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मिस्त्र का तहरीर चौका खाली नहीं है!

A large Egyptian flag is seen as protesters opposing Egyptian President Mursi shout slogans against him and Brotherhood members during a protest at Tahrir Square in Cairoमिस्त्र का तहरीर चौक खाली नहीं है।

मिस्त्र में, अब तक के सबसे बड़े प्रदर्शनों का दौर जारी है।

राष्ट्रपति मुर्सी के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों को सिर्फ मुर्सी के खिलाफ नहीं कहा जा सकता, वास्तव में यह अरब क्रांति के जनभावनाओं के विरूद्ध खड़ी ताकतों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन है। यह दिखावटी जनतंत्र और इस्लामी कटटरता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन है। जिसका सीधा सा मतलब है कि टयूनीसिया से शुरू हुए जनक्रांति को, लोकतंत्र की बहाली के नाम से, बरगलाने की अमेरिकी एवं पश्चिमी ताकतों की साजिशें अभी कामयाब नहीं हुर्इ हैं।

यदि हम मान लें, कि अफ्रीका का मिजाज मिस्त्र की नब्ज पर अंगुलियां रख कर जाना जा सकता है, तो हम कह सकते हैं, कि ”जन असंतोष अपने चरम पर है। लोग अपने गुस्से को जाया करना नहीं चाहते।” हम यह भी कह सकते हैं, कि ”अरब जगत दूसरी क्रांति के दौर में है। जिसे भुलावा देना आसान नहीं होगा।” क्योंकि, अमेरिका ओर पश्चिमी मीडिया के द्वारा प्रचारित ‘अरब सिप्रंग’ से लोगों का मोहभंग हो गया है। उनकी नाराजगी पहले से ज्यादा समझदार हो गयी है।

पश्चिमी मीडिया हो रहे प्रदर्शनों के प्रति सतर्क है। लंदन से प्रकाशित अखबार ‘द आब्जर्वर’ लिखता है कि ”राष्ट्रपति मुर्सी के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन, भविष्य के लिये बेहतर संकेत नहीं हैं। अरब क्रांति का केन्द्र रहा यह देश, इस तरह दूसरी क्रांति से जूझता रहा, तो यहां की स्वाधीनता खतरे में पड़ जाएगी। साथ ही यह देश, वह सब कुछ गंवा देगा, जो इसने अरब क्रांति से अर्जित की है।”

होस्नी मुबारक का जाना और मुहम्मद मुर्सी का आना, यदि पहली क्रांति का हासिल है, तो मिस्त्र की आम जनता उसे वास्तव में गंवाना चाहती है। क्योंकि, वह जान चुकी है, कि दोनों में कोर्इ फर्क नहीं है। वह यह भी जान चुकी है, कि मिस्त्र की सेना और इस्लामी ताकतों के साथ अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देश पहले भी थे, और आज भी मुसिलम ब्रदरहुड के राष्ट्रपति मुर्सी के वो साथ हैं। इस लिये, उन्हें कुछ भी खोने का डर नहीं है। डर है तो सिर्फ इस बात का, कि सेना और सत्ता को ताश के पत्तों की तरह फेंटने वाली शक्तियां लोकतंत्र के वायदे के साथ सेना को सामने खड़ा कर सकती हैं। थोड़े समय के लिये ही सही, मगर यह भुलावा चल सकता है। वैसे भी, पश्चिमी ताकतों के लिये, मिस्त्र में ऐसी सरकार की जरूरत है, जो लोकतंत्र के मुखौटे में सैनिक सरकार हो। जो उनकी उम्मीदों पर उतना ही खरा उतर सके, जितना होस्नी मुबारक और मुहम्मद मुर्सी उतर रहे हैं।

मुर्सी के पक्ष में आज पश्चिमी मीडिया इसलिये है, कि सेना और सत्ता के बीच के संतुलन के अमेरिकी प्रस्ताव को उन्होंने मान लिया और मध्य-पूर्व एशिया की समस्या में वो अमेरिका के साथ हो लिये। साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ तीसरी दुनिया में बन रहे समिकरण और मिस्त्र की आम जनता के साथ, तीसरी दुनिया की नाराजगी को दरकिनार कर उन्होंने सीरिया की समस्या के समाधान में अन्तत: मिस्त्र को अमेरिका के पक्ष में खड़ा कर दिया। विदेशी मामलों के उनके सलाहकार खादि-अल-कज्जाज ने 13 जून को कहा कि ”मिस्त्र के लोग सीरिया की सरकार के खिलाफ लड़ रहे विदेशी समर्थित विद्रोहियों के पक्ष में लड़ने के लिये पूरी तरह स्वतंत्र हैं। विद्रोहियों के साथ लड़ते हुए पकड़े जाने पर काहिरा की सरकार उनके खिलाफ कोर्इ भी कार्यवाही नहीं करेगी।” उन्होंने इसे कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता ओर अधिकार के रूप में परिभाषित किया।

”सीरिया में विद्रोहियों के साथ लड़ने वाले ऐसे मिस्त्रवासी, वापस मिस्त्र में आने के बाद, क्या मिस्त्र के लिये भी खतरा नहीं बन जायेंगे?” के जवाब में उन्होंने कहा- ”हम इन्हें खतरा नहीं मानते।” मगर आज आम मिस्त्रवासी और तहरीर चौक पर जमा लाखों लोग जो मुर्सी के खिलाफ हैं, और मुसिलम ब्रदरहुड के कार्यालय पर हमला कर रहे हैं, को मिस्त्र के लिये सबसे बड़ा खतरा मान रहे हैं। 15 जून को अपने हजारों समर्थकों की रैली को सम्बोधित करते हुए राष्टपति मुर्सी ने कहा- ”हमने आज सीरिया और सीरिया की वर्तमान सरकार से अपने सभी सम्बंधों को खत्म करने का निर्णय लिया है।” उन्होंने सीरिया की राजधानी दमिश्क से अपने राजदूत को वापस बुलाने की घोषणा की। उन्होंने सीरिया की बशर-अल-असद सरकार और उसकी सेना का साथ देने वाले हिजबुल्ला की आलोचना की। उन्होंने कहा- ”हिजबुल्ला को सीरिया से निकाल देना चाहिए। उसके लिये वहां कोर्इ जगह नहीं है।” उन्होंने पश्चिमी ताकतों से सीरिया में ‘नो-फ्लार्इ जोन’ स्थापित करने की मांग की।”

मुर्सी ने काहिरा को तुकी्र की अंकारा सरकार की पंकित में खड़ा कर दिया, जहां मिस्त्र की तरह सरकार और अमेरिका तथा पश्चिमी ताकतों के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। उन्होंने मिस्त्र को सउदी अरब, जार्डन और कतर की कतार में खड़ा करने की बड़ी भूल की है। जहां की आम जनता सीरिया की आम जनता के पक्ष में है, और सीरिया के संकट को पश्चिमी ताकतों की कारगुजारियां मानती है। दशकों से स्थापित सरकारों के खिलाफ जब भी आन्दोलन खड़ा होते हैं, और आम जनता अपने पक्ष में सड़कों पर उतर आती है, थोड़े-मोड़े सुधारों से उन्हें रोक पाना आसान नहीं होता, ना ही उन्हें धोखा देना आसान होता है। सत्तारूढ़ मुसिलम ब्रदरहुड के राष्ट्रपति मुर्सी इस सच को ठीक से समझ नहीं सके हैं। वो इस बात को समझना नहीं चाह रहे हैं, कि जब मिस्त्र की जनता होस्नी मुबारक की सरकार को हिला सकती है, तो वैसे ही सरकार को फिर से क्यों स्वीकार करेगी?

मिस्त्र की जनता शोषण और दमन का अंत चाहती है। राष्ट्रपति बने मुहम्मद मुर्सी से उन्हें बड़ी अपेक्षायें कभी नहीं थीं, मगर इतनी अपेक्षा जरूर थी, कि ”वो अपने से ठीक पहले की सरकार से सबक लेंगे।” लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने होस्नी मुबारक को दुहराना शुरू कर दिया, मगर वो सोचते हैं कि उनका अंत कुछ और होगा।

30 जून, जब मुसिलम ब्रदरहुड और राष्ट्रपति मुहम्मद मुर्सी, मिस्त्र में अपनी सरकार का वार्षिक जश्न मना रहे थे, मिस्त्र के लाखों-लाख लोग मुर्सी के इस्तीफे की मांग के साथ, सड़कों पर थे। वो नारे लगा रहे थे- ”मुर्सी, सत्ता छोड़ो!”……”आम जनता चाहती है, इस सरकार का अंत हो!”

काहिरा के तहरीर चौक पर शाम होते-होते 1 मिलियन से ज्यादा मुर्सी विरोधी लोग जमा हो गये। इसी दौरान हजारों-हजार लोगों ने राष्ट्रपति भवन के सामने विरोध प्रदर्शन किया, जहां सुरक्षा गार्ड तैनात थे। 30 जून को मिस्त्र के सभी प्रमुख शहरों में सरकार विरोध प्रदर्शन हुए। सभी 27 प्रमुख गवर्नर -प्रांतीय क्षेत्रों- में प्रदर्शन हुए।

मिस्त्र के दैनिक अखबार- अल-सौरो में एक फौजी स्त्रोत ने कहा कि ”यह, क्रांति के शुरूआत के बाद का, सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन था, जिसमें 17 मिलियन लोग मिस्त्र की सड़कों पर उतर आये।” प्रदर्शनों के दौरान सैनिक हेलीकाप्टर उस इलाके का गस्त लगाते रहे। मुर्सी समर्थक और मुर्सी विरोधियों के बीच हिंसक झड़पें हुर्इं। मुसिलम ब्रदरहुड के कर्इ कार्यालयों में न सिर्फ तोड़-फोड़ हुर्इ, बल्कि आगजनी की घटनायें भी हुर्इं।

तहरीर चौक पर आम मिस्त्रवासी के जमा होने का मतलब मिस्त्र की सरकार और मिस्त्र की सेना अच्छी तरह जानती है। इस बात की समझ पश्चिमी देश और पश्चिमी मीडिया को भी है। इसे वो न सिर्फ मिस्त्र बल्कि पूरे अरब जगत और अफ्रीका के लिये महत्वपूर्ण मानती है। यही कारण है कि सरकार विरोधियों को न तो सेना, ना ही मिस्त्र की सरकार और ना ही साम्राज्यवादी ताकतें वहां जमने देना चाहती हैं।

मिस्त्र की जनता ने इस बात की घोषणा कर दी है कि ”बस! अब और नहीं!” वह लोकतंत्र के नाम से धोखा खाते-खाते थक गयी है। ‘वाशिंगटन पोस्ट’ एक कैफे मालिक के माध्यम से लिखता है कि ”सभी थक चुके हैं! पूरी तरह निराश हैं! और सभी बहुत गुस्से में हैं।”

हाल ही में ‘इजिप्सियन सेण्टर फार पबिलक ओपिनियन रिसर्च’ द्वारा कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार- मुहम्मद मुर्सी मिस्त्र युवा और कामगरों की नजरों से गिर गये हैं। वो मिस्त्र के सबसे अलोकप्रिय राष्ट्रपति बन गये हैं। जब उन्होंने सत्ता संभाला था, उनके पास लगभग 78 प्रतिशत लोगों का समर्थन था जो अब बड़ी मुश्किल से 32 प्रतिशत रह गया है।” इसके बाद भी सच यह है कि यह 78 प्रतिशत समर्थन उस मतदान पर आधारित है, जिसे मिस्त्र की आधा से ज्यादा आम जनता ने कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपने राष्ट्रपति के 100 दिन विवादों के बीच ही पूरा किया है। उनके विरोध और उनके खिलाफ प्रदर्शनों का दौर कभी थमा नहीं।

नेशनल साल्यूशन फ्रंट के नेता मूसा ने राष्ट्रपति के आर्थिक कार्यक्रमों की आलोचना की। उन्होंने एसोसियेट प्रेस से कहा कि ”मुर्सी और उनके साथ खड़ी इस्लामी ताकतें इस बात को मानना नहीं चाहते कि यहां गुस्सा है। भारी जन असंतोष है।” उन्होंने मिस्त्र की सरकार और विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा कि ”असल में इस वक्त मिस्त्र में विपक्ष और सत्तारूढ़ पार्टियों में कोर्इ फर्क नहीं है। वो सिर्फ सत्ता चाहते हैं। दोनों के लिये कामगर वर्ग और देश की गरीब जनता, कोर्इ मुददा नहीं है।”

मुर्सी की सरकार अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से 4.8 बिलियन डालर के कर्ज के प्रस्ताव पर लगातार चर्चा कर रही है। जिसके आधार पर, मिस्त्र की अर्थव्यवस्था का और उदारीकरण, और बाजारवादी अर्थव्यवस्था को खुली छूट का प्रावधान है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक या ऐसी ही अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों का अपनी अर्थव्यवस्था में दखल देने का परिणाम क्या होता है? यह तीसरी दुनिया के देशों का भोगा हुआ सच है। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के जरिये ही अफ्रीकी देशों में, उन पूर्व उपनिवेशों में अपनी पकड़ को बनाये रखने के लिये, विकास योजनाओं को अपना हथियार बनाया। ज्यादातर सैनिक सरकारों ने जितने भी कर्ज लिये उसका सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका और पश्चिमी देशों तक पहुंच गया। उनके देश की आम जनता पर तो कर्ज का भारी बोझ बढ़ता गया, मगर विकास योजनाओं पर कोर्इ खर्च नहीं हुआ।

साम्राज्यवादी ताकतें और पूर्व उपनिवेशवादी देशों के कब्जे में आज भी उनकी प्राकृतिक सम्पदा है। जो वहां सैनिक कवायतें और राजनीतिक अस्थिरता को बनाये रखते हैं।

मिस्त्र की राजनीतिक अस्थिरता इन दोनों के बीच से गुजर रही है। देश की आम जनता वास्तविक लोकतंत्र चाहती है। मिस्त्र में ऐसी सरकार चाहती है जो अपने देश की आम जनता के प्रति जिम्मेदार हो। राष्ट्रपति मुर्सी की सरकार इस जिम्मेदारी को निभाने में पूरी तरह नाकाम रही है। सेना और सत्ता के बीच का संघर्ष आज भी सतह के नीचे सक्रिय है। और यह मानी हुर्इ बात है कि अमेरिका और पश्चिमी देश लोकतंत्र का राग अलापते हुए इस्लामी ताकतों और सेना के पक्ष में शांति एवं स्थिरता की बातें करते हुए मुर्सी का पक्ष नहीं लेंगे। मुर्सी उनके हितों को साधने की कोशिशों में कम कारगर सिद्ध हो रहे हैं। इसलिये वो खतरे में हैं। उन्होंने इस बात को समझने की लापरवाही की है कि साम्राज्यवादी ताकतें वास्तव में सिर्फ और सिर्फ अपने हितों से जुड़ी होती हैं, और मिस्त्र की आम जनता उनके खिलाफ है।

मुहम्मद मुर्सी ने इस बात को समझने में गहरी लापरवाही दिखायी है, कि मिस्त्र की नाराज आम जनता, जो लाखों की तादाद में सड़कों और चौराहों पर है, वह उन्हीं ताकतों से लड़ रही दूसरी देशों की आम जनता के पक्ष में होगी। उन्होंने सीरिया की आम जनता के खिलाफ सीरियायी विद्रोही और आतंकवादियों तथा साम्राज्यवादी ताकतों के पक्ष में खड़ा होने की भूल की है। उन्हें अपनी लापरवाही और गलतियों का खामियाजा किस रूप में पटाना होगा? यह तो नहीं कहा जा सकता, मगर इतना तय है कि मिस्त्र में उनके लिये कोर्इ जगह नहीं है। कम से कम वह जगह तो हर्गिज नहीं है, जहां वो हैं।

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