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मध्य-पूर्व में बढ़ता युद्ध का खतरा

asiaसीरिया के संकट का राजनीतिक समाधान एशिया की शांति एवं स्थिरता के लिये जरूरी है, मगर यूरोपीय संघ और अमेरिकी सरकार के निर्णयों से, रूस के द्वारा समस्या को वार्ता की मेज पर लाने की कोशिशों को गहरा आघात लगा है। जिनेवा शांति वार्ता की संभावनायें ही खत्म होती जा रही है। यह साफ लगने लगा है, कि आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियां विपरीत होने के बाद भी, अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतें सीरिया में इराक और लीबिया को फिर से दुहराना चाहती हैं। वो वार्ता से पहले, अपनी स्थिति सीरिया में मजबूत करने के लिये, युद्ध की अनिवार्यता से संचालित हो रही है। वो विश्व जनमत को धोखा देने के लिये, आजमाये हुए नुस्खों का सहारा ले रहे हैं।

पिछले महीने ब्रुसेल्स में हुए यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की बैठक में, सीरिया के खिलाफ एक साल के लिये लगाये गये प्रतिबंधों को जारी न रखने का निर्णय लिया गया। इस निर्ण के साथ ही अब यूरोपीय संघ के सदस्य देश सीरियायी विद्रोहियों को सीधे तौर पर हथियार देने के लिये स्वतंत्र होंगे। मध्य-पूर्व के पूर्व उपनिवेशवादी शक्तियां बि्रटेन और फ्रांस, इस प्रतिबंध को हटाने की मांग पहले से ही कर रहे थे। किंतु आसिट्रया, चेकगणराज्य, स्लोवानिया और फिनलैण्ड ने इस निर्णय का विरोध किया।

ब्रुसेल्स में हुए इस बैठक में, तुर्की के विदेश मंत्री ने भी भाग लिया था, और उन्होंने भी तुर्की की आम जनभावना के विरूद्ध यूरोपीय संघ के इस निर्णय का समर्थन किया। सीरिया में बशर-अल-असद सरकार के मुख्य विरोधी ‘नेशनल कालिजन’ के प्रवक्ता खालिद-अल-सालेह ने कहा- ”हम इस निर्णय का महीनों से इंतजार कर रहे थे। हमारे लिये यह सच्चार्इ का क्षण है।” मगर इस सच्चार्इ के खिलाफ सीरिया की आम जनता है।

यूरोपीय संघ और अमेरिकी सरकार इस सच्चार्इ को अस्वीकार करने की कोशिश कर रही है, कि सीरिया की 70 प्रतिशत आम जनता, आज भी बशर-अल-असद की सरकार को ही, सीरिया की वैधानिक सरकार मानती है। विद्रोहियों को 20 प्रतिशत लोगों का भी समर्थन हासिल नहीं है। जिसे बराक ओबामा सरकार और पश्चिमी ताकतें सीरिया पर थोपना चाहते हैं।

अमेरिकी सरकार ने सीरिया की सेना पर विद्रोहियों के खिलाफ रसायनिक हथियारों के उपयोग का आरोप लगातें हुए, सीरियायी विद्रोहियों को घातक हथियार देने और सैन्य हस्तक्षेप तक के विकल्पों की बात की है। अमेरिका के डेप्यूटी नेशनल सिक्यूरिटी एडव्हाइजर बेन रोडस ने कहा है कि ”अमेरिका के राष्ट्रपति ने निर्णय लिया है, कि वो सीरिया के विपक्ष को सीरिया की सरकार के खिलाफ लड़ने के लिये सैन्य सहयोग देंगे।” रोडस ने 13 जून को कहा कि ”राष्ट्रपति विपक्ष के सीरियन मिलिट्री कांउसिल को सीधे तौर पर समर्थन के साथ सैन्य सहायता देने का निर्णय लिया है।”

जिसका सीधा सा मतलब है, कि अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देश अब सीरिययी विद्रोहियों को जमीनी लड़ार्इ लड़ने के लिये हथियार ही नहीं देंगे, उन्हें सैन्य सहयोग भी देंगे। जार्डन में सीरिया की सीमा पर एक हजार से अधिक अमेरिकी सैन्य टुकडियां हैं, तुर्की में नाटो सेना ने पेटि्रयाट मिसाइलों की तैनाती कर दी है और सीरिया के समुद्री सीमा पर अमेरिकी युद्ध पोतों की मौजूदगी है।

अमेरिका और यूरोपीय संध के इस निर्णय से सीरिया ही नहीं, एशिया में युद्ध के खतरों को बढ़ना तय है। यह भी तय है, कि सीरिया के संकट को सोची-समझी योजनाओं के तहत बढ़ाया जा रहा है।

रूस की प्रतिक्रिया से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है, कि वह सीरिया की समस्या से हाथ नहीं खींच सकता, जहां उसका सबसे महत्वपूर्ण नौसैनिक अडडा है। जिस दिन यूरोपीय संघ ने सदस्य देशों के ऊपर से हथियारों की आपूर्ति का प्रतिबंध हटाया रूस ने घोषणा की, कि ”रूस सीरिया को ऐस-300 मिसार्इल्स देने का समझौते पर अब आगे बढ़ेगा, ताकि इस संघर्ष में नये तरीके से हस्तक्षेप करने वाले देशों को रोका जा सके।” वैसे भी सीरिया के समुद्री सीमा पर रूसी नौसैनिक बेड़ा तैनात है, और हवार्इ हमला करना निर्बाध नहीं है। वैसे अमेरिका ने भी जार्डन में पेटि्रयाट मिसार्इलों की तैनाती और एफ-16 विमानों को भेजने की घोषणां कर दी है। जहां उसकी सेना जमीनी लड़ार्इ में विद्रोहियों के समर्थन में लड़ने के लिये पहले से तैनात है।

रूस के राष्ट्रपति व्लालिमीर पुतिन के विदेश नीति सलाहकार यूरी यूशाकोव ने कहा है कि ”सीरिया सरकार के द्वारा विद्रोहियों के खिलाफ रसायनिक हथियारों के उपयोग करने का जो प्रमाण अमेरिका पेश कर रहा है, उसके बारे में हम बेबाक रूप से कह सकते है, कि उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता है। उसे तथ्य और प्रमाण कहना भी गलत है।” सीरिया की सरकार ने भी अमेरिकी आरोपों को एक सिरे से खारिज कर दिया है। उसने विद्रोहियों के द्वारा रसायनिक हथियारों के उपयोग का आरोप पहले ही प्रमाण के साथ, राष्ट्रसंघ में पेश किया था। वास्वत में अमेरिका और पश्चिमी देशों की बेचैनी सीरिया की सेना के द्वारा पिछले तीन सप्ताह में शहर कुसाय पर पूर्ण नियंत्रण और एलप्पो में मिली बड़ी सफलता की वजह से है। जो इस बात के प्रमाण हैं, कि विद्रोहियों के पांव उखड़ते जा रहे हैं। जिनका कहना है कि ”वो जिनेवा वार्ता में तब तक शामिल नहीं होंगे, जब तक बशर-अल-असद राष्ट्रपति पद से हट नहीं जाते।” जिसकी संभावना अभी कम है।

वास्तव में, सीरिया के संकट को शांतिवार्ता से हल करने के बजाये सैनिक हस्तक्षेप में बदलने की कोशिशें हो रही हैं। इराक, अफगानिस्तान और लीबिया की गलितयों को नये सिरे से दोहराने की भूल की जा रही है। अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतें यह समझ नहीं पा रही हैं, कि सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप उनके लिये भी आत्मघाती कदम हो सकता है। पहले से जल रहे अरब देशों की जन नाराजगी सिर्फ अपने देश की सरकार के खिलाफ नहीं है, बल्कि, नवउदारवादी बाजारवाद और उन ताकतों के खिलाफ है, जो जन विरोधी है। र्इरान में हुए चुनाव परिणाम के बाद भी, जिसमें उदारवादी राष्ट्रपति की जीत हुर्इ है, ने घोषणा कर दी है, कि यदि अमेरिका सीरिया मे जार्डन की सीमा से अपनी चार हजार सैन्य टुकडियां सीरिया में उतारेगा, तो र्इरान अपने चार हजार सैन्य टुकडियों को सीरिया के समर्थन में हस्तक्षेप के लिये भेजेगा। लेबनान की आम जनता सीरिया में बशर-अल-असद सरकार के साथ है, और कुसाय में सीरियायी सेना का साथ हिजबुल्ला दे रहा है। इस्त्राइल के द्वारा गोलान हार्इट के जिन इलाकों पर कब्जा किया गया है, वहां से आतंकियों की घुसपैठ सीरिया में अब आसान नहीं रह गयी है। तुर्की की आम जनता पहले से ही सीरिया की आम जनता के पक्ष में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करती रही है।

अमेरिका और पश्चिमी ताकतों को यह समझने की जरूरत है, कि उनके मित्र देशों की सरकारों भले ही, उनका समर्थन कर रही है, मगर उन देशों की आम जनता अमेरिका एवं पश्चिमी ताकतों के खिलाफ है। इराक और लीबिया पर किये गये हमले से स्थितियां पूरी तरह भिन्न है। सीरिया पर किया गया सैनिक हस्तक्षेप सीमिति युद्ध नहीं रह पायेगा। उसका विस्तार स्वाभाविक है।

इसे बाद भी, इस बात की संभावनायें कम ही हैं, कि सीरिया के गृहयुद्ध को एक बड़े युद्ध में बदलने से रोका जा सकेगा।

अमेरिका और पश्चिमी देश यदि सीरिया में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करते हैं, तो जार्डन, तुर्की, सउदी अरब, जैसे उसके मित्र अरब देशों की हिस्सेदारी तय है। रूस और सीरिया के मित्र देशों की सम्बद्धता को रोका नहीं जा सकेगा।

अमेरिका पूरे एशिया में सामरिक तनाव बनाने की नीति पर काम कर रहा है। उसके रक्षा मंत्री ने एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक क्षमता के प्रति अपनी चिंता ही जाहीर नहीं की है, बल्कि अपने मित्र देशों को आश्वस्त करते हुए क्षेत्र में अपनी नौसैनिक क्षमता बढ़ाने की घोषणा भी की है। पश्चिमी मीडिया ‘चीन के बढ़ते खतरे’ का प्रचार बड़े ही सुनियोजित ढंग से कर रही है। माना यही जा रहा है, कि ओबामा सरकार चीन की बढ़ती ताकत को अपनी सामरिक सक्रियता और समझौतों से नियंत्रित करना चाहती है। जिसका स्वाभाविक परिणाम बढ़ती हुर्इ असुरक्षा की भावना के बीच हथियारों की नयी होड़ शुरू होगी। भारत जैसा विशाल देश उसके नये ठिकानों में बदलता जा रहा है। जहां वह अपने बढ़ते हितों के तहत चीन के विरूद्ध असुरक्षा की भावना भर रहा है। भारत का मौजूदा नेतृत्व पूरी तरह अमेरिकी भुलावे में है। यह भुलावा क्षेत्रीय तनाव के लिये खतरा बनता जा रहा है। चीनी सागर और कोरिया प्रायद्वीप का संकट हिंद महासागर तक फैलता जा रहा है। हम यह कहने की स्थिति में नहीं हैं, कि अपने हितों से संचालित चीन की नीतियां विवादास्पद नहीं हैं, उससे कोर्इ खतरा नहीं है। सच तो यह है कि वह भी मुक्त बाजार के नये क्षेत्रों की रचना करना चाहता है, इसलिये, अमेरिकी सरकार के लिये चुनौतियां है। मगर उसके पास लोकतंत्र और आतंकवाद जैसा अमेरिकी मुददा नहीं है। ना ही वह एशिया की शांति और स्थिरता के लिये अमेरिका की तरह खतरा है। वैसे भी उसकी नीतियों में बदलाव आया है। आर्थिक विकास के लिये वह युद्ध के खरों से बचना चाहता है। वह किसी भी देश से सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ है।

लोकतंत्र की बहाली और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध का अमेरिकी मुददा, खुले तौर पर किसी भी देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप और युद्ध के खतरे में बदल गया है। अमेरिकी नजरिये से न तो लोकतंत्र की कोर्इ सूरत बनायी जा सकती है, ना ही आतंकवाद का कोर्इ चेहरा बन सकता है। क्योंकि अमेरिकी सरकार की अपनी कोर्इ सूरत ही नहीं है। वह युद्ध और युद्ध के खतरों को लोेकतंत्र और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध और मानवाधिकार के नाम से लगातार बढ़ा रहा है। ओबामा सरकार उन दैत्याकार कारपोरेशनों के दबाव में है, जो सारी दुनिया के प्राकृतिक सम्पदा और बाजार पर अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। जिनके पास अपने सही होने का कोर्इ तर्क नहीं है।

एशिया की शांति और स्थिरता के सामने एक ऐसे बड़े युद्ध का खतरा है, जिससे बचने की संभावनायें रोज घटती जा रही हैं।

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