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धोखे का खतरा हम कब तक उठायेंगे?

saval dar savalकिसी को भी आप बाजार में खड़ा कर दें, वह खुद को सतर्क और चालाक दिखाने की कोशिश करने लगेगा। वह सतर्क और चालाक है या नहीं? इस बात का, उसके बाजार में खड़ा होने से, कोर्इ संबंध नहीं है, मगर वह ऐसा दिखाने की कोशिश जरूर करता है, ताकि, वह धोखा न खा जाये।

‘बाजार में उसे साथ धोखा हो सकता है।’ ऐसा वह मानता और जानता है। उसे बताया भी यही जाता है, और उसका अनुभव भी यही रहा है। जिसका सीधा सा मतलब निकलता है कि ”बाजार एक बड़ा धोखा है।”

इसके बाद भी, हमसे यह कहा जा सकता है कि ”बाजार कभी गल्ती नहीं करत सकता।”

बाजार की शराफत का प्रचार इस तरह किया जा रहा है, कि यह यकीन खुद-ब-खुद पक्का होता जा रहा है, कि ”हो न हो, यह बाजार की नयी चालबाजी है।”

”हो न हो, वह कोर्इ जाल जरूर फैला रहा है।”

कुछ तो ऐसा जरूर हुआ है, कि उसे हमारे यकीन की जरूरत है।

लोग जब फुटपाथ से खरीददारी करते हैं, तब यह जानते और मानते हुए करते हैं, कि मोल-भाव होगा, ठगी होगी, मगर सामान सस्ते में मिल जायेगा।

ब्राण्ड का कोर्इ लफड़ा नहीं है। जो है, सामने है।

मगर, जहां ब्राण्ड है, जहां शाख है, उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। कम से काम नहीं चलता, बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।

हमारे यहां बाजार की शाख बनायी जा रही है।

मानी हुर्इ बात है, कि हमें कीमत भी बड़ी चुकानी पड़ेगी, क्योंकि बाजार की शाख बनाने वालों में बड़ी-बड़ी हस्तियां, बड़े-बड़े लोग हैं। और अब तो सरकार भी शामिल हो गयी है।

समझ रहे हैं न आप, कि जहां बड़े-बड़े लोग, बड़ी-बड़ी हस्तियां हैं, और अब जहां सरकार भी है, वहां की कीमत क्या होगी? उसे सिर्फ रूपयों में नहीं वसूला जायेगा, बल्कि हक और हस्ती भी, हाथ से निकल जायेगी। बाजार में आप सिर्फ खरीददार नहीं, बिकने वाले भी होंगे। और खरीदने और बिकने की शर्तें भी उनकी होगी।

अब सोचिये, कि बाजार यदि मुनाफा कमाने के लिये है, तो उनकी खरीदी और बिक्री की शर्तें क्या होंगी?

अब सोचिये, कि यदि शर्तें उनकी होंगी, तो हमारी बात कहां होगी? और जब हमारी बात नहीं होगी, तो हम क्या होंगे?

इसका जवाब किसी के लिये अच्छा नहीं होगा, न हमारे लिये, न बड़ी हस्तियों के लिये, न सरकार के लिये और न उस बाजार के लिये जहां हमें मदारी का जमूरा बनाया जा रहा है।

आप तो जानते हैं न, कि अब मदारी और जमूरे एक साथ देखने को नहीं मिलते। वह दौर बीत गया जब दोनों एक-दूसरे का पेट पालते थे, साथ-साथ खेल-तमाशा दिखाते थे, और उनकी रातें चैन से कट जाती थीं। मगर, अब ऐसा नहीं है। मदारी भी किसी का जमूरा है। और उससे ऊपर का मदारी भी किसी का जमूरा है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि छोटा मदारी अपने से बड़े मदारी का जमूरा है। बाजार ऐसे ही मदारी और जमूरों से भरा है।

मदारी मजमा लगाता है, जमूरा तमाशा दिखाता है।

जमूरा मजमा लगाता है, मदारी तमाशा दिखाता है।

बाजार ने मदारी और जमूरे को एक कर दिया है।

इसलिये, भीड़ आप चाहे जहां लगायें, होते आप बाजार में ही हैं। आर्इपीएल का स्पाट फिकिसंग हो या लांग टर्म कोल ब्लाक का मामला, बाजार के जड़ को पकड़ लीजिये, दोनों में कोर्इ फर्क नहीं है। खबरें बेशर्म हो गयी हैं। बाजार ने सबकी इज्जत उतार दी है। राजनीति को तमाशा बना दिया है। किसी फिल्म के प्रीमियर की तरह ही संसद के सत्रों का आयोजन होता है।

हमारे देश में, जैसे यह बताना मुश्किल है, कि कौन कितना प्रसिद्ध है? वैसे ही यह बताना मुश्किल है, कि कौन कितना भ्रष्ट है? सभी के चेहरे पर गजब की व्यावसायिक मुस्कान है। हमारे देश के संसदीय प्रतिनिधि हों या मुखिया, जहां भी जाते हैं, कारोबार का प्रस्ताव उनके पास होता है। हमारे देश के नामवर अब सिर्फ धंधा करते हैं। खुद को बाजार में खड़ा कर देते हैं। और जब खरीदी-बिक्री में, सुलह-समझौतों में दलाली होती है, तो हाय-तौबा मचाते हैं। यह हाय-तौबा इसलिये कुछ ज्यादा होता है, कि दलाल संसद भवन और मंत्री मण्डल में होते हैं, राजनीतिज्ञों के खास और चहेतों में होते हैं। वो लोग होते हैं, जो हम प्याला, हम निवाला होते हैं।

संसद को अब खेल का मैदान और राजनीति को अब आर्इपीएल में बदल दिया जाये तो, बड़ी बात होगी। चुनाव में खिलाडियों की तरह दिग्गजों की बोलियां लगायी जाये। राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को आमंत्रित किया जाये। बड़े-बड़े कारपोरेशनों को बोली लगाने की छूट दी जाये। दिग्गज बिके, झमेला खत्म हो। लोकतंत्र का तकाजा पूरा करने के लिये आम जनता तालियां बजाये। जो जिसका खाये, उसका गाये, राजनीति का खेल खेले, ट्राफी की जगह खदानों, कारखानों, व्यावसायिक क्षेत्रों और विकास योजनाओं का पटटा दिया जाये कि लागत से ज्यादा लूटो-खाओ। अवैधानिक कुछ नहीं, सबकुछ वैधानिक है।

मगर, देश में अभी इतना खुलापन नहीं है। बाजार का पूरा उदारीकरण नहीं हुआ है। मनमोहन सिंह, पी0 चिदम्बरम और मोन्टेक सिंह अहुलवालिया के आला दिमाग में हलुआ की तरह रेसिपी नहीं आयी है। राजनाथ और सुषमा स्वराज के स्वदेशी सोच में यह बात नहीं घुसी है। नरेंद्र मोदी के चालू खाते में ऐसा कुछ नहीं है। मिशन 2014, बाजार की हांड़ी में पक रहा है। जिसे साल भर पहले से सिर्फ इसलिये पकाया जा रहा है, कि बड़ा मदारी छोटे मदारी से सहमत हो जाये और उसे अपना जमूरा बनाये रखे। उसकी परेशानी यह है, कि ‘बड़े मदारी का जमूरा बनने के लिये उसे लोगों को जमूरा बनाना है।

saval dar saval (2)खेल बड़ा है, इसलिये साल भर पहले से तैयारियां हो रही है। भेंड़-बकरियों को, भेड़-बकरियां बनाने के लिये बंदर-भालू बनना पड़ रहा है। जटा-जूट बहरूपिया बनना पड़ रहा है। मनमोहन सिंह परेशान हैं, कि जमूरे के लिये मदारी को नाचना पड़ रहा है। उनकी परेशानी यह भी है, कि मदारी को खेल दिखाने के लिये अब, एक नहीं, कर्इ जमूरों की जरूरत पड़ती है। यूरोप में यूरोपीय संघ बन गया है। अमेरिका पहले से ही कर्इ राज्यों को संगठन है। अपने देश का ढांचा भी संघीय है। अब तो राजनीतिक दल भी संघीय ढांचे में ढ़ल गये हैं। संयुक्त मोर्चा बन गये हैं। जिसमें सभी के लिये दरवाजे खुले हैं। दुकान के दरवाजे पर प्रार्इज लिस्ट लगे हैं, इस नोट के साथ कि ‘मोल-भाव की अतिरिक्त सुविधा हासिल है।’

यूरोपीय देशों में, अमेरिका में और कर्इ सभ्यताओं में गुलामों की बोलियां लगार्इ जाती थी, अब भी खेल और राजनीति के बाजार में, बोलियां लगार्इ जाती हैं। इस बात से किसी को कोर्इ आपतित नहीं है। खेल की तरह राजनीति भी अब ‘मल्टी ब्राण्ड’ हो गया है। दर्शकों के लिये लड़कियां नचार्इ जाती हैं। ”मुनाफा और मौके का फायदा” बाजार की फितरत है, अब यह फितरत जुनून में बदल गया है। आदमी को हाट-बाजार में खड़ा कर दिया गया है। जहां खेल-कूद भी है और कोयले की खदानें भी हैं। जहां संसद भी है, और मुल्क के हुक्मरां भी हैं। जहां बड़े-बड़े लोग, बड़ी-बड़ी हस्तियां भी हैं, और आम आदमी भी है। जहां मदारी भी है और जमूरे भी हैं। राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी हैं।

हम मजमें में खड़े हैं? या मजमा हमारे चारो ओर लगा है? यह तय करना मुश्किल है। हां! हम बाजार में हैं, यह तय है, और बाजार से बाहर निकलने की जरूरतें, हमारे सामने हैं। खरीद-फरोख्त के बीच बस एक ही बात अच्छी है, कि ”बाजार एक बड़ा धोखा है।” और लोग अब, इस बात को समझने लगे हैं। समझदारों की तादाद कम है या ज्यादा? हम नहीं जानते। हम तो बस इतना जानते हैं, कि जब तक बाजार है, धोखे का खतरा बना रहेगा। अब सवाल बस एक है- धोखे का खतरा, हम कब तक उठायेंगे?

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