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आम जनता को, धोखा देने का मुददा

rashtriya mudda (2)जनतंत्र में आम जनता को धोखा देने का मुददा खड़ा होना ही चाहिये। जिसे देश की चुनी हुर्इ सरकार और राजनीतिक दल खुले आम देती है। आम जनता को, राजनीतिक रूप से धोखा देना, कोर्इ मुददा ही नहीं है। वो धोखा देती हैं, और जनता धोखा खा जाती है। किसी को कोर्इ आपतित नहीं होती। वो पांच साल तक ‘देश की सेवा’ करने के लिये ‘स्वतंत्र’ होते हैं, और हम पांच साल के लिये ‘उनको सेवा करते हुए’ देखने के लिये ‘स्वतंत्र’ होते हैं। देश की मनमोहन सरकार ने तो दस साल गुजार दिये। बुढ़ापा में उन्होंने देश की जितनी सेवा की है, उतनी सेवा कम ही लोग कर पाते हैं। स्वतंत्रता दिवस के दिन लालकिला से उन्होंने गिनती भी करा दी।

उन्होंने कहा- ”पिछला दशक हमारे देश के इतिहास में बहुत बड़े बदलाव का दशक रहा है।”

इसे हमें स्वीकार करना चाहिये। यह सच है। मगर इसके बाद उन्होंने जो कहा, उसे सच या झूठ नहीं, राजनीतिक धोखा और जबानदराजी की कसौटी पर कसने की जरूरत है। सिर के बल खड़ी व्यवस्था को सिर के बल नहीं, अपने पांव पर खड़े हो कर देखने की जरूरत है।

उन्होंने लगस्त में कहा- ”देश की आर्थिक समृद्धि जितनी इस दशक में बढ़ी है, उतनी पहले किसी दशक में नहीं बढ़ी। लोकतांत्रिक ताकतों को बढ़ावा मिला है, और समाज के बहुत से वर्ग विकास की प्रक्रिया से पहली बार जुड़े हैं। आम आदमी को नये अधिकार मिले हैं, जिसकी बदौलत उसकी आर्थिक और सामाजिक ताकत बढ़ी है।”

सबकुछ हैरत में डालने वाली बातें है भार्इ! यह इस बात का प्रमाण है, कि सरकार जो कर सकती थी, वह इस दशक में नहीं किया गया है। यदि हम सप्ताह भर पहले और वक्तव्य के सप्ताह भर बाद की अखबारी सुर्खियों को सिलसिलेवार पढ़ लें तो सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक दावों की बखिया उधड़ जायेगगी। मगर हम ऐसा नहीं कर रहे हैं, यह हम आप पर छोड़ते हैं कि इतनी जहमत आप चाहें, तो उठा सकते हैं। हम 14 अगस्त को 15 अगस्त के सामने खड़ा कर देते हैं, राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री के सामने खड़ा कर देते हैं। राष्ट्र के नाम एक संदेश को, दूसरे संदेश के सामने खड़ा कर रहे हैं।

67वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कहा- ”हमें ऐसी संसद चाहिये जिसमें वाद-विवाद हो, परिचर्चायें हों और निर्णय लिये जायें। ऐसी न्यायपालिका चाहिये, जो बिना देरी किये न्याय दे। ऐसा नेतृत्व चाहिये जो देश के प्रति तथा उन मूल्यों के प्रति समर्पित हो जिन्होंने हमें एक महान सभ्यता बनाया है। हमें ऐसा राज्य चाहिये जो लोगों में यह विश्वास जगा सके, कि वह मौजूदा चुनौतियों पर विजय पाने में सक्षम है। हमें ऐसे मीडिया तथा नागरिकों की जरूरत है, जो अपने अधिकारों पर दावों की तरह ही अपने दायित्वों के प्रति भी समर्पित हो।” उन्होंने कहा- ”अकर्मण्यता और उदासीनता के चलते देश के बेशकीमती संसाधन बर्बाद हो रहे हैं।” उन्होंने खत्म हो रही समाज की ऊर्जा को रोकने पर जोर देते हुए स्वीकार किया, कि आज पूरे देश में शासन व्यवस्था और संस्थाओं के काम काज के प्रति चौतरफा निराशा और मोहभंग का वातावरण है। हमारी विधायिकायें कानून बनाने वाली इकार्इ से ज्यादा लड़ार्इ का अखाड़ा बन गयी है। उन्होंने भ्रष्टाचार को बड़ी चुनौती माना। राष्ट्रपति ने कहा- ”लोकतंत्र का मतलब पांच साल मत देने और चुनाव से कहीं ज्यादा है। लोकतंत्र का असितत्व जवाबदेही से ही बना रह सकता है, न कि मनमानी से। इसके बावजूूद हम बेलगाम व्यकितगत सम्पन्नता, असहिष्णुता, व्यवहार में उदण्ड़ता तथा प्राधिकारियों के प्रति असम्मान से अपनी कार्यसंस्कृति को नष्ट होने दे रहे हैं। उन्होंने आंतरिक सुरक्षा के लिये माओवाद से खतरा और सीमा पर पाक से तनाव का जिक्र भी किया। शिक्षा प्रणाली से वो चिंतित हैं।

चारो ओर मोहभंग और राजनीतिक निराशा का माहौल है प्रधानमंत्री जी।

अर्थव्यवस्था रूपये की तरह ध्वस्त है।

विकासदर गोताखोरी कर रहा है।

कृषि उत्पादन की हालत अच्छी है, मगर किसान और उपभोक्ता दोनों ही आत्महत्या करने के कगार पर हैं।

संसद और विधानसभायें, राजनीति का नासमझ तमाशा है।

चुनाव में मतदाता तो हैं, मगर उनके सामने लायक राजनेता नहीं है।

एक दशक से नेतृत्व आपके हाथ में है, जिसे आप बदलाव का दशक कहते हैं, और यह बदलाव आम जनता के विरूद्ध निजीकरण की है। नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवाद की है। भ्रष्टाचार और घपले-घोटालों के भरमार की है।

अब आप ही बतार्इये हम कहां हैं?

जिस खाध सुरक्षा अधिनियम के भरोसे आप तीसरे कार्यकाल के सपने बुन रहे हैं। अपने दूसरे कार्यकाल के शुरूआती 100 दिनों में ही, इसे कानूनी दर्जा दिलाने का आपने वादा किया था। आपके वायदों पर मरती हुर्इ जनता मर मिटी थी, अब वास्तव में मर रही है। देश की जनता भूख, गरीबी, कुपोषण और बेरोजगारी से मर रही है। खाध एवं कृषि संगठन -एफ ए ओ- का अनुमान है कि भारत की 22 प्रतिशत आबादी कुपोषण का शिकार है। यूनिसेफ की रिपोर्ट है, कि ‘विकासशील देशों में कुपोषण की वजह से, सामान्य से कम वजन वाले बच्चों में से 42 प्रतिशत बच्चे भारत में हैं।

एक बदलाव वाले दशक के गुजरने के बाद भी, ऐसा क्यों है, प्रधानमंत्री जी जिसे आपने ही ‘राष्ट्रीय शर्म’ कहा था।

इस राष्ट्रीय शर्म से उबरने के लिये आपने क्या किया? आयोग या समितियां बनार्इ या बच्चों के स्वास्थ्य, चिकित्सा, भोजन और विकास की योजनायें बनार्इ?

हमें तो पता नहीं, शायद आपने कुछ किया हो। मगर, बच्चे जिस परिवार और अभिभावकों पर टिके रहते हैं, आपने उनकी तो कमर ही तोड़ दी। आपके उदारीकरण के लिये खुदरा क्षेत्रों के लिये सार्वजनिक क्षेत्रों को समेटने के ताबड़तोड़ निर्णयों ने आम जनता को बेशुमार महंगार्इयां दी। आप कृषि के विस्तार को बड़ी उपलबिधयों में शुमार करते हैं। आपका दावा है, कि फसलों की खरीद मूल्यों में सरकार ने भारी वृद्धि की। गेहूं और धान के खरीद मूल्य दो गुणा हो गये। मगर आपके कृषि मंत्री ने लागत और खरीद मूल्य के सवालों का जवाब जब राज्य सभा में दिया तो, पता चला कि 2010-11 तथा 2011-12 के बीच धान की प्रति किवंटल उत्पादन लागत 146 रूपये बढ़ी थी, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य मात्र 80 रूपये बढ़ाये गये हैं। गेहूं के मामले में यह स्थिति और भी खराब है। 2011-12 और 2012-13 के बीच पैदावार लागत में 171 रूपये प्रति किंवटल की वृद्धि हुर्इ, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य में मात्र 65 रूपये की वृद्धि हुर्इ।

मामला तो गंभीर है सरकार, कि लालकिला के प्राचीर से दिया गया वक्तव्य कोरी बकवास है। आपको अपने पक्ष में जो आंकड़ा पेश करना चाहिये था, वह आंकड़ा आपने पेश ही नहीं किया, कि राष्ट्रीयकरण की ओट में निजीकरण से कितना लाभ राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने बटोरा? डीजल-पेट्रोलों के मूल्यों की वृद्धि की वजह किस तरह घाटा दिखा कर मुनाफा कमाने की तरकीब है, और कम्पनियों ने कितना मुनाफा कमाया? आम जनता की जेब बाजार में कैसे काटी जा रही है? आपको बताना चाहिये था, कि घपलों और घोटालों से राजनेता और निजी कम्पनियों ने क्या-क्या बनाया और आम जनता ने क्या खोया?

आप कहते हैं कि आर्थिक विकास से देश का समग्र विकास होगा। बताना तो चाहिये कि ऐसा कैसे होगा?

हमने तो यही जाना है, कि दूध में नींबू निचोड़ने से दूध फटता है। आज समाज फट गया है। सामाजिक असुरक्षा, आर्थिक अनिश्चयता बढ़ी है। आप कहते हैं ”हमारी सामाजिक और आर्थिक ताकत बढ़ी है।”

ऐसा क्यों और कैसे हो रहा है प्रधानमंत्री जी, कि आप के लिये जो अन्न है, हमारे लिये विष प्रमाणित हुआ है? आपके उदारीकरण का विष दंत देश के सभी राजनीतिक दलों के जबड़े में उभर आया है। ऐसी स्थितियां बन गयी हैं, कि लोकतंत्र ‘सियाह’ पड़ गया है। वह वित्तीय पूंजी के नागपाश में है। देश की विधायिकी इकार्इ की जड़ता और गिरावट से देश की न्यायपालिका तक चिंतित है। वह अपने निर्णयों और निर्देशों से भले ही इस जड़ता और गिरावट को तोड़ नहीं पा रही है, मगर उसकी कोशिश व्यवस्था में सुधार की है। सर्वोच्च न्यायालय राजनीतिक दलों के द्वारा राजनीति का अपराधीकरण और साम्प्रदायिकता को बढ़ाने वाली हरकतों पर ही नहीं, आम जनता से गलत वायदों को करने से भी रोकना चाहती है, उसने चुनाव आयोग को जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिये हैं। मगर सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस बात से सहमत हैं, कि चुनावी घोषणापत्र उनका स्वतंत्र अधिकार है।

rashtriya muddaयह ठीक है, कि राजनीतिक दलों की सोच, योजना और कार्यक्रमों को अपनी घोषणापत्र में जारी करने का अधिकार है, और उन्हें इस बात की स्वतंत्रता मिलनी चाहिये। जिसके जरिये वो आम जनता को अपने पक्ष में मतदान करने के लिये प्रेरित करती है। मगर, एक बात तो यह भी होनी चाहिये, कि सत्ता में स्वतंत्ररूप से या संयुक्त रूप से आने के बाद वो अपने घोषणा पत्र को -जो आम जनता से किया गया वायदा है- वो पूरा करती है या नहीं? उसके प्रति वो उत्तरदायी है या नहीं? उनकी प्रतिबद्धता जबानी जमा खर्च है या वास्तव में वो गंभीर हैं? जवाबदेही तो उनकी होनी ही चाहिये।

यदि अब तक सत्ता पर काबिज हुए राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र को देखा जाये तो ये राजनीतिक दल, सरकार बनाने के बाद आम जनता को धोखा देती रही है। उन्होंने आम जनता से किये वायदों को पूरा नहीं किया। संयुक्त और गठबंधन की सरकारों ने तो जनादेशों की खुलेआम अवहेलना की है। चुनाव परिणाम के बाद सरकार बनाने की कायदतों में जो खरीद-फरोख्त हुए हैं, जो होते हैं, उसकी जानकारी सार्वजनिक है। दलबदल विधेयक भी अर्थहीन प्रमाणित हुआ है।

गठबंधन की सरकारें आम जनता की असहमति और नाराजगी का परिणाम है, जो एक सीमा तक असंवैधानिक है। सिर्फ सरकार बनाने के लिये गठबंधन जनादेश की अवहेलना है। एनडीए की सरकार रही हो, या यूपीए की सरकार कमजोर सरकार का ठिकरा उन्होंने खणिडत जनादेश पर ही फोड़ा है। जबकि आम जनता की असहमति का आधार सरकार के द्वारा उनसे किये गये वायदों को न पूरा करना है।

भारत में गठबंधन की सरकार आम जनता की राजनीतिक अनास्था में बदल गयी है। और इस अनास्था का अंत कहीं नजर नहीं आ रहा है। सरकार बनाने के लिये गठबंधन की अनिवार्यता रोज बढ़ती जा रही है। सवाल यह है, कि ऐसी सरकारें आम जनता के प्रति जिम्मेदार कैसे हों? यदि न्यूनतम कार्यक्रमों की सहमति को गठबधंन का आधार बनाया जाये तो, आम जनता की सहमति की अनिवार्यतायें भी होनी चाहिये। मगर, सरकारें अपने चुने होने का भरम फैला कर, जनतंत्र और आम लोगों को धोखा दे रही है। ऐसी चुनी हुर्इ सरकारों के खिलाफ धोखा देने का मुददा खड़ा होना ही चाहिये।

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