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यूरोपीय देशों में लोकतंत्र मर चुका है

europe (2)स्पेन के प्रदर्शनकारियों ने अपने बैनर पर लिखा था- ”लोकतंत्र यहां मर चुका है।” सच भी यही है, मगर मरे हुए लोकतंत्र को जिंदा दिखाने की कोशिशें आज भी हो रही हैं। लोकतंत्र की सरकारें यदि लोक विरोधी हों, तो सिर्फ उसकी चुनावी प्रक्रिया को लोकतंत्र कहना उतना ही गलत है, जितना किसी देश की भ्रष्टतम सरकार को देश कहना। जिसका प्रचार पश्चिमी मीडिया बड़े ही सुनियोजित ढंग से करती रही है। 18 जुलार्इ को स्पेन के 30 शहरों में हजारों लोगों ने देश की भ्रष्ट सरकार के खिलाफ इस्तीफे की मांग के साथ प्रदर्शन किये।

इन प्रदर्शनकारियों के समर्थन में एनोनिमस हैकर्स ग्रुप ने सत्तारूढ़ राजनीतिक दल -पिपुल्स पार्टी- के वेबसार्इट को हैक कर लिया। प्रदर्शन शुरू होने के कुछ घण्टे पहले ही यह कार्यवाही की गयी। होम पेज पर ‘सरकार इस्तीफा दे’ के बैनर पर हैकर्स गु्रप का लोगो लगा था।

स्पेन की राजनधानी मैडि्रड में पिपुल्स पार्टी के मुख्यालय के बाहर एक हजार से ज्यादा लोग जमा हुए। वे नारे लगा रहे थे- ”राजकोष में हमारा पैसा है।”….”वो हमारा प्रतिनिधित्व नहीं करते।” इस प्रदर्शन के दौरान 7 पुलिसवालों सहित कर्इ प्रदर्शनकारी घायल हुए। एक व्यकित को हिरासत में भी लिया गया। स्पेन की राजधानी के अलावा बारसिलोना, वालिनिया, जैसे सभी प्रमुख शहरों में हजारों लोगों ने प्रदर्शन में भाग लिया।

सरकार की आर्थिक नीतियों से नाराज लोगों का गुस्सा तब विस्फोटक हो गया, जब पिपुल्स पार्टी के पूर्व ट्रेजरार के भ्रष्टाचार की जानकारी लोगों को हुर्इ। पिपुल्स पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष लुर्इस बारसीनास ने अवैध कामों को धन मुहर्इया कराने के लिये एक कोष बना रखा था, जिसमें कर्इ मिलियन्स यूरो जमा थे। जिसका उपयोग अवैध कायोर्ं के लिये किया जाता था। इस खुलासे के बाद बारसीनास ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उन पर ‘वैधानिक कार्यवाही’ चल रही है और वो ट्रायल का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने धमकी दी है, कि ट्रायल के दौरान वो उन लोगों के नाम का खुलासा कर देंगे, जो इससे जुड़े हुए हैं। उन्होंने स्पेन के प्रधानमंत्री रिजाय का भी नाम लिया है, जो प्रधानमंत्री बनने से पहले इसमें पूरी तरह लिप्त थे।

ग्रीस में पिछले 5 सालों से प्रदर्शन हो रहे हैं। इसके बाद भी, नहीं कहा जा सकता है, कि देश की सरकार की जनविरोधी नीतियों में कोर्इ परिवर्तन हुआ है, या जनसमस्याओं को समाधान निकला है। स्थितियां बद से बदतर होती चली गयी हैं और ग्रीस अघोषित रूप से दिवालिया हो गया है। उस पर कर्ज का ऐसा बोझ है, जिसे वह उतार नहीं सकता और उसके वित्तीय संसाधन तथा आर्थिक स्त्रोत पर अब उसकी वैधानिक पकड़ भी नहीं है। उसकी संसद यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों की गिरफ्त में है। ग्रीस की जनता जिसके सामने प्रदर्शन कर रही है।

18 जून को जर्मनी के वित्त मंत्री वोल्फगैंग शायुब्ले के सरकारी यात्रा की ओट में ग्रीस की सरकार ने सेण्ट्रल एथेन्स में प्रदर्शनों को प्रतिबंधित कर दिया। प्रतिबंध को लागू करने के लिये सेण्ट्रल एथेन्स को 4000 पुलिसकर्मियों ने घेर लिया। एयरपोर्ट से आने वाले सभी मार्गों और उपमार्गों को रोक दिया गया। पार्लियामेण्ट के सामने बने ‘सेण्ट्रल स्क्वायर’ तक पहुंचने पर रोक लगा दी गयी। जहां प्रदर्शनकारी सरकार की कटौतियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।

इन सभी सुरक्षा व्यवस्था और प्रतिबंधों के बाद भी प्रदर्शनकारियों को रोका नहीं जा सका। युवा प्रदर्शनकारी महिलायें संसद भवन के सामने ”हिटलर वापस जाओ।” के नारे लगाये। जर्मनी के वित्त मंत्री की यह यात्रा ग्रीस संसद के द्वारा पिछले तीन सालों में सातवीं कटौती की घोषणा के दूसरे दिन हुर्इ। यह यात्रा ग्रीस की एनटोनिस समरास सरकार को सहारा देने और इस बात को सुनिश्चित करने के लिये था, कि जर्मनी और यूरोपीय संघ के द्वारा निर्देशित कटौतियों के आदेश को पूरी तरह कार्यरूप में बदला जा रहा है, या नहीं? इन कटौतियों पर ही 2.5 बिलियन यूरो के कर्ज की किश्तों का मिलना तय था। संसद द्वारा पास की गयी कटौतियों के अनुसार 15,000 सार्वजनिक नौकरियां समाप्त होंगी, और 2014 में भी 1,50,000 लोगों को अपने काम से हाथ धोना पड़ेगा। इस कटौती प्रस्ताव को 300 जनप्रतिनिधियों में से मात्र 153 सांसदों का समर्थन मिला। इसके बाद भी ग्रीस को 2.5 बिलियन यूरो के बेलआउट के अगले किश्त को देने पर 29 जुलार्इ तक के लिये रोक लगा दी गयी। ट्रोयका का कहना है कि ग्रीस को अगली किश्त तभी मिलेगी जब वह 4200 सरकारी कर्मचारियों को ”लेबर मोबिलिटी स्कीम” में डालेगा। इस स्कीम के तहत कामगरों को उनकी नौकरी से निकाला जाता है, और सरकार 8 महीने के अंदर उनके लिये नौकरी ढूंढने की कोशिश करेगी। ट्रोयका का कहना है कि ग्रीस 22 अलग-अलग वित्तीय निर्देशों को पूरा करे तब ही उसे आर्थिक सहयोग मिलेगा। ग्रीस ने 22 में से 21 शर्तों को पूरा किया है। ग्रीस को 2010 से अब तक 315 बिलियन डालर का कर्ज मिल चुका है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का कहना है कि ”उससे ग्रीस के संकट काो हल करने में गलती हुर्इ है। ग्रीस की अर्थव्यवस्था लगातार सिकुड रही है और उसका कर्ज रोज बढ़ रहा है। इसके पहली तिमाही के अंत तक उसका कर्ज उसके जीडीपी का 160.5 प्रतिशत हो चुका है और उसके आगे भी बढ़ते रहने की उम्मीद है।” मतलब ग्रीस के सम्भलने की संभावनायें रोज घटती जा रही हैं और कर्ज का बोझ जनअसंतोष की तरह लगातार बढ़ रहा है।

ग्रीस की सरकार प्रदर्शनकारियों के प्रति सख्त होती जा रही है। जन समस्याओं का समाधान करने के बजाये वह जन असंतोष को कुचलना चाहती है। अभी कुछ सप्ताह पहले ही सरकार ने दंगा विरोधी पुलिस को एथेन्स के सेण्ट्रल यूनिवरसीटी में घुस कर विधार्थियों को तितर-बितर करने की इजाजत दी। ऐसा 1974 में सैनिक तानाशाही की समापित के बाद पहली बार हुआ। यह घटना 14 जुलार्इ की है। 17 जुलार्इ को आधी रात के बाद ग्रीस की संसद ने कटौती बिल पास किया। जिसके तहत 25,000 सार्वजनिक क्षेत्र के कामगरों का या तो किसी दूसरे क्षेत्र में स्थानांतरण्ण किया जायेगा, या उन्हें नौकरी से निकाल दिया जायेगा। इनमें से ज्यादातर या तो शिक्षक हैं, या म्यूनिस्पल कर्मचारी हैं।

जिस समय संसद इस बिल को पास कर रही थी, संसद के बाहर हजारों प्रदर्शनकारी सरकार के विरूद्ध नारे लगा रहे थे।

ग्रीस की स्थिति कुछ ऐसी बन गयी है कि सरकार संसद में जनविरोधी प्रस्तावों को पारित करती रहती है, और आम जनता सड़कों पर सरकार विरोधी नारे लगाती रहती है। न तो सरकार जन समस्याओं के समाधान के बारे में सोच रही है, ना ही जन विरोधी व्यवस्था को बदलने की निर्णायक लड़ार्इ की शुरूआत आम जनता कर पा रही है। ग्रीस पर यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों का अधिकार हो गया है।

बि्रटेन में सामाजिक एवं आर्थिक असमानतायें इस सीमा तक बढ़ गयी है, कि यदि लाखों-लाख लोग सरकारी कटौतियों और बेरोजगारी की वजह से अपने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की स्थिति में नहीं है, तो पिछले दो सालों में ऐसे लोगों की तादाद दो गुणा हो गयी है, जो 10 लाख पाउण्ड वार्षिक कमाते हैं। कैमरन सरकार को बाजारवादी नीतियों की वजह से बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ रही है। ताजा आंकड़ों के आधार पर लम्बे समय से बेरोजगार लोगों की बेरोजगारी दर अपने चरम पर है। यह स्थिति पिछले दो दशक से बन रही है। 9,15,000 बि्रटिसर्स पिछले एक साल या उससे ज्यादा समय से पूरी तरह बेरोजगार है। यह संख्या पिछले साल की तुलना में 32,000 ज्यादा है। इनमें से आधा से ज्यादा 4,74,000 लोग पिछले दो सालों से बेरोजगार हैं। इसके अलावा 16 से 64 साल के लोगों मे ंसे 87,000 ऐसे लोग है, जो आर्थिक रूप से कुछ नहीं करते।

‘विहच?’ द्वारा किये गये रिसर्च से यह बात सामने आयी है, कि पिछले साल की अपेक्षा इस साल ऐसे बि्रटिश परिवारों की संख्या लगभग 1.5 मिलियन (15 लाख) की वृद्धि हुर्इ है, जो आर्थिक दबाव में है। ऐसे परिवारों की संख्या भी बढ़ी है, जिनकी तादाद गये साल 7.5 मिलियन से बढ़ कर 9 मिलियन हो गयी है, जो खुद को आर्थिक रूप से दबा हुआ और असुरक्षित पाते हैं।

आर्थिक असमानता और आर्थिक असुरक्षा के बीच आवासहीन लोगों की संख्या में भी वृद्धि हुर्इ है। उत्तरी इग्लैण्ड में 42 प्रतिशत की वृद्धि हुर्इ है। सरकार द्वारा प्रकाशित सांख्यकी के अनुसार, आवासहीनता पिछले 5 सालों के चरम पर है। विकास दर में आयी गिरावट के साथ सिफति दर भी बढ़ी है। जिसे रोकना सरकार की मौजूदा आर्थिक नीतियों से असंभव है। निजीकरण की ऐसी परिस्थितियां ढूंढी जा रही हैं, कि अर्थव्यवस्था में निजी कम्पनियों के हिस्सेदारी बढ़ायी जा सके। बि्रटिश सरकार अपने बजट घाटे को भी कम करने के लिये यूरोप के शेष देशों की तरह ही निजीकरण और सार्वजनिक क्षेत्रों में कटौती की नीति पर चल रही है।

सरकार के एक गुप्त आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार- कंजरवेटिव-डेमोक्रेट गठबंधन ‘स्टूडेण्ट लोन’ को निजी वित्तीय कम्पनियों को बेच देना चाहता है, ताकि बि्रटिश सरकार के बजट पर पड़ते इस बोझ को घटाया जा सके। निजी कम्पनियों को आकर्षित करने के लिये ब्याज दर में ‘आकर्षक वृद्धि’ करने की योजना बन रही है। वह 11.5 बिलियन यूरो की कटौती ‘वेलफेयर बजट’ में भी करना चाहती है।

सरकार के द्वारा स्टूडेण्ट लोन को बढ़े हुए ब्याज दर के साथ निजी कम्पनियों को दिये जाने से 3.6 मिलियन बि्रटिश छात्रों और पूर्व छात्रों, जिन्होंने अपने उच्च शिक्षा के लिये 1998 में लोन लिया है, इससे बुरी तरह प्रभावित होंगे। जिन्होंने 2012 में उच्च शिक्षा के लिये लोन लिया है- जो 40,000 पाउण्ड प्रति छात्र के हैं, उनको अपने लोन पर दो गुणा से ज्यादा ब्याज देना पड़ेगा। सरकार की योजना इस लोन के भुगतान के लिये दबाव बढ़ाने की है।

ऐसी स्थिति में, जबकि बि्रटेन में बेरोजगारी दर बढ़ती जा रही है, और युवाओं के पास कोर्इ काम नहीं है, उनके लिये बढ़ी ब्याज दरों के साथ कर्ज का भुगतान कर पाना आसान नहीं होगा। ‘स्टूडेण्ट लोन कम्पनियां’ यदि ‘लोन बुक’ को अपने आधार पर देखती और व्यवसिथत करती हैं, तो ऐसे विधार्थी जो कर्ज का भुगतान किये बिना बि्रटेन से बाहर चले गये हैं, उनकी खोज-खबर लेने के लिये निजी जासूसों को इस काम से लगा रही है।

बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी और बढ़ते हुए आर्थिक दबावों के बीच असंतोष के कारण आपस में जु़ड़ते जा रहे हैं। सरकार की आर्थिक नीतियां ऐसी हैं, कि आम जनता को राहत मिलने की संभावना ना के बराबर भी नहीं है। 2012 में 5 लाख लोग ऐसे थे, जो ‘फुड बैंक’ पर निर्भर थे। यह तादाद और भी बढ़ी है। अभाव का सामाजिक दायरा बढ़ता जा रहा है। बि्रटेन में सामाजिक एवं आर्थिक असमानता अपने चरम पर है। ‘एच एम रेवेन्यू एण्ड कस्टमस’ ने एक आंकड़ा जारी किया है, जिसके आधार पर 18,000 लोग बि्रटेन में 1 मिलियन पाउण्ड वार्षिक की कमार्इ कर रहे हैं। इन नये मिलिनियर में ज्यादातर लोग फार्इनेन्स एण्ड बैंकिग क्षेत्र में काम करते हैं। दो साल पहले ऐसे लोगों की संख्या 10,000 थी। 1999 से 2000 में मात्र 4000 लोग ही ऐसे थे।

यह आंकड़ा ही इस बात का प्रमाण है कि बि्रटेन में पूंजी का केंदि्रयकरण निजी क्षेत्रों में तेजी से हो रहा है, और उसी के अनुपात में आम आदमी की विपन्नता बढ़ती जा रही है। बि्रटेन के सबसे धनी 1000 लोगों की सम्पत्ति को यदि आपस में जोड़ दिया जाये तो उनके पास 450 बिलियन पाउण्ड -लगभग आधा टि्रलियन पाउण्ड- है। जो पिछले साल की तुलना में 35 बिलियन पाउण्ड ज्यादा है। मतलब इन 1000 धनिकों ने सालभर में 35 बिलियन पाउण्ड का मुनाफा कमाया, जबकि आम आदमी कर्ज, कटौती और बेरोजगारी से परेशान हैं।

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