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विश्व जन समुदाय को धोखा दिया जा सकता है, मगर हमेशा नहीं

socha ki jameenआम जनता के पक्ष में खड़ा होना और उस पर यकीन करना, किसी भी देश की सरकार के लिये जरूरी है। मगर, सरकारें जब आम जनता के विरूद्ध खड़ी हो जाती है, उनका यकीन अपने आप घट जाता है, और इस तरह, किसी भी समाज व्यवस्था के होने का आधार टूट जाता है।

इस बात पर, आपको यकीन करना ही होगा, कि ”टूटी और दरकी हुर्इ बुनियाद पर खड़ी इमारतें मजबूत नहीं होती।”

आज बुनियादें दरक गयी है और ज्यादातर सरकारें इमारतों को बचाने की लड़ार्इयां आम जनता से लड़ रही है। जो जितना बड़ा है, आम जनता से उसकी लड़ार्इ उतनी ही बड़ी है। यूरोप की आम जनता अपने देश की सरकार और यूरोपीय संघ को ‘गेम ओवर’ का पोस्टर दिखा रही है। अमेरिका की आम जनता व्हार्इट हाउस, कांग्रेस और वाल स्ट्रीट को वास्तविक आतंकवादी का बैनर दिखा रही है। मगर, यूरोपीय संघ और अमेरिकी सरकार अपने देश की आम जनता से ही नहीं, दुनिया की आम जनता से भी लड़ार्इयां लड़ रही है। उनके पास हंथियारों की कमी नहीं है। उन्होंने सूचना एवं तकनीक को, जिनसे आम जनता आपस में जुड़ती है, को भी हंथियारों में बदल दिया है।

यह कारनामा सिर्फ अमेरिकी सरकार ने नहीं किया है, बल्कि उन देशों की सरकारों ने भी किया है, जो अपने देश की आम जनता पर विश्वास नहीं करती। उन्होंने ‘सुरक्षा’ के नाम से निगरानी का ताम-झाम फैला रखा है। वो अपनी इस विसंगति को देख नहीं पा रही हैं, कि जिस जनता को उन्होंने जनतंत्र की सरकार बनाने का संवैधानिक अधिकार दे रखा है, उस जनता के बीच वो सुरक्षा घेरे में होते हैं। सरकार और समाज के बीच की दूरियां बढ़ गयी हैं।

क्या यह किसी भी समाज व्यवस्था, या उस व्यवस्था की राजनीतिक संरचना, या किसी देश की सरकार के लिये शर्मनाक नहीं है, कि उसे अपने देश की आम जनता से डर लगने लगा है।

यदि सरकारें, अपने देश की आम जनता के खिलाफ होंगी और उनसे डरेंगी, अपने को बचाये रखने की गंदी लड़ार्इयां लड़ेंगी, और जनप्रतिरोध के खिलाफ दमन का सहारा लेंगी, तो कब तक टिकी रहेंगी? एक अमानवीय समाज व्यवस्था, जिसकी बुनियाद हिल गयी है, कब तक खड़ी रहेगी?

हम कह सकते हैं, कि ऐसी सरकारों की जिंदगी छोटी होगी। उनके जीने की मियाद लम्बी नहीं हो सकती, मगर सच यह नहीं है। ऐसी सरकारें दशकों से खड़ी हैं। ऐसी समाज व्यवस्था सदियों से बनी हुर्इ है, क्योंकि ज्यादातर सरकारें धोखेबाज हो गयी हैंं वो अपनी समाज व्यवस्था को बनाये रखने के लिये, मुखौटे की तरह सरकारें बदल देती हैं। बदलता कुछ भी नहीं, मगर बदलने का भरम पैदा करना उन्होंने सीख लिया है। दुनिया भर के जनसंघर्षों और जनप्रदर्शनों के साथ यही हो रहा है। आम जनता को बड़े पैमाने पर धोखा दिया जा रहा है।

मिस्त्र की आम जनता को अभी-अभी धोखा दिया गया है।

तुर्की के प्रधानमंत्री एरडोगन ने गीजि पार्क के प्रदर्शनकारियों पर विदेशी समर्थक होने का आरोप लगाया है।

ब्रजील के प्रदर्शनकारियों को सरकार सुधार के धोखे में डाल रही है।

कोलमिबया के किसान और चिली के विधार्थियों का दमन हो रहा है।

अरब जगत के जनक्रांति को जनतंत्र की बहाली के आंदोलन में बदल दिया गया है।

सीरिया की आम जनता के खिलाफ विद्रोहियों के नाम से आतंकवादियों को उतार दिया गया है, और अमेरिकी सरकार प्रायोजित युद्ध की तैयारियां कर रही हैं।

यूरोपीय संघ और यूरोपीय देशों की आम जनता सड़कों पर है, मगर अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां ”अर्थव्यवस्था के संभलने” का धोखा दे रही है।

अमेरिकी सरकार का नया सिकंजा ‘सर्विलांस प्रोग्राम’ है।

स्थितियां ऐसी हैं, कि व्यापक जनअसंतोष और जनप्रदर्शनों का हासिल कुछ भी नहीं है। दुनिया की चुनी हुर्इ सरकारें जन विरोधी नीतियों से संचालित हो रही है, और आम जनता सड़कों और चौराहों पर लाखों की तादाद में जमा है। जन संघर्षों की दिशा तय है, मगर तय हो रही है। लातिनी अमेरिकी देश क्यूबा के साथ चंद समाजवादी देशों को यदि छोड़ दिया जाये, तो सामाजिक विसंगतियां और आर्थिक असमानता तथा गैर अनुपातिक विकास के खिलाफ व्यापक जनअसंतोष है। नवउदारवादी वैश्वीकरण के इस दौर में, विश्वव्यापी मंदी और राजनीतिक अस्थिरता मौजूदा दौर की पहचान है। वैश्विक व्यवस्था संकटग्रस्त है। वह एक बड़े युद्ध की अनिवार्यता से संचालित हो रही है।

और, इस संकट से उबरने की कोशिशें नाकाफी हैं, क्योंकि अमेरिकी पद्धति की सरकारें आम जनता के पक्ष में खड़ा होने के बजाये, उन ताकतों के पक्ष में खड़ा हो गयी हैं, जिनके हाथों में वित्तीय शक्तियां हैं। वित्तीय पूंजी और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां हैं। सरकारें उन निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों के हितों से संचालित हो रही हैं, जिनके लिये प्रकृति अकूत सम्पदा और विश्व जनसमुदाय श्रमशक्ति का न खत्म होने वाला स्त्रोत है। उन्होंने बाजार को समाज पर फैला दिया है। राज्य उनके नियंत्रण में है।

संवैधानिक घोषणाओं के अनुसार, घोषित रूप से जनतंत्र की सरकारें आम जनता बनाती हैं। जो अभावग्रस्त हैं, भूख से पीडित और अशिक्षित हैं। जिसमें वर्गगत सामाजिक एवं राजनीतिक चेनता का अभाव है। जिसके पास अपनी कोर्इ राजनीतिक संस्कृति नहीं है, और राज्य की सरकारें, अपने हित में, उसे विकसित करना जरूरी नहीं समझतीं। जनतंत्र की राजनीतिक समझ का आम जनता में होना, सरकार की जिम्मेदारी है, मगर जनतंत्र की सरकारें ऐसा नहीं करतीं। यही कारण है, कि आम जनता को कोसना और उसे गालियां देना आसान है। सरकार के कामों के लिये उसे दोषी ठहराने की धुर्तता की जा सकती है। की जाती है। जबकि जनतंत्र की सरकारें आम जनता से पूछ कर, निर्णायक मसलों को, उसकी सहमति से नहीं करती। ऐसा करने को उन्हीं तर्कों से खारिज किया जाता है, जिन तर्कों से सरकारें बनती हैं। कि ‘जनता अभावग्रस्त है, अशिक्षित है, और उसके पास समस्याओं को समझने की राजनीतिक समझ-बूझ नहीं है।’ जिसकी जिम्मेदारी आम जनता से ज्यादा जनतंत्र की सरकार पर है।

इंटरनेट और संचार माध्यमों की वजह से दुनिया जितनी छोटी हुर्इ है, उतनी ही जटिल हो गयी है। हम अपने सम्बंधों की यात्रा चाहे जहां से शुरू करें उन्हें आर्थिक सम्बंधों के गलियारे से गुजर कर वित्त व्यवस्था से हर हाल में टकराना पड़ता है। मुद्रा की महत्ता इतनी बढ़ गयी है, कि समाजव्यवस्था अब अर्थसत्ता के इर्दगिर्द घूमती सी नजर आती है। फिदेल कास्त्रो कहते हैं, कि ”लोगों के लिये समस्याओं को समझना कठिन हो गया है। क्योंकि अधिकांश देशों में बहुसंख्यक आबादी को अर्थव्यवस्था से सम्बंधित सामान्य शिक्षा ही नहीं दी जाती है, और बिल्कुल यही स्थिति राजनीतिक शिक्षा के बारे में भी है।”

जनसामान्य के लिये राजनीतिक शिक्षा और राजनीतिक संस्कृति की अनिवार्यता समाजवादी देशों के अलावा पूंजीवादी देशों में महसूस ही नहीं की जाती। राज्य की सरकारें इसे या तो उच्च शिक्षा के पाठयक्रमों में छोड़ देती हैं या अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने के रूप में देखती हैं। यही कारण है, कि पाठयक्रमों की राजनीतिक शिक्षा व्यावहारिक रूप में किसी काम की नहीं होती, और ‘राजनीतिक संस्कृति’ एक अबूझ सा शब्द है, जिससे अंजान रहना ही बेहतर मान लिया गया है। आम जनता का भेड़-बकरी बने रहना ही अच्छा है। क्योंकि राजनीतिक रूप से जागरूक जनता वर्ग विभाजित समाज की बखिया उधेड़ सकती है। अज्ञानता और राजनीतिक अशिक्षा पूंजीवादी जनतंत्र की ऐसी खेती है, जिनसे सरकारें बनती हैं,- लापरवाह और भ्रष्ट सरकारें। जो शोषण और दोहन को स्वाभाविक बनती है। उन्हें वैधानिक आधार देती है। आम जनता के हाथ में सरकार बनाने की छूट है, इसलिये सरकारें यदि गलत है, तो आम जनता इसके लिये दोषी हो, का गलत सिद्धांत देती है।

”मैं विचारों पर विश्वास करता हूं। मैं चेतना, ज्ञान, संस्कृति और विशेषकर राजनीतिक संस्कृति पर विश्वास करता हूं।” फिदेल कास्त्रो ने कहा- ”हमने कर्इ वर्षों तक चेनता जगाने के लिये प्रतिबद्धता पूर्वक काम किये हैं।” उन्होंने शिक्षा, संस्कृति और विशेष कर राजनीतिक संस्कृति पर जोर देते हुए कहा कि ”हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं, जिसमें राजनीतिक संस्कृति की सबसे ज्यादा कमी है।”….”किसी और की अपेक्षा आपको (समाजवादी व्यवस्था की आम जनता को) यह बहुत बेहतर तरह से जानना चाहिये, क्योंकि आप उस राजनीतिक संस्कृति को विकसित करने के लिये प्रतिबद्ध हैं, उसके लिये संघर्षरत हैंं, जो नयी आर्थिक एवं नवउदारवादी वैश्वीकरण के कारणों से उपजी समस्याओं का भार उठाने में सक्षम हो।”

नवउदारवादी वैश्वीकरण ने जन समस्याओं का भी वैश्वीकरण कर दिया है। आज कोर्इ भी देश अपनी समस्याओं का समाधान अकेले नहीं कर सकता। वह अपना निर्माण भी अकेले नहीं कर सकता है। क्यूबा के समाजवादी क्रांति की यह बड़ी उपलबिध है, कि पूरे महाद्वीप में समाजवाद, बोलिवेरियन क्रांति में बदल गया है, और विकास के जरिये समाजवाद की नयी अवधारणायें जन्म ले चुकी हैं। समाजवादी क्रांति सामाजिक विकास की सतत प्रक्रिया में बदल गयी है। जिसमें आम जनता की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। इसी हिस्सेदारी ने समाज के वर्ग चरित्र को बदलने का काम किया और जहां समाजवादी सरकारें हैं, वहां यह हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है, और जहां गैर समाजवादी सरकारें हैं, वहां इसी हिस्सेदारी की मांग जनसमस्याओं के समाधान की मांगों के जरिये मुददा बनी हुर्इ है।

क्यूबा की समाजवादी क्रांति, आज माक्र्सवाद के संदर्भित होने का प्रमाण बनी हुर्इ है। फिदेल कास्त्रो और कम्युनिस्ट पार्टी ने जिस वर्गगत राजनीतिक चेतना के माध्यम से राजनीतिक संस्कृति का निर्माण किया यह उसी का परिणाम है , कि क्यूबा के समाजवादी समाज के निर्माण में आम जनता की गहरी साझेदारी है मगर, क्यूबा की सरकार के निर्माण में कम्युनिस्ट पार्टी की कोर्इ भूमिका नहीं है। आम जनता अपना प्रतिनिधि खुद चुनती है, जिसका कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य होना जरूरी नहीं। वह किसी भी वर्ग, धर्म एवं जाति को हो सकता है। क्यूबा में चुनाव राजनीतिक जश्न या उत्सव नहीं है, जैसा कि अमेरिका, यूरोपीय देश या पूंजीवादी जनतंत्र की सरकारों के लिये चुनाव में होता है। और तमाम ताम-झाम के बाद, सरकारें जनविरोधी होती हैं।

वेनेजुएला के सामने बोलिवेरियन क्रांति और समाजवादी समाज का लक्ष्य है। वह विकास के जरिये समाजवाद का ऐसा प्रतिनिधि देश है। जहां हयूगो शावेज के ‘स्ट्रीट गर्वमेण्ट’ की सोच को राष्ट्रपति निकोलस मदुरो के द्वारा कार्यरूप में बदला जा रहा है। वेनेजुएला की सरकार अब सड़कों पर है, जहां आर्थिक एवं सामाजिक विकास की योजनायें आम जनता बनाती है और सरकार के द्वारा कार्यरूप में बदला जा रहा है। वेनेजुएला की सरकार अब सड़कों पर है, जहां आर्थिक एवं सामाजिक विकास की योजनायें आम जनता बनाती हैं, और सरकार के द्वारा उन योजनाओं की स्वीकृति की ओपचारिकतायें पूरी की जाती हैं। मदुरो की सकरार पूरे वेनेजुएला का दौरा कर चुकी है और इसके दूसरे चरण की शुरूआत होनी है। वेनेजुएला अपनी राजनीतिक समस्याओं का समाधान जनभागिदारी से हल करने में लगी है। जहां दक्षिणपंथी विपक्ष अमेरिकी सहयोग से भितरघात कर रहा है। इस ‘स्ट्रीट गर्वमेण्ट’ प्रोग्राम में 2000 से ज्यादा जन-बैठकें हुर्इं और 2,450 प्रोजेक्ट को स्वीकृति के बाद, सरकार उसे पारित करने की ओपचारिकता पूरी करती है। वहां कम्यूनों की रचना हो रही है, और कारखानों को मजदूरों के नियंत्रण में दिया जा रहा है।

आर्थिक समझ, वर्गगत सामाजिक चेतना, राजनीतिक संस्कृति के विकास की जिम्मेदारी सरकार की है। आम जनता के पक्ष में खड़ा होना और अपने देश की आम जनता पर विश्वास करने का दायित्व, सरकार पर है। मगर दुनिया की ज्यादातर सरकारें अपने देश की आम जनता और विश्व जनसमुदाय के खिलाफ है, उन पर वित्तीय पूंजी, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों और निजी कम्पनियों एवं कारपोरेशनों का अधिकार हो गया है। जहां आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक संकट रोज गहराता जा रहा है। आम जनता की बद से बदतर होती स्थितियों ने उसे सड़कों पर ला दिया है। अब वह अपने देश की सरकार ही नहीं, दुनिया में हो रहे शोषण और दमन की व्यवस्था के खिलाफ खड़ी हो रही हैं उसके जनसंघर्षों की तय दिशा, तय हो रही है। उसे धोखा दिया जा सकता है मगर वह हमेशा धोखे में नहीं रहेगी, यह तय है। टूटी और दरकी हुर्इ बुनियादों पर खड़ी समाज व्यवस्था का ढहना तय है, मगर उसे धक्का देना और निर्माण से पहले मलबों को साफ करने की जिम्मेदारी भी आम जनता पर ही है।

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