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मिस्त्र में मुर्सी का तख्तापलट

africa (2)आज मिस्त्र की जो स्थिति है, पश्चिमी मीडिया उसे दूसरी क्रांति कह सकती है, मगर हमें लग रहा है, कि मिस्त्र की आम जनता को एक बार फिर धोखा दिया जा रहा है। जनआंदोलन एक बार फिर घूम कर वहीं पहुंच गया है, जहां से होस्नी मुबारक के खिलाफ जन प्रदर्शनों की शुरूआत हुर्इ थी। सेना और सरकार विरोधी प्रदर्शन अब मुर्सी समर्थक मुसिलम ब्रदरहुड और सेना समर्थकों के बीच के संघर्ष में बदल गया है। हिंसक झड़पें और प्रदर्शन हो रहे हैं। मुहम्मद मुर्सी को सत्ता से बेदखल किया जा चुका है, और वो नजरबंद हैं। न्यायिक हिरासत में वो वहीं हैं, जहां होस्नी मुबारक है। और वास्तविक सत्ता सेना के हाथ में है।

सेना ने जो वायदे होस्नी मुबारक के तख्तपलट के बाद किये थे, वही वायदे वह मुर्सी को सत्ता से बेदखल करने के बाद कर रही है। तख्तापलट को ही जनक्रांति कहा जा रहा है।

यदि वास्तव में यह जनक्रांति है तो सत्ता पर जनपरिषद का अधिकार होना चाहिये था, मगर मिस्त्र में ऐसा नहीं है।

हमारे सामने सिर्फ दो सवाल है-

1. मिस्त्र की आम जनता क्या चाहती है, और वह किसके पक्ष में है?

2. अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देश क्या चाहते हैं, और मुर्सी के तख्तापलट या उन्हें सत्ता से बेदखल करने की वजह क्या है?

हम यह नहीं कह सकते कि मोहम्मद मुर्सी या मुसिलम ब्रदरहुड अमेरिका या पश्चिमी ताकतों के खिलाफ थे। सच तो यह है, कि उन्होंने अमेरिकी दबाव में ही सत्ता की साझेदारी सेना से की। अफ्रीका और मध्य-पूर्व एशिया में अमेरिका और पश्चिमी देशों का साथ दिया। सत्ता से बेदखल होने से ठीक पहले उन्होंने सीरिया से अपने राजनीतिक सम्बंधों को तोड़ने की घोषणा की, और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से 4.8 बिलियन डालर के कर्ज के प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया और मिस्त्र को मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था से नये सिरे से जोड़ने का काम किया। साम्राज्यवादी ताकतों के आर्थिक एवं सामरिक हितों से मिस्त्र को जोड़ कर, होस्नी मुबारक के कार्यकाल को वापस लाया। उन्होंने जनप्रदर्शनों और जनभावनाओं की अनदेखी की।

इसके बाद भी, मुसिलम ब्रदरहुड और मोहम्मद मुर्सी को सत्ता से बेदखल होना पड़ा। मुसिलम ब्रदरहुड ने अमेरिका पर तख्तापलट कराने का आरोप लगाया। काहिरा की सड़कों पर संघर्ष जारी है। यह कहना मुनासिब है कि, हिजबुल्ला और हमास की तरह ही मुसिलम ब्रदरहुड की पहुंच अरब जगत में है। आज मिस्त्र में हो रहे मुर्सी समर्थक प्रदर्शनों में सिर्फ मिस्त्र के मुसिलम ब्रदरहुड नहीं है। अरब जगत के जनप्रदर्शनों में, भावनात्मक और वास्तविक अंर्तसम्बध कायम हो गये हैं। पूरे क्षेत्र में जनधु्रविकरण की प्रक्रिया शुरू हो गयी है। लीबिया के खिलाफ की गयी सैन्य कार्यवाही का सबक, वह सबक बन गया है, कि सीरिया के पक्ष में हिजबुल्ला भी शामिल है। अब राजनीति धु्रविकरण सिर्फ सत्तारूढ़ वर्ग में ही नहीं है, बल्कि आम जनता के बीच भी है। उन संगठनों के बीच है जिसे अमेरिकी सरकार आतंकवादियों की सूची में डाल कर रखती है, मगर अपने क्षेत्र की जनता का वो नेतृत्व भी करती हैं, उनके सामने दलित राष्ट्रीयता का मुददा अहम है। कुर्द विद्रोही अपनी स्वायत्तता के साथ सीरिया की बशर-अल-असद सरकार के साथ है, और सीरियायी विद्रोहियों से लड़ रहे हैं।

संघर्षरत आम जनता के बीच की एकजुटता और क्षेत्रीय समस्याओं के लिये लड़ रहे संगठनों के बीच की घटती दूरियां, अमरिकी सरकार और पश्चिमी देशों की ऐसी समस्या है, जिसे तोड़ना या गलत दिशा देना उनकी पहली अनिवार्यता है। वो जनसंघर्षों को गलत दिशा दे रहे हैं, और अपने हितों के लिये आतंकी संगठनों को राजनीतिक अस्थिरता का प्रमुख साधन बनाने के साथ, वो उन संगठनों के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं, जो दलित राष्ट्रीयता के मुददे से जुड़े हैं। उन्होंने जो माली में किया, उसे अफ्रीकी देशों में दोहराना चाहते हैं।

मिस्त्र की आम जनता होस्नी मुबारक की तानाशाही के खिलाफ जब एकजुट हो गयी, जनतंत्र की बहाली के नाम पर सेना ने सत्ता संभाल लिया। और जनतंत्र के लिये संविधान और संविधान के निर्माण से पहले राष्ट्रपति के रूप में मोहम्मद मुर्सी को सत्ता तक पहुंचा दिया गया। दशकों से सत्ता के शीर्ष पर रही मिस्त्र की सेना और राष्ट्रपति मुर्सी की रस्साकशी मुर्सी के एक साल के कार्यकाल की विशेषता रही है। अमेरिकी दबाव की वजह से ही मुर्सी ने सेना से सत्ता की साझेदारी की, मगर वो हमेशा मुसिलम ब्रदरहुड के इस्लामी हितों को तरजीह देने वाले राष्ट्राध्यक्ष बने रहे। मुसिलम ब्रदरहुड हमास की नीतियों का अनुशरण करती रही है, और मुहम्मद मुर्सी ने अपने शुरूआती दौर में -राष्ट्रपति बनने के तत्काल बाद- हमास और फतह के बीच की दूरियों को घटाने का काम भी किया, जिसे अमेरिकी सरकार आतंकी संगठन करार देती रही है। जो फिलिस्तीन में इस्त्राइली हितों के विरूद्ध है।

अमेरिकी सरकार ने होस्नी मुबारक के साथ जो किया था, मोहम्मद मुर्सी के साथ भी उसने वही किया।

मोहम्मद मुर्सी के तख्तापलट के मूल में उग्र इस्लामी ताकतों के बीच बढ़ती एकजुटता और मुसिलम ब्रदरहुड के प्रभाव का क्षेत्र विस्तार है। जिन ताकतों को दशकों से अमेरिकी सरकार ने बढ़ाया उनका उसके नियंत्रण से बाहर होने की आशंका और इस्त्रार्इल के लिये बढ़ता हुआ खतरा महत्वपूर्ण कारक है। मुर्सी की यह सोच है, कि ”अरब जगत में मिस्त्र के महत्व एवं प्रभाव का बढ़ना जरूरी है।” अमेरिकी नीतियों से मेल नहीं खाती।

अमेरिकी सरकार और यूरोपीय शक्तियां दशकों से उस समिकरण के खिलाफ रही हैं, जो उनके लिये और इस्त्रार्इल के लिये मध्य-पूर्व में चुनौती बन सके। उन्होंने कैम्प डेविड समझौते से मिस्त्र को जिस तरह अरब जगत के संयुक्त हितों से काट रखा है, मोहम्मद मुर्सी और मुसिलम ब्रदरहुड सीधे तौर पर उसका उल्लंघन कर रहे थे। मोहम्मद मुर्सी और मुसिलम ब्रदरहुड मिस्त्र को इस्लामी ताकत के केंद्र में लाना चाह रहे थे। वो उस ओर बढ़ रहे थे, जिस ओर अमेरिका कभी खाड़ी के देशों को धकेलना चाहता था, मगर लीबिया की तबाही ने और सीरिया के संकट ने राजनीतिक समिकरण और अमेरिकी नीतियों में बदलाव की अनिवार्यता पैदा कर दी।

अरब जगत और खाड़ी के देशों में उसके प्रमुख सहयोगी देश रहे हैं- सउदी अरब, जार्डन, अरब अमिरात, बहरीन, टयूनीसिया, कुवैत, कतर, तुर्की और नासीर के तख्तापलट के बाद मिस्त्र। उसका मकसद खाड़ी के देशों के प्राकृतिक संसाधन- गैस एवं अकूत खनिज तेल भण्डार का दोहन और इस्त्राइल की सुरक्षा। वह तेल की राजनीति दशकों से करता रहा है। डालर की अनिवार्यता और वैश्विक मुद्रा के रूप में उसकी स्वीकृति पेट्रोडालर के रूप में रही है। इराक, लीबिया और सीरिया तथा उनके सहयोगी देश उसके निशाने पर रहे हैं, जिन्होंने अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ लम्बी लड़ार्इ लड़ी। जिनकी अर्थव्यवस्था उसकी वैश्विक वित्त व्यवस्था से मुक्त थी। र्इरान भी अमेरिकी वर्चस्व के खिलाफ रहा है। इस्लामी सोच रखने के बाद भी, लीबिया और सीरिया से उसके अच्छे सम्बंध रहे हैं। अपने हित एवं इस्त्राइल के लिये अमेरिका और पश्चिमी ताकतों के लिये र्इरान आज भी कड़ी चुनौती है।

मिस्त्र में, मुर्सी के तख्तापलट के पीछे खाड़ी के देशों और मध्य-पूर्व एशिया की समस्यायें आपस में जुड़ गयी हैं। पिछले दो सालों में अमेरिकी सरकार कटटर इस्लामी ताकतों के साथ इन क्षेत्रों में मिल कर काम कर रही है। टयूनीसिया, लीबिया और मिस्त्र में अरब क्रांति के बाद अमेरिकी समर्थक इस्लामी ताकतें ही सत्ता में आयीं। टयूनीसिया में इन्नाहदा और मिस्त्र में मुसिलम ब्रदरहुड। लीबिया में भी अमेरिका ने इन्हीं ताकतों का उपयोग कर के कर्नल गददाफी को सत्ता से बेदखल किया। लीबिया की तबाही और गददाफी की हत्या की गयी। आज लीबिया में कोर्इ भी सरकार नहीं है। जो है, वह कटटर इस्लामी ताकतें ही हैं। तुर्की में इस्लामी ‘जसिटस एण्ड डव्लपमेण्ट पार्टी’ भी मुसिलम ब्रदरहुड से जुड़ी है। नेशनल कालिजन की सम्बद्धता भी इसी से है। कतर की सरकार, मुसिलम ब्रदरहुड से अच्छे सम्बंध रखती है। इस तरह टयूनीसिया, लीबिया, तुर्की और मिस्त्र में मुसिलम ब्रदरहुड के रहने पर एक ही सोच और समझ रखने वाले इस्लामी ताकत का वर्चस्व कायम हो जाना तय है, जिसका विस्तार इराक से लेकर कतर तक संभावित है। ऐसे किसी भी समिकरण को अमेरिका अपने एवं इस्त्राइल के हितों के विपरीत मानता है।

मिस्त्र में मुर्सी के तख्तापलट की तीखी प्रतिक्रिया तुर्की की एरडोगन सरकार में हुर्इ। कतर ने भले ही अधिकृत रूप से इसकी निंदा नहीं की, मगर उसकी उदासीनता छुपी नहीं रह सकी। अमेरिका अपने ही मित्र देशों में संदेहास्पद हो गया है।

मिस्त्र की तरह कतर में भी अनोखे ढंग से तख्तापलट किया गया।

24 जून को कतर के अमीर हमाद-बिन-खलिफा-अल-थानि ने अपने बेटे शेख-तामिम-बिन-हमाद-अल-थानि को सत्ता सौंप दी। प्रचारित यही किया गया, कि बुजुर्ग अमीर हमाद ने अपने युवा बेटे को सत्ता सौंप दी। मगर ‘अरब टार्इम्स’ के डायरेक्टर ओसामा फैयाजी, जो कि, कतर इंफारमेशन मिनिस्ट्री के पूर्व प्रमुख अधिकारी हैं, के अनुसार यह सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि सत्ता से बेदखली है। जिसका नोटिस अमेरिका की गुप्तचर एजेन्सी सीआर्इए के एजेन्ट द्वारा सीधे तौर पर अमीर हमाद बिन और प्रधानमंत्री को दिया गया। वजह बतार्इ गयी, कि ओसामा-बिन-लादेन के एब्टाबाद में मारे जाने के बाद, यह जानकारी सामने आयी है, कि ओसामा बिना लादेन और अलकायदा का प्रमुख आर्थिक सहयोगकर्ता कतर का कोर्इ व्यकित है, जो वहां के सांस्कृतिक मंत्री के रिश्ते का भार्इ है। सीआर्इए एजेंट ने अल थानिक के सामने दो ही प्रस्ताव रखा या तो सत्ता अपने बेटे को सौंप दे या दुनिया भर में कतर की जो परिसम्पत्तियां हैं, उसे जप्त कर लिया जाये। और बड़ी खामोशी से 61 वर्षीय अमीर हमाद-बिन-खलिफा-अल-थानि को सत्ता से बेदखल कर दिया गया।

अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतों ने, खाड़ी के देशों में जैसी स्थितिया बना दी है, उनके लिये मिस्त्र में जनतंत्र के नाम पर एक ऐसी सरकार की जरूरत है, जो उनके राजनीतिक एवं आर्थिक हितों के लिये युद्ध और युद्ध के भय को बनाये रखे, किंतु मूलत: वह एक सैनिक सरकार हो। सेना की वरियता हर हाल में बनी रहे। मुर्सी और मुसिलम ब्रदरहुड मिस्त्र की सेना पर सरकार की वरियता के पक्षधर थे। मुसिलम ब्रदरहुड मिस्त्र में जनतंत्र के नाम पर सेना के स्थान पर इस्लामी जनतंत्र का पक्षधर है।

1954 से 1970 के बीच अमेरिका की गुप्तचर एजेन्सी सीआर्इए और पश्चिमी देशों की खुफिया तंत्र ने मुसिलम ब्रदरहुड का भरपूर साथ दिया। वो मानते थे कि राष्ट्रपति नासिर के तख्तापलट की क्षमता उनमें है। दोनों के रिश्ते दशकों पुराने हैं। ऐसी ही स्थिति मिस्त्र की सेना के साथ भी है। अमेरिका हर साल मिस्त्र की सेना को 1.3 बिलियन डालर की अर्थिक सहायता देता है, और अमेरिकी सैन्य अधिकारी ही सेना के वास्तविक प्रशिक्षक हैं। इस दृष्टि से मुर्सी और मुसिल्म ब्रदरहुड के बजाये मिस्त्र की सेना हमेशा से अमेरिकी सरकार की विश्वस्निय सहयोगी रही है।

मोहम्मद मुर्सी ने मिस्त्र के लिये अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से 4.8 बिलियन डालर के कर्ज पर अपनी स्वीकृति भले ही दी थी, मगर मिस्त्र की आम जनता पहले से ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के कर्ज की यातना झेल रही थी। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की आर्थिक नीतियों की वजह से मिस्त्र में एक भयानक किस्म की गरीबी का विकास हुआ। युवाओं में बेरोजगारी दर 80 प्रतिशत हो गयी। होस्नी मुबारक और मोहम्मद मुर्सी की आर्थिक नीतियों में कोर्इ फर्क नहीं होने की वजह से, मिस्त्र की आम जनता का मोहभंग होता चला गया। वैसे भी आम जनता मुर्सी के पक्ष में, पूरी तरह नहीं थी। मिस्त्र की बिगड़ती हुर्इ आर्थिक स्थिति ने, राजनीतिक कारणों से नाराज मिस्त्रवासियों की एकजुटता को आधार दिया। उन्होंने अर्थव्यवस्था को सुधारने की कोशिश करने के बजाये उसे अनछुआ ही छोड़ दिया। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से कर्ज के समझौते पर हस्ताक्षर ने लोगों की नाराजगी को और बढ़ा दिया। मिस्त्र की समस्याओं का समाधान के प्रति गये साल 53 प्रतिशत लोगों का विश्वास उनके साथ था, मगर इस साल वह घट कर 30 प्रतिशत रह गया। उनके प्रति समर्थन दर भी 78 प्रतिशत से घट कर 53 प्रतिशत हो गया। होस्नी मुबारक के समर्थक मिस्त्र का उधोगपति (पूंजीपति) वर्ग ने भी आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से, मुर्सी को सत्ता से बेदखल करने में सहयोग दिया।

मुर्सी अपने खिलाफ बढ़ते जनअसंतोष, मुबारक समर्थक सेना, न्याय प्रशासन और पूंजीपतियों के ध्रुविकरण तथा राजनीतिक रूप से उदारवादियों की एकजुटता को रोक नहीं सके। ओबामा सरकार ने अंतिम और निर्णायक दौर में मोहम्मद मुर्सी को धोखा दिया। वास्तविक जनतंत्र के लिये संघर्षरत मिस्त्र की आम जनता भी एकबार फिर धोखा खा गयी है। संघर्ष अब मुर्सी समर्थक और मुर्सी विरोधियों के बीच जारी है। मुर्सी विरोधियों को -जिन्होंने सेना का भी विरोध किया था- अब पश्चिमी मीडिया उन्हें सेना समर्थक करार दे रही है।

नवम्बर 2011 के पार्लियामेण्ट्री चुनाव में इस्लामी ताकतों को 69 प्रतिशत वोट मिला था, उदारवादी ताकतों को 20.3 प्रतिशत, मुबारक समर्थकों को 7.4 प्रतिशत तथा वाम दल को 2.8 प्रतिशत वोट मिले थे। चुनाव परिणाम से यह बात बिल्कुल साफ थी कि मुबारक समर्थकों की स्थिति जरूरत से ज्यादा बुरी है और इस्लामी ताकतों को स्पष्ट बहुतमत प्राप्त था। मगर न्याय प्रशासन के सभी सर्वोच्च पदों पर होस्नी मुबारक के समर्थकों का कब्जा था, परिणाम स्वरूप न्यायालय ने चुनाव परिणाम को असंवैधानिक करार दे उसे निरस्त कर दिया। और सत्ता एक बार फिर होस्नी मुबारक को सत्ता से बेदखल होने के बाद सत्ता संभालने वाले ‘सुप्रिम कांउसिल आफ द आर्मड फोर्स’ के हाथों में चली गयी। मुर्सी ने न्यायालय के निर्णय का सम्मान करने की बात की।

मिस्त्र के राष्ट्रपति चुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वन्दि मुबारक समर्थक अहमद सफीक को मोहम्मद मुर्सी ने 3.4 प्रतिशत के मतों के अंतर से भले ही मात दी, मगर आम जनता ने इसे मिस्त्र में जनतंत्र की बहाली के लिये उठाये गये कदम के रूप में कभी मान्यता नहीं दी। यह जीत मतों के विभाजन और न्यूनतम सहमति का परिणाम था। आम जनता के सामने वह प्रत्याशी ही नहीं था, जिसे वो अपना समर्थन दे सके। या जिसके प्रति वह अपना विश्वास व्यक्त कर सके।

मिस्त्र की राजसत्ता, राष्ट्रपति और सेना के बीच की रस्साकशी में फंस गयी। मुसिलम ब्रदरहुड सत्ता के केंद्र में राष्ट्रपति को चाहता था, मगर सेना अपनी वरियता खोना नहीं चाहती थी। मुर्सी ने ‘सुप्रिम कांउसिल आफ द आमर्ड फोर्स’ के प्रमुख फिल्ड मार्शल तांतावी को अपने पद से हटा कर जनरल सिसी को उनकी जगह नियुक्त कर दिया। यह लड़ार्इ नये संविधान से बाहर लड़ी गयी। संविधान परिषद का चुनाव नहीं हुआ उसे नियुक्त किया गया। उन्हें आशंका थी, कि मिस्त्र की न्याय व्यवस्था इस नियुक्ति को अवैधानिक करार दे सकती है, इसलिये उन्होंने राष्ट्रपति के हाथों में सत्ता के केंदि्रयकरण की बात की।

मुर्सी के इन कदमों का परिणाम यह हुआ, कि आम जनता उनकी तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर उतर आयी और मुर्सी विरोधियों (आम जनता नहीं, उदारवादियों) के साथ सेना और न्यायालय का समर्थन जुड़ गया। मिस्त्र का पूंजीपति वर्ग की भूमिका भी बढ़ गयी। वहां से बिलेनियर नगीब सारिस ‘तमारोड़’ के प्रमुख वित्तीय सहायता देने वाले बन गये। जिसका मकसद ही मुर्सी को सत्ता से बेदखल करना था।

तमारोड़ युवा नेतृत्व में, सड़कों पर संघर्ष की शुरूआत की। तख्तापलट से पहले, मिस्त्र की नाराज जनता को जो पहले से ही तहरीर चौक पर थी, उनके बीच घुस कर उन्हें अपने साथ ले लिया। ‘न्यूयार्क टार्इम्स’ लिखता है, कि ”बिलेनियर सारिस ने राष्ट्रीय स्तर पर बने कार्यालय एवं राजनीतिक दल- ‘फ्री इजीप्सीयन’ को पूरा-पूरा उपयोग उन्हें करने दिया। उन्होंने अपने द्वारा बनाये गये प्रसिद्ध टेलीविजन नेटवर्क पर तमारोड़ को चर्चित किया। स्थानीय समाचार पत्रों के जरिये ख्याति दिलार्इ। विडियो बनवाया और उसका प्रसारण बार-बार कराया गया।” जिसका मकसद मुर्सी को सत्ता से बेदखल करना था।

तमारोड़ का युवा नेतृत्व अल-बरदेयी से जुड़ा हुआ है। जिसने मुर्सी के विरूद्ध इलेक्शन पिटीशन दायर करने के लिये हस्ताक्षर अभियान चलाये। और जिनका दावा है कि 22 मिलियन लोगों ने उस पर दस्तखत किये हैं। मुर्सी के खिलाफ भारी जनप्रदर्शनों का तांता लग गया। 28 अप्रैल 2013 को हस्ताक्षर अभियान की शुरूआत की गयी, जिसका नेतृत्व पांच युवा सामाजिक कार्यकर्ता कर रहे थे। 29 जून 2013 को कहा गया कि 22,13,4460 हस्ताक्षर हुए हैं। आंदोलनकारियों ने राष्ट्रपति मुर्सी को पद त्याग के लिये 2 जुलार्इ तक का समय दिया। सेना ने दोनों पक्ष को मामला सुलझाने की चेतावनी दी।

अब तक मुर्सी विरोधी प्रदर्शनों में 35 से ज्यादा मुर्सी विरोधी संगठन जुड़ चुके थे। तमारोड़ के प्रवक्ता महमूद बद्र एक समाजसेवी और पत्रकार हैं, और अल-वरदेर्इ के खास। ‘सुप्रिम काउंसिल आफ द आमर्ड फोर्स’ के प्रमुख अलसिसि ने -जिसे मुर्सी ने नियुक्त किया था- राष्ट्रपति मुर्सी को 3 जुलार्इ तक का समय देने से पहले मोहम्मद बद्र, अल अजहर मसिजद के अहमद अल तैययब तथा अन्य प्रदर्शनकारियों से इस राजनीतिक अस्थिरता को खत्म करने के बारे में चर्चायें की थी।

मोहम्मद मुर्सी ने 30 जून 2012 को राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी और 3 जुलार्इ 2013 को उन्हें अपदस्त कर दिया गया।

मुर्सी समर्थक और मुर्सी विरोधियों के बीच संघर्ष जारी है। ”लास ऐंजील्स टार्इम्स’ ने 10 जुलार्इ के अपने रिपोर्ट में कहा है, कि ”युवा प्रदर्शनकारी कह रहे हैं, जैसा कि उन्होंने 2011 में भी कहा था, कि उन्हें राजनीतिक परिदृश्य से बाहर कर दिया गया है, जबकि वे ही वास्तविक नेतृत्व कर्ता है।”

अमेरिका ने जो काम होस्नी मुबारक के साथ किया था, उसने वही काम मोहम्मद मुर्सी के साथ दुहराया। तख्तापलट की पूर्व संध्या तक, उसने मुर्सी का समर्थन किया और उसके बाद उसने मुर्सी को विपक्ष की बात मानने को कहा। उसने तख्तापलट पर अपनी कोर्इ प्रतिक्रिया तब तक नहीं दी, जब तक वह खुद सवालों से नहीं घिर गया। बीबीसी संवाददाता ने जब मुर्सी को अपदस्त करने की मांग को जर्मनी के द्वारा समर्थन दिये जाने पर, जब व्हार्इट हाउस के प्रवक्ता से सवाल किया, तब उन्होंने कहा- ”हम भी सहमत हैं।” सुप्रिम कांउसिल आफ द आर्मड फोर्स के प्रमुख जनरल अब्दुल फतह अल सिसी ने मुर्सी के तख्तापलट से पहले अमेरिकी डिफेन्स सेक्रेटरी चक हेगल से कर्इ बार बातें की। उन्होंने 30 जून और 2 जुलार्इ को मुर्सी को चेतावनी देने से पहले भी, बातें की। अमेरिका के ज्वार्इंट चीफ आफ स्टाफ जनरल मार्टिन डेम्पसी भी लगातर सम्पर्क में थे।

africaमिस्त्र की सेना ने बेदखल राष्ट्रपति मुर्सी के सभी निर्णयों को -जिससे अमेरिकी सरकार असहमत रही है- बदलना शुरू कर दिया है। मोहम्मद मुर्सी ने जिस गाजा टर्मिनल को खोल दिया था, सेना ने पहला काम उसे बंद करने का किया। गाजा से लगे सीमा को सख्ती से बंद कर दिया गया और नहर में पानी भर दिया गया, जहां से लोगों की आवा-जाही होती थी।

मुर्सी के साथ कतर में भी सत्ता परिवर्तन हो चुका है, यह फिलिस्तीन को समर्थन देते रहने के खिलाफ उठाया गया अमेरिकी दबाव है। मुसिलम ब्रदरहुड पर अमरिकी समर्थक खाड़ी के देशों में हमले हो रहे हैं। 2 जुलार्इ को संयुक्त अरब अमिरात में मुसिलम ब्रदरहुड के 64 नेताओं पर तख्तापलट करने की कोशिशों का आरोप लगा कर सजा सुनार्इ गयी। 6 जुलार्इ को सउदी एजेण्ट अहमद असी अल जरबा को सीरियन नेशनल कालिजन का प्रमुख चुना गया। 8 जुलार्इ को गासान हित्तो ने सीरिया के अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री पद से इस्तिफा दिला दिया गया, जो कतर और मुसिलम ब्रदरहुड के एजेण्ट थे। भारी रददोबदल के बीच मुसिलम ब्रदरहुड की पहुंच को रोका जा रहा है। मुर्सी के द्वारा सीरिया से सभी राजनीतिक संबंधों के समापित की घोषणा ने भी अमेरिकी सरकार की असहमति को नाराजगी में बदल दिया।

सीरिया के संकट का स्वरूप बदल गया है। अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देश सीरिया में विद्रोहियों के पक्ष में सैन्य हस्तक्षेप करने की तैयारी के साथ, उसके विस्तार का आंकलन न कर पाने की वजह से, राजनीतिक समाधान निकालने की राह भी तलाश रहे हैं। वैसे भी, सीरिया में सीरियायी विद्रोही और अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के विरूद्ध, हिजबुल्ला जैसे इस्लामी संगठनों की बढ़ती एकजुटता से बनता समिकरण बशर-अल-असद के पक्ष में है। कुर्द विद्रोही और फिलिस्तीनी शरणार्थी बशर-अल-असद सरकार और सीरियायी सेना का हाथ बंटा रहे हैं। विश्व राजनीति में रूस, चीन और र्इरान जैसी ताकतों का नया समिकरण उभर चुका है, जो अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देशों के द्वारा सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ है।

मिस्त्र में मोहम्मद मुर्सी का तख्तापलट मध्य-पूर्व एशिया और खाड़ी के देशों में अमेरिकी नीतियों की असफलता का प्रमाण है। वह न तो बढ़ती हुर्इ जनचेतना को रोक सका, ना ही उग्र इस्लामी राष्ट्रवाद के विस्तार को। सच तो यह है कि मुर्सी के तख्तापलट की कार्यवाही से उसने अपने कतर और तुर्की जैसे मित्र देशों को आशंकित कर दिया है। लोकतंत्र की बहाली और आतंकवाद के खिलाफ उसकी नीतियां जनभावनाओं के विपरीत खड़ी नजर आने लगी हैं। वह अपने विरूद्ध उभरते हुए नये ध्रुविकरण में फंस गया है। यह ठीक है कि मिस्त्र की आम जनता एक बार फिर धोखा खा गयी है, मगर यह तय है कि वह अमेरिका या मुर्सी के खिलाफ है, उसने जान लिया है कि अपनी तादाद से वह इन ताकतों के खिलाफ लड़ सकती है।

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