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पिछले कर्इ दिनों से मेरे कान बज रहे हैं!

पिछले कर्इ दिनों से मेरे कान बज रहे हैं।

आप तो जानते हैं, कि कान बजने की बीमारी बुरी होती है। उस पर अपना बस नहीं चलता। जुबान से आवाज का रिश्ता गड़मड़ हो जाता है। ऐसा लगता है, जैसे लोग हिंदी में अंग्रेजी बोल रहे हैं।

डाक्टर से मिलो तो पूछते हैं- ”किसी खदान या कारखाने में काम करते हैं?”

”नहीं!” कहने पर पूछते है।- ”ऐसी जगह रहते हैं जहां हो-हल्ला मचा रहता है, शोर-शराबा होता है?”

समझ में नहीं आता कि क्या जवाब दूं? कहां हल्ला नहीं है? शोर शराबा नहीं है?

दिल की धड़कन भी शोर मचाती है।

पेट की आंतें भी भूख से चिल्लाती हैं।

लाखों-लाख लोग सड़कों पर नारे लगा रहे हैं।

गोली-गोले चल रहे हैं।

सच कहने की सजा बड़ी तगड़ी है भार्इ! मैं बता नहीं सकता कि मेरे कान क्यों बजते हैं?

ग ग ग

पिछले कर्इ दिनों से मेरे कान बज रहे हैं।

अजीब सी डरावनी आवाजें सुनार्इ पड़ती हैं।

चंद रोज पहले किसी ने कहा- ”मैं देशभक्त हूं।”

मैं डर गया।

कान में सीटियां बजने लगीं।

जेहन में खयाल होते हैं, और खयालों में बड़ी दहशत है, कि दंगे के समय दाढ़ी बुरी चीज होती है। पैंट तक उतरवा देती है, यह बताने के लिये कि ”आप जो सोच रहे हैं, मैं वह नहीं हूं।”

जेहन में, आगजनी के बाद अधजली लाशों से पटी ट्रेन बरसों से ठहरी है।

कोर्इ कहता है- ”आपको भरम हो रहा है। ट्रेन जा चुकी है।”

”कहां?” मैं बता नहीं सकता।

सच बताने की सजा पक्की होती है।

ग ग ग

पिछले कर्इ दिनों से मेरे कान बज रहे हैं।

कोर्इ कहता है- ”दो रूपये किलो गेहूं। तीन रूपये किलो चावल। एक रूपये किलो मोटा अनाज मिलेगा।”

मैं चकरा गया।

अफसोस जाहिर करने के लिये, उसकी और देखता हूं कि ”बंदा, पागलखाने से भाग आया है।

मगर हांक लगाने वालों के बीच हरी झण्डी लिये एक सभ्य महिला खड़ी थी। उसके बगल में खड़े सरदार जी भी सभ्य दिख रहे थे। हांक लगाने वाले लोग भी जरूरत से ज्यादा सभ्य लोग थे।

मैंने तसल्ली कर लेनी चाही कि जो देख और सुन रहा हूं वह सही है न? मगर लोग अपनी खुशी में मस्त थे।

गेमचेंजर प्रोग्राम की धुन बज रही थी।

जिन्होंने सड़े हुए अनाज को गरीबों में नहीं बांटा, वो क्या कह रहे हैं? ऐसा क्यों कर रहे हैं?

मैंने अपनी उगी हुर्इ हंथेलियों को देखा जो झण्डे पर लहरा रहा है। जिसे 2014 में एक बार फिर कटना है।

मेरे कान बजने लगे, कि गल्ती करोगे, तो सजा मिलेगी।

ग ग ग

मेरे बजते हुए कान ने मेरे साथ सब कुछ झेला है। उसे मुझ पर तरस आने लगा। उसने मुझसे पूछा-

”मेरे सवालों का जवाब दोगे?”

”देने के लिये मेरे पास कुछ भी नहीं है, मेरी मर्जी भी नहीं।” मैंने कहा।

”फिर भी!”

”पूछो!”

”देखने और सुनने में फर्क लगता है?” उसने सवाल किया।

”लगता है।” मैंने कहा।

”फिर कान के बजने को बीमारी क्यों समझते हो?”

”क्योंकि बीमारी है।”

”गलत!” उसने कहा- ”फर्क है, इसलिये फर्क लगता है। जिस दिन फर्क नहीं रहेगा कान का बजना भी बंद हो जायेगा।”

मेरे कान बजने लगे। अब भी बज रहे हैं, और न जाने कब तक बजते रहेंगे?

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