Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / राजनीति को जाति और दागियों से बचाने के अदालती कवायतें

राजनीति को जाति और दागियों से बचाने के अदालती कवायतें

भारतीय राजनीति के सड़े हुए अंगों को सुधारने की प्रक्रिया शुरू की गयी है। चुनाव आयोग और न्याय प्रशासन कुछ अच्छा कर गुजरना चाहती है। मगर हम यह नहीं भूल सकते, कि वो भी इस व्यवस्था के अंग हैं, और उनकी अपनी सीमायें हैं। वो पूरी व्यवस्था को बदलने के लिये, आपरेशन कर नहीं सकती और दवाओं का असर कितना होगा? कहा नहीं जा सकता, क्योंकि मर्ज ला-इलाज है और मरीज को किसी चीज से परहेज नहीं है। बदपरहेजी की आदत दशकों पुरानी है। जब से देश गणतंत्र बना तब से और जातिगत आधार पर आजादी से भी पहले। इस लिये यह सोचना, कि राजनीति से अपराधियों को दूर रखने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और लखनऊ उच्च न्यायालय के पीठ के जातीय रैलियों पर रोक के निर्णय से, राजनीति का गंदा गलियारा साफ हो जायेगा, जरूरत से ज्यादा बड़ी अपेक्षायें होंगी।

देश में चुनाव आयोग है और वह सरकार बनाने वालों को आचार संहिता के जरिये नियंत्रित भी कर सकती है, का पता पहली बार चुनाव आयुक्त टी एन शेषन ने ही कराया। राजनीतिक दलों ने हाय-तौबा मचाया, और फिर चुनाव आयोग सख्त होता रहा और राजनीतिक दलों ने पतली गली और पिछले दरवाजे को महत्वपूर्ण बना दिया। आज हम इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन होता है, चुनावी खर्च का ब्योरा गलत होता है, नीतिगत आधार पर जो दिखया जाता है, वह झूठ है। चुनाव आयोग का प्रभावशाली होना जनतंत्र के लिये अच्छी बात है, मगर जनतंत्र की सेहत को बिगाड़ने का काम राजनीतिक दल और उनके द्वारा बनार्इ गयी सरकारें ही करें, तो सेहत कैसे सुधर सकती है? टी एन शेषन के बाद से राजनीति का अपराधिकरण और चुनाव खर्च बेतहाशा बढ़ा है। चुनाव के लिये सेना और सुरक्षा बलों की अनिवार्यता बढ़ी है।

देश की राजनीतिक संरचना ऐसी है कि चुनाव आयोग तो प्रभावशाली हो गया, मगर राजनीति, राजनेता, संसद और लोकतंत्र का अवमूल्यन होता चला गया। हम यह दावे के साथ कहने की सिथति में आज तक नहीं हैं, कि देश में आज तक स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव हुआ है।

राजनीतिक भ्रष्टाचार ने वित्तीय पूंजी के जरिये जैसी ऊंचार्इयां हासिल कर ली है, सर्वोच्च न्यायालय का राजनीति के अपराधीकरण और उच्च न्यायालय का फैसला जातीय रैलियों पर प्रतिबंध दशकों पिछड़ा हुआ है। आज की जरूरत वित्तीय पूंजी को नियंत्रित करने, निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों के निर्णायक भूमिका पर रोक लगाने की है। जोकि, मौजूदा व्यवस्था में संभव नहीं है। यदि गहरार्इ से देखा जाये तो, आज भारतीय राजनीति के जितने भी नकारात्मक कारक हैं, उनकी वजह यही है। इन्हीं ताकतों ने वैशिवक स्तर पर, इन्हीं कारकों से आतंकवाद और विद्रोह को जन्म दिया, जिसका मकसद राजनीतिक असिथरता के जरिये अपने वित्तीय एवं राजनीतिक हितों को साधना है।

ग ग ग

राजनीति को प्रभावित करने वाले सर्वोच्च न्यायालय और लखनऊ उच्च न्यायालय के इलाहाबाद पीठ के निर्णयों पर चर्चा करने से पहले यह कहना जरूरी है, कि न्यायालयों की अपनी कोर्इ सोच नहीं होती, देश और देश की जनता के प्रति विधानों के तहत प्रतिबद्धता होती है।

संवैधानिक रूप से व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच स्पष्ठ विभाजन है। इसके बाद भी न्यायपालिका को वैधानिक विसंगतियों को दूर करने के लिये स्पष्ट आदेश एवं निर्देश देने का अधिकार है। वह व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका के निर्णयों एवं अध्यादेशों को चुनौती देने वाले वाद पर निर्णय दे सकती है।

जनप्रतिनिधि कानून की धारा 8(3) में यह प्रावधान है, कि यदि किसी व्यकित को दो साल या उससे ज्यादा की सजा होती है, तो उसे जनप्रतिनिधि बनने से अयोग्य माना जायेगा। इसी की उपधारा 8(4) में यह प्रावधान है, कि दोषी ठहराये जाने के तीन माह तक किसी भी जनप्रतिनिधि को अयोग्य करार नहीं दिया जा सकता है। यदि दोषी करार दिया गया सांसद या विधायक न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध ऊपरी अदालत में चुनौती दी है, तो उसे न्यायालयीन प्रक्रिया के दौरान अयोग्य करार नहीं दिया जा सकता है।

धारा 8(3) के विरूद्ध धारा 8(4) का उपयोग बड़े पैमाने पर होता रहा है। याचिकाकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता लिली थामस ने, इसी विसंगति के विरूद्ध याचिका दायर किया था, जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय ने जनप्रतिनिधि कानून की धार 8(4) को असंवैधानिक करार दिया। उसे निरस्त कर दिया। उसने यह भी कहा, कि ”यह निर्णय भावी मामलों पर लागू होंगे। अब तक जो सांसद या विधायक अपनी सजा के विरूद्ध ऊपरी अदालत में अपील किया है, उन पर यह आदेश लागू नहीं होगा।”

वर्तमान में 1286 विधायक और 162 सांसद ऐसे है, जिन पर विभिन्न न्यायालयों में अपराधिक मामले चल रहे हैं। 76 सांसद ऐसे हैं, जिन्हें न्यायालय के द्वारा 5 साल से ऊपर की सजा सुनार्इ जा चुकी है। इस आंकड़े से बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि राज्यों की विधानसभाओं और देश की संसद में ऐसे माननीय लोगों की हिस्सेदारी कितनी शर्मनाक है। भारतीय संविधानविद सुभाष कश्यप का मानना है कि ”चुनाव सुधार के लिये कानून बनाने का काम संसद का है। लेकिन, हमारे देश का राजनीतिक वर्ग, जिसमें सत्ताधारी दल और विपक्षी दल, सभी शामिल हैं, अपने निहित स्वार्थों के कारण राजनीति में भ्रष्ट व्यवस्था को बनाये रखना चाहता है।” वजह कर्इ हैं, मगर सबसे बड़ी वजह यह है कि ”राजनीति को धंधा बना दिया गया है।” एक ऐसा कारोबार बना दिया गया है, जिसकी पैठ न सिर्फ हर एक कारोबार तक है, बलिक वह ऐसा कारोबार है, जहां हर एक कारोबार पर, जायज-नाजायज का परदा पड़ जाता है।

राजनीतिक दलों को काले धन की बुनियाद पर खड़ा कर दिया गया है। कर्इ राजनीतिक दल ऐसे हैं, जिनका टिकट पांच-सात करोड़ में बिकता है। आठ-दस करोड़ चुनाव जीतने में लगता है। जीत के बाद पार्टी फण्ड को मजबूत करने की जिम्मेदारी भी उस पर होती है। उसके सामने पांच साल होता है, अपने बोये की फसल काटने के लिये। और वह बड़ी र्इमानदारी से यही करता है। सबसे बड़ी बात यह है, कि राजनीति के इस हमाम में सभी नंगे हैं। यह अच्छी बात है कि जेल से चुनाव लड़ना अब संभव नहीं होगा।

जिन्होंने अपराध से राजनीतिक कारोबार किया वो जन प्रतिनिधि हैं। जिन्होंने कारोबार से राजनीति की और जिन्होंने राजनीति को ही, कारोबार बनाया, वो भी सांसद और विधायक है। धर्म और जाति की राजनीति भी राजनीतिक कारोबार है।

संभवत: अदालतें मानती हैं, कि सरकार अपना काम ठीक से नहीं कर रही हैं, इसलिये उन्हें जनहित में नागरिकों को न्याय दिलाने के लिये, आगे आना पड़ रहा है। यह अच्छी बात है। मगर, जिस व्यवस्था में अपराधी, कारोबारी और राजनीति ही कारोबार है, उस व्यवस्था के वैधानिक तंत्र को कैसे बदला जायेगा? हर एक विश्लेषक इस बात को मानता है, कि सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय पर राजनीतिक दलों की सतर्कता भरी चुप्पी या वक्तव्यों में कार्इयांपन है। वो अपने लिये, इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिये, और जो चल रहा है, उसे चलाते रहने के लिये, रास्ता निकाल लेंगे। क्योंकि उसके पास वैधानिक एवं वित्तीय सत्ता है।

हम यह सवाल नहीं कर रहे हैं, कि इसके बाद क्या होगा? मगर सवाल है। राजनीति जहां से संचालित हो रही है, जिन्होंने राजनीतिक दलों को दुकान और व्यवस्था को बाजार बना दिया है, उसके लिये चारो ओर भले ही नाराजगी है, मगर या तो चुप्पी है, या वैधानिक संघर्षों की राहें बंद हैं। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय हमारे लिये व्यवस्था की विसंगतियों का खुलासा है। भारतीय राजनीति के सड़े हुए अंगों पर बंधी पटिटयों को खोलने की पेशकश है, जिसका मकसद इलाज है।

ग ग ग

10 जुलार्इ को देश की सर्वोच्च न्यायालय संसद और विधान सभाओं को अपराधियों से दूर रखने का निर्णय पारित करती है। 11 जुलार्इ को उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्ड पीठ जातीय रैलियों पर रोक लगाने का आदेश पारित करता है। वरिष्ठ न्यायामूर्ति उमानाथ सिंह व महेंद्र दयाल की खण्डपीठ स्थानीय अधिवक्ता मोती लाल यादव की जनहित याचिका पर दिये गये निर्णय में कहा गया है, कि ”जातीय रैलियों से समाज बंटता है, यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।” जनहित याचिका में पक्षकार बनाये गये कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा को नोटिस जारी किया गया है, तथा राज्य सरकार सहित निर्वाचन आयोग को भी अपना पक्ष रखने का आदेश दिया गया है।

याचिकाकर्ता का मानना है कि ”जातीय रैली एवं आयोजनों से जहां समाज में विघटन की प्रवृतियां पनप रही हैं, वहीं सामाजिक एकता एवं समरसता भी बिगड़ रही है।” याचिकाकर्ता ने इन रैलियों और आयोजनों पर रोक लगाने तथा ऐसे आयोजन करने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता रदद करने के निर्देश, चुनाव आयोग को दिये जाने का आग्रह किया है।

कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा के राजनीतिक प्रवक्ताओं ने -जिन पर याचिका में मूलत: आरोप रखा गया है- बड़ी शराफत से न्यायालय के इस निर्णय को ‘स्वागत योग्य’ बताते हुए, खुद को आरोपों से बरी और दूसरों पर आरोपों को रखने का काम किया है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को समाजवाद की याद आयी। भाजपा के लक्ष्मीकांत वाजपेयी को कांग्रेस, सपा और बसपा जैसे राजनीतिक दलों में जातीय समिकरण नजर आया। कांग्रेस के पी एल पुनिया को सपा, बसपा जातिवाद को बढ़ावा देने वाला लगे। भाजपा को वो हिंदूवादी कहते ही रहे हैं। बसपा के विजय बहादुर ने जात-पात की नींव कांग्रेस ने रखी है, का बयान दिया। विश्लेषक यह मानते हैं, कि राजनीति दलों की गतिविधियों में इस निर्णय से कोर्इ फर्क नहीं आयेगा। वो रास्त आसानी से निकाल लेंगे। जो हो रहा है, वह होता रहेगा।

भारतीय राजनीति से जातीयवादी तत्वों को अलग कर पाना, या सियासत से उसकी नजदीकी को घटा पाना, सामाजिक जन-चेतना के बिना संभव नहीं है, और सामाजिक जनचेतना को जातीय चेतना में बदलने का षडयंत्र पूरी व्यवस्था आजादी से पहले ही करती रही है। धर्म, जाति एवं सम्प्रदाय के आधार पर, सीटों का बंटवार 1919 के अधिनियम से हुआ। भारत की स्वाधीनता और उसके संसदीय स्वरूप की चर्चा बि्रटिश संसद में हुर्इ। जहां धर्म और जाति के आधार पर भारतीय समाज के बंटवारे को वैधानिक रूप दिया गया। आजादी वास्तव में देश का बंटवारा है। इस तरह देश के राष्ट्रीय नेताओं ने समाज एवं देश के बंटवारे को आम जनता के सामने आजादी का जामा पहनाया।

आजादी के बाद जैसे ही पतनशील संसदात्मक व्यवस्था की संवैधानिक रूप दिया गया, बि्रटिश संसद के घातक कारनामों को भी मान्यता मिलती चली गयी। आज हम जिस लकीर को पीट रहे हैं, और उसे सुधारने की न्यायालयीन कोशिशें हो रही हैं, उसके जातीय समिकरण को बहुत पहले ही राजनीतिक मान्यता मिल चुकी है। राष्ट्रीय कांग्रेस के विभाजन के बाद असितत्व में आयी इंदिरा कांग्रेस का जातीय समिकरण ब्राम्हण, दलित और मुसिलम गंठजोड़़ पर आधारित है। जिसे राजीव गांधी के बाद आयी सोनिया गांधी भी नहीं तोड़ी, जो अब परिवारवाद में बदल गया है। राष्ट्रीय पूंजीपतियों के हितों से संचालित कांग्रेस अब राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों से जुड़ गयी है। सामंती सोच से संचालित जनसंघ और अब भाजपा हिंदुवाद से हमेशा से जुड़ी रही है। भले ही उसके पास हिंदुस्तान में रहने वाला हर हिन्दुस्तानी हिंदु है। नरेंद्र मोदी पर जिस साम्प्रदायिक दंगे का कीचड़ आज उछाला जा रहा है, और वो डंके की चोट पर कह रहे हैं कि गुजरात दंगे को लेकर मेरे मन में कोर्इ अपराध बोध नहीं है। उन्होंने 12 जुलार्इ को कहा- ”मैं राष्ट्रवादी और देशभक्त हूं। मैं हिंदु परिवार में पैदा हुआ, इसलिये हिंदु राष्ट्रवादी हूं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।” सपा भले ही अपने को समाजवादी कहती है, मगर उसमें समाजवाद कहीं नहीं है। उसका जातीय गणित परिवारवाद में बदल गया है। बसपा खुद को दलितों का मसीहा बताते-बताते ब्राम्हण-दलित गठजोड़ में बदल गयी है।

धर्म, जाति और सम्प्रदाय की राजनीति को छोड़ पाना भारत के राजनीतिक दलों के लिये संभव नहीं है। कांग्रेस इसी समिकरण से दशकों सत्तारूढ़ रही। अड़वाणी (भाजपा) के रामरथ ने दिल्ली तक उसकी पहुंच को सुनिशिचत किया। बसपा की दलित राजनीति जब ब्राम्हण वर्ण से जुड़ी वह उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ हुर्इ। सपा समाजवाद को भूल कर ही आज यादव और अल्पसंख्यक मतों से सत्तारूढ़ है। इन राजनीतिक कलाबाजों के लिये रैलियों प्रदर्शनों एवं आयोजनों का रूप बदलना, कोर्इ खास कलाकारी नहीं है। इसलिये होगा यही। वैसे भी इस देश के सभी राजनीतिक दल धर्म निर्पेक्ष और गैर-साम्प्रदायिक हैं। वर्गगत राजनीतिक समिकरण और धु्रविकरण को रोकने का यही कारगर उपाय है। जिसके पीछे राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय शक्तियां हैं, जो भारतीय समाजव्यवस्था और उसकी राजनीतिक संरचना को आराम से निगल रही है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top