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भारत की अंतर्राष्ट्रीय नीतियां, वित्तीय दबाव में हैं

rashtriya antarrashtriyaअमेरिका की ओबामा सरकार भारत के मनमोहन सिंह सरकार से, उसके जाने से पहले, उससे बहुत कुछ हासिल कर लेना चाहती है। वह आर्थिक समझौतों से लेकर सामरिक करार को वरियता दे रही है, ताकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र और हिंद महासागर में उसकी स्थिति मजबूत हो सके, और चीन की बढ़ती सक्रियता को नियंत्रित किया जा सके। उधर चीन इस बात को अच्छी तरह जानता है, कि भारत में अमेरिका का हित पूरी तरह से उसके हित में नहीं है। इसलिये, वह दोनों देशों के बीच दशकों से खड़े सीमाविवाद को अपनी बढ़त के साथ हल करना चाहता है, और अपनी समानांतर वैश्विक वित्त व्यवस्था के लिये, भारत से वित्तीय एवं व्यावसायिक साझेदारी को बढ़ाने का पक्षधर है। वह इस बात को भी अच्छी तरह जानता है, कि भारत के साथ विकसित हुए वित्तीय सम्बंधों में ही सीमा विवाद का समाधान छुपा है। कि भारत की अंतर्राष्ट्रीय नीतियां वित्तीय दबाव में हैं।

यह कड़वी सच्चार्इ है, कि भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे ढलान पर है, जब नीतिगत उलझनें खड़ी हैं, भले ही वह मनमोहन सिंह के अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के चपेट में है, मगर सार्वजनिक क्षेत्रों की हत्या अब तक हो नहीं सकी। सरकार की वित्तीय नीतियां और राजनीतिक ढांचे के बीच सही तालमेल नहीं है। सरकार बनाने के लिये ‘जन समस्याओं का समाधान’ अहम मुददा है, इसलिये न तो उसकी पूरी तरह अनदेखी कर पाना सरकार के लिये आसान हो पा रहा है, ना ही उसे जनविरोधी उदारीकरण की आर्थिक नीतियों से हल किया जा सकता है। मनमोहन सिंह जैसे पूंजीवादी अमेरिकी स्कूल के विधार्थियों के लिये, देशी-विदेशी पूंजीनिवेश ही एकमात्र ऐसा रास्ता है, जिसके जरिये वो अर्थव्यवस्था में ‘हवार्इ ब्रेकर और कुछ चेकपोस्ट’ बना कर अपने सही होने का प्रमाण पेश कर सकते हैं। इसलिये वित्तमंत्री यहां-वहां भागे-भागे फिर रहे हैं। मोन्टेक सिंह अहुलवालिया और रंगराजन राजनीतिक रूकावटों को हटाने में लगे हैं। मनमोहन सिंह के लिये चीन से बेहतर, हर हाल में अमेरिका है।

यह अजीब सी स्थिति है, कि न तो अमेरिका भारत का स्वाभाविक मित्र देश है, ना ही चीन को वह स्वाभाविक मित्र देश की श्रेणी में शामिल कर पा रहा है। भारतीय मीडिया बदलते हुए विश्व परिदृश्य को देखे और समझे बिना चीन विरोधी है। विवादित सीमाओं के अतिक्रमण को वह सुर्खियों में बदल देती है, मगर अमेरिका के सबसे बड़े औधोगिक शहर डेट्रायट के दिवालिया होने, अमेरिकी वित्त व्यवस्था पर चीन के भारी निवेश और उसके सकल घरेलू उत्पाद के 100 प्रतिशत से ज्यादा के कर्ज होने और अमेरिकी सकरार के द्वारा वैश्विक स्तर पर खुफिया कार्यक्रमों को चलाने जैसी खबरों को, या तो तरजीह नहीं देती, या सस्ते में निपटा देती है। बिखरते और टूटते वैश्विक वित्त व्यवस्था में अमेरिकी सरकार की भूमिका को देखती ही नहीं, जिसका प्रभाव सिर्फ यूरोप पर ही नहीं, सारी दुनिया पर पड़ रहा है। वह इस मुगालते में है, कि भारत की उभरती हुर्इ वित्त व्यवस्था है। मीडिया इस बात को देखने की कोशिश ही नहीं कर रही है, कि उसके विकास की दिशा लगातार मरती हुर्इ एक ऐसी व्यवस्था की है, जिसकी पतनशील शक्तियां उसकी संभावनाओं को निगलती जा रही हैं।

यह बात खुले तौर पर, अब बिल्कुल साफ है, कि सार्वजनिक क्षेत्रों की आवश्यकता पूंजीवादी व्यवस्था में भी है, जिसके बिना सरकार वित्तीय संतुलन को बना कर नहीं रख सकती। वित्तीय पूंजी का सरकार के नियंत्रण में रहना जरूरी है। जबकि, अर्थव्यवस्था का बाजारवादी रवैया कुछ ऐसा है, कि सरकारें पूंजी के नियंत्रण में आती जा रही हैं। परिणाम हमारे सामने है -यूरोप और अमेरिकी व्यवस्था संकटग्रस्त है, उनकी राजनीतिक संरचना टूटती जा रही है, और लोकतंत्र वित्तीय पूंजी की तानाशाही का आसान शिकार हो गया है। दुनिया की चुनी हुर्इ सरकारें जन समस्याओं का समाधान करने में नाकाम रही है, और उनकी नीतियां जनविरोधी व्यवस्था को बनाये रखने से जुड़ गयी है। अर्थव्यवस्था का निजीकरण मौजूदा वित्तीय समस्या का समाधान नहीं है, किंतु पूंजीवादी सरकारें निजीकरण में ही संभलने की संभावनायें ढंूढ रही है।

आज की दुनिया दो खेमों में बंटी ऐसी दुनिया है, जहां ‘मुक्त बाजार’ के लिये संघर्ष जारी है। जनसमस्याओं का समाधान करने वाली सरकारें इन्हीं बाजारवादी सोच से संचालित हो रही हैं। भारत को मनमोहन सिंह की सरकार ने देश को बाजारवादियों का नुमाइंदा बना दिया है। जिसका सबसे बड़ा सच यह है कि ”कोर्इ किसी का मित्र देश नहीं है। हित आर्थित एवं सामरिक हो गये हैं।”

पिछले महीने अमेरिकी विदेशमंत्री जान कैरी की भारत यात्रा हुर्इ और भारत ने अमेरिका के सर्विलांस प्रोग्राम का समर्थन कर दिया।

जुलार्इ में अमेरिका के उपराष्ट्रपति बाइडेन की यात्रा हुर्इ और द्विपक्षीय सम्बंधों को और ज्यादा बढ़ाने की बातें हुर्इं।

भारत और अमेरिका के सम्बंधों को बढ़ाने के दो ही मुख्य रास्ते हैं। एक- भारतीय वित्त व्यवस्था और बाजर, दो- रक्षा समझौते और हथियारों का उत्पादन। इन्हीं दो राहों के इर्द-गिर्द शेष सम्बंधों की बुनावट की जाती है।

अब अमेरिकी सरकार दोनों देशों के सम्बंधों की राह में आने वाले वैधानिक एवं व्यावहारिक अड़चनों को हटाने की पेशकश भी करने लगी है। ‘परमाणु करार’ के साथ ‘असैन्य’ शब्द भी जुड़ा रहता है, और अब परमाणु संयंत्र स्थापित करने की राह में आड़े आ रही कानूनी बाधाओं को दूर करने पर भी चर्चायें हो रही हैं, ताकि मनमोहन सिंह के जाने के बाद भी सम्बंधों को बढ़ाने की संभावनायें बनी रहें। मनमोहन सिंह के 6 दिवसीय अमेरिकी यात्रा की तिथियां तय हो रही हैं।

यूरोपीय देश और अमेरिकी सरकार -औपनिवेशिक काल की समापित के बाद- अपनी पूंजी और हंथियारों के साथ तीसरी दुनिया के देशों में घुसती रही है। विकास के नाम पर वो पूंजी को शोषण का जरिया बना लेती है, और हंथियारों के लिये जगह बनाने के लिये राजनीतिक अस्थिरता और आपसी युद्ध का खतरा बढ़ा देती है। जिस पूंजी के चारो और विकास की बुनावट बुनी जाती है, उस पूंजी का उपयोग हथियारों की खरीदी और हथियारों के उत्पादन और सेना पर खर्चा करा देना ही उनकी नीतियां होती हैं। दुनिया के सबसे बड़े हथियार उत्पादक देश यही हैं। भारत में अमेरिका के द्वारा ऐसी ही परिस्थितियां तैयार की गयी हैं। पाकिस्तान और चीन की ओर से बाहरी खतरे को बढ़ाया गया, इस्लामी आंतकवाद के जरिये उन्हें भीतर लाया गया, सुरक्षा के नाम पर भारत अमेरिका के नक्शे कदम पर है और अपनी सुरक्षा के लिये हथियारों पर उसकी निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। अमेरिकी पेण्टागन सीनेट में जो रिपोर्ट पेश करता है, उसमें भारत को हथियार उत्पादक देश बनाने और उसे अमेरिकी हथियारों की तकनीक देने की पेशकश होती है। उसकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये देश में रास्ता साफ किया जा रहा है। मनमोहन सिंह सरकार ने एफडीआर्इ की नयी खेप पेश की है। अब भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजीनिवेश की परिस्थितियां बनाने का दबाव है। यह दबाव आर्थिक से ज्यादा अब राजनीतिक हो गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत यह है, कि वह वित्तीय पूंजी के उस दबाव में है, जिसके बिना उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था भी डूबने के कगार पर है।

भारत के लिये चीन की वित्तीय पेशकश बराबरी की है, मगर सीमाविवाद सहित कर्इ राजनीतिक गांठें पड़ी हैं। उसके लिये राजनीतिक गलियारे में न तो विश्वास है, ना ही खास उत्साह है। बल्कि आशंकायें और सतर्कता ज्यादा है। चीन के लिये भारत का महत्व अमेरिका से कम नहीं है। वैसे भी, एशिया की शांति और स्थिरता के लिये सबसे बड़ा खतरा अमेरिका और यूरोपीय देश हैं। जो अपनी सक्रियता, एशिया प्रशांत क्षेत्र में बढ़ाने के लिये, चीन सागर और कोरिया प्रायद्विप का मुददा उठाते रहे हैं। जबकि महाद्वीपीय शांति और स्थिरता के लिये इराक, अफगानिस्तान के बाद सीरिया, र्इरान और फिलिसितन का मुददा पहले से है। इन मुददों पर भारतीय नीतियां अमेरिका के नक्शे कदम पर भले नहीं चलतीं मगर, उनसे अलग भी नहीं हैं।

एशिया की शांति और स्थिरता के लिये खतरा बनाये गये मुददों से अपने को अलग रखने की नीतियों का लाभ उन ताकतों को मिलता है, जो इराक और अफगानिस्तान को आतंकी हमलों का निशाना बनाते हैंं। सीरिया के संकट को उस सीमा तक बढ़ाते हैं कि युद्ध अनिवार्य हो जाये। र्इरान उनके लिये वास्तव में खतरा सिर्फ इसलिये है, कि वो फारस की खाड़ी पर अपना अधिकार चाहते हैं। तेल की राजनीति से आज दुनिया कोर्इ भी देश अलग नहीं है, क्योंकि अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देशों की नीतियों में इसकी वरियता हमेशा से रही है। प्राकृतिक संसाधनों पर आधिपत्य ही उनकी नीतियों का आधार है। भारत अपने प्राकृतिक संसाधन का उपयोग न तो आम जनता के हित में कर रहा है, ना ही उसे सुरक्षित रखने की उसकी नीति है, बल्कि वह राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये उदार से उदार होने की नीति पर चल रहा है।

भारत सरकार की अपनी गलत नीतियों का ही परिणाम है, कि उसने खुद पर ऐसे आर्थिक दबावों की रचना कर ली है, कि वह दो ताकतों के बीच, एक बड़ी शक्ति होने के बाद भी, बाजार की तरह बन गया है। वह उन ताकतों के दबाव में है, जो अपने हितों में क्षेत्रीय संतुलन या वर्चस्व के लिये उसका उपयोग कर रहे हैं। भारत में जैसी सक्रियता यूरोपीय देश और अमेरिका की बढ़ी है और अपने रिश्तों की नयी परिभाषा करने के लिये जितनी बैठकें चीन के साथ हो रही हैं, इससे पहले कभी नहीं हुर्इं, उस समय भी नहीं, जब भारत और चीन के रिश्तों की कडुवाहट रोज बढ़ती थी। दोनों ही देश सीमा पर हो रहे हलचल, घुसपैठ के बाद भी, सीमा पर शांति बनाये रखने के नये तरीकों को ढूंढने में लगे हैं।

यह समझने की जरूरत है, कि जिस वित्तीय दबाव में भारत की अंतर्राष्ट्रीय नीतियां आ गयी हैं, अमेरिका और चीन में भी वह वित्तीय दबाव है।

यह समझने की जरूरत है, कि वित्तीय दबाव से नियंत्रित होती नवउदारवादी -मुक्त बाजारवाद हथियारों की होड़ और युद्ध की अनिवार्यता की और बढ़ रही है, जिसे विचारहीन राजनीतिक शून्यता से नहीं भरा जा सकता, ना ही उस और बढ़ने से खुद को रोका जा सकता है।

बनते और बिगड़ते हुए मुक्त बाजार के नये क्षेत्र में, अपने लिये जगह के निर्धारण से ज्यादा जरूरी है, वित्तीय दबावों से मुक्त होना और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों के सही दिशा का निर्धारण करना।

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