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भारत में सुरक्षा के लिये निगरानी कार्यक्रम

rashtriya vicharसरकारें सुरक्षा के नाम पर चौकसी और प्रतिबंधों को जायज ठहराती हैं। यह गलत भी नहीं है। सरकार बनाने का मतलब ही होता है, कि हम अपने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार को सौंप रहे हैं। उन सोच और नियमों को सौंप रहे हैं, जिनसे सरकारें चलती हैं। मगर गलितयों की शुरूआत तब होती है, जब सरकारें आम जनता के खिलाफ खड़ी हो जाती है। सैद्धांतिक रूप से हम इस बात के पक्ष में हैं, कि आम जनता की जिम्मेदारी उठाने का अधिकार सरकार के पास सुरक्षित हैं, मगर हम इस बात के भी पक्ष में हैं, कि सरकार को देश, समाज और आम जनता के पक्ष में होना चाहिये। आम जनता की वास्तविक हिस्सेदारी सरकार में जरूरी है। सरकार बनाने का अधिकार उस देश की आम जनता को है।

यदि सरकारें आम जनता के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं, तो उनकी चौकसी और प्रतिबंधों को जायज करार नहीं दिया जा सकता। दुनिया की अधिकतर सरकारें, अपने देश की आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को घटाती जा रही है। सामाजिक विकास योजनायें, लोक कल्याणकारी कार्य और समाज के कमजोर वर्ग के प्रति अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से हाथ खींच रही है। दूसरी और वो आम जनता पर अपनी पकड़ बढ़ाने के लिये, उसकी निजी से निजी गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाती जा रही है। इसे निजता में हस्तक्षेप भी करार दिया जा रहा है, मगर वास्तव में यह व्यक्ति की स्वतंत्रता, उसकी सामाजिक सम्बद्धता और उसकी सृजनशीलता पर हमला है। अपने को व्यक्त करने और अपनी सक्रियता को बनाये रखने का घातक हमला है। उसे मशीनी व्यवस्था का पुर्जा और पुर्जे को हथियार बनाने का षडयंत्र है।

”अमेरिकी नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी” द्वारा संचालित कार्यक्रम ”सर्विलांस प्रोग्राम” की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद, गये महीने अमेरिकी विदेश मंत्री जान कैरी जब भारत आये थे, उनसे सहमत होते हुए, भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने जब सर्विलांस प्रोग्राम के लिये कहा कि ”यह जासूसी नहीं है”, तब ही भारत सरकार की ‘सुरक्षा योजनाओं’ की भनक लोगों को लगी। और जब इस अमेरिकी खुफियागिरी कार्यक्रम को सार्वजनिक करने वाले एडवर्ड स्नोडेन के राजनीतिक शरण देने के आग्रह को अस्वीकार किया गया, यह बात खुल कर सामने आ गयी, कि भारत की मौजूदा सरकार, अमेरिकी कार्यक्रम की पक्षधर है। किंतु इसकी प्रतिक्रिया देश के मध्यम वर्ग में भी वह नहीं हुर्इ, जो होनी चाहिये थी। बुद्धिजीवी वर्ग के बारे में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है, कि भारत में उसके लिये अभी यह गंभीर मुददा नहीं बन सका है। वह इसे व्यक्ति के निजी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देख रहा है।

यह बात तो आपको स्वीकार करनी ही होगी, कि जैसे व्यक्ति का निजी से निजी श्रम सामाजिक श्रम का हिस्सा होता है, ठीक उसी तरह उसका निजी से निजी पल सामाजिक पल का हिस्सा है। इसलिये, यह किसी एक व्यक्ति के निजी जीवन में तांक-झांक या किसी एक व्यक्ति की निगरानी नहीं है, बल्कि व्यक्ति के बहुत बड़े समूह और उस वर्ग का निगरानी कार्यक्रम है। सरकारें एक व्यक्ति के माध्यम से भी समाज के बहुत बड़े वर्ग पर हमला करती हैं।

अप्रैल 2013 में इस बात की जानकारी सामने आयी थी, कि भारत सरकार के द्वारा व्यापक रूप से निगरानी कार्यक्रम की शुरूआत की गयी है। पूर्व केंद्रीय गृहसचिव आर0के0 सिंह ने मीडिया को सूचित किया था कि ”भारत सरकार बड़े पैमाने पर केंद्रीय निगरानी कार्यक्रम -सीएमएस- शुरू करने वाली है।” जिसके तहत सुरक्षा एजेन्सियां फोन काल, मैसेज और र्इ-मेल पर नजर रखेंगी। 2011 में केंद्रीय निगरानी प्रणाली की घोषणा सार्वजनिक रूप से की गयी थी। मगर सार्वजनिक चर्चा नहीं हुर्इ। जिसके तहत 90 करोड़ लैण्डलार्इन और मोबाइल फोन उपभोक्ताओं और एक करोड़ बीस लाख इंटरनेट से जुड़े लोगों पर निगरानी रखी जा सकेगी। सुरक्षा एजेन्सियां फेसबुक, टवीटर जैसे सोशल नेटवर्किंग सार्इट पर भेजे गये किसी भी संदेश और गूगल सर्च इंजन पर किये गये किसी भी सर्च पर निगरानी रखेंगी।

इस बात की गंभीरता उस समय भी महसूस नहीं की गयी जब 2011 में तात्कालीन केंद्रीय संचार राज्य मंत्री मिलिंद देवड़ा ने राज्यसभा में लिखित वक्तव्य दिया कि ”केंद्र सरकार ने फेसबुक एवं टवीटर की पूरी निगरानी शुरू की है।” उन्होंने यह भी कहा कि ”किसी भी वेबसार्इट एवं ब्लाग्स को ब्लाक करने की तकनीक हासिल की जा चुकी है।”

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता पर पहरेदारी ”अमेरिकी पद्धति के लोकतंत्र” की अपनी विशेषता बन गयी है। भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के साथ ही भारतीय लोकतंत्र का वर्ग चरित्र तेजी से बदला है। मनमोहन सिंह और उदारीकरण की ढ़ोल पीटने वाली भारतीय मीडिया आज तक इस बात को ठीक से समझ नहीं सकी है, कि ”आज जो हो रहा है, वह उसी बाजारवादी अर्थव्यवस्था का परिणाम है।” किसी भी सरकार की अर्थनीति और उसके वर्गहित से, सरकार के कार्यों के आंकलन, उसकी नीतियों का विश्लेषण करने की गंभीरता से वो बचते रहे हैं। उनकी समझ में यह बात भी अब तक नहीं आयी है, कि वो दुनिया के ऐसे 6 दैत्याकार कारपोरेशनों की चाकरी बजाते रहे हैं, जो खबरों की सूरत बनाती है। उसे नियंत्रित करती है। देश की मीडिया आम जनता के पक्ष में कम ही खड़ी होती है। जिन मुददों को सुर्खियां बनायी जाती हैं, उन मुददों का हासिल लम्बी बहंस और बहंस के बाद की चुप्पी है। हमारा मकसद मीडिया को कोसना नहीं है। हमारा मकसद यह जानना है, कि वो ऐसा क्यों करती है? चोटखाने के बाद वो गाल भर क्यों सहलाती है?

भारत के निगरानी कार्यक्रम और अमेरिका के सर्विलांस प्रोग्राम में बड़ी समानता है, और यह महज इत्तफाक नहीं है। बस, बड़े मियां और छोटे मियां होने का फर्क है। बड़े मियां सारी दुनिया की खुफियागिरी करते हैं, जिसमें भारत भी है, तो छोटे मियां अभी यही गुर सीख रहे हैं।

देश की आम जनता से जितना डर, अमेरिकी सरकार को लगता है, भारत सरकार भी अपने देश की आम जनता से उतना ही डरना सीख रही है, क्योंकि जिन नीतियों ने अमेरिकी सरकार को जनविरोधी बनाया है, भारत सरकार की नीतियां भी वही होती जा रही हैं। उदारीकरण के जरिये मनमोहन सरकार ने देश की वित्त व्यवस्था में ही नहीं, उसकी राजनीतिक संरचना में भी, भीतरी बदलाव ला दिया है। प्रचारतंत्र ने सुनियोजित ढंग से यह प्रचारित किया है, कि आर्थिक विकास के लिये यह जरूरी है, और इन जरूरतों को पूरा करने के लिये राजनीतिक बदलाव स्वाभाविक है। और कोल ब्लाक आबंटन ने यह समझा दिया है, कि सरकार कितनी होशियार है। उसने राजनीति एवं प्रशासन एवं सरकारी विधि-विधान में बिना किसी मूलभूत परिवर्तन किये ही, सार्वजनिक क्षेत्रों में निजीकरण के लिये इतनी बड़ी जगह बना दी, कि देश के प्राकृतिक सम्पदा पर निजी कम्पनियों को निर्णायक बढ़त हासिल है। देश की मिश्रित अर्थव्यवस्था का ढांचा तो खड़ा है, मगर उसका सिर जमीन में धंसा है।

इसे आर्थिक एवं राजनीतिक चमत्कार ही कहा जायेगा, कि देश की सबसे भ्रष्टतम सरकार के खिलाफ, वास्तविक जनसंघर्षों की शुरूआत ही नहीं हुर्इ। जन लोकपाल विधेयक के लिये भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, हमारी नजरों में लोगों की नाराजगी को जाया करने का जरिया ही रही है। और उसने अपनी जिम्मेदारियों को बड़ी र्इमानदारी से निभाया है। उनकी नकेल निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों के हाथों में है।

1975 में जब आंतरिक आपातकाल की घोषणा की गयी थी, देश ने पाबंदियों को पहली बार महसूस किया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबंधों को जाना था। परिणाम भी आया, कि श्रीमती गांधी चुनाव हार गयीं, इंदिरा कांग्रेस के हाथ से केंद्र की सत्ता निकल गयी। राजनीतिक विकल्पों की शुरूआत हुर्इ। मगर, आज देश के सामने ऐसा कोर्इ विकल्प नहीं है। उदारीकरण की नीति ने देश के सभी राजनीतिक दलों के वर्गहितों को बदल दिया है। जनता के सामने कोर्इ विकल्प नहीं है। मगर आम जन में नाराजगी, असंतोष और गुस्सा है। बढ़ती हुर्इ महंगार्इ उसे परेशान कर रही है। आर्थिक महाशकित बनने का प्रचारित सपना, उसका अपना नहीं है। लोगों पर निगरानी जरूरी है, क्योंकि विकल्पहीन आम आदमी चुप नहीं बैठता। मीडिया तो सरकार और उस पर नियंत्रण रखने वाली ताकतों के प्रति पहले से प्रतिबद्ध है, इसलिये खतरा उससे नहीं, आम आदमी से है।

सरकार के सामने खतरों को नियंत्रित करने के लिये आतंकवाद और देश की सुरक्षा का अपना रचा तर्क है। इन रचे तर्कों के बारे में खास कुछ कहने की जरूरत नहीं है। उन्होंने अपनी विश्वसनियता खो दी है। देश की आम जनता जिसे आतंकवाद समझती है, उसकी पैदार्इश अमेरिकी संसर्गों का परिणाम है, उसका आयात किया गया है, और सरकार जिस आतंकवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिये, सबसे बड़ा खतरा करार देती है, वह उसकी अपनी ही नीतियों का परिणाम है। आज देश, समाज और आम आदमी की सुरक्षा के लिये सबसे बड़ाा खतरा वित्तीय तानाशाही है। सरकार की जनविरोधी नीतियों से है। उन ताकतों से है, जिन्होंने सरकार को अपने नियंत्रण में ले लिया है।

सरकारें इंटरनेट और सोशल मीडिया से इसलिये डरने लगी है, कि खबरें सारी दुनिया में एकसाथ फैल जाती हैं। जिन पर उनका पूरी तरह नियंत्रण नहीं है। उन्होंने जिस वैश्वीकरण को अपना हथियार बनाया था, वह वैश्वीकरण अब उनके पक्ष में नहीं है।

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