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तुर्की की आम जनता, अपने देश की सरकार के खिलाफ है

aisaतुर्की की आम जनता यह मानती है, कि ”हम जिस चीज से सहमत नहीं हैं, उसके खिलाफ प्रदर्शन करें, यह हमारा मुख्य अधिकार है।” और तुर्की की आम जनता-

• अपने देश की सरकार और उसकी नीतियों से सहमत नहीं है।

• वह अपने देश में अमेरिका और नाटो सेना के तैनात मिसार्इलों से सहमत नहीं है।

• वह सीरिया के खिलाफ अमेरिका और पश्चिमी ताकतों के हस्तक्षेप और तुर्की की सीमा से आतंकवादियों के घुसपैठ और विद्रोहियों को मदद देने से सहमत नहीं है।

उसकी नाराजगी इस सीमा तक बढ़ गयी है कि सत्तारूढ़ इस्लामिस्ट ‘जसिटस एण्ड डव्लपमेण्ट पार्टी’ के प्रधानमंत्री एरडोगन को अपना अंजाम मिस्त्र के पूर्व राष्ट्रपति मुर्सी की तरह होने की आशंकायें घेरती जा रही हैं। अब उन्हें आम जनता से ही नहीं, उन ताकतों से भी डर लगने लगा है, जिनके साथ मिल कर वो सीरिया में राजनीतिक अस्थिरता और गृहयुद्ध को बढ़ावा देते रहे हैं। पिछले महीने उन्होंने तुर्की के पार्लियामेण्ट में 25 जून को आरोप लगाया कि ”कुछ विदेशी शक्तियां, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां और बीबीसी जैसी विदेशी मीडिया सरकार विरोधी प्रदर्शनों के लिये जिम्मेदार है।” उन्होंने कहा, कि ”यह अस्थिरता तुर्की के विकास को रोकने के लिये प्रायोजित है, क्योंकि तुर्की ने ब्रजील की तरह ही ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष’ के कर्ज का भुगतान कर दिया है।”

कल तक इस्लामिस्ट पार्टी और प्रधानमंत्री एरडोगन अपनी बाजारवादी वित्तीय नीतियों और यूरो-अमेरिकी ताकतों के प्रति जितना आश्वस्त थे, मिस्त्र में मोहम्मद मुर्सी के तख्तापलट के बाद, उतने आश्वस्त नहीं हैं। हाल ही में तुर्की में हो रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि ”उनकी सत्ता को भी, मुर्सी की तरह ही, अपने भाग्य का सामना करना पड़ सकता है।”

मुर्सी को सत्ता से बेदखल किये जाने पर उन्होंने पश्चिमी देशों की सरकार की निंदा इसलिये की, कि उन्होंने मुर्सी को सत्ता पर फिर से लाने के लिये, सीधे तौर पर हस्ताक्षर नहीं किया। जबकि सत्ता से बेदखल होने से ठीक पहले मुर्सी ने मध्य-पूर्व एशिया, में अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियों का न सिर्फ समर्थन किया बल्कि, सीरिया से अपने राजनीतिक सम्बंधों के समापित की घोषणा भी की, और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से कर्ज के प्रस्ताव को अंतिम रूप देने का काम भी किया। उन्होंने सीरिया के खिलाफ ‘नो फ्लार्इ जोन’ स्थापित करने की मांग भी की। मगर, आज अपदस्थ राष्ट्रपति के लिये पश्चिमी देश और ओबामा सरकार की नीतियां मिस्त्र में हो रहे हिंसक मुटभेड़ों के जरिये जनप्रदर्शनों को अर्थहीन बनाते हुए मिस्त्र की सेना के कार्यवाहियों को जायज ठहराने की है। मुर्सी का मुददा एक ऐसी सरकार के हवाले है, जिसकी अपनी कोर्इ वैधानिक स्थिति नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि ”मध्य-पूर्व एशिया और सीरिया के संकट में तुर्की की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है, कि एरडोगन बराक ओबामा पर भरोसा कर सकते हैं।” प्रदर्शनकारियों के विरूद्ध सरकारी दमन को अमेरिकी समर्थन हासिल है। तक्सीम चौक और गीजि पार्क को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। तुर्की की कम्युनिस्ट पार्टी और वामपंथी सोच रखने वालों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हो रही हैं।

15 जुलार्इ से 21 जुलार्इ के बीच इस्ताम्बुल पुलिस ने पूरे शहर में कर्इ छापे मारे। 16 जुलार्इ को आतंकवाद विरोधी पुलिस ने 100 से भी ज्यादा घरों में छापामारी की। 30 लोगों को हिरासत में लिया गया। हिरासत में लिये गये युवा और छात्रों पर आतंकवादी संगठनों का सदस्य होने, और गीजि पार्क से जुड़े सार्वजनिक सम्पत्ति को हानि पहुंचाने का आरोप लगाया गया। इसके अलावा इजि़मर, बालिकेसिर मामिस और बुर्सा प्रांत में 15 लोगों को अलग-अलग छापामारी में, हिरासत में लिया गया।

तुर्की के इण्टीरियर मिनिस्टर के अनुसार, तुर्की में हो रहे प्रदर्शनों में 25 लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। ये प्रदर्शन 79 शहरों में हुए। अब तक के प्रदर्शनों में 4900 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया और 4000 लोग दंगा विरोधी पुलिस के साथ हुए संघर्ष में घायल हुए। प्रदर्शन के दौरान हजारों प्रदर्शनकारियों के घायल होने के अलावा 5 प्रदर्शनकारी मारे गये। मारे गये लोगों में 19 वर्षीय अली इस्माइल कोरकमाज का मामला काफी तूल पकड़ लिया है।

2 जून को एस्केशिहिर में हुए प्रदर्शन के दौरान एक गू्रप ने अली इस्माइल को बुरी तरह पीटा था। यह ग्रूप या तो पुलिस का था, या सरकार समर्थकों का? इस बात की पक्की जानकारी नहीं है। हमले के बाद बुरी तरह घायल अली बाद में कोमा में चला गया। इस दौरान इण्टरनेट पर एक विडियो फुटेज भी जारी की गयी, बाद में जिसे हटा दिया गया है। इसी आधार पर एक हमलावर की शिनाख्त भी हुर्इ। मगर स्थानीय अदालत के द्वारा हमलावर आरोपी को बरी कर दिया गया। इस घटना ने लोगों को आंदोलित कर दिया। ऐसी घटनायें अन्य शहरों में भी हुर्इ हैं। सरकार के विरूद्ध हो रहे प्रदर्शनों के मीडिया कवरेज को सेंसर करा दिया गया। एसोसियेशन आफ फोटोग्राफर की रिपोर्ट के अनुसार कुल 111 फोटोग्राफरों को हिरासत में लिया गया है। इस्ताम्बुल और अंकरा में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने फोटोग्राफरों के कैमरों को तोड़ा और तस्वीरों को नस्ट किया। तुर्की के विपक्षी राजनीतिक दल ने कहा है कि ”सरकार ने 64 पत्रकारों को गिरफ्तार किया है, और 123 अन्य पर आतंकवादी होने के आरोप लगाये हैं। जिनके खिलाफ ट्रायल चल रहा है।”

रिपब्लिकन पिपुल्स पार्टी यह बात 23 जुलार्इ को रिपोर्ट जारी करते हुए कहा। रिपब्लिकन पिपुल्स पार्टी के लीडर केमाल किलिक्सडाराग्लु ने कहा कि ”प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में तुर्की का स्थान 179 देशों में 154वें नम्बर पर है।” उन्होंने कहा कि ”गीजि पार्क में चल रही घटनाओं के बारे में रिपोर्ट देने वाले 59 पत्रकारों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है।”

सरकार के द्वारा मीडिया पर लगाये गये प्रतिबंधों की वजह से तुर्की के सरकार की लोकप्रियता में भी गिरावट आयी है। 20 जुलार्इ को ‘सोनर रिसर्च कम्पनी ने एक सर्वे रिपोर्ट जारी किया, जो 8 से 16 जुलार्इ के बीच कराया गया सर्वेक्षण है, जिसके आधार पर पिछले साल 53.2 प्रतिशत के अनुपात में, सत्तारूढ़ राजनीतिक दल की लोकप्रियता 6 प्रतिशत घट गयी है।

गीजि पार्क बंद है, और तक्सीम चौक के राहों को रोक दिया गया है। फिर भी सत्ता विरोधी प्रदर्शन जारी है। 13 जुलार्इ को इस्ताम्बुल के तक्सीम चौक पर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जमा हुए। उन्होंने सरकार से इस्तीफे की मांग की। पुलिस ने हमेशा की तरह वाटर कैनन और अंश्रुगैस का उपयोग किया।

यह प्रदर्शन सरकर के उस कानून के विरोध में किया गया, जिसके तहत ऐसे आर्कीटेक्ट और इंजीनियरों को सीटी प्लानिंग के काम में शामिल होने पर रोका गया है। ये आर्कीटेक्ट और इंजीनियर भी बड़ी तादाद मे प्रदर्शन में शामिल हुए। अंकरा सरकार प्रदर्शनकारियों को विदेशी समर्थित आतंकवादी करार दे रही है। गीजि पार्क में गिरफ्तार किये गये प्रदर्शनकारियों, हिरासत की अवधि बढ़ाने के विरोध में, भूख हड़ताल पर हैं। भूख हड़ताल में 50 से अधिक शामिल प्रदर्शनकारी मजदूर संगठन के नेता और प्रतिनिधि हैं। ‘तक्सीम सालिडेट्री प्लेटफार्म’ ने कहा है कि ”उन्हें बिना किसी वैधानिक आधार के हिरासत में लिया गया है।”

8 जुलार्इ को इस्ताम्बुल के गर्वनर के इस घोषणा के बाद कि ”गीजि पार्क को वो फिर से प्रदर्शन या उस पर कब्जा जमाने की अनुमति नहीं देंगे।” के विरोध में फिर से प्रदर्शनकों की शुरूआत हो गयी और पार्क को बंद करना पड़ा।

सरकार के दमनपूर्ण कार्यवाहियों के विरोध में तुर्की के सबसे बड़े शहर इस्ताम्बुल में एक समारोह का आयोजन किया गया। ‘मैन मेड अप आफ टीयर्स गैस’ नामक इस आयोजन में तुर्की के हर वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया। कलाकारों का एक समूह भी इसमें भाग लिया।

एक प्रदर्शनकारी ने कहा- ”यह तो शुरूआत है। हम इस संघर्ष को जारी रखते हुए, आगे ले जायेंगे।”

एक बड़े बैनर पर लिखा था- ”स्वतंत्रता और लोकतंत्र तुर्की के लिये है।”

एक आयोजक ने कहा- ”सरकार के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन ने अब त्यौहार के आयोजन का रूप ले लिया है।”

3 जुलार्इ को तुर्की की अदालत ने, सरकार के द्वारा प्रस्तावित तक्सीम चौक के पुर्ननिर्माण की योजना को रोक दिया है, जोकि, सरकार के लिये एक बड़ा झटका है। तुर्की के गीजि पार्क के लिये शुरू हुए आंदोलन का इतनी तेजी से पूरे तुर्की में फैल जाने की मुख्य वजह है- एरडोगन सरकार की नवउदारवादी वित्तीय नीतियां, जिसकी वजह से तुर्की में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। उनकी सत्तावादी पद्धति और इस्लामीकरण को धीरे-धीरे फैलाने की नीति के साथ पड़ोसी देश सीरिया में असद सरकार को सत्ता से बेदखल करने की साजिशों के खिलाफ तुर्की की 80 प्रतिशत आबादी है। तुर्की की एक तिहार्इ आबादी गरीबी के जाल में फंसी है। गरीबी में जीवन बसर करनेवालों की संख्या लगभग 32.6 मिलियन है। जबकि तुर्की के 10 प्रतिशत लोगों की आय न्यूनतम आय वालों से 15 गुणा से भी ज्यादा है। 2008 के वैश्विक एवं 2009 के घरेलू मंदी के दौरान तुर्की के व्यावसायिक अभिजात्य वर्ग ने मजदूरों से वेतन में भारी कटौतियों की और लोगों को काम से निकाल दिया। आज तुर्की में बेरोजगारी दर 16 प्रतिशत और युवा बेरोजगारी दर 22 प्रतिशत से ज्यादा है। यह वर्ग हो रहे प्रदर्शनों की महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

अब प्रदर्शनकारी पूरे देश में हो रहे प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिये गये लोगों के रिहार्इ की मांग कर रहे हैं। उन्होंने अदालतों के सामने भी प्रदर्शन किये। प्रदर्शनकारियों का कहना है, कि ”हिरासत में लिये गये लोगों को रिहा कर देना चाहिये, क्योंकि, यह हमारा मुख्य अधिकार है, कि हम जिस चीज से सहमत नहीं हैं, उसके खिलाफ प्रदर्शन करें।”

asia (3)और असहमति के एक नहीं कर्इ कारण हैं। तुर्की की आम जनता अपने देश में अमेरिका और पश्चिमी देशों की मौजूदगी नहीं चाहती। वह नाटो देशों का सैनिक ठिकाना बनने और सीरिया के खिलाफ राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिये तुर्की की सीमाओं से आतंकी घुसपैठ कराने से लेकर सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ है। वह मानती है, कि सीरिया की आम जनता को ही अपने देश की सरकार बनाने का अधिकार है। तुर्की की आम जनता ने नाटो पेटि्रयाट मिसार्इलों की तैनाती का विरोध किया। वह मध्य-पूर्व एशिया के बारे में, अपने देश की सरकार से पूरी तरह असहमत है। जिसकी गलत नीतियों की वजह से क्षेत्रीय संतुलन और शांति एवं स्थिरता खतरे में पड़ गयी है। सीरिया में राजनीतिक अस्थिरता का प्रभाव तुर्की सहित उसके सीमा से लगे देशों पर पड़ने लगा है। युद्ध और युद्ध के खतरों में इजाफा हुआ है। सीरिया ही नहीं, तुर्की में भी कुर्द विद्रोहियों की समस्या खड़ी हो गयी है।

मौजूदा दौर में भले ही तुर्की का महत्व पश्चिमी देशों के लिये बढ़ गया है और वह सीरिया में अमेरिकी हितों के लिये काम कर रहा है, मगर सीरिया में नाटो के द्वारा सैन्य हस्तक्षेप से तुर्की की घरेलू और सीमा पर कुर्द स्वायत्तता का मसला भी निर्णायक दौर में पहुंच जायेगा। यदि सीरिया का विभाजन होता है, तो कुर्द ‘संयुक्त कुर्द’ की मांग से तुर्की का विभाजन भी संभव है। सीरिया में बशर-अल-असद सरकार ने 2012 में ही अपने सीमांत कुर्द क्षेत्र को स्वायत्तता के साथ सुरक्षा की व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंप दी है। परिणाम स्वरूप, कुर्द लड़ाकों ने सीरियायी सेना के साथ मिल कर, तुर्की सीमा से सीरिया में घुसपैठ को लगभग रोक सा दिया है। सीरिया में फंसे विद्रोही-आतंकियों पर लगातार हमले हो रहे हैं। लेबनान की सीमा पर हिजबुल्ला सक्रिय है, और दमिश्क में फिलिस्तीनी शरणार्थियों ने सीरियायी विद्रोहियों के खिलाफ हथियार उठा लिया है।

तुर्की ने सीरिया से लगे अपने सीमा पर सैन्य टुकडियां तैनात की है। ऐसा उसने सीमांत इलाके में ‘सीरियन कुर्दिस आर्मड पार्टी’ और अल-नुसरा फ्रण्ट के बीच चल रहे संघर्ष की वजह से किया। तुर्की के अखबार हुर्रियत के 19 फरवरी के रिपोर्ट के अनुसार ”तुर्की के एफ-16 लड़ाकू बमवर्षक विमान तुर्की के दक्षिण क्षेत्र से सीमा पर भेजा जा चुका है।”

खबरों के अनुसार- प्रतिबंधित ‘कुर्दिस वर्कर्स पार्टी’ से सम्बद्ध ‘डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी’ के लड़ाकू दस्ता, पिपुल्स डिफेन्स यूनिट और अल नुसरा में पिछले तीन दिनों से सीरियायी शहर रास-अल-यान में संघर्ष चल रहा है। इस संघर्ष की शुरूआत तब हुर्इ जब अल नुसरा फ्रण्ट के लड़कों ने ‘कुर्द महिला लड़ाकों -कुर्दिस फिमेल फार्इटर’- के एक काफिले पर हमला किया। इस शहर का युद्ध के दृष्टि से काफी महत्व है।

तुर्की के एरडोगन की सरकार घरेलू विरोध का सामना कर रही है, और अपनी नीतियों में बदलाव लाये बिना, जन प्रदर्शनों को खत्म कर देना चाहती है, मगर वह आश्वस्त नहीं है, और मिस्त्र में मुर्सी के तख्तापलट की वारदात ने उन्हें चेतावनी दे दी है, कि खतरा उनके भी करीब है।

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