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लातिनी अमेरिकी देशों की बढ़ती एकजुटता

latine americaविश्व जनमत के लिये लातिनी अमेरिकी देशों में पलती संभावनाओं के आगे सवालों की कमी नहीं है, मगर उलझी लकीरों के बीच सुलझी रेखाओं का होना, बड़ी बात है। यह बड़ी बात है, कि जब दुनिया की सरकारें अपने देश की आम जनता के खिलाफ खड़ी हैं, लातिनी अमेरिकी समाजवादी देश, अपने देश की आम जनता की फिक्र कर रही हैं। यह बड़ी बात है, कि जब अमेरिका, यूरोप और एशिया के कर्इ देश अपने देश की आम जनता की निगरानियां करा रही हैं, लातिनी अमेरिका के समाजवादी देश अपने देश और महाद्वीप की आम जनता पर अपना यकीन दिखा रही हैं। अपनी समस्याओं के प्रति अपनी सम्बद्धता का सकारात्मक एहसास करा रही है।

अमेरिकी सरकार, जब किसी भी कीमत पर, अपने ‘सर्विलांस प्रोग्राम’ की जानकारी दुनिया को देने वाले एडवर्ड स्नोडेन को, दुनिया के किसी भी देश से बेदखल रखना चाहती है, अमेरिकी विरोध और चेतावनी भरे पेशकश की अनदेखी कर वेनेजुएला, बोलेविया और निकारागुआ ने रूस के टर्मिनल जोन में फंसे स्नोडेन को, मानवता के आधार पर राजनीतिक शरण और नागरिकता देने की घोषणां की है। यह अधिकार आम आदमी की तरह स्नोडेन के हाथ में है? कि वह किस देश में, किस रूप में रहना चाहते हैं।

ओबामा सरकार ने जिस तरह ‘नागरिकता’ को हथियार की तरह उपयोग करना चाहा, लातिनी अमेरिका के समाजवादी दिशा की ओर बढ़ते देशों ने, खुले तौर पर यह समझाने की कोशिश की है, कि किसी भी देश की सरकार को, आम जनता के पक्ष में खड़ा होना चाहिए, और नागरिकता हथियार नहीं, आम जनता का अधिकार है, जो विश्व के मौजूदा ढ़ांचे में राज्य के पास सुरक्षित है।

राज्य और उनकी सरकारों को आम जनता के पक्ष में खड़ा करने की र्इमानदार कोशिशें लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों में हो रहा है, जिसका व्यापक प्रभाव गैर समाजवादी देशों की आम जनता पर पड़ा है। पूरे महाद्वीप में जन चेतना का विकास हुआ है। ऐसे जन संघर्षों एवं जन प्रदर्शनों की शुरूआत हुर्इ है, जिसका मकसद आम जनता की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिये राज्य की सरकारें जिम्मेदार हैं। आम जनता सार्वजनिक सम्पत्ति और राज्य की सरकारों के पास जमा सार्वजनिक धन के प्रति संवेदनशील है, उसके खर्च का अधिकार अपने हाथों में लेना चाहती है, या यूं कहें, कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मद में खर्च करने का अधिकार सरकार को देना चाहती है। और जब ऐसा नहीं होता तो चिली और ब्रजील जैसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं। आम जनता सड़कों पर होती है, और सरकारें आम जनता के सामने अपना पक्ष रख रही होती हैं।

वो अमेरिका और यूरोपीय देशों की सरकारों की तरह दमन भी कर रही होती हैं, मगर जन समस्याओं की तरह उतनी अंधी और बहरी नहीं होती, जितनी बहरी और अंधी सरकारें यूरोपीय देश और अमेरिका की सरकारें हैं। आम जनता के पक्ष में समाजवादी देशों की सरकारें और महाद्वीप की आम जनता होती है। वर्गगत राजनीतिक जागरूकता और सामाजिक चेतना इन देशों की आम जनता में यूरोप और अमेरिका की आम जनता से कहीं ज्यादा है। वैसे भी तीसरी दुनिया के देशों ने जो झेला है, और वो जो झेल रहे हैं उसका सकारात्मक प्रभाव भी अब बढ़ने लगा है, हालांकि स्थितियां विपरीत हैं। उसके सामने विपरीत आर्थिक एवं सामाजिक स्थितियां ही नहीं हैं, बल्कि नवउदारवादी वैश्वीकरण और साम्राज्यवादी हस्तक्षेप भी है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के सामने घृणित वित्तीय साम्राज्यवाद का हस्तक्षेप है, मगर, तीसरी दुनिया के देशों के सामने वित्तीय साम्राज्यवाद अपने फौजी साज-ओ-सामान और दुनिया की सबसे बड़ी फौज के साथ खड़ा है। वह तीसरी दुनिया के बदलते मिजाज की निगरानियां करा रहा है। इस वैश्विक मंदी ने पहली बार ग्रीस जैसे यूरोपीय देशों को, ‘एक देश के द्वारा दूसरे देश के शोषण’ का क्या मतलब होता है(?) का एहसास कराया है।

यूरोप की आम जनता ऐसी व्यवस्था को बदलने की लड़ार्इ कितनी लड़ रही है? यह तो बताना मुश्किल है, मगर वह अपने ही देश की सरकार और यूरोपीय संघ तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के खिलाफ संघर्ष कर रही है। उसकी लड़ार्इ सरकार की कटौतियों, नये कर, काम के घटते हुए अवसर के खिलाफ है। वह सारी दुनिया को लूट कर हासिल की गयी समृद्धि के खिलाफ कितना है? यह तय होना बाकी है। उनकी सोच नस्लवाद और औपनिवेशिक काल से कितना बाहर निकल पायी है? इसे जानने की जरूरत है। हां, उनकी सरकारों ने तीसरी दुनिया के देशों के साथ जो किया है, वह इतिहास के काले अध्याय को दुहराने की तरह है। उन्होंने एक ऐसी समाज व्यवस्था का निर्माण किया है जहां शोषण और दमन के साथ विकास का स्वरूप विध्वंसक है। उसने दुनिया के आम लोगों के जुड़ने के सूचना एवं तकनीक विकास को भी उनके खिलाफ हथियार में बदल दिया है।

स्नोडेन का मुददा लातिनी अमेरिकी देशों में नये रूप में उभरा है। 3 जुलार्इ को मास्को से बोलेविया जा रहे बोलेविया के राष्ट्रपति इवो मोरालिस के विशेष विमान को, यूरोपीय देश स्पेन, फ्रांस, पुर्तगाल और इटली ने अपने हवार्इ सीमा से गुजरने की अनुमति इसलिये नहीं दी, कि उसमें अमेरिका के वांछित एडवर्ड स्नोडेन के होने की बेबुनियाद खबर दी गयी थी। स्पेन ने इस शर्त के साथ उड़ान भरने की अनुमति दी कि ‘उसे विमान का निरीक्षण करने और यात्रियों के जांच करने की स्वीकृति दी जाये।’

इवो मोरालिस ने कहा- ”हम औपनिवेशिक काल में नहीं हैं। कुछ यूरोपीय देशों के द्वारा गलत किया जा रहा है। वे हमें डराने की कोशिश कर रहे हैं।” उन्होंने कहा- ”यह घटना सिर्फ उन पर नहीं बल्कि पूरे बोलेविया और लातिनी अमेरिकी देशों पर किया गया हमला है। यूरोपीय देशों को दुनिया के सामने इस घटना के कारणों को बताना होगा।” उन्होंने इस घटना की वैधानिक प्रक्रिया के तहत जांच की घोषणा भी की।

4 जुलार्इ को बोलेविया में ‘यूनियन आफ साउथ अमेरिकन नेशन’ की आवश्यक बैठक बुलार्इ गयी और संयुक्त वक्तव्य जारी कर के फ्रांस, इटली, स्पेन और पुर्तगाल द्वारा बोलेविया के विमान को अपने हवार्इ क्षेत्र से उड़ान भरने और र्इंधन के लिये रूकने के लिये इजाजत नहीं देने की कड़े शब्दों में निंदा की और बोलेविया के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त की। संयुक्त वक्तव्य पर यूनियन के राष्ट्रपतियों निकोलस मदुरो, क्रिस्टीना फर्नाणिडस एवं अन्य लोगों ने हस्ताक्षर किये। उन्होंने सीधे तौर पर इसे अंतर्राष्ट्रीय सनिध का उल्लंघन करार देते हुए सम्बद्ध देशों से क्षमा मांगने की मांग की।

‘यूनियन आफ साउथ अमेरिकन नेशन’ के संयुक्त प्रेसिडेण्ट ने चारो यूरोपीय देशों के विरूद्ध कहा कि ”वे बोलेविया द्वारा राष्ट्रसंघ हार्इ कमिश्नर फार हयूमन रार्इटस में मानवाधिकार के गंभीर उल्लंघन और राष्ट्रपति इवो मोरालिस के जीवन को खतरने में डालने के खिलाफ, शिकायत दायर करने और अन्य सम्बंधित एजेंसियों में किये जाने वाले सभी जरूरी कार्यवाहियों का समर्थन करते हैं।”

बोलेवेरियन सोशल मोमेण्टस आफ वूमने से लेकर लातिनी अमेरिका के कर्इ समाज सेवी संगठनों ने इवो मोरालिस के प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्शित की। मोरालिस यह मानते हैं कि ”जो हुआ वह कोर्इ गलती या दुर्घटना नहीं है, बल्कि बोलिवियन लोगों के प्रति अमेरिकी नीतियों का प्रतिबिम्ब है।”

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो ने कहा कि ”यूरोप के लिये यह एक दुखद घटना हो सकती है, मगर लातिनी अमेरिका के लिये यह अपनी एकजुटता को दिखाने का समय है।”

इक्वाडोर के राष्ट्रपति राफेल कोरिया ने कहा- ”या तो हम उपनिवेश की तरह रहें या एक स्वतंत्र और सम्प्रभु लोगों की तरह अपनी प्रतिक्रिया दें।” उन्होंने कहा- ”दक्षिणी अमेरिका के देश महाद्वीप के किसी भी राष्ट्र के प्रमुख के साथ ऐसे व्यवहार की स्वीकृति नहीं देते हैं।”

उरूग्वे की राजधानी मोन्टेवीडियो में 12 जुलार्इ को हुए मर्कोसर ट्रेड ब्लाक के 45वें सम्मेलन में अर्जेण्टीना, वेनेजुएला, ब्रजील और उरूग्वे के नेताओं ने स्पेन, फ्रांस, इटली ओर पुर्तगाल से अपने राजदूतों को विचार-विमर्श के लिये वापस बुला लिया।

15 जुलार्इ को बोलेविया में स्पेन के राजदूत ने बोलेविया के विदेश मंत्रालय जा कर, 3 जुलार्इ की घटना के लिये सरकारी तौर पर क्षमा याचना की।

17 जुलार्इ को बोलेविया के विदेश मंत्री ने जानकारी दी कि इटली और पुर्तगाल ने भी क्षमा मांगी है।

गुटनिर्पेक्ष देशों ने भी इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की है।

इवो मोरालिस ने कहा कि ”यदि यह प्रमाणित हो जाता है कि वाशिंगटन इस घटना के पीछे है, तो हम अमेरिकी दूतावास को बंद करने में, थोड़ी भी हिचक नहीं दिखायेंगे।”

8 जुलार्इ को बोलेविया में 3,000 से अधिक लोगों ने अमेरिकी दूतावास के बाहर प्रदर्शन किया। उनकी मांग थी, कि अमेरिका चारो यूरोपीय देशों के साथ मिल कर चला रहे कूटनीतिक षड़यंत्रों को बंद करे।

सम्बद्ध यूरोपीय देशों के वापस बुलाये गये राजदूतों को 26 जुलार्इ को वापस भेज दिया गया। उन्होंने मांग की है, कि इस तरह की घटनायें फिर से नहीं होनी चाहिए।”

क्यूबा ने कहा है कि ”इवो मोरालिस के साथ जो हुआ वह अन्यायपूर्ण और अस्वीकार्य घटना है। जिससे लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों को ठेस पहुंची है।”

जिसे उन्होंने अपने आपसी निकटता और एकजुटता में बदल दिया। लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों के लिये स्नोडेन न तो अमेरिकी सरकार के खिलाफ हथियार है, ना ही सनसनी पैदा करने वाली खबरें। उनके लिये स्नोडेन मानवीय आधार पर स्वतंत्रतापूर्वक जीने या कहीं भी भयमुक्त रहने-बसने का अधिकारी है।

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