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भारत में, जनतंत्र की उम्मीदें दरक गयी हैं

rashtriya vicharभारत में जनतंत्र के लिये हमारी फिक्र का बढ़ना वाजिब है, क्योंकि उसकी राजनीतिक संरचनायें तेजी से टूट रही है। जिसे हम देश का संविधान कहते हैं, वह अपनी जगह है। उसके द्वारा घोषित लोक कल्याणकारी राज्य के निर्माण का लक्ष्य और समजावादी समाज के निमार्ण का आदर्श अपनी जगह है, मगर लक्ष्य और आदर्श का स्वरूप बदल गया है। उसके संघीय स्वरूप को टुकड़ों में बांट कर, राजनीति के जरिये, वित्तीय पूंजी के लिये नये ठिकाने बनाये जा रहे हैं। हम छोटे राज्यों के जरिये विकास की बिखरी संभावनाओं पर यकीन नहीं करते, क्योंकि विकास के लिये राज्यों के आकार से ज्यादा उसकी दिशा का निर्धारण जरूरी है। मौजूदा दौर में आंध्र प्रदेश से अलग तैलंगाना की नियति नहीं होगी। उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड की उपलबिधयां ऐसी नहीं हैं, कि राज्यों के बंटवारें को सकारात्मक रूप में देखा जा सके।

हम राज्यों के बंटवारे का जिक्र करने नहीं बैठे हैं, हमारा मकसद देश की टूटती-बिखरती और असंदर्भित होती उसकी राजनीतिक संरचना है। यह जिक्र सिर्फ इसलिये हुआ, कि यह भी बिखरती और असंदर्भित होती संरचना सें, लोगों की नजरें हटाने का राजनीतिक षडयंत्र है। भारत में यह सोचना, कि क्षेत्रीय विकास और विकास के लिये संतुलित पहल, राज्यों का बंटवारा है, समस्याओं के राजनीतिकरण को एक सिरे से झुठलाना है। गोरखा लैण्ड, बोडो लैण्ड से लेकर बुंदेलखण्ड, विदर्भ तक, न जाने कितनी मांगें उभर आयी हैं। उससे देश का संघीय ढ़ांचा, क्षेत्रीय जनचेतना और गैर अनुपातिक विकास की स्थितियां ही सवालों के दायरे में खड़ी होती हैं। जिसका समाधान राज्यों का बंटवारा तो कतर्इ नहीं है।

यदि हम मान लें कि जनतंत्र का आधार आम जनता है, तो सवाल एक साथ खड़े होते हैं, कि

• देश की सरकार बनाने में आम जनता की हिस्सेदारी कितनी वास्तविक है? और

• देश की सरकार आम जनता के प्रति कितनी जिम्मेदार है?

यदि देश की सर्वोच्च न्यायालय संसद तक अपराधी पृष्टभमि वाले लोगों की राह रोकती है, और आदेश पारित करती है, तो यह मानी हुर्इ बात हुर्इ, कि देश के संसद में ऐसे लोग हैं।

यदि लखनऊ उच्च न्यायालय की पीठ, राजनीतिक दलों को धर्म, सम्प्रदाय और जातिगत रैलियों एवं आयोजनों पर रोक लगाती है, तो तय सुदा बात है, कि देश के राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिये, ऐसा कर रहे हैं।

सबसे शर्मनाक स्थिति यह है, कि देश की संसद और राजनीतिक दल न्यायालय के इन आदेशों को मानने के बजाये, समर्थन का नाटक करते हुए उसकी काट तलाशने में लग जाती है। एक-दूसरे को कोसना और आरोप लगाने से भी बाज नहीं आती।

अब, आम जतना जिन्हें अपना जनप्रतिनिधि चुनती है, उनके सामने पेशेवर राजनीतिक, पुस्तैनी पेशे से जुड़े राजनीतिबाज, पेशेवर अपराधी और धर्म, जाति तथा सम्प्रदाय से उबरे नेताओं का विकल्प होता है। परिणाम हमारे सामने है, कि ऐसे लोग जनप्रतिनिधि बन जाते हैं, जिसमें रूपये की भूमिका सबसे बड़ी है।

एक बात और कि देश के 60 प्रतिशत मतदाता पोलिंग बूथ तक नहीं पहुंचते। जो पहुंचते हैं, वो कैसे मतदाता होंगे? का अंदाज लगाया जा सकता है। मतों की गिनती में यदि 20 से 25-30 प्रतिशत मत भी किसी राजनीतिक दल के पास है, तो सरकार उसकी बन जायेगी। मगर पिछले 2-3 दशक से ऐसा भी नहीं हो पा रहा है। संयुक्त गठबंधन की सरकारें बन रही हैं। रूपये और रूतबे का जुड़ाव महत्वपूर्ण गठबंधन है। सभी राजनीतिक गठबंधन से ऊपर का गठबंधन है। भारतीय जनतंत्र के बुनियाद की यही सतह है, ओर सतह पर बनी र्इमारतें भी यही हैं।

आर्इये, अब रूपये और रूतबे की ओर चले। देश में चुनाव 2014 में होना है। कुछ राज्यों के विधान सभा चुनाव भी लार्इन में खड़े हैं। सत्तारूढ़ यूपीए गठबंधन की कांग्रेस साल भर पहले से ही चुनावी पैकेज तैयार कर रही हे, और विपक्षी एनडीए गठबंधन की भजपा ‘मिशन 2014’ के जरिये यही काम कर रही है। आपसी घमासान के बाद यह मान लिया गया है, कि नरेंद्र मोदी ही भाजपा की सूरत होंगे। नरेंद्र मोदी का यह रूतबा नया है। कांग्रेस में यह रूतबा गांधी परिवार के पास दशकों पुराना है। यदि प्रधानमंत्री बनाने का मौका मिला तो प्रधानमंत्री कोर्इ भी हो, सोनिया गाध्ांी से वो कमतर ही होंगे। इसलिये दौड़ इसके लिये नहीं है, दौड़ इसके लिये हो रही है, कि जिनके बिना देश में सरकारें नहीं बनती उनका विश्वास कैसे बढ़ाया जाये?

नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय औधोगिक घरानों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को आश्वस्त करने में लगे हैं, कि भाजपा सत्तारूढ़ हुर्इ तो आप का हित सुरक्षित है। निजीकरण का विस्तार होगा। सरकार आम जनता और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बीच बिचौलिया होगी। यही उनका मिशन 2014 है।

कांग्रेस, मनमोहन सरकार के जरिये खाध सुरक्षा अधिनियम और सामाजिक विकास योजनाओं की गठरी आम जनता के लिये खोल रही है। लगे हाथ लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये विदेशी पूंजी निवेश के लिये खुदरा क्षेत्रों के साथ निजीकरण के हर एक दरवाजे को खोल रही है। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी व्यवस्था में कांगे्रसी जन प्रचार अभियान चला रहे हैं। राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय निवेशकों के हितों में ताबड़-तोड़ फैसले हो रहे हैं, ताकि डुबकी लगाती वित्त व्ययवस्था और उदारीकरण के लिये घटते विश्वास को संभाला जा सके।

साल भर पहले शुरू हुर्इ यह कवायतें देश की आम जनता के लिये नहीं, उनके लिये हैं, जो वास्तव में सरकार बनाते और चलाते हैं।

अब, आप तय कर सकते हैं, कि देश की सरकार बनाने में आम जनता की कितनी हिस्सेदारी है? और हिस्सेदारी इतनी कमजोर है, तो निजीकरण और मुनाफे की डोर से बंधी सरकारें आम जनता के हितों के लिये कितनी र्इमानदार हो सकती है? उनके लिये देश, समाज और सामाजिक विकास का मतलब क्या हो सकता है?

आर्थिक विकास को सामाजिक विकास समझने वाली सरकार और राजनीतिक दलों के लिये जनसमस्याओं के समाधान, और जनहितों से अपने को जोड़ना कितना कठिन है। उनकी विकास योजनायें जन समस्याओं को और भी बढ़ा देती है। और जनहित में उठाये गये कदमों का मतलब आर्थिक लाभ का जरिया बनना है। दशकों की बात हम ना भी करें तो अपने दो कार्यकाल के आखिरी साल में मनमोहन सरकार को खाध सुरक्षा अधिनियम का खयाल आया। जिसके लिये न निश्चित कार्य योजना है, ना हित ग्राहियों की सूची है, और ना ही पर्याप्त वितरण प्रणाली है। सरकार की फिक्र देश के बहुसंख्यक वर्ग का हित नहीं, बल्कि आम चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करना है। विपक्ष की फिक्र यह है, कि चुनावी गोटियां सटिक न बैठ जाये?

सरकार और विपक्ष के बीच समाज का सबसे कमजोर वर्ग चुनावी मुददा है। एक रूपये किलो मोटा अनाज, दो रूपये किलो गेहूं और तीन रूपये किलो चावल के नाम से रचा गया गणित दो दुना चार होता है, ना दो दुना पांच, इससे सरकार को कोर्इ खास मतलब नहीं है। वह दिखाना सिर्फ यह चाह रही है, कि सरकार को समाज के सबसे कमजोर वर्ग की फिक्र है। उसकी फिक्र सुरक्षा की गारण्टी, शिक्षा का अधिकार और मनरेगा से ग्रामीण क्षेत्रों में कम से कम सौ दिनों के काम की गारण्टी के साथ न्यूनतम मजदूरी और काम न मिलने पर मुआवजा पाने के अधिकार की तरह ही प्रमाणित होगा, या खाध सुरक्षा को अर्थव्यवस्था पर बोझ मान कर बटटे खाते के हवाले कर दिया जायेगा? चुनाव के बाद ही तय होगा। हां, इतना तय है, कि आम जनता की फिक्र बाजारवादी अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों के विपरीत है। जिससे सरकार बंधी है। यही कारण है, कि सामाजिक विकास और जन कल्याणकारी ‘सरकारी योजनाओं’ का परिणाम वह नहीं निकलता जिसका प्रचार किया जाता है, बल्कि वह निकलता है, जो नजर नहीं आता। ऐसी योजनायें एक जनविरोधी सरकार के द्वारा दूसरी जनविरोधी सरकार बनाने के लिये की गयी ऐसी कोशिशें होती है, जिसका लाभ प्रचारतंत्र के जरिये गरीब तबका को मिलता है, मगर वास्तव में भ्रष्ट प्रशासन, बिचौलिये और सरकारें ही उठाती हैं।

आम जनता थोड़ी देर के लिये धोखे में आ जाती है, या यूं कहें कि सोचती है- ”अंधा मामा से काना मामा भला।” मगर सरकारें अपना विश्वास खो देती हैं। सरकारी आंकड़ों के तहत सबकुछ अच्छा हुआ है, मगर आम जतना के लिये वास्तव में वह हुआ है, जिसकी अपेक्षा उसने नहीं की थी। जनतंत्र की उसकी उम्मीदें दरक गयी हैं। संवैधानिक आदर्शों के विपरीत एक ऐसी वित्त व्यवस्था का विकास किया गया है, जहां आम आदमी की जरूरतें पूरी नहीं होतीं। भूख, गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक अनिश्चयता, गिरता हुआ जीवन स्तर और बढ़ती हुर्इ महंगार्इ से वह अपना पीछा नहीं छुडा पाता।

एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली विकसित हो गयी है, जहां जन आकांक्षायें अपनी जानमारू समस्याओं के साथ संसद और विधान सभाओं के बाहर खड़ी नजर आती है। जनप्रतिनिधि जनसमस्याओं और जनआकांक्षाओं का नेतृत्व नहीं करते। उन्होंने संवैधानिक तरीके से परिवर्तन की सभी राहों को बंद कर दिया है। आम जनता यदि आम चुनावों के जरिये, सरकार बदलना चाहे तो उसके पास सही विकल्प ही नहीं है। एक ऐसी राजनीतिक संरचना का निर्माण हो गया है, जहां व्यवस्था में बदलाव की अपेक्षायें नहीं पाली जा सकतीं।

जन लोकपाल विधेयक की मांग से होना-जाना कुछ भी नहीं है, मगर अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और जनलोकपाल विधेयक की मांग का जो हासिल है, वह जन आकांक्षाओं को पूरा नहीं करती। पूरी व्यवस्था इतनी चालबाज हो गयी है, कि उसने विरोध को भी प्रायोजित बना दिया है। विरोध के स्तर पर भी आम जनता की हिस्सेदारी मौजूदा व्यवस्था से खत्म हो गयी है।

अब आप ही तय करें, कि यदि अपने ही देश की सरकार बनाने में आम जनता की हिस्सेदारी ना के बराबर है, और सरकारें आम जनता के हितों से संचालित नहीं होती है, तो सरकारें किसके प्रति जिम्मेदार हैं?

अब आप ही तय करें कि यदि विरोध के स्तर पर भी आम जनता की हिस्सेदारी मौजूदा व्यवस्था में नहीं है, तो वह व्यवस्था कितनी सुरक्षित है?

अब आप ही तय करें, कि लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा खतरा कहां सुरक्षित है? आम जनता से यदि उसकी सरकार ही छिन जायेगी, तो वह क्या करेगी? कि जनतंत्र में आम जनता की वकत क्या है?

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