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अमेरिकी सरकार, सीरिया के खिलाफ प्रायोजित युद्ध का आंकलन कर रही है

asiaअघोषित रूप से सीरिया का संकट मुक्त बाजार के क्षेत्र के बंटावारे से जुड़ गया है। उसकी शांति और स्थिरता का सवाल, फारस की खाड़ी और दुनिया के लगभग 48 प्रतिशत तेल के भण्डार पर, वर्चस्व की लड़ार्इ में बदल गया है। इसलिये, वार्ताओं की मेज पर सन्नाटा है, और बदलती हुर्इ स्थितियों को अपने पक्ष में मोडने के लिये अमेरिकी सेनायें जार्डन में खड़ी हैं, तुर्की में नाटो देशों की पेटि्रयाट मिसाइलें तैनात हैं, और एशिया-प्रशांत क्षेत्र से लेकर फारस की खाड़ी तक, नौसैनिक बेड़ों की सरगर्मियां बनी हुर्इ हैं। रूस के नौसैनिक बेड़े सीरिया की समुद्री सीमा पर खड़े हैं, और माना यही जा रहा है, कि एस-300 मिसाइलों की तैनाती रूस के द्वारा की जा चुकी है, और सीरिया के एयर क्राफ्ट डिफेन्स सिस्टम की मजबूती इतनी है, कि नो फ्लार्इ जोन और उस पर हवार्इ हमले आसान नहीं हैं। जैसी कार्यवाही लीबिया में पश्चिमी देशों और अमेरिकी सेना के द्वारा की जा सकी, वह सीरिया में संभव नहीं है। मतलब, सीरिया के संकट का समाधान अब न तो उस देश की आम जनता के हाथ में है, ना ही उनके द्वारा चुनी गयी बशर-अल-असद की सरकार के हाथ में है। किसी भी देश की सम्प्रभुत्ता और उसकी अखण्डता के लिये यह सबसे बड़ा खतरा है, जो कि सीरिया में मौजूद है। जिसका क्षेत्र विस्तार होता जा रहा है।

सीरिया के मुददे पर बहस वो कर रहे हैं, जिन्होंने विद्रोहियों को खड़ा कर गृहयुद्ध की स्थितियां बनायी। वो ही मानवाधिकार, शरणार्थियों की समस्या और समस्या के समाधान के लिये बशर-अल-असद सरकार के बर्खास्तगी की मांग कर रहे हैं। यही नहीं सैन्य हस्तक्षेप की तैयारी कर रहे हैं। जून में ब्रुसेल्स में हुए यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की बैठक सीरियायी विद्रोहियों -आतंकवादियों को सीधे तौर पर हथियार देने का निर्णय लिया गया। गये महीने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने, सीरियायी सेना के द्वारा विद्रोहियों के खिलाफ रसायनिक हथियारों के उपयोग करने का झूठा आरोप मढ़ कर, सीरियन मिलिट्री कांउसिल को घातक हथियारों की आपूर्ति और सैन्य सहयोग देने की घोषणा की। अब अमेरिका के ज्वार्इंट चीफ आफ स्टाफ जनरल मार्टीन डेम्पसी ने 18 जुलार्इ को सीनेट को बताया, कि ”ओबामा प्रशासन सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप करने के बारे में सक्रिय रूप से विचार कर रही है।” उन्होंने यह बात सीरिया में अमेरिकी सेना के द्वारा हस्तक्षेप किये जाने के प्रबल समर्थक रिपबिलकन सीनेटर मैक लैन के सवालों के जवाब में कहा। उन्होंने कहा कि ”राष्ट्रपति बराक ओबामा को सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप करने के सभी विकल्पों की जानकारी दे दी गयी है, जिस पर विचार-विमर्श चल रहा है।”

माना यही जा रहा है, कि ओबामा सरकार विद्रोहियों को घातक हथियार मुहययैया करायेगी, ताकि वो सीरियायी सेना से जमीनी लड़ार्इ लड़ सके और जार्डन तथा तुर्की की और से मिसाइली हमले के साथ, अमेरिकी सेना हवार्इ हमले की कार्यवाही करेगी। क्योंकि, इराक और अफगानिस्तान के हमलों ने यह सबक दे दिया है, कि अमेरिकी सेना को जमीनी लड़ार्इ में झोकना बड़ी भूल है। ओबामा के लिये लीबिया एक सबक है, जिसे दोहराने से वो बाज नहीं आयेंगे।

जिस तेजी से सीरियायी सेना ने कुसाय और एलेप्पो से विद्रोहियों को खदेड़ कर अपना अधिकार जमा लिया, और जिस तेजी से इन शहरों में आम जीवन व्यवस्थापित होता जा रहा है, उससे विदेशी समर्थित सीरियायी विद्रोही और आतंकी ही नहीं, यूरोपीय देश और अमेरिकी सरकार भी परेशान है, कि यदि बशर-अल-असद को समय मिल गया, तो वहां से विद्रोहियों का सफाया हो जायेगा। ‘प्रवासी सरकार’ बना कर कूटनीतिक समर्थन हासिल कराने की नीतियां यूरोपीय संघ के सदस्य देशों से आगे नहीं बढ़ सकी। अरब जगत में अमेरिकी विरोध बढ़ता जा रहा है। हिजबुल्ला का यह कहना कि ”सीरिया के सहयोगी उसे किसी भी कीमत पर अमेरिका और इस्त्राइल के हाथों में जाने नहीं देंगे।” अरब जगत के आम जनता की आवाज बन गयी है। सीरिया में रह रहे फिलिस्तीनी शरणार्थी भी सीरियायी सेना के साथ विद्रोहियों से लड़ रही है। इसलिये यह तय है, कि यदि सीरिया पर सैन्य हस्तक्षेप किया गया तो युद्ध सीमित नहीं होगा। कुर्द विद्रोही भी सीरियायी सेना के साथ अल-कायदा आतंकियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। मुददा बशर-अल-असद सरकार के होने या न होने की सीमाओं को पार कर गया है।

इसके बाद भी, सच यह है कि अमेरिका और पश्चिमी ताकतों के खिलाफ सीरिया में बशर-अल-असद की सरकार, सेना और आम जनता जो लड़ार्इ लड़ रही है, उसका निर्णय उनके हाथ में नहीं है। मुक्त बाजारवादी ताकतों ने उस पर कब्जा कर लिया है। निर्णय चाहे जो भी हो, यह तय है कि वह सीरिया की आम जनता के पक्ष में नहीं होगा।

अमेरिकी सरकार उन खर्चों का आंकलने कर रही है, जो बशर-अल-असद की सरकार को सीरिया से बेदखल करने के लिये किया गया है। जो इस बात का पक्का सबूत है, कि अमेरिकी सरकार सीरिया की संकट का फौजी समाधान की ओर बढ़ रही है, इसके लिये समय चाहे जो लगे, वह फौजी समाधान ही चाहती है। अमेरिकी सीनेटर कार्ल लेविन ने डेम्पसी को अगले हफ्ते सीनेटार पैनल को विकल्पों की सूची देने को कहा है।

18 जुलार्इ को इस बात की घोषणा की गयी, कि ‘फ्री सीरिया आर्मी के सैनिक कमाण्डर जनरल सलीम इदरिस अगले सप्ताह अमेरिका आ रहे है। और संभावना इस बात की भी है कि, वो व्हार्इट हाउस भी जायेंगे। ओबामा के द्वारा राष्ट्रसंघ में अमेरिका की राजदूत के लिये नामित की गयीं समान्था पावर ने सीनेट में कहा कि ”राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद के द्वारा सीरिया में चल रहे खून-खराबे के खिलाफ अब तक कोर्इ ठोस कदम न उठाये जाने की घटना शर्मनाक है, इतिहास उसके बारे में बड़ी कठोरता से न्याय करेगा।” उन्होंने इस बात के संकेत दिये कि ‘अमेरिकी सरकार राष्ट्रसंघ की मंजूरी के बिना भी कुछ कदम उठाने के बारे में विचार-विमर्श कर रहा है।’ क्योंकि राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में सीरिया के खिलाफ लाये गये अमरिकी प्रस्ताव के विरूद्ध रूस और चीन के ‘वीटो पावर’ का सामना करना पड़ता है। रूस सीरिया के संकट का समाधान वार्ताओं की मेज पर चाहता है। वह सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ है। जुलार्इ में होने वाले जिनेवा वार्ता पर अपनी सहमति व्यक्त करने के बाद भी अमेरिका, इसे असफल बनाने की साजिशों में लगा है। जबकि, राजनीतिक समाधान ही एकमात्र रास्ता है।

यदि हम फ्रांस के पूर्व विदेश मंत्री के द्वारा दिये गये इण्टरव्यू पर विश्वास करें तो बि्रटेन सीरिया में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का सूत्रधार है। और अब वह अमेरिका के साथ मिल कर संयुक्त सैन्य हस्तक्षेप की योजना पर काम कर रहा है। मार्टिन डेम्पसी का बयान बि्रटिश आर्मड फोर्स के प्रमुख जनरल सर डेविड रिचर्ड के ‘द डेली टेलिग्राफ’ और ‘द सन’ में दिये गये बयान के बाद आया।

सीरिया में जिन परिस्थितियों की रचना साम्राज्यवादी ताकतों ने की है, उसके लिये वो सीरिया की असद सरकार को दोषी करार दे रही हैं, उनका प्रचारतंत्र ‘मीडिया वार’ छेड़ रखा है। राष्ट्रसंघ के रिफ्यूजी चीफ एंटोनियो ग्युटुरस ने सुरक्षा परिषद को बताया कि ”सीरिया के संघर्ष ने आने वाले 20 सालों के लिये एक बहुत बुरे शरणार्थी समस्या को पैदा किया है। 6000 लोग रोज देश छोड़ कर किसी और जगह शरण ले रहे हैं। हर महीने 5000 लोग मारे जा रहे हैं। पूरे संघर्ष के दौरान 2 साल में अब तक 93,000 लोग मारे गये हैं। 5 मिलियन से ज्यादा लोग शरणार्थी हैं।”

सीरिया का संकट असद सरकार की देन नहीं है, यह हम अच्छी तरह जानते हैं। हम यह भी जनते हैं, कि अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतों के द्वारा राजनीतिक अस्थिरता पैदा की गयी है, और अब प्रायोजित युद्ध का लक्ष्य उनके सामने है। एक ऐसा युद्ध जिसके विस्तार के बारे में वो कुछ भी नहीं जानते। वो नहीं जानते हैं कि यदि सीरिया में सीधे तौर पर सैन्य हस्तक्षेप किया गया तो, सीरिया की सीमाओं को लांघ चुकी सममस्याओं का स्वरूप क्या होगा? वो इसका आंकलन नहीं कर सके है। यह आसान भी नहीं है, क्योंकि जिन अरब देशों की सरकारें साम्राज्यवादी ताकतों के साथ सीरिया के खिलाफ खड़ी हैं, वहां की आम जनता न सिर्फ उनके खिलााफ है, बल्कि वो सीरिया की संकटग्रस्त आम जनता के साथ है, जिसका नेतृत्व बशर-अल-असद सरकार कर रही है।

अमेरिका, पश्चिमी देश और उनके द्वारा समर्थित विद्रोहियों के खिलाफ सीरिया और उसकी सीमाओं से लगे देशों में, ऐसे संगठित ग्रुपों के बीच ध्रुविकरण की शुरूआत हो गयी है, जिनकी क्षमता, स्त्रोत और समर्थन का सही आंकलन नहीं किया जा सकता। ये ग्रूप अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों के भी खिलाफ है, जो अमेरिका और पश्चिमी ताकतों का हाथ बंटा रहे हैं।

11 जुलार्इ को ‘फ्री सीरियन आर्मी’ के एक सीनियर कमाण्डर कमाल हमामी की हत्या सीरिया के उत्तर पश्चिम प्रांत लाटाकिया प्रांत के सलमा शहर में कर दी गयी। यह हत्या हमामी और स्थानीय इस्लामी स्टेट लीडर अबू अयमाम के बीच के संघर्षों का परिणाम है। अल कायदा से जुड़े ‘इस्लामिक स्टेट आफ इराक एण्ड अल शाम’ ने यह हत्या की। इस तरह के रिपोर्ट रार्इटर्स जैसे अखबार में कम ही आते हैं। ऐसा ही एक रिपोर्ट 11 जुलार्इ को छपा। बुसटन अल कसर चेक प्वार्इंट पर विरोधी गुट के द्वारा कब्जा कर लिया गया और विद्रोहियों के कब्जे वाले क्षेत्र से सीरिया सरकार के कब्जे वाले क्षेत्र में आवश्यक खाने के सामान और दवार्इयां जैसे जरूरी चीजों की आपूर्ति को रोक दिया। विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों को विद्रोहियों ने हिंसक ढंग से कुचल दिया। बुसटन अल कसर एलेप्पो शहर का दक्षिण पूर्व हिस्सा है, जिसके पूर्वी क्षेत्र पर पिछले साल से विद्रोहियों का कब्जा है। वर्तमान में शहर दो हिस्सों में बंटा है, और संघर्ष जारी है।

11 जुलार्इ को हुए हमामी की हत्या का मुददा इसलिये ज्यादा संवेदनशील हो गया है क्योंकि, वह 30 सदस्यीय सुप्रिम मिलिट्री कांउसिल का सदस्य था, जो कि ‘फ्री सीरियन आर्मी’ की नीति नियंता इकार्इ है। बि्रटिश अखबार टेलीग्राफ का मानना है कि ”हमामी की हत्या के खिलाफ ‘फ्री सीरियन आर्मी’ बड़ा हमला करेगी।” 12 जुलार्इ को एक अपरिचित सीनियर कमाण्डर ने इस बारे में बयान भी जारी किया है। जिसका सीधा सा मतलब है, कि संघर्ष घरेलू रूप से भी बढ़ेगा। विद्रोहियों के खिलाफ संगठित ग्रुपों की कार्यवाहियां भी बढ़ी हैं। इसलिये यह सोचना कि विद्रोहियों के खिलाफ सिर्फ सीरिया की सेना अभियान चला रही है, सच होने के बाद भी इस सच से जुड़ी है, कि अन्य संगठित गु्रप भी विद्रोहियों-आतंकियों के खिलाफ हैं और वो आपस में भी लड़ रहे हैं। सीरिया का संघर्ष अब सीरिया से बाहर आ गया है।

लेबनान की राजधानी बेरूत के बाहरी इलाके में, 3 जुलार्इ को एक बम धमाका हुआ। इस पहाड़ी इलाके में हिजबुल्ला के लीडरों के मकान हैं। लेबनान के सिया राजनीतिक दल और हिजबुल्ला के मिलिसिया असद सरकार एवं सेना की मदद कर रहे हैं। इस हमले में लगभग दो दर्जन लोग घायल हुए। जिसकी जिम्मेदारी एक सीरियन ग्रुप -ब्रीगेड 313 स्पेशल मिशन, ने ली है। हिजबुल्ला की पकड़ सिर्फ लेबनान में ही नहीं, बल्कि अरब जगत में भी है। इसलिये हिजबुल्ला का सीरिया की सरकार को मिल रहे समर्थन का अपना विशेष महत्व है। उसने लेबनान की सीमा से सीरिया में घुसपैठ को रोक दिया है।

तुर्की सीरिया की सीमा से जुड़े इलाके में, डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी से सम्बद्ध कुर्द विद्रोही और अल कायदा से जुड़े आतंकी गुटों के बीच संघर्ष जारी है। कुर्द विद्रोही सीरिया में विदेशी हंस्तक्षेप के खिलाफ है। वो विदेशी समर्थित सीरियायी विद्रोहियों के खिलाफ उत्तरी प्रदेश रागा में भी संघर्ष कर रहे हैं। जहां अल कायदा के कर्इ आतंकी मारे गये हैं। 21 जुलार्इ को कुर्द विद्रोहियों ने अल कायदा से जुड़े विद्रोहियों के कब्जे से एक चेक प्वार्इंट को अपने अधिकार में ले लिया। वहां से उन्होंने कर्इ हल्के हथियारों सहित युद्धक सामान, गोला बारूद, एक गाड़ी हैवि मशीनगन और मोर्टार लांचर जप्त किये हैं। 17 जुलार्इ को कुर्द विद्रोहियों ने रास-अल-ऐन शहर को भी अपने नियंत्रण में ले लिया।

चीन के सिन्हुआ न्यूज एजेन्सी के अनुसार -21 जुलार्इ को डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी के लीडर सालेह मुसिलम ने कहा है कि ”कुर्द लोगों का इरादा न तो सीरिया से अलग होने का है, ना ही वो अलग से अपनी सरकार बनाना चाहते हैं।” 20 जुलार्इ को अल-जजीरा ने कहा था कि ”सीरिया के कुर्द उत्तरी क्षेत्र में अस्थायी स्वायत सरकार बनाने के बारे में विचार कर रहे हैं।” अल-जजीरा के अनुसार मुसिलम ने कहा, कि पार्टी अन्य कुर्द गुटों के साथ इस प्रस्ताव पर विचार करना चाहती है, कि जैसे ही समझौता हो जाता है, तीन महीने के अंदर चुनाव कराया जायेगा, ऐसी स्वायत सरकार बनाने के लिये जो सीरिया के संकट का समाधान होने तक कुर्द क्षेत्र में काम करेगी। सीरिया की मौजूदा असद सरकार ने वर्ष 2012 से ही, एक सीमा तक कुर्दों को स्वायत्तता दे रखी है। वो अपने क्षेत्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी आज भी उठा रहे हैं। मुसिलम ने दोहराया है कि ”उनकी पार्टी सीरिया से अलग हो कर स्वायत्तता की बात नहीं सोचती है।” कुर्द विद्रोही सीरियायी सेना के साथ विद्रोहियों के खिलाफ लड़ रहे हैं।

राजधानी दमिश्क से बाहर सिथत रिफ्यूजी कैम्पों से विदेशी समर्थित विद्रोहियों को दमिश्क से बाहर खदेड़ने का काम सीरियायी सेना के साथ फिलिस्तीनी स्वयं सेवक मिल कर कर रहे हैं। 24 जुलार्इ को सीरियायी सैनिक एवं विद्रोहियों के बीच फिलिस्तीनी रिफ्यूजी कैम्प में भारी झड़प हुर्इ। यह इलाका सीरिया की सेना और विद्रोहियों के लिये विशेष महत्व रखता है। सीरिया का बदलता हुआ घरेलू समिकरण विद्रोही और पश्चिमी ताकतों की बड़ी चिंता है। वो मानते हैं, कि मौजूदा दौर बशर-अल-असद के पक्ष में है। यही कारण है कि वो शांति प्रक्रिया को, वार्ताओं की मेज तक पहुंचने देने से रोकने के लिये सैन्य हस्तक्षेप के पक्ष में हैं।

अमेरिका और बि्रटिश सूत्रों की 14 जुलार्इ की रिपोर्ट है, कि इस्त्राइली सब-मैरिन ने 5 जुलार्इ को सीरिया के बंदरगाह लटाकिया शहर के सशस्त्रागार पर क्रुज मिसाइल से हमला किया और ‘येरूसलम पोस्ट’ के अनुसार रूस में बने 50 पी-800 एंटीशिप मिसाइलें निशाने पर थीं। जो किसी भी नौसैनिक गनबोट के लिये घातक था। इस साल की शुरूआत से लेकर अब तक यह इस्त्राइल का सीरियायी फौजी साज-ओ-सामान पर किया गया, चौथा हमला है। साम्राज्यवादी ताकतें सीरिया के आयुद्धों को किसी भी कीमत पर नष्ट करना चाहती हैं, ताकि उस पर किये गये हमले के प्रतिरोध को घटाया जा सके।

डेमोक्रेटिक सीनेटर कार्ल लेविन को लिखे पत्र में जनरल मार्टिन डेम्पसी ने अमेरिका द्वारा सीरिया पर सैन्य हस्तक्षेप करने के विकल्पों का जिक्र उस पर होने वाले खर्च के साथ किया गया है। जिसके अंर्तगत-

• सीरियायी विद्रोहियों को सैन्य प्रशिक्षण देना।

• सीरिया के प्रमुख ठिकानों पर मिसाइल हमले करना।

• नो फ्लार्इ जोन स्थापित करना।

• सीरियायी एयर फोर्स को नष्ट करना।

• जार्डन या तुर्की सीमा से लगे सीरियायी क्षेत्र पर बफर जोन स्थापित करना।

• स्पेशल फोर्स के द्वारा रेड़ डाल कर रसायनिक हथियारों पर कब्जा करना।

पेण्टागन के द्वारा बड़े पैमाने पर हवार्इ हमला करना भी एक विकल्प है। जिसका खर्च हर साल करोड़ो-करोड़ डालर आयेगा।

डेम्पसी ने कहा है, कि स्पेशल फोर्स के हमले का खर्च हर महीने 1 बिलियन डालर से ज्यादा आयेगा। मिसाइल हमलों के लिये सैंकड़ों एयरक्राफ्ट, जंगी जहाज, सब-मैरिन और अन्य आयुद्धों एवं संसाधन की जरूरत पड़ेगी, इसका खर्च भी कर्इ बिलियन डालर होगा।

एक प्रभावशाली रणनीतिकार ऐंथनी कार्डसमैन ने वाशिंगटन पोस्ट में लिखा- यदि असद ‘आपरेशन’ को खत्म करके सीरिया के ज्यादातर हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं, तो र्इरान का प्रभाव इराक, सीरिया और लेबनान में बढ़ जायेगा। ‘संयुक्त मध्य-पूर्व’ सुन्नी और सिया के बीच बंट जायेगा -और यह स्थिति इस्त्राइल और कमजोर जार्डन और तुर्की के लिये गंभीर खतरे की बात होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि ”र्इरान का फारस की खाड़ी पर प्रभुत्व कायम हो जायेगा, जहां दुनिया का 48 प्रतिशत खनिज तेल मौजूद है।” कार्डमैन के अनुसार- अमेरिका और उसके मित्र देशों को एक बड़े क्षेत्रीय या हो सकता है वैश्विक युद्ध की तैयारी करनी चाहिये। जिसमें जान-माल की बड़ी हानि होगी और इसका भयानक प्रभाव भूमण्डलीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। इस युद्ध में अमेरिका को सिर्फ सीरिया के खिलाफ ही नहीं, बल्कि हिजबुल्ला, र्इरान -जिस पर नया प्रतिबंध अमेरिका के द्वारा पिछले सप्ताह ही लगाया गया है- से ही नहीं, यहां तक कि अमेरिका को रूस और चीन के खिलाफ भी लड़ना पड़ सकता है।”

asia (2)सीरिया का संकट वैश्विक युद्ध की पृष्टभूमि तो है ही, अमेरिका के द्वारा उसकी पहल भी हो सकती है। इस खतरे को एहसास अमेरिकी सेना को भी है, जो यह समझ नहीं पा रही है, कि युद्ध की तैयारी उसे कितने बड़े पैमाने पर करनी होगी? वो इसे सतर्कता से अंजाम देना चाहती हैं, क्योंकि ओबामा सरकार युद्ध के पक्ष में है। लीविन को लिखे अपने पत्र में डेम्पसी ने लिखा है कि ”एक बार युद्ध की शुरूआत हो गयी, तो फिर जो भी हमारे सामने आयेगा, उसके लिये हमें तैयार होना चाहिये। उससे गहरे तौर पर जुड़ने से खुद को रोक पाना मुश्किल होगा।”

अमेरिकी सीनेट के कुछ डेमोक्रेटिक सीनेटर सीरिया में विपक्ष को मजबूत करके, इस प्रायोजित युद्ध को लम्बा खींच कर सीरिया का विभाजन चाहते हैं। व्हार्इट हाउस के प्रवक्ता -प्रेस सेक्रेटरी- ने कहा है कि ”अब असद पूरे सीरिया पर शासन कभी नहीं कर पायेंगे।” जिसका सीधा सा मतलब है, कि व्हार्इट हाउस सीरिया पर हमले की गंभीरता को और उसके विस्तार को समझ रहा है, मगर वह मध्य-पूर्व और सीरिया में अपने हितों को छोड़ नहीं सकता। यही कारण है कि वह सैनिक हस्तक्षेप के जरिये सीरिया का विभाजन चाहता है।

किवनिपिअक पोल द्वारा हाल ही में कराये गये सर्वे के अनुसार- 61 प्रतिशत अमेरिकी सीरिया युद्ध में अमेरिकी हंस्तक्षेप के खिलाफ है। यदि निश्चित रूप से अमेरिका के लिये यही बेहतर भी होगा। लेकिन, हम जानते हैं कि व्हार्इट हाउस से ऐसी समझदारी की अपेक्षा करना बड़ी भूल है। आज नहीं तो कल, अमेरिका अपनी गलतियों को दुहरायेगा जरूर।

रूस ने अमेरिका पर सीरियायी संकट के शांतिपूर्ण समाधान पर टाल-मटोल करने का आरोप लगाया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेर्इ लोवारोव ने 24 जुलार्इ को कहा कि ”वाशिंगटन के द्वारा सीरियायी विद्रोहियों को वहां की सरकार के खिलाफ लड़ने के लिये हथियार उपलब्ध करा कर वह ‘संयुक्त अंतर्राष्ट्रीय शांति सम्मेलन’ के लिये रूकावटें पैदा कर रहा है। मास्को में एक प्रेस कांफ्रेन्स के दौरान लोवारोव ने राइटर्स से कहा कि ”यदि हमारे अमेरिकन साझेदार इस वक्त सीरियायी विद्रोहियों को हथियार उपलब्ध कराने और उनसे इस युद्ध योजना पर चर्चा करने के बजाय कि ‘सीरिया पर हमला कहां किया जाये?’ शांतिवार्ता के लिये विपक्ष को तैयार कर रहे होते तो अच्छा होता। उनकी गतिविधियां संयुक्त शांतिवार्ता करने के लिये, तय किये गये समझौतों के खिलाफ है।”

17 जुलार्इ को सीरिया के उप-प्रधानमंत्री कादर जमील मास्को में रूस के विदेशमंत्री लोवारोव से मिले। कादर जमील से कहा ”सीरिया और रूस के बीच हुए सुरक्षा संधि और हथियारों की आपूर्ति के समझौते अभी भी कायम हैं।” उन्होंने मास्को के द्वारा दमिश्क के लिये आर्थिक सहयोग पर हो रही चर्चाओं का भी उल्लेख किया। रूसी विदेशमंत्री लोवारोव ने कहा- ”रूस सीरिया के संकट के शांतिपूर्ण समाधान के लिये प्रयत्नशील है। हम लगातार सीरिया की सरकार और विपक्षी गु्रपों से मिल कर, उनको रूस-अमेरिका द्वारा प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को आयोजित करने के लिये, तैयार कर रहे हैं। मगर दूर्भाग्यवश ज्यादातर विपक्षी गुट जिसमें सीरियन नेशनल कालिजन भी शामिल है, खुद को तैयार नहीं कर पा रहे हैं।” जबकि सीरिया की असद सरकार सीरिया के हित में सम्मानित शांतिवार्ता के पक्ष में है।

सीरिया का संकट दुनिया के बंटवारे की ओर मुड़ चुका है। अमेरिका और पश्चिमी ताकतों ने दुनिया को एक बड़े युद्ध के मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया है। यदि सीरिया पर सैन्य हस्तक्षेप होता है -जिसकी आशंकायें बढ़ती जा रही हैं- तो यह तय है कि युद्ध के विस्तार को रोका नहीं जा सकेगा।

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