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सामाजिक विकास योजनाओं में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों को शामिल करने की नीति

rashtriya muddaहमारे पास, इस बात के पक्ष में बहुत ही कम तर्क है, कि आम जनता ही सरकारें बनाती है। एक बार हम उसकी चुनावी प्रक्रिया को देखते हुए, यह मान भी लें, कि सरकार बनाने में, आम जनता की भूमिका बड़ी है, तब भी वह निर्णायक नहीं है, प्रमाणित यही होता है। सार्वजनिक पूंजी पर निजी पूंजी की बढ़ती पकड़ ने आम जनता को दोयम दर्जे पर ला कर खड़ा कर दिया है, और निर्णायक भूमिका अपने नाम दर्ज करा लिया है।

मौजूदा दौर की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था जो काम दुनिया भर के प्रचारित जनतंत्र के साथ कर रही है, वही भारत में हो रहा है। राजनीतिक संरचना लोकतंत्र की दुहाइयां देती रहती है, और वित्तीय संरचना उसकी हंसी उड़ा रही होती है। पूरी व्यवस्था हास्यास्पद हो गयी है। सरकार की मूलभूत नीतियां आम जनता की हिस्सेदारी राजसत्ता में घटाने, उसके वित्तीय अधिकारों को नियंत्रित करने और उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों से हाथ खींचने की है। वो बाजार की उन नीतियों से संचालित हो रही है, जहां मुनाफा के लिये लागत घटाने की अनिवार्यता है। मगर, उनकी राजनीतिक अनिवार्यता आम जनता को अपने पक्ष में बनाये रखने की है। यही कारण है, कि सरकारें आम जनता के लिये दोधारी तलवार बन जाती हैं।

केंद्र की मनमोहन-सोनिया सरकार, आम जनता के हितों में किये गये कामों का प्रचार करने में लगी है। ‘भारत निर्माण’ की शक्ल में विज्ञापनों की नयी श्रृंखला बना रही है। उसे इस बात का यकीन नहीं है कि ”बिना बताये और दिखायें देश की आम जनता उसके द्वारा किये गये जनहितकारी कार्यों को समझ पायेगी।” उसकी परेशानी यह है कि, महंगार्इ और भ्रष्टाचार की मार से, सरकार की सेहत खराब हो रही है। विकास दर की गर्दन झूलती जा रही है, और ढलान पर गिरे पत्थर सा रूपये की कीमत लुढ़कती जा रही है। उसे डर इस बात का है, कि सरकार कुचल जायेगी, जबकि कुचल और मर आम जनता रही है। आदमी की जान सांसत में है।

भ्रष्टाचार और गिरावट की अटूट श्रृंखला के बीच केंद्र की सरकार यह प्रमाणित करने में जुटी है, कि पिछले दो कार्यकाल में उसने आर्थिक विकास के आयामों को छुआ है, देश को नयी ऊंचार्इयां दी है और समाज के सबसे कमजोर वर्ग को उठाने वाले कार्यक्रमों की उसने झड़ी लगा दी है। उसकी अपनी मान्यता है, कि ग्रामीण स्वास्थ्य बीमा योजना और मनरेगा ने ग्रामीण क्षेत्रों की समस्या और रोजगार के लिये नये अवसर जुटाये हैं। सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून के बाद, साम्प्रदायिक दंगा कानून और लोकपाल विधेयक उसकी कार्यसूची में है। वह खाध सुरक्षा अधिनियम बनाने के लिये बेचैन है। उसकी बेचैनी, वास्तव में तीसरे कार्यकाल के लिये बेचैनी है। जिस तरह दूसरे कार्यकाल के लिये ‘मनरेगा’ ने मतों को भुनाने का काम किया, केंद्र की सरकार मानती है, कि ‘खाध सुरक्षा अधिनियम’ तीसरे कार्यकाल के लिये बुरा नहीं है। दांव लगाया जा सकता है।

इसलिये, संसद से पारित कराने की वैधानिक औपचारिकता में पड़े बिना विपक्ष के संशोधन प्रस्ताव, अडंगेबाजी को दरकिनार कर, केंद्रीय सरकार उसे अध्यादेश के दरवाजे से निकाल चुकी है, ताकि जनहितकारी सरकार का बिल्ला ‘786’ के बिल्ले के बगल में लगाया जा सके।

भाजपा के मिशन 2014 के जिस बिल्ले को नरेंद्र मोदी गले में लटकाये हुए फिर रहे हैं, वह मनमोहन सिंह के उदारीकरण के कारखाने में ढ़ला है। इसलिये, कांग्रेस को खतरा उस ओर से नहीं है। राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियां इस बात को अच्छी तरह जानती हैं, कि निजी वित्तीय पूंजी को जितनी छूट मनमोहन सिंह दे सकते हैं, उतनी छूट नरेंद्र मोदी की भाजपा दुकान भी दे सकती है, मगर शुरूआत करने वाला बंदा आजमाया हुआ है, इसलिये, अमेरिकी डेमोक्रेट और रिपबिलकन की तरह इन्हें भी लड़ने दो।

कांग्रेस इस बात को मान कर चल रही है, कि अभी भी उसके गठबंधन की दुकान बड़ी है, और जो सरकार वास्तव में बनाते हैं, उनकी भीड भी ज्यादा है। वह घपले-घोटाले और भ्रष्टाचार के बीच से उबरे स्वच्छ सुशासन के शगूफे की हवा बिल्ला 786 और खाध सुरक्षा अधिनियम जैसे जनहितकारी छवि से निकाल सकती है। 2014 के मददेनजर कांग्रेस की योजना इसे अपने पक्ष में प्रचारित करने की है। 10 जनपथ में तैयारियां भी पूरी हो गयी हैं। सोनिया गांधी इसकी लांचिंग कर रही हैं। पूरे देश में प्रवक्ताओं की फौज भेजी जायेगी। कांग्रेस शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों, पार्टी महासचिवों और कांग्रेस कोरग्रूप के सदस्यों को तैयार किया जा रहा है, ताकि पांच राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव और आगामी लोकसभा चुनाव में इसका लाभ उठाया जा सके। वो होने वाले लाभ की खुशियों से भरे हैं।

यह कोर्इ नयी बात नहीं है, कि सरकार आम चुनाव में इसका लाभ उठाना चाहती है। ऐसा होता रहा है। पूंजीवादी लोकतंत्र की सरकारें आम जनता के हित में ऐसे ही काम करती है। श्रीमती इंदिरा गांधी का ‘गरीबी हटाओ’ नारा अभी के ‘कुपोषण हटाओ’ के नारे से कुछ खास अलग नहीं है। बैंकों और कोयला खदानों का राष्ट्रीय करण भी उन्होंने किया था, मनमोहन सिंह ने जिसे बड़ी बारीकी से निजीकरण का रास्ता दिखा दिया। वैसे, कांग्रेस को आम चुनाव से ठीक पहले समाजवादी बुखार चढ़ता है। पिछले चुनाव में नरेगा-मनरेगा का बुखार चढ़ा था, और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की गारण्टी के सपनों ने दूसरे कार्यकाल के सपने को साकार कर दिया। मनमोहन सिंह की दुखती कमर तन गयी और आम जनता की झुकी गर्दन, दुखती कमर वाले कंधों पर भूख, गरीबी, बेकारी के साथ बाजारवाद चढ़ गया। गांवों में रोजगार सुनिश्चित करने का लक्ष्य कभी पूरा ही नहीं हुआ। ज्यां दे्रज और अमित भादुडी जैसे भले लोगों का मोहभंग हो गया।

मनरेगा के अंतर्गत मांगने पर 15 दिन का काम देने, काम ने देने पर भत्ता देने और मजदूरी में देरी पर हर्जाना देने का प्रावधान है। सामाजिक कार्यकर्ता और मनरेगा से जुड़े सुनील जी लिखते हैं- ”साधारण ग्रामीणों के लिये इन प्रावधानों का उपयोग कर पाना असंभव है।” उन्होंने मजदूरी दर के कम होने और काम की मात्रा के अनुपात में मजदूरी दर और घटाने का उल्लेख करते हुए, उन्होंने संभावनायें देखने का काम किया कि ”मनरेगा ने देश में कर्इ जगह ग्रामीण गरीबों को संगठित करने के लिेय एक मुददा जरूर दिया।”

उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ”जब सरकार की नीतियां और ढांचा पूरी तरह जनविरोधी हो तो किसी इक्का-दुक्का कार्यक्रम से लोगों के कष्ट दूर नहीं हो सकते। रोजगार की ही बात लें तो भूमंडलीकरण के इस दौर में बड़ी संख्या में छोटे-बडे उधोगों और सरकारी उपक्रम बंद हुए हैं, मशीनीकरण हुआ है, खेतों में संकट आया है। रोजगार भी कम हुआ है और वास्तविक मजदूरी भी घटी है। एक तरह से बुनियादी संकट से ध्यान बंटाने का काम मनरेगा ने किया है।”

सरकार के जनहित खाते में दर्ज हर एक नीति का सच यही है। चाहे वह सूचना का अधिकार हो या वनाधिकार कानून। चाहे वह शिक्षा का अधिकार हो या अध्यादेशों की जुबान में पारित खाध सुरक्षा अधिनियम। निजीकरण और बाजारीकरण ही उसका सच है।

देश की मौजूदा अर्थव्यवस्था -जो किसी भी रूप में अच्छी संभावनाओं को बढ़ा नहीं सकी है- देश की राजनीतिक संरचना को तोड़ रही है, और वित्तीय पूंजी की तानाशाही के लिये रास्ता चौड़ा कर रही है। इसी बीच उसे और भी चौड़ा करने के लिये और देश के वित्तव्यवस्था में निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिये, मनमोहन सिंह मंत्री मण्डल ने 12 सार्वजनिक क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश को स्वीकृति देने का ‘नायाब’ काम किया है, ताकि विदेशी पूंजी निवेश के थीर पानी में थोड़ी सी हलचल हो सके।

देश की आम जनता इन मसलों की गंभीरता को, ठीक से नहीं समझती। वह इस बात को भी नहीं जानती, कि आनेवाला कल कितना भारी है। यदि खाध सुरक्षा अधिनियम का तात्कालिक लाभ उसे मिल जाता है, तो अर्थव्यवस्था में होने वाली घातक दूर्घटना और सरकार के घपलों-घोटालों पर परदा पड़ जायेगा। सरकार की सोच और चालबाजियां यही हैं। उसकी जनविरोधी नीतियों पर एक बार फिर परदा पड़ जायेगा।

सुनने में खाध सुरक्षा अधिनियम जितना अच्छा लग रहा है, और उसे जितना अच्छा प्रमाणित किया जा रहा है, सच उतना अच्छा और आकर्षक नहीं है। उसकी सूरत सरकार के निजीकरण की नीतियों और बाजारवादी सोच की तरह ही बदशक्ल है। जिसकी तख्ती पर लिखा है ”2 रूपये किलो गेहूं, 3 रूपये किलो चावल और मोटा अनाज 1 रूपये किलो मिलेगा।”

मिलेगा कैसे? यह सवाल है।

जिस सरकारी वितरण प्रणाली -सस्ते गल्ले की दुकान- को मनमोहन सरकार ने अपनी बाजारपरक नीतियों से ध्वस्त कर दिया है, वह रातो-रात, एक अधिनियम पारित होते ही, चुस्त-दुरूस्त कैसे हो जायेगी? इसकी जरूरत क्या है? ऐसा क्यों लगने लगा कि आम जनता गरीब है, भुखमरी की शिकार है, कुपोषित है? उसे सरकारी सहयोग की सख्त जरूरत है। और सरकार रातो-रात आम जनता के प्रति, समाज के सबसे कमजोर वर्ग के प्रति, सहसा ही जिम्मेदार हो गयी। यकीन नहीं होता, और यकीन करना भी नहीं चाहिये। आम जनता के हितों का शिकार करने वाली सरकार पर यकीन करना भी नहीं चाहिये। वह अपनी अपनी सूरत प्रचारतंत्र से बना रही है। यह प्रचार ही तो है कि ”कांग्रेस ने 2014 के लिये ‘गेम चेंजर प्रोग्राम’ को लांच कर दिया है।” सरकार जिसे मानसून सत्र में, संसद में प्रस्ताव ला कर ‘खाध सुरक्षा अधिनियम’ पारित करा लेगी। विपक्ष हाय-तौबा के बाद भी, खुल कर विरोध इसलिये नहीं करेगी, कि इसकी सूरत आम जनता के हितों से बनी है। दिख भी ऐसा ही रहा है।

अब आप ही सोचिये, कि जिस सरकार की नीतियां और ढांचा ही जनविरोधी है, उसके कार्यक्रमों का मकसद जन कल्याण कैसे होगा? वह आम जनता के पक्ष में खड़ी क्यों होगी? जिसके लिये उसकी अपनी मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था ही सबकुछ है, उस व्यवस्था पर आम जनता के हितों में, इतना बड़ा बोझ क्यों लेगी?

सरकार यह मान कर चल रही है, कि घोषणाओं से काम चल जायेगा और उसके जन कल्याणकारी सूरत से, उसकी भी सूरत बदल जायेगी। ढांचा और नीतियां नहीं बदलेंगी, मगर यह प्रमाणित किया जा सकेगा, कि अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का लाभ आम जनता को भी मिलता है। जिसके बारे में देश की आम जनता कम ही सोचती है। मनमोहन सिंह सरकार का खाध सुरक्षा अधिनियम मरनेगा की तरह ही सामाजिक विकास के कार्यक्रमों में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों को शामिल करने की नीति है। जिसका पूरा लाभ सत्तारूढ़ राजनीतिक वर्ग और वित्तीय इकार्इयों को मिलता है, और आम जनता पर ऐसे कर्ज का भारी बोझ बढ़ता जाता है, जिसका पूरा लाभ उसे कभी नहीं मिलता।

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