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यूरोपीय देशों के पास, जनसमस्याओं का समाधान नहीं है

europeयूरोपीय देशों का वित्तीय संकट यूरोपीय संघ की व्यवस्था के संकट में बदल गया है। यूरोप की आम जनता न तो अपने देश की सरकारों के पक्ष में है, ना ही यूरोपीय संघ की व्यवस्था से उसकी सहमति रह गयी है। वह उन अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के भी खिलाफ है, जिनकी जनविरोधी निर्देशों का पालन उनके देशों की सरकारें कर रही हैं।

यह एक अजीब सी स्थिति है, कि यूरोपीय संघ के देशों की सरकारों के पास अपने देश के आम लोगों की समस्याओं को कोर्इ समाधान नहीं है और अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक से लिये गये कर्जों से स्थितियां और भी बिगड़ती जा रही हैं। आज यूरोप का कोर्इ भी देश ऐसा नहीं है, जहां सरकार, यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के खिलाफ लोग सड़कों पर न हों।

यूरोपीय संघ तीसरी दुनिया के देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सैन्य हस्तक्षेप और लूट की योजनायें तो अच्छी बना लेता है, मगर अपने ही सदस्य देशों की वित्तीय समस्याओं और जनसमस्याओं का समाधान करने की उसकी योजनायें कारगर नहीं रही हैं। सदियों की आयातित समृद्धि और तीसरी दुनिया के देशों के लिये तय की गयी उसकी नीतियां, शोषण, और दमन से इतनी प्रभावित रही हैं, कि अब वह अपने ही संकटग्रस्त सदस्य देशों के साथ भी वहीं करने लगा है, जो सदियों से वह करता आया है। यही कारण है, कि न तो यूरोप की अर्थव्यवस्था में सुधार की संभावनायें बन पा रही हैं, ना ही जनसमस्याओं का समाधान संभव है। प्रक्रियावादी ताकतें पिटी-पिटार्इ लकीरों को पीटने की इतनी आदि हो गयी हैं, कि नये विकल्पों की खोज, अब उनकी पकड़ से बाहर है। आंतरिक विरोध और वैश्विक स्तर पर नये ध्रुविकरण का निर्माण हो गया है। रूस और चीन की वित्तीय चुनौतियां उन्हें झेलनी पड़ रही हैं। लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों में बढ़ता ‘विकास के जरिये समाजवाद’ उनके सामने वैचारिक चुनौतियां है, और मध्यपूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीका में उनके खिलाफ जनप्रतिरोध खड़ा हो गया है। जिस अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ यूरोपीय संघ खड़ा है, उसके सामने भी अस्तित्व का संकट है। वह भी वित्तीय पूंजी की गिरफ्त में है।

यूरोपीय संघ और उसके सदस्य देशों की नीतियां, वास्तव में असफल हो चुकी हैं।

जर्मनी की चांसलर ऐंजीला मार्केल और उनके मंत्रियों की मुश्किलों को जर्मन विकली -स्पीगल के 21 जुलार्इ को प्रकाशित अंक ने, बढ़ा दी है। अमेरिका के ‘नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी’ द्वारा संचालित ‘सर्विलांस प्रोग्राम’ में जर्मनी की गहरी सम्बद्धता की जानकारी ने, नयी मुश्किलें पैदा कर दी है। एडवर्ड स्नोडेन की जानकारियां जर्मनी की चांसलर के लिये समस्या बन गयी है।

अमेरिका के खुफियागिरी के जानकारी की पहली प्रतिक्रिया में मार्केल ने अपनी नाराजगी के साथ कहा था, कि अमेरिका के इस कार्यक्रम की जानकारी उन्हें प्रेस रिपोर्ट से ही मिली है। मगर 21 जुलार्इ के अंक में प्रकाशित अमेरिकी इण्टेलिजेन्स सर्विस के गुप्त दस्तावेजों से यह प्रमाणित होता है, कि जर्मनी के विदेशी गुप्त विभाग -बीएनडी- और घरेलू गुप्तचर एजेन्सी -फेडरल आफिस फार द प्रोटेक्शन आफ द कंस्टीटयूशन, दोनों ही अमेरिकी सरकार के नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी का उपयोग करते रहे हैं। जिसे ‘एक्स की स्कोर’ का नाम दिया गया है।

प्रकाशित दस्तावेज के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी द्वारा 500 मिलियन फोन काल और डाटा एक्टिविटीस की मानेटरिंग की जाती है। और उसका सबसे बड़ा हिस्सा ‘एक्स की स्कोर प्रोग्राम’ इकटठा करता है।

एक्स की स्कोर प्रोग्राम किसी भी चिनिहत व्यकित द्वारा टार्इप किये गये, किसी भी टर्मस का सक्रियता से पता लगा लेता है, जो उस व्यकित के द्वारा सर्च इंजन पर टार्इप किया गया है। यह कलेक्टेड मेटाडाटा के जरिये किया जाता है। यह सिस्टम पिछले कर्इ दिनों की गतिविधियों सहित संचार के जरिये की गयी बातों की जानकारी भी हासिल कर लेता है। इसके अलावा गुप्त दस्तावेजों से यह भी पता चला है, कि जर्मनी की गुप्तचर एजेन्सी बीएनडी प्रमुख गेरहार्ड शिन्डलर जर्मनी के गुप्तचर एजेन्सी के सम्बंधों को अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी से और बढ़ाने के लिये तत्पर है।

अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी ने जनवरी में कहा था, कि बीएनडी, जर्मन सरकार को इस बात के लिये राजी करने का काम कर रही थी, कि वह जर्मन में जारी प्राइवेसी ला में और ढ़ील दे। ताकि अमेरिकी एजेन्सी के साथ मिल कर गुप्तचरी को प्रभावशाली ढंग से किया जा सके।

जारी दस्तावेज में कहा गया है कि ”अफगानिस्तान में बीएनडी अमेरिकी एजेन्सी का बहुत ही सफल सहयोगी प्रमाणित हुआ है।” दस्तावेज में यह भी जानकारी मिली है, कि ”अप्रैल 2013 के अंत में बीएनडी के 12 सदस्यीय उच्च प्रतिनिधि मण्डल को अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी ने आमंत्रित किया था।”

स्नोडेन द्वारा सार्वजनिक किये गये दस्तावेजों के अनुसार- अमेरिका हर महीने आधा बिलियन से ज्यादा जर्मन टेलीफोन काल्स और इण्टरनेट यूजरों की जासूसी करता है।

इस जानकारी ने जर्मनी की आम जनता को ही नाराज नहीं किया है, बल्कि, जर्मन चांसलर और राष्ट्रपति को भी एक-दूसरे के सामने खड़ा कर दिया हैं जर्मनी के राष्ट्रपति जोआखिम गौअक ने 26 जुलार्इ को पस्साउव नोय प्रेस अखबार को दिये अपने इण्टरव्यू में कहा कि ”जिस किसी ने सच्चार्इ के आधार पर लोगों को यह जानकारी दी है, वह सम्मान पाने का अधिकारी है।” उन्होंने मार्केल सरकार से कहा कि ”वो अपने सहयोगियों के साथ समझौता करके लोगों के निजता की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करें।” उन्होंने आगे कहा कि ”हमें यह सुनिश्चित करना चाहिये कि हमारे सहयोगी सुरक्षा एजेन्सियां भी पहले से तय ”निर्धारित सीमाओं का सम्मान करें, जो कि जरूरी है।”

जर्मनी में हजारों लोगों ने अमेरिकी गुप्तचर एजेन्सियों द्वारा जारी गतिविधियों के खिलाफ, बर्लिन के अलावा कर्इ शहरों में प्रदर्शन किये। जर्मनी में गर्मी के बाद भी ‘स्टाप वाचिंग यूएस नेटवर्क’ ने, 27 जुलार्इ को जर्मनी के 35 प्रमुख शहरों में प्रदर्शन किये। उनहोंने एडवर्ड स्नोडेन का समर्थन किया।

जर्मनी की ‘फारेनिसक इंटेलिजेंसी एजेन्सी- बीएनडी’ ने जर्मनी के विकली मैगजिन में छपी खबर -500 मिलियन फोन काल और इंटरनेट यूजरों की जानकारी अमेरिकी नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी को उपलब्ध कराने- के बारे में सफार्इ दिया है, कि ”इस डाटा में एक भी डाटा जर्मनी के नागरिकों का नहीं है। ये डाटा अफगानिस्तान के टेलीकम्युनिकेशन सर्विलांस से जुड़े हुए हैं।”

डेर स्पीगल पत्रिका के 10 अगस्त के अंक में छपी रिपोर्ट के अनुसार- रूस, चीन, र्इरान और यूरोपीय संघ अमेरिकी नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी के ‘सर्विलांस प्रोग्राम’ के निशाने पर प्रमुख देश है। इसके अलावा इस सूची में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और उत्तरी कोरिया भी शामिल है। सार्वजनिक हुए सर्विलांस दस्तावेजों के अनुसार, जिस पर अप्रैल 2013 की तारीख पड़ी है, अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी ने वरियता सूची तैयार की है, जो एक से पांच है। जिस देश की वरियता एक होती है, उसे अमेरिकी सरकार निशाने पर रखती है, और पांचवी वरियता प्राप्त देशों की निगरानी विशेष नहीं होती। रूस, चीन, र्इरान, और यूरोपीय संघ में अमेरिकी सरकार को अपने लिये खतरा जयादा महसूस होता है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और उत्तरी कोरिया भी उसके लिये खतरा है। भारत इसके बाद है। रूस, चीन, र्इरान और उत्तरी कोरिया को वह दुश्मनों की जमात में शामिल करता है, मगर आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में शामिल सहयोगी देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी उसके लिये संवेदनशील है। यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की स्थिति अलग-अलग है। फ्रांस और जर्मनी सर्विलांस प्रोग्राम के तहत मध्यम वरियता प्राप्त देश है। तीसरे स्तर के देशों में उन देशों की विदेश नीति और आर्थिक सम्बंधों पर नजर रखी जाती है। चौथे स्तर वाले देशों के हथियारों के सौदे, नयी टेक्नोलाजी, आधुनिक हथियारों के साथ सर्विलांस प्रोग्राम में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर नजर रखी जाती है। सार्वजनिक हुए रिपोर्ट के अनुसार यूरोपीय संध का ब्रुसेल्स वाशिंगटन और न्यूयार्क के नेशनल सिक्यूरिटी एजेन्सी के इलेक्ट्रानिक सर्विलांस के तहत है।

europe (2)जर्मनी की चांसलर एंजीला मार्केल ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेन्सी और सर्विलांस प्रोग्राम के बारे में जानकारी होने से भी इंकार कर दिया था, मगर बाद में उन्होंने इसे जायज करार देते हएु कहा कि ”लोकतंत्र के लिये यह जरूरी है।” लेकिन लोकतंत्र के लिये खुफियागिरी की अनिवार्यता को जर्मनी जनता स्वीकार करने को तैयार नहीं है। स्नोडेन के द्वारा जानकारियों को सार्वजनिक किये जाने के बाद से, पहले से नाराज जर्मनवासी अब लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

यूरोपीय संघ का सबसे महत्वपूर्ण देश और यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी जर्मनी की स्थिति लगातार बिगड़जती जा रही है। वह वित्तीय संकट से घिरता जा रहा है। बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी दर और अर्थव्यवस्था में आयी गिरावट की वजह से न सिर्फ निवेशकों का विश्वास घटा है, बल्कि जनअसंतोष भी बढ़ता जा रहा है। यदि फ्रांस और जर्मनी की अर्थव्यवस्था ध्वस्त होती है, तो यूरोपीय संघ की वित्त व्यवस्था ही ध्वस्त हो जायेगी। वैसे भी यूरोपीय संघ के देशों के पास जनसमस्याओं का कोर्इ समाधान नहीं है।

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