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राज्य विहीन विश्व की अवधारणायें अभी दूर है

vishesh aalekhदेशों से भरी दुनिया में आम आदमी से, उसके वैश्विक होने की खुशियां छीन ली गयी हैं। उसके नैसर्गिक अधिकारों को, उससे छीन लिया गया है। उसे ऐसी परिस्थितियों से घरे दिया गया है, कि जब तक वह प्रचारित वैश्वीकरण के विरूद्ध खड़ा नहीं होता, दुनिया से जुड़ नहीं पाता है। दुनिया से जुड़ने के लिये एकाधिकारवादी वैश्वीकरण के विरूद्ध खड़ा होना जरूरी हो गया है। यह अजीब सी स्थितियां हैं, कि वैश्वीकरण की सोच वास्तव में विभाजित है। जन वैश्वीकरण और एकधिकारवादी वैश्वीकरण के बीच गहरी खायी है। यह खायी इतनी चौड़ी है कि इसे लांघा नहीं जा सकता।

एकाधिकारवादी वैश्वीकरण उधोगपरक समाज व्यवस्था के विशाल मशीन में लोगों को अलग-अलग पुर्जे की तरह जोड़ना और दुनिया के देशों को एक ही उत्पादन प्रणाली और उसकी वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा बनाना है। जिसकी व्यवस्था राज्य की सरकारों के जरिये, निजी कम्पनियों, दैत्याकार कारपोरेशनों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के हाथों में हैं, जो वित्तीय पूंजी के नियंत्रण में है। इसके बाद भी उसकी वैश्विक संरचना टूट कर बिखर रही है, और विवादहीन रूप से वह संकटग्रस्त है।

उभरती हुर्इ आंतरिक विसंगतियां और बढ़ता हुआ जन असंतोष इस बात का प्रमाण है, कि वित्तीय पूंजी के द्वारा संचालित वैश्विकरण के विकास की दिशा गलत है। जो हो रहा है, वह गलत है। जनविरोधी और जन जुड़ाव के विरूद्ध है। एकाधिकारवादी ताकतें आर्थिक, सामरिक एवं असीम राजनीतिक ताकतों के बाद भी, उतनी भी एकजुट नहीं हैं, जितनी नजर आती हैं। जनध्रुविकरण के साथ ही नये राजनीतिक ध्रुविकरण की शुरूआत हो गयी है। मास्को ने वाशिंगटन के दबाव को दरकिनार कर एडवर्ड स्नोडेन को एक साल के लिये शरण देने की घोषणा की है। शरण मिलने के साथ ही स्नोडेन ने मास्को के शेरमतिएवा एयरपोर्ट के ट्रांजिट जोन को छोड़ दिया है। उनके सुरक्षा की जिम्मेदारी रूस की सरकार पर है।

स्नोडेन के वकील एनतोली कुचेरेना ने रूस के अस्थायीशरण के प्रमाणपत्र के फोटोकापी भी दिखार्इ उन्होंने कहा- ”उन्हें एक साल के लिये रूस में रहने की इजाजत मिल गयी है। अब उन्हें खुद तय करना है कि वो कहां जायेंगे।”

देशों से भरी दुनिया में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि स्नोडेन कहां जायेंगे? उनके पास एक अस्थायी ठिकाना है। एक साल का पनाहगाह है।

वो जहां जायेंगे, वहां जाने के लिये राज्य के सरकारों की अनुमति, और उनकी सरपरस्ती का सवाल जुड़ा हुआ है। दुनिया में रहने-बसने के लिये एक भी ऐसी जगह नहीं है, जहां राज्य और उनकी सरकारों की दखल न हो। राज्य की स्वीकृति के बिना, पांव रखने को भी जगह नहीं है, इस दुनिया में।

स्नोडेन के लिये यह मुददा नहीं है, कि ”राज्य की सरकारों की अनुमति के बिना दुनिया में रहने की कोर्इ जगह नहीं है।” वो राज्य के अनुचित हस्तक्षेप के खिलाफ है। उन्होंने अमेरिका की आम जनता, और दुनिया की आम जनता के पक्ष में खड़ा होने को तरजीह दी। जिसे अमेरिकी सरकार गंभीर अपराधों की श्रेणी में रखती है। राष्ट्रद्रोह भी गंभीर अपराध है। हालांकि बे्रडली मैनिंग को -जिन्होंने विकिलिक्स को अमेरिकी सरकार के गुप्त दस्तावेज दिये- राष्ट्रद्रोह के अपराध से आरोप मुक्त कर दिया है, मगर जितने आरोप उनपर हैं,उसकी सजा 35 साल सुनार्इ गयी है। इस लिये वो आरोप मुक्त नहीं, आरोपों के दायरे में हैं। मगर, स्नोडेन अमेरिकी न्याय प्रक्रिया के दायरे से बाहर हो गये हैं।

उन्होंने राज्य की सरकारों के द्वारा आम जनता के खिलाफ की जा रही, अमेरिकी सरकार के अपराधों की जानकारियां अमेरिका और दुनिया की आम जनता को दी है, जिसमें कम से कम 150 ठिकानों के कर्इ देश शामिल हैं। गार्जियन ने जानकरी दी है, कि दुनिया भर में, 150 जगहों पर इंटरनेट गतिविधियों की जासूसी के लिये 700 सरवर लगा रखे हैं। एक सरवर भारत में भी है। जिसके जरिये अमेरिकी सरकार करोड़ों लोगों के र्इ-मेल, आनलार्इन चैटिंग और इण्टरनेट पर दूसरी गतिविधियों पर नजर रखती हैं। मतलब साफ है, कि इन देशों में स्नोडेन के लिये कोर्इ जगह नहीं। स्नोडेन के लिये वहां भी जगह नहीं है, वहां भी उन्हें शरण नहीं मिल सकती है, जहां की सरकारें आम जनता के पक्ष में नहीं हैं।

हम राज्य विहीन विश्व की कल्पना अभी नहीं कर सकते। सरकारों का आम जनता के पक्ष में होना ही बड़ी बात है।

यदि आज हम यूरोपीय और अमेरिकी पद्धति की जनतांत्रिक सरकारों को देखें, तो अपने देश की जनता के लिये उनकी नीतियां कारनामों से कम नहीं हैं। उन्होंने जनहित और जन भावनाओं की अनदेखी कर राज्य के अधिकारों और उसके वित्तीय स्त्रोतों को न सिर्फ निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों को सौंपने का काम किया, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय वित्त्ीय इकार्इ -विश्व बैंक एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष- के भारी कर्ज के बोझ को भी अपने देशवासियों पर लाद दिया। उन्होंने ऐसी स्थितियां बनायी कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों की भूमिका महत्वपूर्ण होती चली गयी। जिन उददेश्यों के लिये सरकारें बनायी जाती हैं, उन्होंने उन्हीं उददेश्यों को एक सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने अपने ही देशवासियों की जिम्मेदारियों से हाथ खींच सा लिया है। इसके बाद भी, अमेरिकी पद्धति की सरकारें अपने सही होने का तर्क कहीं न कहीं से बटोर लाती हैं, और उनकी मीडिया इस बात का इतना प्रचार करती है, कि झूठ के चेहरे पर आम जनता को सच्चार्इयां नजर आने लगती हैं। उनके प्रचारित झूठ की सच्चार्इयों ने अब राज्य एवं उनकी सरकारों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया हैं

अब आप खुद ही सोचिये, कि अपने ही प्रचारित झूठ को सरकारें यदि सच मान लेंगी, तो उनकी समझ कितनी समझदार होगी? वो अपने पतनशील व्यवस्था को, उसके आज और आनेवाले कल को, प्रचारित झूठ के नजरिये से देखने लगी है।

क्या सामाजिक विकास की दिशा को हंथियारों से नियंत्रित किया जा सकता है?

क्या राज्य को वित्तीय इकार्इयों में बदल कर, सरकारें आम लोगों के प्रति अपनी सामाजिक दायित्वों का निर्वाह कर सकती हैं?

क्या समाज को बाजार के हवाले करके, सामाजिक समानता की बुनियादों को बचाया जा सकता है?

क्या जनविरोधी सरकारों की सरपरस्ती में समाज का सर्वोच्च विकास संभव है?

क्या देशों से भरी दुनिया में, दुनिया के लिये जीने वालों के लिये कोर्इ जगह है?

क्या आम जनता के पक्ष में खड़ा होना, अपने देश एवं दुनिया की सरकारों के खिलाफ खड़ा होना है?

यदि- ‘हां’ तो इसका जवाब आपको देना होगा।

यदि- ‘नहीं’ तो ऐसे लोगों के लिये दुनिया में जगह आपको ही बनानी होगी। क्योंकि, सरकारें तो ऐसा होने देना नहीं चाहतीं।

यदि आज स्नोडेन के सामने यह सवाल है, कि सालभर बाद वो कहां जायेंगे? तो यह सवाल कल आपके सामने भी खड़ा हो सकता है। इसलिये यह सवाल निजी तो कतर्इ नहीं है।

माना यही जा रहा है, कि वो लातिनी अमेरिकी देशों में ही कहीं जाने का निर्णय लेंगे। जहां विकास के जरिये समाजवाद की अवधारणायें विकसित हो रही हैं। बोलेविया, इक्वाडोर और वेनेजुएला में उनके लिये रहने और खुल कर जीने की परिस्थितियां हैंं तो क्या अंजाने ही आप यह नहीं कह रहे हैं, कि लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों में ही आम आदमी के जीने की संभावनायें है। क्या अंजाने ही आप यह नहीं कह रहे हैं, कि जनविरोधी सरकारों की इस भीड़ में, आम जनता के पक्ष में खड़ी सरकारें यहीं हैं।

एडवर्ड स्नोडेन के निर्णय से, आनेवाले कल का निर्धारण नहीं होगा। ना ही, लातिनी अमेरिकी देशों के जनवैश्वीकरण की, समाजवादी सोच का स्वरूप तय होगा, मगर यह तय जरूर होगा, कि आम जनता के पक्ष में खड़ी सरकारें ही ऐसे विश्व की रचना कर सकती हैं, जहां जनविरोधी सरकारों के लिये कोर्इ जगह नहीं होगी। राज्य की सरकारों के सामने आम जनता के पक्ष में खड़ा होने के अलावा और कोर्इ विकल्प नहीं है। आज आम आदमी को, सारी दुनिया के बारे में सोचने और जीने की सख्त जरूरत है। क्योंकि देशों से भरी दुनिया, विश्व मानचित्र में टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों के जाल में उलझी हुर्इ है। जिस पर अलग-अलग रंग-रोगन चढ़ा दिया गया है, ताकि उसकी पहचान अलग से हो सके। राज्य विहीन विश्व की अवधारणायें अभी दूर हैं। अभी तो हम वहां खड़े हैं, जहां ऐसे लोगों को मिटाने की कोशिशें हो रही हैं।

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