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सीरिया का संकट युद्ध के मुहाने पर खड़ा है

asia (2)सीरिया के संकट को प्रस्तावित जिनेवा वार्ता तक पहुंचने से पहले ही, निर्णायक युद्ध की ओर मोड़ दिया गया है।

यूरोपीय संध के विदेश मंत्रियों के ब्रुसेल्स सम्मेलन में सीरियायी विद्रोहियों को हथियार देने का निर्णय लिया जा चुका है।

14 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी सीरियायी विद्रोहियों को घातक हथियार देने का आदेश दिया है।

जार्डन में सीरियायी सीमा पर अमेरिकी सेना की 400 नयी सैन्य टुकडियों को भेजा जा चुका है, और एफ-16 लडाकू बम वर्षक एवं पेटि्रयाट मिसार्इलों की तैनाती का निर्णय हो चुका है।

तुर्की की सेना, टैंक दस्ता, पहले से ही सीरिया की सीमा पर तैनात है, और नाटो सैन्य संगठन की पेटि्रयाट मिसार्इलें तैनात की जा चुकी हैं।

मिस्त्र ने सीरिया से अपने सभी राजनीतिक एवं कूटनीतिक सम्बंधों को तोड़ने की घोषणा की है।

ओबामा सरकार सीरिया की समस्या का शांतिपूर्ण समाधान के लिये, रूस के साथ मिल कर ”जिनेवा वार्ता’ से सहमति व्यक्त करने के, अपने वायदे से पीछे हट गयी है। मास्को में रूसी विदेश मंत्री सर्गेर्इ लोवारोव और अमेरिकी विदेशमंत्री जान कैरी की घोषणा का अघोषित अंत हो गया है। माना यही जा रहा है, कि अमेरिका अपने कूटनीतिक पराजय को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है, हालांकि सीरिया के मामले में उसके लिये यही सबसे सम्मानित स्थिति होती। क्योंकि सीरिया को इराक, अफगानिस्तान, या लीबिया बनाने की स्थिति नहीं है। लेकिन, बराक ओबामा ने संकट के राजनीतिक समाधान के स्थान पर सैनिक समाधान को तरजीह दी है। जिसका प्रभाव मध्य-पूर्व पर ही नहीं, एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर भी पड़ेगा। अमेरिका और यूरोपीय देशों के विरूद्ध बन रहे नये समिकरण एवं खेमें की अनिवार्यता और बढ़ जायेगी।

दो साल से जारी सीरिया के संकट का समाधान विद्रोहियों को घातक हथियार और सैनिक सहयोग से संभव नहीं है। यह सोचना, कि सीरिया युद्ध सीमित होगा, हमलावरों का लापरवाह नजरिया ही प्रमाणित होगा।

यूरोपीय संघ ने जैसे ही ‘हथियार प्रतिबंधों’ के समापित की घोषणा की रूस ने घोषणा की कि ”रूस सीरिया को एस-300 मिसार्इल्स देने के करार पर आगे बढ़ेगा, ताकि, सीरिया के संकट में नये लोगों को शामिल होने से रोका जा सके।” अमेरिकी सरकार ने स्थितियों की गंभीरता को समझे बिना 3 जून को कहा कि ”सीरिया की बिगड़ती हुर्इ स्थिति को देखते हुए, अमेरिका जार्डन में पेटि्रयाट मिसार्इल और एफ-16 लड़ाकू विमानों को तैनात करेगा।” सीरियायी विद्रोहियों ने कहा कि ”वो जिनेवा वार्ता में तब तक शामिल नहीं होंगे, जब तक बशर-अल-असद सीरिया के राष्ट्रपति पद छोड़ नहीं देते हैं।” जिसकी सम्भावना बहुत ही कम है।

अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी देशों की यह मांग पहले से ही है, कि बशर-अल-असद सत्ता छोड़ दें।” जोकि किसी भी तरह से जायज नहीं है, क्योंकि किसी भी देश की सरकार को बनाने का अधिकार उस देश की आम जनता को है, और जमीनी हकीकत यह है कि आज भी सीरिया की 70 प्रतिशत आबादी बशर-अल-असद के साथ है।

सीरियन स्टेट टेलीविजन ने जानकारी दी है कि ”सीरिया की सेना ने तीन सप्ताह के संघर्ष के बाद कुसाय शहर पर पूरी तरह अधिकार जमा लिया है।” सीरिया की सेना ने घोषणा की, कि अब शहर पूरी तरह सुरक्षित है, लोग अपने घरों में वापस हो सकते हैं।” वो पूरे शहर की सफार्इ में लगे हैं। उन्होंने चारो ओर लगे विस्फोटक डिवाइस को हटा दिया है। इस अभियान के दौरान सैंकड़ो विद्रोही मारे गये और 200 ट्रकों में भरकर अपने सामान के साथ उत्तरी क्षेत्रों में भाग गये हैं।

सीरियायी सेना के इस अभियान में हिजबुल्ला के सशस्त्र लड़कों ने भरपूर सहयोग दिया। 19 मर्इ को इन्हीं के सहयोग से सीरिया की सेना ने कर्इ दिशाओं से शहर में प्रवेश किया। उन्होंने कहा- ”यह अमेरिका और इस्त्राइल की सरकार पर करारा चोट है।” हिजबुल्ला के डिप्यूटी सेक्रेटरी जनरल शेख नर्इम कासीम ने कहा कि ”सीरिया की सरकार को सत्ता से बेदखल करने का दावा कभी न पूरा होने वाले खयाल के अलावा और कुछ नहीं है।” उसने पहले भी इस बात की घोषणा की है, कि सीरिया के सहयोगी उसे किसी भी कीमत पर अमेरिका और इस्त्राइल के हाथों में जाने नहीं देंगे।”

कुसाय में बड़ी संख्या में सीरियावासियों ने शहर में फिर से सुरक्षा व्यवस्था कायम होने की खुशी में रैली निकाली। साना न्यूज एजेन्सी ने रिपोर्ट दी है कि 9 जून की रैली में लोगों ने राष्ट्रीय नारे लगाये। उन लोगों ने सीरिया की सेना पर अपना भरोसा जताया, कि वो आतंकवादियों से अपने देश की रक्षा कर सकते हैं।” रैली का नेतृत्व करने वाले होम्स के गर्वनर अहमद मुनिर मोहम्मद ने कहा कि ”आतंकवादियों के द्वारा तबाह की गयी जनसेवा को जल्द से जल्द बहाल किया जायेगा।” पूर्व लेबनानी जनप्रतिनिधि हसन याकूब ने भी रैली में भाग लिया। उन्होंने कहा- ”सीरिया के दुश्मन इसे तबाह करने की फिराक में थे, मगर वो नाकाम रहे, और ऐसा सिर्फ और सिर्फ सीरियावासियों की निष्ठा और सीरिया की सेना की बहादुरी की वजह से हुआ।”

सउदी अरब ने हिजबुल्ला के द्वारा विदेशी समर्थित विद्रोहियों के खिलाफ सीरिया की सेना के साथ मिल कर की गयी सैन्य कार्यवाही की निंदा की है।

सउदी अरब, सीरिया में अस्थिरता पैदा करने की योजना में, बराबर का हिस्सेदार है। जिस तरह कतर अमेरिकी यूरोपीय ताकतों के लिये सराजनीतिक षड़यंत्रों का गढ़ रहा है और तुर्की और जार्डन सैनिक सहयोगी, आतंकवादियों के लिये घुसपैठ कराने का क्षेत्र रहे हैं, ठीक उसी तरह सउदी अरब ने विद्रोहियों को आर्थिक सहयोग के साथ समर्थन दिया है। जिनके लिये हिजबुल्ला आतंकी संगठन है, और सीरिया की बशर सरकार जन विरोधी।

फ्रांस की पत्रिका लेबदो द्वारा कराये गये एक सर्वे के अनुसार 78 प्रतिशत लेबनानी हिजबुल्ला के द्वारा सीरिया के गृहयुद्ध में सीरियायी सेना के साथ सहयोग के पक्ष में है। 19 प्रतिशत लोगों ने ही इसका विरोध किया है।

जमीनी स्तर पर सीरिया की सेना की मिली इस सफला और सीरिया के संकट में हिजबुल्ला का खुले तौर पर शामिल होना अमेरिका और पश्चिमी ताकतों की बेचैनी का कारण है। वो किसी भी कीमत पर सीरिया की सेना को उत्तर-पश्चिमी शहर एलप्पो शहर पर कब्जा करने से रोकना चाहते हैं। जबकि सीरियायी सेना ने कुसाय पर अपनी पकड़ मजबूत करने के साथ ही एलप्पो पर अधिकार जमाने के अभियान की शुरूआत कर दी है।

पश्चिमी समर्थित विद्रोही गुटों में आपसी संघर्ष शुरू हो गया है। वो लूट के सामान के बंटवारे के लिये लड़ रहे हैं। हसाका प्रांत में हुए ऐसे ही झड़प में दर्जनों विद्रोही मारे गये हैं। कर्इ गुटों ने सीरियायी सेना के सामने आत्म समपर्ण भी कर दिया है।

अपने को ‘फ्री सीरियन आर्मी’ कहने वाले गुट के बि्रगेडियर जनरल सलीम इदरिश ने ‘न्यूयार्क टार्इम्स को दिये गये अपने 8 जून के इण्टरव्यू में कहा है कि ”यदि हमें युद्ध सामग्री और हथियारो की नयी खेप नहीं दी जाती है, तो हम जिनेवा सम्मेलन में भाग नहीं लेंगे।” वह अपने को विदेशी समर्थित विद्रोही सेना का कमाण्डर भी कहता है। सीरियायी सेना ने एलप्पो शहर से बाहर जाने वाले सभी सड़कों को रोक दिया है। रसद की सप्लार्इ लार्इन भी काट दी गयी है। एलप्पो के करीबी शहर कफर हमरा पर सीरियायी सेना का कब्जा हो गया है, जहां 120 आतंकी मारे गये हैं।

कुसाय और एलप्पो ने विद्रोहियों ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी, और यहीं से वो अपने अभियान को आगे बढ़ा रहे थे। मगर कुसाय के हाथ से निकलने और एलप्पो पर जारी हमलों ने उन्हें आधारहीन बना दिया है। वो यूरोपीय देश और अमेरिकी सरकार से हथियारों की मांग कर रहे हैं, और सैन्य हस्तक्षेपका दबाव बना रहे हैं।

फ्रांस के विदेश मंत्री ने 12 जून को कहा कि ”सीरिया की सेना को उत्तरी शहर एलप्पो में सफलता हासिल करने से रोकना होगा। हमें स्थितियाेंं को फिर से संतुलित करने की जरूरत है, क्योंकि पिछले कुछ सप्ताह में बशर-अल-असद की सेना और खास कर हिजबुल्ला ने जमीनी स्तर पर महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर ली है।”

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल किलंटन ने सीरिया के बारे में ओबामा सरकार के नीतियों की आलोचना करते हुए कहा है, कि ”वाशिंगटन का इस संघर्ष में हस्तक्षेप न करना एक बड़ी भूल होगी।” 11 जून को मेनहटटन में रिपबिलकन सीनेटर जान मैक्कन के साथ ‘सवाल-जवाब कार्यक्रम’ के अंतर्गत उन्होंने कहा। मैक्कन सीरियायी विद्रोहियों को घातक हथियार देने और सीरिया के संकट में सैन्य हस्तक्षेप करने की बात करते रहे हैं। उन्होंने तुर्की की यात्रा के दौरान भी यह कहा था।

अमेरिकी सरकार सीरिया के मामले में ”सभी विकल्प खुले हैं”, का राग आलापती रही है, लगे हाथ सीरिया की सरकार के लिये ‘रसायनिक हथियारों के उपयोग न करने की’ चेतावनी भी दागती रही है। जिसके बारे में बशर-अल-असद की सरकार ही नहीं, रूस ने भी विश्व समुदाय को आश्वस्त किया था। जिसके रसायनिक हथियारों पर इतनी खुफिया नजर लगी थी, कि वह उन हथियारों को एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित भी नहीं कर सकता था। सीरिया की सरकार ने राष्ट्रसंघ में अपने स्थायी प्रतिनिधि के माध्यम से पिछले महीने विद्रोही आतंकवादियों द्वारा रसायनिक हथियारों के उपयोग का प्रमाण के साथ, जानकारियां भी दी थी।

13 जून को डिप्यूटी नेशनल सिक्यूरिटी एडव्हाइजर बेन रोडस ने जानकारी दी कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सीरियायी विपक्ष-विद्रोहियों को सीरिया की सरकार के खिलाफ लड़ने के लिये सैन्य सहयोग देने का निर्णय लिया है।” इस वक्तव्य से एक दिन पहले बेन रोडस ने कहा था कि ”हमारे इंटीलिजेंश कम्युनिटी ने यह आंकलन किया है कि असद सरकार ने रसायनिक हथियारों का उपयोग किया है।” उन्होंने कहा कि ”पिछले साल रसायनिक हथियार का उपयोग विद्रोहियों के खिलाफ छोटे स्तर पर कर्इ बार किया गया है।”

यूरोप और अमेरिकी सरकार सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप का बहाना पहले से तलाश रहे थे। बराक ओबामा को एक साल बाद यह इहलाम तब हुआ, जब सीरिया की सेना ने जमीनी तौर पर बढ़त हासिल कर ली, विद्रोहियों के पांव उखड़ गये और जिनेवा शांतिवार्ता की वार्ता तय हो गयी। जिन्होंने बड़े पैमाने पर वियतनाम में ‘एजेन्ट आरेंज’ (रसायनिक हथियार) का उपयोग खुले रूप में किया। जिनके माथे पर लाखों इराकियों की हत्या, अफगानों का खून लगा है। खुद बराक ओबामा ने लीबिया के साथ अफ्रीकी देशों के आनेवाले सुखद कल की हत्या की। गददाफी की हत्या का जश्न मनाया।

रूस के लोअर चेम्बर आफ पार्लियामेण्ट के विदेश नीति के प्रमुख अलेक्सेर्इ पास्कोव ने कहा कि ”सीरिया की सरकार के द्वारा विद्रोहियों के खिलाफ रसायनिक हथियारों का उपयोग करने का आरोप प्रायोजित है।” उन्होंने अपने टिवटर एकाउण्ट पर पोस्ट किया, कि ”इस सूचना को ठीक उसी तरह गढ़ा जा रहा है, जैसे इराक पर हमले से पहले उसके पास संहारक हथियार होने की बात को प्रचारित किया गया था।” उन्होंने कहा है कि ”इस खबर को, कि बशर-अल-असद ने रसायनिक हथियारों का उपयोग किया है, ठीक उसी तरह गढ़ा जा रहा है, जैसे कि सददाम हुसैन के घातक हथियार के झूठ को गढ़ गया था।”

यह कड़वी सच्चार्इ है, कि अमेरिका के द्वारा सददाम हुसैन पर लगाये गये एक भी आरोप को आज तक सिद्ध नहीं किया जा सका। इसके बाद भी बराक ओबामा यह मान कर चल रहे हैं कि विश्व जनमत उनकी बातों में आ जायेगी।

14 जून को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने विदेशी मामलों के सलाहकार यूरी यूशाकोव ने कहा कि ”अमेरिका के द्वारा सीरियायी सरकार के खिलाफ विद्रोहियों पर रसायनिक हथियारों के जो प्रमाण पेश किये गये हैं, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। मैं खुले तौर पर कह सकता हूं, कि वो तत्थ्य भी नहीं है।” उन्होंने वाशिंगटन के द्वारा सीरियायी विद्रोहियों को हथियार देने के निर्णय की निंदा की। उन्होंने कहा- ”सीरिया के संकट का संयुक्त समाधान करने के प्रयासों को इससे गहरा आघात लगा है।”

सीरिया ने भी अमेरिका के द्वारा विद्रोहियों को हंथियार देने के निर्णय की निंदा की और रसायनिक हथियारों के उपयोग के आरोप को झूठा और मनगढंत करार दिया।

सीरिया के संकट को जानने वाले इस बात को अच्छी तरह जानते हैं, कि अमेरिकी सरकार के आरोप और निर्णय की वजह सीरिया में सक्रिय विपक्ष, विद्रोही और आतंकियों के उखड़ते पांव हैं। यही कारण है कि 14 जून को सीरियायी विद्रोहियों के बि्रगेडियर जनरल सीलम इदरिस ने कहा कि ”हम उम्मीद करते हैं कि अमेरिकी सरकार का यह निर्णय पेपर पर स्याही की तरह नहीं होगा, बल्कि उसे जमीनी तौर पर लागू भी किया जायेगा।” सीरियन नेशनल कालिजन के प्रमुख जार्ज साबरा ने भी इस निर्णय का स्वागत किया है।

जबकि, राष्ट्रसंघ महासचिव बान कि मून ने कहा है कि ”ऐसी स्थिति में यह निर्णय किसी के पक्ष में नहीं है। सीरिया के संघर्ष का समाधान सैन्य कार्यवाहियों से नहीं किया जा सकता। यह देश को विघटन की ओर ले जायेगा।” उन्होंने रसायनिक हथियारों के उपयोग के बारे में कहा कि ”सीरिया की सरकार के द्वारा रसायनिक हथियारों के उपयोग करने के अमेरिकी आरोपों को हम प्रमाणित नहीं कर सकते। राष्ट्रसंघ के विशेषज्ञ अपनी जांच जारी रखेंगे।”

14 जून को ही फ्रांस के विदेश मंत्री के प्रवक्ता फिलिप ने कहा कि- ”सीरिया पर नो फ्लार्इ जोन लागू करना, अभी असंभव है। क्योंकि, इसके लिये राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद का निर्णय जरूरी है। विश्व समुदाय के अनुमति के बिना इसे लागू नहीं किया जा सकता है।” अमेरिकी सरकार भ्ीा इस बात को अच्छी तरह जानती है कि ‘नो फ्लार्इ जोन’ के नाम से जो झांसा लीबिया के समय दिया जा सका है, उसे दुहराया नहीं जा सकता। व्हार्इट हाउस के प्रवक्ता ने कहा है कि ”नो फ्लार्इ जोन का निर्णय संभव की सीमा से बाहर है। उसे भयानक बाधाओं का सामना करना पडेगा, जोकि 2011 में लीबिया के समय नहीं उठाना पड़ा था।”

अमेरिका के डीप्यूटी नेशनल सिक्यूरिटी एडव्हार्इजर बेन रोडस ने कहा कि ”यह नाटकीय रूप से ज्यादा कठिन, खतरनाक और खर्चीला होगा।” क्योंकि सीरिया और लीबिया की स्थितियां अलग है। उन्होंने कहा- ”सीरिया के पास लीबिया की तुलना में ज्यादा आधुनिक एयर डिफेन्स सिस्टम है। जिसकी वजह से भी नो फ्लार्इ जोन स्थापित करना मुश्किल है।”

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की घोषणा के बाद, यह तय हो चुका है, कि सीरियायी विद्रोहियों को सीआर्इए के द्वारा असाल्ट रार्इफल्स, सैनिकों के द्वारा चलाये जाने वाले राकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड, और एंटी टैंक मिसार्इल दिये जायेंगे।” मीडिया रिपोर्ट के अनुसार- विद्रोहियों तक ये घातक हथियार तुर्की और जार्डन के गुप्त सैनिक बेस के जरिये पहुंचाया जायेगा। ‘यूएसए-टूडे’ में छपे खबरों के आधार पर एक युद्ध विश्लेषक क्रिस्टोफर हारमर ने कहा है, कि अमेरिका तुर्की के इनरिक एयरबेस का उपयोग करेगा, यह बेस वास्तव में तुर्की में नाटो का एयरबेस है।” और तुर्की नाटो सदस्य देश है। जहां अंकरा सरकार और तुर्की में सीरिया के खिलाफ किये जा रहे साजिशों के विरोध में भारी जन प्रदर्शन आज भी जारी है। तुर्की की आम जनता नाटो पेटि्रयाट मिसार्इलों की तैनाती के खिलाफ है।

पश्चिमी मीडिया ने खबर दी है कि ”अमेरिका एफ-16 लड़ाकू विमान और पेटि्रयाट एंटी एयरक्राफ्ट मिसार्इल्स जार्डन में स्थापित करेगा, जिसके जरिये सीरिया में नो फ्लार्इ जोन लागू किया जा सकता है।” जिसकी प्रतिक्रिया रूस में स्वाभाविक रूप से हुर्इ।

16 जून को रूस ने विदेशमंत्री सर्गेर्इ लोवारोव ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा, कि ”यह अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है, और हम सचमुच यह उम्मीद करते हैं, कि हमारे अमेरिकन सहयोगी अपनी गतिविधियों को दोनों देशों के द्वारा तय किये गये राजनीतिक वार्ता के आधार पर ही निर्धारित करेंगे।” उन्होंने रसायनिक हथियारों के उपयोग के आरोप को एकसिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि ”ओबामा सरकारी ने रसायनिक हथियारों के उपयोग के जो साक्ष्य जुटाये हैं, वो हेग द्वारा तय किये गये प्रतिबंधित रसायनिक हथियारों के अहर्ताओं को भी पूरा नहीं करते हैं। खून, पेशाब, मिटटी और कपड़ों को गंभीर प्रमाण तब माना जा सकता है, जब हेग के द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों के द्वारा नमूना लेकर उनकी जांच प्रयोगशाला में किये गये हों।”

अब तक रूस की प्रतिक्रिया अमेरिकी सरकार, यूरोपीय देश और उनके अरब जगत के मित्र देशों के खिलाफ रही है। वह सीरिया के संकट का राजनीतिक समाधान के पक्ष में है। जबकि साम्राज्यवादी शक्तियां ऐसी स्थितियां बनाती जा रही हैं, कि सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप को वैधानिक स्वीकृति मिल जाये। उन्होंने विद्रोहियों के पक्ष में मानवाधिकार का मुददा उठा लिया है। 14 जून को राष्ट्रसंघ मानवाधिकार काउंसिल ने 37 देशों के समर्थन से एक मानवाधिकार प्रस्ताव पारित कराया है, जिसमें हिजबुल्ला के सीरियायी सेना के साथ मिल कर विद्रोहियों के खिलाफ की गयी कार्यवाहियों की निंदा की गयी है।

इस प्रस्ताव पर रूस के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ”यह प्रस्ताव पक्षपात पूर्ण और प्रतिकूल है। जिसकी पहल अमेरिका, बि्रटेन, कतर, कुवैत, संयुक्त अरब अमिरात और टयूनीसिया ने की है। जिन्हें विदेशी समर्थित सीरियायी विद्रोहियों द्वारा किये जाने वाले अत्याचार नजर नहीं आता।” मंत्रलाय ने कहा है कि ”इस प्रस्ताव में हिजबुल्ला के संघर्ष में शामिल होने पर चिंता व्यक्त की गयी है, मगर, पूरी तरह प्रशिक्षित, हथियारबद्ध भाडे़ के सैनिक, आतंकी और भुगतान पाने वाले पेशेवर विदेशियों के द्वारा सीरिया में जारी किये गये लड़ार्इ में मारे जाने वाले सीरियायियों की कोर्इ चिंता नहीं है। उनके संगीन अपराधों की अनदेखी की गयी है।”

एक सउदी अरब के स्त्रोत के अनुसार सीरिया में लगभग 8000 सउदी लोगों को, सीरिया की सरकार के खिलाफ लड़ने के लिये जार्डन की सीमा से भेजा गया है। तुर्की और गोलान हार्इट की सीमा से भी सीरिया में भारी आतंकी घुसपैठ किया गया है। जिन्हें पश्चिमी देशों का समर्थन हासिल है। फ्री सीरियन आर्मी के प्रतिनिधि मिकदाद ने कहा है, कि विश्व समुदाय को अपने सारे ताकत का उपयोग करना चाहिये क्योंकि हमें मदद की जरूरत है।” अब वो टैंक और बम वर्षकों की मांग कर रहे हैं। अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देश विद्रोहियों के पक्ष में सैन्य हस्तक्षेप की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने रसायनिक हथियार के उपयोग को बहाना बना लिया है।

15 जून को मिस्त्र के राष्ट्रपति मुर्सी ने सीरिया से अपने सभी राजनीतिक सम्बंधों के समापित की घोषणा की। उन्होंने पश्चिमी देशों से सीरिया के लिये ‘नो फ्लार्इ जोन स्थापित करने की मांग की, और हिजबुल्ला के लिये कहा, कि सीरिया में उसके लिये कोर्इ जगह और संभावना नहीं है।

सीरिया की सरकार ने इसकी निंदा की और गैर जिम्मेदाराना हरकत करार दिया। सीरिया के द्वारा कहा गया कि ”मिस्त्र ने दमिश्क से अपने रिश्तों को खत्म कर सीरिया की सरकार के खिलाफ हो रहे साजिशों में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ हो गया है। अब उन्होनें अमेरिका और इस्त्राइली क्लब की सदस्यता पा ली है।” रूस ने भी इस निर्णय की आलोचना की है।

सीरिया का संकट भले ही निर्णायक मोड़ पर है, मगर उसे असमाप्त राह पर डाला जा रहा है। जिसके अंत के बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है।

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