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हम एक मरे हुए देश में है

vishesh aalekh15 अगस्त को, देश की आजादी का जश्न मना लिया जायेगा।

”हम आजाद हुए थे, और दशकों से आजाद हैं”, मान लिया जायेगा, कि यह बड़ी बात है। इन बड़ी बातों में कल, आज और आने वाले कल की बहुत सी बातें धुंधली रह जायेंगी।

हम, न तो गुजरे हुए कल के बारे में सही समझ रखते हैं, ना आज के बारे में हमारी समझ पक्की है। इसलिये, आनेवाले कल के बारे में सोचने की जहमत हम नहीं उठाते हैं। और यहीं हम, अपने ही खिलाफ रची गयी साजिशों में शामिल हो जाते हैं। या यूं कहिये, कि शामिल कर लिये जाते हैं। हमें पता ही नहीं चलता और आजादी चंद लोगों के ‘अमर रहें’ के नारों में बदल जाती है। दिल के दरवाजे पर कोर्इ दस्तक देता है- ”मर गया देश! जिंदा रह गये हम।”

दर्द होता है, यह सोच कर, कि ‘हम एक मरे हुए देश में हैं।’ जिन्दा हैं या नहीं? यह जटिल सवाल है।

मगर, इस बात का एहसास घट गया है। वह पीढ़ी गुजर गयी है, जिसे देश के विभाजन की पीड़ा को सहना पड़ा था। 1947 और 2013 के बीच का फर्क हमारे सामने है। पाकिस्तान विदेश है। बांगलादेश विदेश है। वहां जाने और ठहरने के लिये पासपोर्ट और विजा चाहिये। भगत सिंह होते तो क्या सोचते? क्या कहें? अभी तो महात्मा गांधी की जय है। जिन्ना साहब, कायदे आजम हैं। मुजीबुर्र रहमान की हत्या उस देश में हुर्इ जिसे उन्होंने बांगलादेश बनाया। लार्ड माउण्ट बेटन के पीछे खड़ा लार्ड मेकाले खुश है। औपनिवेशिक शक्तियां साम्राज्यवादी झण्डों की छांव में हैं, जहां व्हार्इट हाउस है, और बराक ओबामा बैठे हैं। अमेरिका हो या बि्रटेन भारत के मित्र देश हैं। मनमोहन सिंह हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं।

वैसे, यह जान लेना अच्छा होगा कि भारत में न तो अब महात्मा गांधी हैं, न पाकिस्तान में मोहम्मद जिन्ना हैं, और ना ही बांगलादेश में मुजीबुर्र रहमान हैं। कौन अमर है? अब यह कहना मुश्किल है, क्योंकि टुकड़ों में बंटे देश की लुटी असिमता और लुटेरों के बारे में हुक्मरां की समझ भोंथरी है। इसलिये वो खींची गयी उन लकीरों पर चल रहे हैं, जो आपस में उलझी हुर्इ है।

हम यह नहीं कहेंगे, कि गुजरा हुआ वक्त लौट आयेगा। चाणक्य फिर जन्म लेंगे, और चंद्रगुप्त का साम्राज्य उभर आयेगा। ऐसा नहीं होगा। ऐसा होना संभव नहीं है। मगर, साथ होने की सोच तो पैदा की ही जा सकती है। जो संभव है, उसकी पहल ही नहीं होती।

बि्रटिश साम्राज्य ने जो चाहा, जब तक उसकी चलती रही, वह करता रहा। देश के विभाजन का प्रस्ताव आया, और देश बंट गया। आसानी से नहीं, भारी खून खराबे के साथ। गांधी, नेहरू, पटेल थे। न जाने कितने दिग्गज थे। देश की आम जनता उनके साथ थी, मगर दश्ेा को बंटने से रोका नहीं जा सका। बंटवारा हुआ।

ऐसा बंटावार हुआ, कि बंटवारा आज भी जारी है।

एक पीढ़ी खप गयी, मगर बंटवारा पूरा नहीं हुआ।

पाकिस्तान में कितने पाकिस्तान हैं? और किसकी वजह से है?

बांगलादेश, बंटवारे के बाद का बंटवारा है, मगर बंटने के बाद भी क्या वह पाकिस्तान से कुछ खास अलग है?

हिंदुस्तान तो, बंटवारे का दूसरा नाम है।

जब देश आजाद हुआ। बि्रटिश क्राउन ने पाकिस्तान कहां से कहां तक है, की घोषणा की और जो बच गया, देशी रियासतों के उस भीड़ को हिंदुस्तान मान लिया गया। जिन्हें बि्रटिश सरकार ने उनसे किये गये समझौतों से मुक्त कर दिया। उनसे कह दिया गया कि ”भार्इ! आप स्वतंत्र हैं।” और स्वतंत्रता के ऐसे दस्तावेज पर राष्ट्रीय कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू और सरदार बल्लभ भार्इ पटेल ने हस्ताक्षर कर दिये। महात्मा गांधी अपने आश्रम में बैठे चरखा कातते रह गये। हुआ वह जो नहीं होना चाहिये था। गांधी ने कहा था- ”देश का विभाजन मेरी लाश पर होगा।” विभाजन के बाद यह औपचारिकता भी पूरी कर दी गयी। तीन गोलियां चलीं और शर्मनाक हत्याकाण्ड की शुरूआत हो गयी। हजारों-हजार लोगों की हत्या और लाखों लोगों की खानाबदोशी जिसकी पृष्टभूमि थी।

बि्रटिश हुकूमत ने जहां लकीरें खींची वहां लड़ार्इयां और तनाव आज भी जारी है। सीमायें पाकिस्तान से जुड़ें या चीन से, विवादें आज भी हैं।

आपको पता है या नहीं? कह नहीं सकता। नारा लगाने वाले लोगों के बारे में जानकारियां कम ही होती हैं। स्वतंत्रता दिवस, महात्मा गांधी, शहीद भगत सिंह के अमर रहने के नारे, हमने खूब लगाये हैं। चाचा नेहरू, जिंदाबाद से लेकर जय जवान, जय किसान और जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा, का दौर हमने देखा है। राजीव गांधी के साथ भी सूरज चांद को जोड़ा है।

समझ नहीं थी। गांधी और भगत सिंह को नारे के नजरिये से देखने की हमने बेवकूफियां की है।

अमूमन, भारत का हर आदमी- जो साल-छ: महीने में, राष्ट्रीय पर्व की तरह, अपने देश के बारे में सोच लेता है, वह ऐसे नारे जरूर लगाता है।

समझ ही नहीं थी, कि दो देश भक्तों की सोच अलग हो सकती है।

गांधी जी के बारे में लोग जानते हैं, मगर भगत सिंह के बारे में सही समझ अब बढ़ रही है।

आज से लगभग 25-30 साल पहले ‘शहादत दिवस’ के दिन भगत सिंह और उनके साथियों के बारे में मैंने एक पर्चा पढ़ा था। शहर के प्रतिषिठत बुद्धिजीवियों के बीच पढ़ा गया पर्चा, सन्नाटों से घिरा रहा। और जब पर्चा खत्म हुआ, मामला गंभीर हो गया। एक आलोचक ने कहा- ”लेखक ने भगत सिंह को कम्युनिस्ट बना दिया।” जो जवाब मैंने उस समय दिया था, वहीं मैं आज भी कहना चाहता हूं कि ”मेरी या किसी भी लेखक की यह औकात नहीं है, कि वो भगत सिंह को कम्युनिस्ट बना दे। मगर वास्तव में वो कम्युनिस्ट हैं, तो आप क्या कहेंगे?”

उन्होंने शोषणविहीन समाज से स्वतंत्र भारत की जो तस्वीर बनायी थी, आज का भारत उसके विपरीत है। गांधी को बराक ओबामा हार्इजैक कर चुके हैं। जो बे-वतन हुए स्नोडेन से इतने डरे हुए हैं, कि इक्वाडोर के राष्ट्रपति तक के विमान की चेकिंग करा रहे हैं। अपने बच्चों को गांधी के सत्याग्रह के किस्से सुनाते हैं, और सीरियायी विद्रोहियों को हथियारों की आपूर्ति का आदेश देते हैं। दुनिया पर युद्ध का खतरा थोपते हैं, और सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह की बातें करते हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री जी उनके इन्हीं अदाओं पर मर मिटे हैं। उन्होंने नवउदारवाद के हर एक संस्करण से अपने दिमाग की लायब्रेरी को सजा रखा है। अर्थव्यवस्था पर इतने खर-पतवार लाद दिये हैं, कि शोषणविहीन समाज या लोक कल्याणकारी राज्य के बारे में सोचना, आज भी उन लोगों के खिलाफ है, जिन्हाेंने भगत सिंह को, उनके साथियों के साथ, फांसी के फंदे से टांग दिया। भगत सिंह होते तो, उनके लिये आज भी कुछ ऐसी ही सजा मुकर्रर की जाती। कि देश को जगाने के लिये संसद में बम फोड़ना गलत है। हां, आतंकवादियों के साथ मिल कर दुनिया को जोखिमों में डालना, आम आदमी की जासूसी करना गलत नहीं है। मनमोहन सरकार इसे गलत नहीं मानती है। ‘आम आदमी पार्टी’ के अरविंद केजरीवाल के आरोपों को पचा चुके सलमान खुर्शीद देश के विदेश मंत्री हैं। वो भी कहते हैं कि ”सुरक्षा के लिये जानकारी हासिल करना जासूसी नहीं है।” सुरक्षा के लिये जेल, हत्या और नरसंहार सब जायज है। सरकारें यदि सही हैं, तो आम आदमी से इतना डरती क्यों हैं?

उनका डरना ही यह बताता है, कि ”वो जो कर रही हैं, वह गलत है।” आम आदमी का दमन, आम आदमी की निगरानी और आम आदमी का शोषण गलत है। बि्रटिश हुकूमत और औपनिवेशिक ताकतों की समृद्धि का आधार उपनिवेशों का शोषण और दोहन था। साम्राज्यवादी ताकतें अब निजी कम्पनियों और दैत्याकार कारपोरेशनों के जरिये यही कर रही है। उनकी सेनायें लड़ रही हैं। तीसरी दुनिया में बढ़ते युद्ध का खतरा बाजार की कारस्तानी है और भारत मुक्त बाजारवाद का नया क्षेत्र बन गया है। आजादी से पहले बि्रटिश हुकूमत उसके प्राकृतिक सम्पदा का दोहन कर रही थी, अब सरकार राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को यह अधिकार सौंपती जा रही है। निजी कम्पनियों को जितनी खुली छुट पिछले एक दशक में मिली है, उतनी छूट पहले कभी नहीं मिली। पूंजी राज्य के नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। जबकि आम जनता का हित प्राकृतिक संपदा, वित्तीय पूंजी और अपने देश के बाजार को राज्य के नियंत्रण में रखने से जुड़ा हुआ है।

आज देश मुक्त बाजारवाद के जिस दौड़ में शामिल है, वह न गांधी का भारत है, ना ही भगत सिंह का भारत है। वह बि्रटिश उपनिवेशवाद का अमेरिकी साम्राज्यवाद है। जिसके विरूद्ध आजादी की लड़ार्इ लड़ी गयी। इसलिये, देश के लिये जिस खतरे को इस्लामी आतंकवाद और सीमा पर बढ़ते तनाव के या पड़ोसी देशों के रूप में देखा जा रहा है, वास्तव में वह खतरा वित्तीय पूंजी और बाजारवाद के रूप में पूरी व्यवस्था में विराजमान है।

यह कहा जा सकता है, कि गांधी और भगत सिंह के सपनों के पीछे हम क्यों पड़ें?

यह भी कहा जा सकता है, कि वो अपने समय की पैदार्इश थे, और उनकी सोच और समझ भी अपने समय की देन थी। समय उनसे आगे निकल गया है। हर एक कालखण्ड की अपनी मांग होती है।

गांधी के बारे में हम कुछ नहीं कहेंगे, क्योंंकि थोड़ी देर पहले ही हमने देखा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति उनका उपयोग कर रहे हैं। गांधी उन लोगों के जाल में फंस गये हैं, जो दुनिया भर में जालसाजी का धंधा करते हैं। हम आम जनता को अपने पीछे नहीं, आम जनता के साथ खड़ा होने वालों के साथ हैं। सोच और मूल्यों के स्तर पर गांधी आज के संदर्भों से पूरी तरह जुड़ नहीं पाते, मगर भगत सिंह को चाह कर भी असंदर्भित करार नहीं दिया जा सकता। इसलिये भगत सिंह के सपनों का हमारे लिये मोल है।

आज देश के सामने जितनी आंतरिक एवं बाहरी समस्यायें हैं, उसका समाधान उस ओर है, मौजूदा सरकार जिसके विपरीत दिशा की ओर बढ़ रही हैंं। सामाजिक असमानता, आर्थिक बदहाली, राजनीतिक विकल्पहीनता और गैर अनुपातिक विकास की वजह से अवरूद्ध विकास की दिशा की वजह मुक्त बाजारवाद और निजीकरण की अंधी दौड़ है। देश को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों और कारपोरेशनों के जाल में इस तरह फंसा दिया गया है, कि उससे बाहर -सही सलामत- निकल पाना अब आसान नहीं है। डूबते जहाज को बचाने के लिये सामान को पानी में फेका नहीं गया है, बल्कि जहाज को डुबाने के लिये जहाज के जोड़ों को तोड़ा गया है, तली में छेद की गयी है। निजी पूंजी का विस्तार और निजी कम्पनियों का दैत्याकार कारपोरेशनों में बदलते जाना इस बात का प्रमाण है, कि सरकार राष्ट्रीय संसाधन और प्राकृतिक सम्पदा को उनके हितों से जोड़ चुकी है। अब तक भ्रष्टाचार के जितने खुलासे हुए हैं, सरकार के उदारीकण की नीति और निजी कम्पनियों को पहुंचाया गया लाभ ही उसकी तह में है।

मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था को बचाये रखने के लिये सरकारें और राजनेता बदल जाते हैं, मगर उसका लाभ उठाने वाला वर्ग सुरक्षित बचा रहता है। यह वर्ग आजादी से पहले सक्रिय था, अब आजादी पर उसका बराबर का अधिकार है। आम जनता के लिये आजादी कभी खुल कर आयी ही नहीं। वह वर्ग जिसने बि्रटिश हुकूमत को बनाये रखने में, हाथ बंटाया आज राजनीति में उनकी पकड़ है। सामंती ताकतें अपने को आजादी के साथ ही बदल लीं, और राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग की हिस्सेदारी कांग्रेस के जरिये सत्ता में हो गयी। आज वही वर्ग विश्व पूंजीपति वर्ग का सदस्य है और उनकी एकजुटता मुजबूत हो चुकी है। देश का सार्वजनिक क्षेत्र मिट सा गया है और निजी क्षेत्रों ने वित्त व्यवस्था पर वर्चस्व हासिल कर लिया है। हम कह सकते हैं कि ”जो आजादी खुल कर आयी ही नहीं, वह आजादी अब खुला हुआ बाजार है।” जिसका सपना आजादी से पहले स्वतंत्र भारत के लिये किसी भी वर्ग ने नहीं देखा। आम जनता के लिये आजादी ”सभी मुसीबतों से निजात पाना था।” लोगों ने यह मान लिया था कि ”स्वतंत्रता के बाद सब कुछ ठीक हो जायेगा।” मगर उसकी मुराद कभी पूरी नहीं हुर्इ। सत्ता पर उस वर्ग का अधिकार हो गया जो बि्रटिश श्रेष्ठता के कायल थे। जो मानते थे, कि अंग्रेज एक श्रेष्ठ और न्याय प्रिय जाति है। जिनके लिये हर एक गोरा आदमी अंग्रेज था। यही कारण है, कि आजादी के बाद भी मानसिक दासता बनी रही, और देश के विकास के लिये उसी राजनीतिक ढांचे को खड़ा किया गया, जिसका घोषित लक्ष्य तो लोकतंत्र है, मगर जहां बि्रटिश क्राउन है, बि्रटिश पार्लियामेण्ट में हाउस आफ कामन और हाउस आफ लार्ड है।

सुनते हैं, आज कल बि्रटेन यूरोपीय संघ का वित्तीय संकट झेलता हुआ देश है। अब वह ग्रेट बि्रटेन नहीं, सिर्फ बि्रटेन है। मगर उसकी नीतियां एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिकी देशों के लिये वही ‘ग्रेट’ है। वह साम्राज्यवादी देश है। और देश की बदहाल जनता से अब औपनिवेशिक शोषण, दमन, अत्याचार और अमानवीय इतिहास को छुपाया जा रहा है। कल तक जिस पर गर्व किया जाता था, आज उस इतिहास पर आम बि्रटिश जनता को शर्म आ रही है। बि्रटिश सरकार दुनिया के आतंकी सरकारों की जमात में खड़ी है, तीसरी दुनिया के देशों में षडयंत्र और हमले कर रही है, राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रही है, अपने को बचाने के लिये पूर्व उपनिवेशों को हलाल करने में लगी है, मगर देश की आम जनता, अब पूरी तरह उसके साथ नहीं है।

सोचने के लिये यह सवाल पूरी तरह जायज है, कि शोषकों के लिये जो सही है, शोषितों के लिये वह कैसे सही हो सकता है? मालिक और नौकर का हित एक कैसे हो सकता है? पीठ और चाबूक के बीच दोस्ती कैसे हो सकती है? मगर, आजादी के बाद भारत में इस दोस्ती को बरकरार रखा गया। शोषण तंत्र को बनाये रखने का आदर्श शोषितों का आदर्श घोषित किया गया। आम जनता के लिये ”आजादी तीन थके रंगों में बदल गयी, जिसे एक पहिया व्यर्थ ढ़ो रहा है।”

साठ के दशक में संसद से मोहभंग की जो स्थितियां पैदा हुर्इ थीं, अब पूरी तरह परिपक्व हो गयी है। संसद की गरिमा, संसद की सर्वोच्चता और संसद के होने का अर्थ बदल गया है। यह बात खुले तौर पर सामने आ गयी है, कि देश की संसदात्मक व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठ गया है। विचारों की राजनीति का अंत हो गया है। आज देश में ऐसी एक भी राजनीतिक पार्टी नहीं है, जिसे आम जनता का समर्थन हासिल हो। सरकारें जोड़-तोड़ से चल रही हैं। जन विश्वासों की हत्या हो चुकी है। आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अनास्था अपने चरम पर है। हम यह कहने की स्थिति में नहीं हैं, कि मौजूदा व्यवस्था के पास आने वाला बेहतर कोर्इ कल भी है। इसके बाद भी इस व्यवस्था को बदलने और देश की सरकार को आम जनता के पक्ष में खड़ा करने की, कोर्इ गंभीर पहल अब तक नहीं हुर्इ है।

जन समस्याओं के समाधान के लिये, माओवादियों ने विभाजन की लकीर हथियारों से खींचने की भूल की है। प्रजातंत्रवादी वामपंथी राजनीतिक दलों ने अब तक जो भी किया है, वह अपर्याप्त है। जन समस्याओं से जुड़ने और जन संघर्षों को सही दिशा देने की जिम्मेदारियों के साथ बेर्इमानी की गयी है। कांग्रेस और भाजपा और उनके राजनीतिक गठबंधन का व्यवस्थागत स्वरूप एक है। मुक्त बाजारवाद और उदारीकरण की नीतियों से वो लोकतंत्र के खिलाफ षडयंत्रों में शामिल जुड़वा भार्इ है। लोकतंत्र के नाम पर वित्तीय पूंजी की तानाशाही उनका मकसद है।

1947, देश के लिये 2013 में भी सड़क और चौराहे पर खड़ा है। हम यह बताने की स्थिति में नहीं हैं, कि नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवाद हमें ले कर कहां जायेगी? हिंदुस्तान में कितने हिंदुस्तान हैं? पाकिस्तान में कितने पाकिस्तान हैं? बांगलादेश में कितने बांगलादेश हैं? सवाल अब यह नहीं है। सवाल अब यह है, कि हम फटे हुए चादर को सिलेंगे कैसे? बिखरे हुए देश को आपस में जोड़ेंगे कैसे? साम्राज्यवादी देशों की सोहबत को छोड़ेंगे कैसे? उस और बढ़ेंगे कैसे, जहां आम जनता के पक्ष में सरकारें खड़ी होती हैं? जो लड़ार्इ सारी दुनिया में चल रही है, हम उस लड़ार्इ का हिस्सा कब होंगे?

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