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भ्रष्टाचार लाभ पर आधारित व्यवस्था है

rashtriya mudda (3)भारत में भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय मुददा बनाया जा चुका है। इस बात से किसी को कोर्इ आपतित नहीं है।

भ्रष्टाचार स्वाभाविक है, लोग सोचते हैं।

देश की सरकार भ्रष्ट है, लोग मानते हैं।

वर्तमान सरकार के बाद, आनेवाली सरकार भ्रष्ट नहीं होगी, इस बात पर विश्वास किसी को नहीं है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों में असहमति है, नाराजगी है।

सरकार भी यह मानती है, कि इससे उसकी छवि खराब हुर्इ है। विपक्ष के लिये, यह राजनीतिक मुददा है। जिसे वह एक सीमा तक ही हवा दे पाती है, क्योंकि उनके दामन भी दागदार हैं।

देश की जनता यह गिन नहीं पायेगी, कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के खाते में किनते घपले और घोटाले दर्ज है? वह नहीं जानती, कि भ्रष्टाचार की जड़ें कहां हैं? जबकि सारा मामला बिल्कुल खुलेआम है। आरोप सरकार पर है, उनके करीबियों पर है, और राजनेताओं पर है। सरकार की नीतियों पर कोर्इ आरोप नहीं है। उस व्यवस्था पर कोर्इ आरोप नहीं है, जहां भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी फूलते-फलते है। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण को ‘क्लीन चिट’ मिली हुर्इ है। भारत में जिसके सबसे बड़े खैरख्वाह डा0 मनमोहन सिंह और उनकी टीम है। संसद और मंत्रीमण्डल है। जिसकी बोलिया टीम इणिडया के खिलाडियों की तरह आर्इपीएस में लगार्इ जाती है। हां, यह खुलेआम नहीं होता है। आर्इपीएल की तरह कोर्इ प्लेटफार्म भी नहीं है।

भ्रष्टाचार के मामले में देश की आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना को कभी कटघरे में खड़ा नहीं किया जाता, जहां सरकार है, विपक्ष है, राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं।

राबर्ट वाड्रा का मामला फिर उभर आया है। मनमोहन सरकार और कांग्रेस की परेशानी बढ़ गयी है। संसद में हंगामा हुआ है। आर्इएएस -अशोक खेमका के सवालों पर चर्चा हो रही है। अखबारों में सुर्खियां बनीं। टीवी चैनलों पर भी चर्चायें हुर्इं। भ्रष्टाचार का मुददा दमदार है, मगर व्यवस्था का सवाल मुददे से बाहर है। जोकि सबसे अहम है। समाज व्यवस्था से काट कर न तो, भ्रष्टाचार के स्वरूप का निर्धारण किया जा सकता है, ना ही उसके खिलाफ लड़ार्इयां लड़ी जा सकती हैं।

भ्रष्टाचार के कर्इ क्षिद्राणवेशी उसे अलग-अलग टुकड़ों में, अलग-अलग प्रकारों में बांट कर देखते हैं। उनके लिये भ्रष्टाचार के कर्इ प्रकार हैं- राजनीतिक भ्रष्टाचार, आर्थिक भ्रष्टाचार, सामाजिक भ्रष्टाचार, नैतिक भ्रष्टाचार। यदि वो मानवीय और अमानवीय भ्रष्टाचार या वास्तविक और अवास्तविक भ्रष्टाचार के रूप में भी इसका विभाजन करें तो हमारे लिये यह बड़ी बात नहीं होगी। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में आंदोलन खड़ा करने वाले अन्ना हजारे और उनसे अलग हुए उनके चेले अरविंद केजरीवाल ने इस मुददे को बड़ा गरमाया। अन्ना हजारे दूसरे गांधी बन गये और अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी, किंतु भ्रष्टाचार के विरूद्ध उनकी समझ, समझ से बाहर है। वो भ्रष्टाचारियों के रहते, भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त करना चाहते हैं। जो संसद भ्रष्टाचार का गढ़ बनी हुर्इ है, जिनके सांसदों और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों की झड़ी लगी हुर्इ है, उन्हीं से भ्रष्टाचार विरोधी जन लोकपाल विधेयक पारित कराना चाहते हैं।

एक जन लोकपाल विधेयक से क्या होगा? यह कोर्इ नहीं जानता। और ऐसे, जन लोकपाल कहां से आयेंगे, जो दूध के धुले हों, यह भी कोर्इ नहीं जानता। वो खुद से भी यह सवाल नहीं करते, कि यदि व्यवस्था भ्रष्ट है, व्यवस्था को बदले बिना भ्रष्टाचारियों के साथ भ्रष्टाचार कैसे समाप्त होगा? मगर, व्यवस्था को बदलने का खयाल किसी के जेहन में नहीं है, और आम जनता के जेहन में यह बात न आ जाये, इसीसे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की शुरूआत होती है। आम जनता के गुस्से के गुब्बारे से हवा निकल जाती है, और आंदोलन बैठ जाता है। हां, मुददा खड़ा रहता है, और सुर्खियां बदलती रहती हैं।

भारत में पक्ष, विपक्ष और प्रायोजित आंदोलनकारी सभी समझदार हैं। वो लकड़ी की तलवार से इसलिये लड़ते हैं, कि जन संघर्षों की शुरूआत न हो जाये। कि जनता अपनी तादाद के साथ उनसे न लड़ने लगे। भारत में थोड़ा बहुत घट कर वहीं हो रहा है, जो दुनिया भर के ज्यादातर देशों में हो रहा है, जहां की सरकारें जन विरोधी हैं, और जो जन समस्याओं का समाधान करने के स्थान पर एक ऐसी व्यवस्था को बचाने की लड़ार्इयां अपने ही देश की आम जनता से लड़ रही है, जिसकी वैश्विक संरचना टूट और बिखर रही है। मिस्त्र की आम जनता को अभी-अभी धोखा दिया गया है। सीरिया की आम जनता के खिलाफ हमले हो रहे हैं। तुर्की और ब्रजील के जन प्रदर्शनकारियों पर विदेशी समर्थन प्रदर्शनकारियों का लेबल चिपकाया जा रहा है। अरब जगत के जनप्रदर्शनों को अमेरिकी साम्राज्य और पश्चिमी देश वहां की सरकारों के साथ मिल कर गलत दिशा दे रही है। यूरोप और अमेरिका की आम जनता वित्तीय सिकंजे में है। भारत के राजनीतिक दल और प्रायोजित समाजसेवी मुक्त बाजारवादी ताकतों से जुड़े हुए हैं। जिन्होंने भ्रष्टाचार को स्वाभाविक बना दिया है।

इस बीच अपने देश और दुनिया की आम जनता को धोखा देने की कोशिशें सरकारें लगातार करती रही हैं।

भारत में राजनीतिक साझेदारी से आर्थिक भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं? का सवाल हमारे सामने नहीं है। सवाल यह है कि मनमोहन सिंह के उदारीकरण और नवउदारवादी वैश्वीकरण की सोच से संचालित बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रवेश के साथ ही, ऐसा क्या हुआ कि सरकार, मंत्रीगण, सांसद, विधायक, राजनेता ही नहीं राजनीतिक दल और समाजसेवी संगठन तक भ्रष्ट होते चले गये? जहां है, वहां टिके रहने के लिये उनका भ्रष्टाचारी होना जरूरी हो गया?

घपले और घोटालों की मूल वजह-

• अर्थव्यवस्था का निजीकरण है।

• राज्य की सरकार और बाजार की साझेदारी है।

• राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये ज्यादा से ज्यादा जगह बनाने की सरकार की नीति है।

टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से लेकर कोल ब्लाक आबंटन तक आप जहां भी नजरें टिकायेंगे हर एक घपले और घोटालों के पीछे इन्हीं निजी कम्पनियों का लाभ आपको नजर आयेगा। आज स्थिति यह हो गयी है, कि सरकार को बनाने और सरकार को बिगाड़ने के पीछे, इन्हीं ताकतों का हाथ है। इन ताकतों ने जनतंत्र की सरकार बनाने के लिये होने वाले आम चुनाव को भी आम जनता के विरूद्ध साजिशों और षडयंत्र में बदल दिया है।

एक ऐसी व्यवस्था विकसित हो गयी है, जहां विचार एवं सामाजिक मूल्यों का कोर्इ अर्थ नहीं है। यही कारण है, कि गिरावट और संकट उसकी पहचान बन गयी है। सरकार निजी वित्तीय पूंजी की गिरफ्त में है।

यदि आज हम, आर्थिक विकास को ही, सामाजिक विकास समझने वाली सरकारों से यह सवाल करें, कि आपकी मौजूदा अर्थव्यवस्था की हालत क्या है? तो जानकारी मिलेगी -औधोगिक विकस दर रूक गया है, घरेलू उत्पादन में भारी गिरावट आयी, कृषि संकटग्रस्त, बाजार की हालत खराब हो गयी है और जिस विदेशी पूंजी निवेश के लिये निजीकरण रास्ते खोले जा रहे हैं, उस दरवाजे पर निवेशकों के लिये आकर्षक प्रस्ताव तो टंगे हैं, मगर वहां कोर्इ नहीं है। अर्थव्यवस्था की हालत खराब है। रूपये लुढ़क रहा है। अर्थशात्रियों के माथे पर चिंता की रेखायें हैं।

यदि आज हम देश की सामाजिक स्थितियों के बारे में सवाल करें, कि महानुभव, वहां क्या हो रहा है? तो जानकारी मिलेगी कि आर्थिक एवं सामाजिक असमानतायें विस्फोटक हो रही हैं, जनअसंतोष बढ़ा है, घाटा दिखा कर मुनाफा कमाने के लिये निजी कम्पनियों को दी गयी छूट की वजह से न सिर्फ खनिज तेलों की कीमतें बढ़ी हैं, महंगार्इ बेलगाम घोड़ा बन गयी है। देश की सामाजिक संरचना टूट रही है। हम बाजार में खड़े हैं, और आम जनता की जेब खाली है। सरकार की सामाजिक विकास योजनाओं का लाभ आम जनता को नहीं मिल रहा है। अब सरकार लोक कल्याणकारी कायोर्ं से हाथ खींचती जा रही है।

यदि आज हम देश की राजनीतिक संरचना के बारे में सवाल करें, तो पता चलेगा कि उदारीकरण हर एक राजनीतिक दल का अनिवार्य मुददा है। जनतंत्र संकटग्रस्त है। सरकार भ्रष्ट है, विपक्ष भ्रष्ट है, मंत्रालय से लेकर प्रशासनिक विभागों की हालत खराब है। विचारहीन राजनीति ने अनास्था और अविश्वास को लोगों में भर दिया है। मौजूदा समाज व्यवस्था संकटग्रस्त हैं, उसके हर एक अंग से सड़ांध की बू आ रही है।

पिछले एक दशक ने जनतंत्र की राजनीतिक संरचना की बुनावट को बदल दिया है। जनतंत्र का ढांचा खड़ा है, मगर उस पर वित्तीय एकाधिकारवादी ताकतों की पकड़ मजबूत हो गयी है। उन्होंने एक ऐसे तंत्र को विकसित कर लिया है, जहां आम जनता के सामने कोर्इ विकल्प नहीं है। यदि राजनीतिक एवं आर्थिक भ्रष्टाचार की बात करें, तो वह सुविधा शुल्क है। यूरोपीय देश और अमेरिका में जिसे वैधानिक स्वीकृति मिली हुर्इ है। जो जहां है, वहीं कमार्इ कर लेता है। पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश कर्इ तेल कम्पनियों के महत्वपूर्ण शेयर होल्डर हैं। राजनीति अब एक पेशा है।

भारत में भी राज्य की सरकार और बाजार की साझेदारी ने आर्थिक एवं राजनीतिक भ्रष्टाचार को पेशा बना दिया है। जो जहां है, वहीं चार पैसा कमा लेना चाहता है। यह तो मौके की बात है, कि आम जनता रूपया-पैसा जोड़ती है, विभागीय अधिकारी लाखों-लाख जोड़ रहे हैं, और मंत्री-राजनेता करोड़ों-करोड़ बना रहे हैं, और उन सब के ऊपर बैठी निजी कम्पनियां जो लाखाें-करोड़ों का जरिया देती है, वो अरबों-खरबों से खेल रहे हैं। भ्रष्टाचार कुछ और नहीं लाभ पर आधारित व्यवस्था है।

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