स्पष्ट नहीं है, कि यह तेल लाबी किसके पक्ष में दबाव बनाती है? मगर, सरकार की तेल नीतियों को देखते हुए समझा जा सकता है। यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्य के विदेश नीति का आधार ही दुनिया के प्राकृतिक संसाधन एवं सम्पदा पर एकाधिकार है। मर्इ में विदेश मंत्री की र्इरान यात्रा के बाद र्इरान के प्रतिनिधि मण्डल के साथ आये गैस पार्इप लार्इन के प्रस्ताव पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया अब तक सामने नहीं आयी है। मनमोहन सरकार अमेरिकी दबाव में रही है। भारत चीन के बाद ही र्इरान से तेल आयात करने वाला, सबसे बड़ा देश है। चीन अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा एवं तेल आयात निर्यात के लिये प्रचालित अमेरिकी पेट्रो डालर के विरूद्ध र्इरान ही नहीं अन्य तेल उत्पादक देशों के सामने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में अपनी मुद्रा की सुविधा उपलब्ध करा चुका है, और रूस तेल निर्यात के लिये उसे पर्याप्त मात्रा में तेल उपलब्ध कराने का आश्वासन दे चुका है।

भारत के सामने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य सक्रियता और क्षेत्रीय शांति और स्थिरता की जटिल समस्या है, मगर उसकी नीतियां इस बारे में पूरी तरह गंभीर नहीं है। वह गुटनिर्पेक्ष देशों के आंदोलन के मंच का उपयोग कर रहा है ना ही दो ध्रुवि विश्व की विभाजन रेखा पर खड़ा हो बहुध्रुवि विश्व की अवधारणा की अनिवार्यता महसूस कर पा रहा है। वह उन पतनशील ताकतों की ओर झुका हुआ है, जो अपनी समस्याओं का समाधान, भारत जैसे देशों को बाजार बना कर करना चाहते हैं। जिनके लिये उनका मित्र देश होने का मतलब है, उनकी शर्तों को मानना। यदि भारत अमेरिकी शर्तों और सम्बंधों के तहत अपने सम्बंधों को विकसित करता है, तो वह खुद संघर्षों के नये क्षेत्र में बदल सकता है। उसे पाकिस्तान बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

चीन की बढ़ती ताकत का खौफ, पश्चिमी प्रचारतंत्र का हिस्सा है। सिंगापुर की यात्रा के दौरान अमेरिकी रक्षामंत्री हेगल ने कहा कि ”चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों को देखते हुए, अपने एशियायी सहयोगी देशों के हित में अमेरिका एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाये रखेगा।” अमेरिकी रक्षामंत्री ने यह बात ”इण्टरनेशनल इंस्टीटयूट फार स्ट्रैटिजिक स्टडीज” के सालाना कांफ्रेन्स में, अपने सम्बोधन के दौरान कही। उन्होंने अमेरिका एवं चीन के बीच सैन्य वार्ता पर भी जोर दिया। अमेरिकी योजना एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने की है, ताकि क्षेत्रीय संतुलन को अपने पक्ष में किया जा सके।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में जारी सैन्य संतुलन की नीतियां सिर्फ इस क्षेत्र को नहीं, बल्कि काला सागर तक के देशों को भी प्रभावित करेंगी। अमेरिकी नीतियां वैश्विक शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में बनाये रखने की है, जहां रूस की सामरिक क्षमता की चुनौतियां उसके सामने है। अमेरिकी नीतियां शांति एवं स्थिरता के विरूद्ध युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता की है, ताकि असुरक्षा की भावना और तनाव बरकरार रहे हैं। वैसे भी अमेरिकी वर्चस्व का आधार, उसकी सामरिक क्षमता है।

rashtriya antarrashtriya (2)भारत के सामने अपनी आंतरिक और पड़ोसी देशों के साथ स्थिरता और सुरक्षा को तय करने का, यह निर्णायक समय है। यह कड़वी सच्चार्इ है, कि वह अविश्वसनीय सहयोगी और अविश्वसनीय पड़ोसी देशों से घिरा हुआ है। उसकी आंतरिक एवं वित्तीय स्थितियां भी गलत नीतियों की शिकार है। जिस समय उसे अपने निर्माण और विकास की नयी पहल करनी चाहिये, उस समय वह चरागाह बनने की नीतियों से संचालित हो रहा है, जन लोकतंत्र के बजाये, जन विरोधी वित्तीय पूंजी के नियंत्रण में आता जा रहा है। उस लोकतंत्र का समर्थन कर रहा है, जिस लोकतंत्र की बखिया अमेरिका और यूरोपीय देशों में उधड़ चुकी है।

अमेरिका और यूरोपीय देशों से बढ़ती उसकी निकटता चीन सागर और कोरिया प्रायद्वीप के बढ़ते तनाव को हिंद महासागर तक लाने में सहायक सिद्ध हो रही है। हथियारों की होड़ और सुरक्षा संधियों के जरिये वह उस ओर बढ़ रहा है, जहां अपनी सम्बद्धता से वह बच नहीं सकेगा। वह उस लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व कर रहा है, जिस लोकतंत्र ने देश में वित्तीय तानाशाही के लिये खुली जगह बनाने का काम किया है। पाकिस्तान का लोकतंत्र नयी सरकार के गठन के बाद भी, भारत के प्रति उसकी नीतियों में कोर्इ बदलाव ला सकेगा, या नवाज शरीफ पाक आवाम की समस्याओं का समाधान कर सकेंगे(?) यह सोचा तक नहीं जा सकता, हालांकि, लोग सोच रहे हैं। यह खुली सच्चार्इ है, कि पाक सरकार जब तक आवाम की समस्याओं का सही समाधान नहीं कर सकती, तब तक भारत से उसके रिश्तों में कोर्इ सकारात्मक परिवर्तन नहीं आ सकता। वह आतंकवाद और इस्लामी ताकतों से निपटने की स्थिति में नहीं है। सेना की वरियता को चुनौती नहीं दी जा सकती है।

आतंकवाद के खिलाफ भारत उस लड़ार्इ का हिस्सा बनता जा रहा है, जिस लड़ार्इ का नेतृत्व अमेरिका कर रहा है। जो वास्तव में किसी भी देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप के अलावा और कुछ नहीं है। और यह हंस्तक्षेप सिर्फ दुश्मन देशों में नहीं, मित्र देशों में भी है। इसलिये, अमेरिकी सहयोग उसकी सेना की तरह ही खतरनाक है। और खतरे की बात यह है कि भारत को इस खतरे का अंदाजा नहीं है।

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