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स्नोडेन ने कुछ मुददे दिये हैं

soch ki jameenस्नोडेन ने कुछ मुददे दिये हैं।

सरकारें आम आदमी की खुफियागिरी करा सकती हैं, और नागरिकता का (अधिकार) हंथियार लिये उसके खिलाफ खड़ी हो सकती है।

यदि हम किसी देश के नागरिक नहीं हैं, तो क्या दुनिया में हमारे रहने के लिये कोर्इ जगह नहीं है?

ऐसा क्यों है, कि दुनिया की ज्यादातर सरकारें, अपने देश की आम जनता के खिलाफ हैं? जबकि सरकारें उस देश की आम जनता बनाती है, कहा यही जाता है।

सच यह है कि राज्य ने समाज पर बढ़त हासिल कर ली है, और सरकारें आम जनता के हाथों से निकल गयी हैं। कम्पनियों, कारपोरेशनों और वित्तीय इकार्इयों ने उसे अपने हाथों में ले लिया है। यही कारण है, कि समाज को सुव्यवसिथत रखने के बजाये उसे अपने नियंत्रण में रखने की सोच को विकसित किया गया है। यह पहली बार हुआ है, कि दुनिया की एकाधिकारवादी ताकतों के लिये आम जनता वैश्विक स्तर पर, चुनौती बन कर उभरी है। यह पहली बार हुआ है, कि सरकारें एक दूसरे का हाथ बंटा रही हैं, मगर आम जनता अपने देश और दुनिया की सरकारों के खिलाफ, बड़ी तादाद में सड़कों पर है। उसकी सम्बद्धता संघर्षरत लोगों से बढ़ती जा रही है।

सरकारें ऐसे लोगों की शिनाख्त करना चाहती है, जो उनके पक्ष में नहीं है। उन्होंने जान लिया है, कि खतरा अब किसी देश से नहीं, बल्कि समाज और आम आदमी की ओर से है। वो अपने को बनाये रखने के लिये, आम आदमी की नब्ज टटोल रही है। मगर, आम जनता की दुखती रगों पर हाथ रखना नहीं चाहती। वो इस बात से लापरवाह बने रहना चाहती है, कि आम जनता सड़कों पर क्यों है?

वैश्विक मंदी के जिन राजनीतिक प्रभावों का पूर्वानुमान लगाया गया था, आज स्थितियां उससे बदतर हैं। अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देश अपनी लड़खड़ाती घरेलू अर्थव्यवस्था और बिखरती वैश्विक संरचना को बचाने के लिये -जोकि वास्तव में असंदर्भित हो गयी है- तीसरी दुनिया के देशों की प्राकृतिक संपदा और उनकी वित्तीय व्यवस्था पर अपना अधिकार चाहती है। उन्होंने वैश्वीकरण और बाजारवाद के इर्द-गिर्द आर्थिक एवं राजनीतिक हस्तक्षेप की ऐसी बुनावट की है, कि सैन्य हस्तक्षेप और युद्ध की आंशकाओं का बढ़ना तय है। उन्होंने व्यवस्था को बनाये रखने के लिये आम जनता पर कर्ज का बोझ लाद दिया है और सरकारी सहयोग से हाथ खींच लिया है। उन्होंने यह समझने की पहल अब तक नहीं की है, कि जिस समाज व्यवस्था में आम आदमी के लिये सम्मानित जगह नहीं है, उस व्यवस्था को बनाये रखने की लड़ार्इ वह क्यों लडे़गा? उसे बदलने की पहल क्यों नहीं करेगा? जबकि वह जहां भी है, हजारों, लाखें की तादाद में है। सबसे बड़ी बात, कि अब वह कहीं अकेला नहीं है। यदि एडवर्ड स्नोडेन के खिलाफ अमेरिका की सरकार और यूरोपीय देशों के अलावा उसके कर्इ पिछलग्गू देश हैं, तो विश्व की आम जनता और आम जनता के पक्ष में खड़ी लातिनी अमेरिकी देशों की कर्इ सरकारें भी हैं।

अमेरिकी सरकार अपने ‘सर्विलांस प्रोग्राम’ के जरिये आम जनता की सोच-समझ को अपने नियंत्रण में रखने के लिये सेंधमारी कर रही है। जिसे आतंकवादी हमलों से बचने के लिये, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये, जरूरी बताया जा रहा है। यूरोपीय संघ और जर्मनी की सख्त नाराजगी के बाद भी ओबामा सरकार अपने को सही मान रही है, और स्नोडेन को राजनीतिक शरण न देने के दबाव को बनाये रखना चाहती है। यूरोपीय देश अमेरिकी दबाव में हैं। उन्होंने मास्को से लौट रहे बोलेविया के राष्ट्रपति इवो मोरालिस के विमान को अपने देश के हवार्इ अड़डे पर इस आशंका के तहत उतरने की इजाजत नहीं दी, कि एडवर्ड स्नोडेन भी विमान में हो सकते हंै। विमान को र्इधन के लिये आस्ट्रेलिया में उतारना पड़ा। इवो मोरालिस ने सख्त आपतित की है। लातिनी अमेरिकी देशों ने संगठित रूप से इसका विरोध किया है।

अमेरिकी दबाव और अपनी बाजारवादी नीतियों की वजह से भारत सहित दो दर्जन से ज्यादा देशों ने एडवर्ड स्नोडेन को राजनीतिक शरण देने से इंकार कर दिया है। इक्वाडोर की अपनी वैधानिक विवशता है।

स्नोडेन ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिकी सरकार पर खुला आरोप लगाया है कि ”ओबामा प्रशासन ने नागरिकता को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति अपनार्इ है। उसने मेरा पासपोर्ट रदद कर दिया है, और मुझे ऐसा व्यकित बना दिया है, जिसका कोर्इ देश नहीं है।” और देशविहीन आदमी के लिये दुनिया में कोर्इ जगह नहीं है। दुनिया को देश में बांट दिया गया है, और देश की सीमाओं में सरकारों का कब्जा है, जिनके पास नागरिकता का हथियार है। जो आम आदमी का स्वाभाविक एवं प्राकृतिक अधिकार है, उसे वैधानिक बना दिया गया है। यह किसी भी देश की सरकारें तय करती हैं, कि उस देश का नागरिक कौन है?

हम अराजक नहीं हो सकते।

राज्य एक आवश्यक बुरार्इ है, हम जानते हैं, मगर मुददा जब वैश्विक है, तब किसी एक देश की सरकार के हाथों में उसे कैसे छोड़ा जा सकता है? का सवाल भी है।

आम जनता और स्नोडेन जैसे लोगों के लिये, अपने देश की सीमाओं में रहते हुए, समर्थन के उठते आवाजों की अनदेखी नहीं की जा सकती। विश्व जनमत, सरकारों से ही स्नोडेन के सुरक्षा की अपील कर रही है। हमारे सामने इस सच को स्वीकार करने के अलावा और कोर्इ विकल्प नहीं है। दुनिया में रहने-जीने के लिये, किसी एक देश का नागरिक होना जरूरी है। चाहे यह कितना ही अप्राकृतिक, अनैसर्गिक हो, हमें इसे स्वीकार करना होगा। सामाजिक विकास के दौर में राज्य ने अपने लिये एक ऐसी जगह बना ली है, जिसके बिना समाज व्यवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिसे पूंजीवादी सरकारों ने शोषण तंत्र में बदल दिया है। उसके पास दमन और दबाव के असीमित अधिकार हैं।

आम आदमी के सामने इन स्थितियों को बदलने और राज्य को आम जनता के पक्ष में खड़ा करने के अलावा और कोर्इ विकल्प नहीं है।

अमेरिकी सरकार विश्व जनमत और आम जनता के खिलाफ लड़ रही है। वह इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रही है कि स्नोडेन का मुददा अब उसकी पकड़ से बाहर है। दुनिया भर के लोगों की खुफियागिरी करने का उसे कोर्इ अधिकार नहीं है। ‘आतंकवाद और सुरक्षा’ की बातें, कोरी बकवास है। आज दुनिया जिन खतरों से घिरी है, और असुरक्षा की जो भावना रोज बढ़ जाती है, उसकी वजह वह खुद है। 90 प्रतिशत से अधिक समस्यायें अमेरिकी सरकार की वजह से है। जिसके खिलाफ विश्व जनमत ही नहीं, आम अमेरिकी भी है।

अमेरिकी सरकार, अमेरिकी व्यवस्था और पूंजीवादी -नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवाद -वैश्विक संरचना के खिलाफ बुनियादी सवाल खड़े हो गये हैं, जिसे हल कर पाना आसान नहीं है। यह संभव नहीं है, कि आम आदमी की सोच और समझ को ‘सर्विलांस प्रोग्राम’ के तहत अपनी गिरफ्त में रखा जा सके। ‘द डीपर मीनिंग आफ मास स्पार्इंग इन अमेरिका’ में प्रोफेसर जेम्स पेट्रास ने सवाल खडे़ किये हैं, कि ”सार्वजनिक जासूसी अमेरिकी सरकार के लिये इतना जरूरी क्यों है?” उन्होंने कहा है कि ”एक और बचत के नाम पर सामाजिक कार्यक्रमों में कटौतियां की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर सैंकड़ों अरब डालर लगा कर जासूसी का विशालतंत्र खड़ा किया जा रहा है।”

आम जनता से, वैश्विक स्तर पर उनके जुड़ने से, अमेरिका और दुनिया की पूंजीवादी सरकारें इतना डर क्यों रही हैं?

कल तक, आम अमेरिकी की सूरत उसके राष्ट्रपति से भी बनती थी। आज आम अमेरिकी की सूरत बराक ओबाम से नहीं, ब्रेडली मैनिंग और एडवर्ड स्नोडेन से क्यों बन रही है?

व्हार्इट हाउस और सीनेट के चेहरे पर वालस्ट्रीट का पोस्टर क्यों चिपक गया है?

क्यों आकोपायी वालस्ट्रीट मोमेण्ट को अमेरिकी सरकार अपने ऊपर हमला समझती है? और आम अमेरिकी के पोस्टर पर लिखा होता है ”व्हार्इट हाउस, सीनेट और वालस्ट्रीट वास्तविक आतंकवादी हैं।” फिर अमेरिकी सरकार का सर्विलांस प्रोग्राम आतंकवादियों के खिलाफ सुरक्षा का कारगर कदम कैसे है? क्या वास्तविक आतंकवादियों की शिनाख्त होना, अब भी बाकी है?

इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया में हुए, और हो रहे आतंकी हमलों में अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देशों की सम्बद्धता की अपनी कहानी है। जो आतंकियों को लोकतंत्र की कमान सौंपने में लगे हैं। और कतर को आंतवादियों का वैधानिक ठिकाना बना दिया है। कतर की सेना लीबिया में आतंकवादियों के साथ लड़ी। आज कतर सीरियायी विद्रोही और आतंकवादियों की प्रवासी सरकार का ठिकाना है, जिसे यूरोपीय संघ और अमेरिकी सरकार न सिर्फ घातक हथियार दे रही हैं, कूटनीतिक समर्थन और सैन्य सहयोग दे रही हैं। इससे, भी आगे बढ़कर अब वो सीरिया के विभाजन के लिये हमले की तैयारियां कर रहे हैं, यह जाने बिना, कि यदि हमला हुआ, तो युद्ध के विस्तार को रोका नहीं जा सकेगा।

राजनीतिक अस्थिरता और अमेरिकी हस्तक्षेप की पृष्टभूमि आतंकी संगठन और विद्रोही-आतंकी बना रहे हैं। नाटो सेना की अगुवार्इ जिनके हाथों में है। इसके बाद भी बराक ओबामा सचमुच निरीह हैं।

विश्व जनमत के पक्ष में निकारागुआ के राष्ट्रपति डेनियल ओर्टेगा ने कहा- ”हमें स्नोडेन की मदद करने का पूरा अधिकार है।”

बोलेविया के राष्ट्रपति इवो मोरालिस ने कहा- ”यदि अनुरोध किया जाता है, तो बोलेविया स्नोडेन को राजनीतिक शरण देगा।”

वेनेजुएला के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति निकोलस मदुरो ने कहा- ”देश की बोलीवेरियन गणराज्य की सरकार ने मानवता के आधार पर युवा अमेरिकी स्नोडेन को शरण देने का निर्णय लिया है, ताकि वह बिना उत्पीड़न के रह सकें।”

अमेरिकी सीनेटर स्नोडेन को ‘चीन का जासूस’ और ‘देशद्रोही’ करार दे रहे हैं। अमेरिकी सरकार ने दुनिया भर के देशों को एडवर्ड स्नोडेन को राजनीतिक शरण न देने का फरमान जारी किया है, क्योंकि ”उस पर जासूसी और गोपनीय सूचनाओं को लीक करने का आरोप है।”

यदि दुनिया भर के देशों और आम लोगों की जासूसी करने का अधिकार अमेरिका को है, तो उसकी इस घिनौनी योजना को आम जनता के हित में सार्वजनिक करने का अधिकार अमेरिकी नागरिक (पूर्व) स्नोडेन को क्यों नहीं है?

यदि स्नोडेन जासूसी करने और गोपनीय सूचनाओं को सार्वजनिक करने के दोषी हैं, तो अमेरिकी सरकार दोषमुक्त कैसे है? वह विश्व जनमत, विश्व मानवता और सारी दुनिया की दोषी क्याें नहीं है?

यदि स्नोडेन देशद्रोही हैं, तो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा पर विश्वद्रोह का आरोप लगना चाहिये। मगर, इन सवालों और बातों को लफ्फाजी का दर्जा दिया जायेगा, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा विश्व शांति का नोबल पुरस्कार आपनी जेब में लिये फिरते हैं, और अमेरिकी सरकार उन्हें अपना मुखिया मानती है। और यदि मुखिया के पास यह सम्मान है तो, उसकी सेना शांति सेना होगी, उसकी नीतियां विश्व शांति के लिये होंगी, उसकी खुफिया योजनाये शांति की योजनायें होंगे, और उसके द्वारा लाखों-लाख लोगों की की गयी हत्यायें शांति की बहाली के लिये होंगी। अमेरिकी नागरिक होना शायद इसलिये सम्मानित होता है, कि वहां हर एक आदमी का दम घुट रहा है।

अमेरिकी सरकार को यह समझना ही होगा, कि उसके लिये सारी दुनिया में, इतनी नाराजगी क्यों है? आम आदमी में इतना गुस्सा क्यों है? क्यों वह अमेरिकी सरकार और आम अमेरिकी में फर्क करने लगी है?

मौजूदा दौर में, आम आदमी की नये पहचान बन गयी है। उसकी सूरत उन करोड़ों-करोड़ लोगों से मिल कर बन रही है, जो अपने देश की जनविरोधी सरकार के खिलाफ ही नहीं, दुनिया की जनविरोधी सरकारों के खिलाफ भी सड़कों पर उतरती है।

मिस्त्र की आम जनता ने अपनी तादाद को अपना हथियार बना लिया है। तुर्की की आम जनता भी यही कर रही है। ब्रजील की आम जनता ने खेलों के आयोजन से मोटी कमार्इ करने और जन समस्याओं की सूरत बदलने के खिलाफ लड़ार्इ छेड़ रखी है। चिली के विधार्थियों ने शिक्षा को जनसंघषोर्ं का जरिया बना लिया है। आम अमेरिकी सामाजिक असमानता और सरकार की निगरानी योजनाओं के खिलाफ है। आम जनता के हर एक आंदोलन और जनसंघर्षों की समझ और जानकारियां सोशल मीडिया और इंटरनेट के जरिये आम लोगों तक पहुंच रही है। सरकारें इस माध्यम को रोकने में लगी हैं।

विकीलिक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने पिछले एक साल से, बि्रटेन में इक्वाडोर के दूतावास में शरण ले रखा है। तीन साल से भी लम्बी यातना झेलने के बाद, ब्रेडली मैनिंग पर, सैनिक अदालत के बंद कमरे में न्यायिक प्रक्रिया की शुरूआत हुर्इ है। सजा तय है, और यह एक सवाल है, कि आम जनता से अमेरिकी सरकार पर्दादारी क्यों कर रही है? क्यों आम अमेरिकी से भी सच को छुपाया जा रहा है? स्नोडेन का मुददा सुर्खियों में है और अमेरिकी नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी के द्वारा चलाये जा रहे सर्विलांस प्रोग्राम की परतें खुल रही हैं।

soch ki jameen (2)इण्टरनेट पर एक नये युद्ध की शुरूआत हो गयी है। जिन संचार माध्यमों से आम जनता आपस में जुड़ रही है, उन्हीं माध्यमों को सरकार उसके खिलाफ हथियार बना रही है। आम आदमी के जुड़ते चेहरे को तोड़ने की कोशिशें लगातार जारी हैं। युद्ध, युद्ध की आंशका और गृहयुद्ध को लगातार बढ़ाया जा रहा है। हत्या, हिरासत, दमन और धोखेबाजी से सरकारें काम चला रही हैं। पूंजीवाद, अमेरिकी समाज व्यवस्था के रूप में उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां विध्वंसक सोच और हथियारों को वरियता मिल गयी है। उसने अपने विकास की संभावनाओं को हमेशा के लिये खो दिया है।

स्नोडेन का मुददा अब पूरी तरह राजनीतिक हो गया है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा- ”हमारे लिये स्नोडेन से ज्यादा, अमेरिका से द्विपक्षीय सम्बंधों का महत्व है।” अपुष्ट समाचार यह है कि रूस के द्वारा स्थायी, अस्थायी या राजनीतिक शरण देने के लिये स्नोडेन के सामने शर्तें हैं। उन शर्तों को मानना राज्य की सरकारों के सामने नागरिकता के हथियार और शरण की शर्तों को मानना है।

अमेरिकी सरकार इस दबाव को बनाने में लगी है, कि स्नोडेन को अमेरिका को सौंप दिया जाये। जिसकी संभावना को, रूस ने खारिज कर दिया है। खुले तौर पर यह कहा गया है कि ”अमेरिका से हमारा प्रत्यार्पण संधि नहीं है। इसलिये, स्नोडेन को सौंपा नहीं जा सकता।” रूस से लातिनी अमेरिकी देशों तक पहुंचने के लिये जिन आवश्यक दस्तावेजों की जरूरत है, और जैसी निगरानी अमेरिकी सरकार और उसके सहयोगी देश कर रहे हैं, उसे देखते हुए बिना रूस के सहयोग के, आसान नहीं है। यही कारण है, कि स्नोडेन ने अस्थायी शरण देने के लिये रूस से आवेदन किया है। स्नोडेन के सामने अमेरिका के खिलाफ किसी भी काम को न करने की शर्तें हैं। स्नोडेन को लेकर हमारे चेहरे पर गहरी लकीरें हैं।

यह सोचना कि स्नोडेन अमेरिका के खिलाफ है, पूरी तरह सही नहीं है। सही यह है, कि वह एक ऐसी व्यवस्था के खिलाफ है, जहां आम आदमी का दम घुटता है, उसके लिये कोर्इ जगह नहीं है। वास्तव में स्नोडेन अपने देश और दुनिया के आम आदमी के पक्ष में है, जिनके खिलाफ दुनिया की ज्यादातर सरकारें हैं। जिन्होंने मान लिया है, कि उनके लिये खतरा अब आम आदमी से है। यही कारण है कि सरकारें नागरिकता के हथियार से उसे दुनिया से बेदखल करने की कोशिशें कर रही हैं।

स्नोडेन ने जो मुददे दिये हैं, उसका जवाब दुनिया की जनविरोधी सरकारों के पास नहीं है। राज्य को आवश्यक बुरार्इ मानने वालों के पास भी नहीं है। जिन देशों ने मानवता के आधार पर स्नोडेन को राजनीतिक शरण देने या अपने देश में खुले तौर पर रहने-जीने की स्वीकृति दी है, उनके सामने भी यह सवाल है। हम यह मानते हैं कि राज्य की सरकारों को आम जनता के पक्ष में खड़ा करना ही होगा।

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