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अफसोस, दिल गडढे मे!

vakradhrishtiकभी हमने सोचा था, कि हमारे पास भी अपनी गाड़ी होगी, और उसके नम्बर प्लेट पर नौ-दो-ग्यारह (9 2 11) लिखवायेंगे। मगर, मेरी तरक्की सेकेण्ड हेण्ड स्कूटर से आगे नहीं बढ़ सकी। जिस पर नम्बर पहले से लिखा था। दूसरी बार लिखवाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। झडझडिया स्कूटर का नम्बर 0840 है। आपतितजनक कुछ भी नहीं, मगर नौ दो ग्यारह की जगह 0840 मुझे डबल 420 लगता है।

नौ दो ग्यारह किसी दूसरी गाड़ी का नम्बर प्लेट बन गया? या बनना बाकी है? कहने लायक नहीं हैं हम। वह हमारी जिंदगी में सशरीर आयी ही नहीं इसलिये, यह भी नहीं कह सकते, कि फरार हो गयी। गुमसुदगी या फरारी की रिपोर्ट भी नहीं लिखायी जा सकती।

सुनते हैं, कि गाड़ी का नाम भी ‘फरारी’ है।

कभी ट्रक का माडल ‘स्तकर’ था।

ओवरब्रीज के नीचे वाले सैलून का नाम ‘कातिल’ था।

कपड़े का ब्राण्ड ‘लूट’ है।

‘बिग बास’ टीवी शो है।

घूमने की जगह ‘नार्इट सफारी’ है।

कार की दौड़ ‘फारमुला-वन’ है।

हमारे पास कोर्इ फारमुला ही नहीं है, कि गिनती शुरू करें। हमारे पास न मनमोहन सिंह बनने का फारमुला है, ना बराक ओबामा। जो आज कल दूसरों का र्इ-मेल और मैसेज पढ़ने में व्यस्त हैं। उन्होंने ताक-झांक करने की आदत को ‘सर्विलांस प्रोग्राम’ बना लिया है। जो बड़ा होता है, उसकी ओछी हरकतें भी काबिल-ए-तारीफ होती है।

जिसे वो पैदा करते हैं, उसे फरार करा देते हैं, और जब वह फरार हो जाता है, उसे पकड़ने के बहाने, जिसके लिये जी मचला, उसे पकड़ने लगते हैं। बराक ओबामा जी आतंकवादी पकड़ रहे हैं, और मनमोहन सिंह जी पैसे वालों को पकड़ने में लगे हैं।

हम न तो आतंकवादी हैं, ना पैसे वाले हैं, इसलिये हमें कोर्इ नहीं पकड़ता। ट्रैफिक पुलिस, पर्यावरण के लिये फिक्रमंद समाजसेवी और पुरातन सामान के खरीददार कबाड़ी भी, हमारे चलते-फिरते 0840 को नहीं पकडते। छुआ-छुर्इ के खेल में भी, हमें आज तक कोर्इ नहीं पकड़ा। हम जन्मजात बजरबटटू हैं।

जब श्रीसंत जी पकड़े गये, हमारा जी लम्पट हो गया। श्री और संत का सम्बंध विच्छेद हो गया। हम लम्पट बनने का फारमुला ही बना रहे थे, कि खबर आयी ‘जनाव बाहर आ गये हैं।’ उन्होंने खास कुछ नहीं किया, थोड़ी सी दीवानगी की, थोड़ी सी आवारगी की, सटोरियों के जरिये थोड़ीसी कमार्इ की और जो हो रहा था, उसे ही दुहरा दिया। बवाल मच गया। बवाल से बड़ा फायदा हुआ। राजनीति का प्रवेश द्वार खुल गया।

अब उनके पास जनप्रतिनिधि बनने, संसद तक पहुंचने, देश और समाज की सेवा करने का लार्इसेंस है। बिना जेल भरो आंदोलन के ही, वो जेल रिटर्न हैंं। पूर्व कप्तान अजहरूददीन संसद में पहले से डंटे हैं। अपार अवसर हैं

हमें ऐसा अवसर कभी नहीं मिला।

6 दशक तक जनसंघ, भाजपा, राजनीति और देश सेवा करने के बाद भी आडवाणी जी बेचारे हो गये हैं।

हमें बेचारा बनने का मौका ही नहीं मिला।

हमारे सामने नरेंद्र मोदी जी, कभी खड़ा ही नहीं हुए।

राहुल गांधी जी के भाग्य की परछार्इ भी हम पर नहीं पड़ी कि मनमोहन जी कुर्सी छोडे़। जिंदगी तोहफे में मिले।

अभी तक ऐसा कोर्इ हादसा भी नहीं हुआ कि सरकार हमें मुआवजे का तोहफा दे सके।

हम तो अधूरी कहानी की तरह बिना छपे, बिना पढ़े ही रह गये।

न तो किसी चालू फिल्म की कहानी बन सके कि सौ करोड़ की कमार्इ हो जाये। ना ही अखबार की सुर्खी बन सके कि हाय-तौबा मच सके। नरेंद्र मोदी उत्तराखण्ड में कांग्रेस को लथाड़े और कांग्रेस उन्हें कीचड़ में घसीटे। आम जनता जीने की चाह में मरती रहे। हमारी बेशर्मी देखिये, कि हम कुछ करने, कुछ ऐसा बनने की सोचते रहे, कि पांचो अंगुलियां घी में हो और सिर कड़ाही में। मगर अफसोस, दिल गडढे मे। अब तक ऐसा नहीं हुआ। जबकि अमेरिकी विदेश मंत्री जान कैरी भारत में आ कर कहते हैं- ”हम (भारत और अमेरिका) एक और एक ग्यारह हैं।” मगर हम किससे कहें कि हमारे सपने नौ दो ग्यारह हो गये हैं।

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