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सीरिया पर हमले की वजह, विश्वयुद्ध की पृष्टभूमि है

asiaसीरिया पर हमले की वजह तलाश ली गयी है, और अपनी जेब में शांति का नोबल पुरस्कार लिये बराक ओबामा रक्त पिशाच की तरह मंड़राते हुए, यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं, कि सीरिया मानवता का दुश्मन है। सीरिया की सीमाओं पर जंगी बेड़े खड़े हैं। लगता है, सैन्य अभ्यास से शक्ति प्रदर्शन और संतुलन बनाने का दौर बीत गया है। अमेरिकी सरकार युद्ध चाहती है, मगर युद्ध के विस्तार का खतरा उठाने की स्थितियां नहीं हैं, और सीमित युद्ध सीरिया के मामले में संभव नहीं है। इसलिये, जोखिमों से भरे इस दौर का अंत क्या होगा? यह जटिल सवाल है। इसके बाद भी यह तय है, कि इस जटिल सवाल से टकराये बिना, और इसे हल किये बिना, आनेवाले कल की अच्छी सूरत नहीं बनायी जा सकती।

सीरिया से पहले हमारे सामने इराक है।

सीरिया से पहले हमारे सामने अफगानिस्तान है।

सीरिया से पहले हमारे सामने लीबिया है।

और सीरिया के साथ जुड़ा विश्व समुदाय है, दुनिया की वह आम जनता है, जो युद्ध नहीं चाहती। क्या यह कमाल की बात नहीं है, कि जनविरोधी सरकारें यह बता रही हैं, कि दुश्मन कौन है?

सोवियत संघ के होने से, यह सवाल ही पैदा नहीं होता था, कि इस मुददे पर रूस का रवैया क्या होगा? कि समाजवादी दुनिया अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़ी होगी या नहीं? मगर, आज यह सवाल है। आज यह सवाल है, कि हमले से मुसीबतों का हल तलाशने वाली ताकतों के खिलाफ हम कितने एकजुट हैं? सीधे तौर पर हम अमेरिकी साम्राज्यवाद के कितने खिलाफ हैं?

सीरिया बि्रटेन और अमेरिकी साजिशों का शिकार है। जिस पर अपने ही देश के नागरिकों पर रासायनिक हथियारों का उपयोग करने का आरोप है, और पश्चिमी मीडिया जिसकी मुनादी कर रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा बकवास कर रहे हैं। उन्हें नजर नहीं आ रहा है, कि सीरिया पर हमला अमेरिकी ताबूत की आखिरी कील होगा। जिसका खामियाजा सिर्फ सीरिया ही नहीं, एशिया और दुनिया को भोगना पड़ेगा।

21 अगस्त की शाम दमिश्क के करीब अलदोमा क्षेत्र की बाहरी बस्ती अलगौता में रासायनिक हथियारों का उपयेाग किया गया। जिसमें लगभग 1500 लोगों के मारे जाने की खबरें हैं। यह आंकड़ा विवादास्पद है।

रासायनिक हथियारों का उपयोग किया गया है। यह तय है। मगर हमला किसने किया? यह तय नहीं है। पश्चिमी मीडिया, अमेरिकी सरकार और यूरोपीय संघ सीरिया की बशर-अल-असद सरकार पर यह आरोप रख रही है। उनका कहना है कि ‘सीरिया की सरकार अपने ही देश के नागरिकों और विद्रोहियों के खिलाफ रासायनिक हथियारों का उपयोग कर रही है, और वो सीरिया की सरकार को इसकी सजा देंगे।’ विडियो भी जारी किया गया। महिलाओं और बच्चों के लाशों की नुमार्इश की गयी। मंजर खौफनाक है। हमले की निंदा सभी ने की। उन लाशों में विद्रोहियों की लाशें नहीं हैं। विद्रोहियों की लाशें वहां मिलीं, जहां रासायनिक हथियारों के कंटेनर में रिसाव से दुर्घटना घटी। इसी दौरान सीरियायी सेना ने विद्रोहियों को खदेड़ने के लिये हवार्इ हमले भी किये। सीरिया में विद्रोहियों के सारे किले लगभग ध्वस्त हो गये हैं। सीरिया पर बशर-अल-असद सरकार की पकड़ मजबूत हो गयी है। ऐसे में सवाल तो पैदा होता ही है, कि बशर की सेना रासायनिक हथियारों का उपयोग क्यों करेगी?

यह जानते हुए कि सीरिया के मित्र देश और संगठन भी रासायनिक हथियारों का उपयोग करने के खिलाफ हैं।

अमेरिकी सेटेलार्इट से हथियारों की निगरानी हो रही है। यदि सीरिया अपने रासायनिक हथियारों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना चाहे, तब भी उन्हें इसकी खबर लग जायेगी। सीआर्इए, मोसाद और बि्रटिश गुप्तचर एजेंसियां सक्रिय हैं। यह सवाल सबसे अहम है, कि रासायनिक हथियारों के उपयोग से फायदा किसे होगा? सीरिया की सरकार को तो इससे फायदा मिलने से रहा, फिर भी सीरिया के मत्थे यह आरोप मढ़ा जा रहा है। यह आरोप उन्हीं ताकतों के द्वारा मढ़ा जा रहा है, जो पिछले दो साल से बशर-अल-असद सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिये सीरिया में गृहयुद्ध की स्थितियां बनाते रहे हैं। जिन्होंने पूरे क्षेत्र में राजनीतिक तनाव भर दिया है। जिन्होंने लीबिया को तबाह किया और अब सीरिया को लीबिया बनाने में लगे हैं। उन्होंने ही विद्रोहियों को खड़ा किया, आर्थिक, सामरिक आयुद्धों के साथ कूटनीतिक मदद की। कतर को सीरियायी कालीजन सरकार का गढ़ बनाया। जार्डन की सीमाओं में अपनी सेना और बमवर्षकों को तैनात किया। तुर्की में पेटि्रयाट मिसार्इलों की तैनाती की। सउदी अरब के जरिये आर्थिक मदद और हथियारों की आपूर्ति की। तुर्की की सीमा से आतंकवादियों की घुसपैठ को अंजाम दिया। जो अलकायदा और अलनुसरा फ्रण्ट के खैरख्वाह हैं। अपने यूरोपीय और अमेरिकी आकाओं की साजिशों को अंजाम देने वाले विदेशी समर्थित विद्रोही अब मारे जा रहे हंै। सीरिया को इराक, अफगानिस्तान या लीबिया बनाना मुश्किल हो गया।

अमेरिका, यूरोपीय संघ, नाटो सैन्य संगठन के देश और सीरिया के पड़ोसी देशों की बेचैनी बढ़ गयी है। वो महीनों से यह राग अलाप रहे हैं, कि ”यदि सीरिया ने रासायनिक हथियारों का उपयेाग किया तो वो सैन्य हस्तक्षेप करेंगे।” बनार्इ गयी वजह की भूमिका है। उनकी नीतियां पहले से ही तय थीं। वैसे भी सीरिया में रासायनिक हथियार सिर्फ बशर-अल-असद सरकार के पास नहीं है, बल्कि कथित विद्रोही यानी वहाबी-सलफी आतंकवादियों की पहुंच भी रासायनिक हथियारों तक है। जिसे उन तक पहुंचाया गया।

किसने पहुंचाया? का जवाब भी खुल गया है, मगर संयुक्त राष्ट्रसंघ और उसे अपने हितों के लिये उपयोग करने वाली ताकतों के सामने यह मुददा नहीं है। जबकि यह मुददा होना चाहिये। यदि सीरिया की असद सरकार दोषी है, तो उस पर सख्त कार्यवाही होती है, तो उन ताकतों पर भी सख्त कार्यवाही होनी चाहिये, जिन्होंने उन रासायनिक हथियारों को विद्रोहियों तक पहुंचाया। जांच के दायरे में सिर्फ सीरिया नहीं, उन ताकतों को भी रखने की जरूरत है, जिनका नेतृत्व अमेरिकी सरकार कर रही है।

”साइबर वार न्यूज डाटा इन्फो” की खबर एक बार फिर चर्चा में है। इस वेब साइट पर दी गयी खबर में बि्रटेन की हथियार उत्पादक कम्पनी बि्रटम के मलेशिया सर्वर से कुछ गुप्त र्इ-मेल हैक किया गया है। कम्पनी के संस्थापक फिलिप डाउटी और व्यापार विकास निदेशक डेविड गोलिडंग की कम्पनी बि्रटम डिफेंस कम्पनी के डेटा को हैकरों ने हैक कर लिया। सीरिया नाम के फोल्डर में एक र्इ-मेल और दो पीडीएफ फाइलों में चौंकाने वाली जानकारियां हैं।

”इंफोवार्स डाट काम” के अनुसार, 25 दिसम्बर को बि्रटम बिजनेश डव्लपमेंट डायरेक्टर डेविड गोलिडंग के द्वारा कम्पनी के फाउण्डर फिलिप डाउटी को एक र्इ-मेल भेजा गया-

फिलिप,

हमें एक नया प्रस्ताव मिला है। यह फिर से सीरिया के बारे में है। कतरी (कतर की सत्तारूढ़ राज परिवार) ने एक आकर्षक प्रस्ताव रखा है। यह शपथ के साथ कहा गया है, कि इस प्रस्ताव को वाशिंगटन की स्वीकृति हासिल है। हमें केमिकल वेपंस होम्स में पहुंचाना होगा। एक सोवियत ओरिजिन जी सेल (रूस में बना) लीबिया से बिल्कुल मिलता हुआ, जैसा कि असद के पास होना चाहिये। वो हमसे चाहते हैं, कि ”हम अपने यूक्रेनी व्यकित को इसके लिये तैनात करें, जिसे रूसी बोलना आना चाहिये। एक विडियो भी बनाया जाये। वैसे खुले तौर पर मैं नहीं समझता, कि यह एक अच्छा प्रस्ताव है, मगर इसके लिये जितने पैसों का प्रस्ताव रखा गया है, वह बहुत ज्यादा है।”

काइंड रिगार्ड -ससम्मान- डेविड!

asia (2)इस र्इ-मेल को एक मेलिशयायी हैकर्स ने जारी किया है।

यह र्इ-मेल इस सच का ठोस प्रमाण है, कि इस खुराफात के जड़ में कौन है? किसने सीरिया में रासायनिक हंथियारों का उपयोग किया? और कैसे वहां तक रासायनिक हथियारों को पहुंचाया गया? इसके अलावा भी जानकारियां हैं।

तुर्की के हैताय प्रांत के सिटी कांउसिल पूर्व सदस्य मोहम्मद गनी ने प्रेस टीवी से कहा कि ”21 अगस्त को सीरिया में हुए रासायनिक हथियारों से हमला का रासायनिक हथियार तुर्की से भेजा गया है।” उन्होंने आगे कहा कि ”चार महीना पहले तुर्की सिक्यूरिटी फोर्स ने अल-कायदा और अल-नुसरा के सीरियायी विद्रोहियों के घरों की तलाशी में एक 2 किलो के सिलेण्डर में सरिन गैस बरामद किया था।” उन्होंने जोर दे कर कहा कि ”सीरिया के राष्ट्रपति के पास अपने लोगों को मारने का कोर्इ कारण नहीं है।”

तुर्की के दक्षिणी प्रांत के लोगों का कहना है कि ”रासायनिक हथियारों का उपयोग अल-कायदा से जुड़े अल-नुसरा फ्रंट के विद्रोहियों ने किया है, ना कि सीरिया की सरकार ने।” तुर्की का यह प्रांत सीरिया की सीमा से जुड़ा हुआ है।

हैताय (तुर्की) के एक निवासी फरीद मकून, जो सामाजिक कार्यकर्ता हैं, ने कहा है, कि ”हम पर युद्ध थोपने के लिये अमेरिका और इस्त्राइल के अल-कायदा ने रासायनिक हथियारों का उपयोग किया है। हममें से कोर्इ यहां युद्ध नहीं चाहता। हैताय का इतिहास है, कि हम यहां अगल-बगल शांति पूर्वक रहते रहे हैं। मगर अब यहां हर जगह मोसाद, सीआर्इए और अल-कायदा है। हम इस बात को ले कर चिंतित हैं, कि वो हमारे खिलाफ भी रासायनिक हथियारों का उपयोग कर सकते हैं।”

सीरिया में एमपीएन और एसोसियेट प्रेस के लिये फ्रीलांसिंग करने वाले रिपोर्टर डेल गावलाक के अनुसार- उस क्षेत्र में मारे गये सीरियायी विद्रोही के पिता अबु-अब्देल मोमीन ने जानकारी दी, कि उसका बेटा सऊदी अरब के विद्रोही के नेतृत्व में काम करता था। जो संभवत: रासायनिक कंटेनर को जहां रखा गया था, वहां रिसाव से मारा गया। उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी, कि वो रासायनिक हंथियार ले जा रहे हैं।” उसके अनुसार यह एक दुर्घटना थी, जिसमें उसके बेटे के साथ कर्इ विद्रोही मारे गये। जो अल-नुसरा फ्रंट के लिये भी काम करते थे। अल-नुसरा फ्रंट ने कहा है कि ”हम अपनी गुप्त जानकारियां शेयर नहीं करते हैं। मगर उस तरह का हथियार सामान्य विद्रोहियों को देना गलत है।”

डाक्टर विदाउट बार्डर के अनुसार ”3,600 मरीजों की जांच अब तक उन्होंने की है।” इस तरह जिस रासायनिक हथियारों से हमले का हाय-तौबा अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतें मचा रही हैं, वह उन्हीं के द्वारा सीरियायी विद्रोहियों और आतंकियों को दिया गया था। जिसमें चंद विद्रोही दुर्घटनावस मारे गये और उन्हीं के द्वारा सीरिया की आम जनता -महिलाओं और बच्चों- पर उसका प्रयोग किया गया। जिसे असद सरकर पर हमले की वजह बनायी जा रही है।

सीरिया ने संयुक्त राष्ट्रसंघ से कहा है कि ”वह सीरिया के खिलाफ होने वाले अमेरिकी हमले को रोके।”

सरकारी समाचार एजेंसी ‘साना’ के अनुसार- संयुक्त राष्ट्रसंघ में सीरिया के प्रतिनिधि बशर-अल-जाफरी ने एक पत्र लिख कर कहा है कि ”सीरिया की सरकार ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव से कहा है कि वे अपनी जिम्मेदारी निभायें और सीरिया के खिलाफ होने वाले हमले को रोकने की कोशिश करें।” पत्र में सीरिया के संकट का शांतिपूर्ण राजनीतिक समाधान निकालने की अपील भी की गयी है। सीरिया के उपविदेश मंत्री फैसल मुकदद ने कहा है कि ”अमेरिकी सैन्य कार्यवाही अल-कायदा और उससे जुड़े संगठनों की मदद करने के लिये होगी।” दूसरी ओर अरब लीग ने संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अपील की है, कि सीरिया के खिलाफ कड़े कदम उठाये जायें।” काहिरा में हुए विदेश मंत्रियों की बैठक में यह अपील की गयी, किंतु, अरब लीग ने अमेरिका के द्वारा प्रस्तावित सैन्य हमले के प्रस्ताव का विरोध किया।

अमेरिकी सरकार और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा विश्व समुदाय को अपने पक्ष में खड़ा करने की कवायतें कर रहे हैं। तुर्की और जार्डन की सीमा पर हवार्इ हमले की तैयारियां हो रही हैं, सीरिया के समुद्री सीमा पर अमेरिकी जंगी बेड़ों की तैनाती हो गयी है। इसके बाद भी, अमेरिकी सैन्य हमले के प्रस्ताव को पर्याप्त सफलता नहीं मिल पा रही है। जिस बि्रटेन ने 2000 में सीरिया में राजनीतिक अस्थिरता को फैलाने की योजना को अमेरिकी सहयोग से अंजाम दिया, उसकी संसद ने हमले के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद भी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन गुप्त सूचनाओं का सहयोग देने की प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं। फ्रांस में भी अमेरिकी हमले के प्रस्ताव को समर्थन नहीं मिला। जर्मनी की चांसलर ऐंजीला मार्केल ने कहा है कि ”उनका देश सीरिया के खिलाफ सैन्य कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेगा।”

31 अगस्त को अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के द्वारा सीरिया के खिलाफ सैन्य कार्यवाही के लिये कांग्रेस की स्वीकृति के इंतजार के वक्तव्य के साथ ही दुनिया भर में अमेरिका के खिलाफ जनप्रदर्शनों की शुरूआत हो गयी है। दुनिया की आम जनता किसी भी स्थिति में युद्ध के खिलाफ है। एनबीसी न्यूज पोल के अनुसार- अमेरिका की 65 प्रतिशत आबादी सीरिया पर सैन्य हमले के खिलाफ है। वैसे अमेरिका के ‘सीनेट विदेशी सम्बंध कमेटी’ ने बराक ओबामा को सीरिया के खिलाफ 60 दिनों के लिये हमले की मंजूरी दी है। जिसे एक बार महीने भर के लिये बढ़ाया जा सकता है। जिसे पाने के लिये अमेरिकी विदेश मंत्री जान कैरी ने कमेटी के सामने कहा- ”कुछ अरब देशों ने हमसे कहा है, कि यदि अमेरिका सीरिया के मुददे पर कुछ करना चाहता है, तो हम अन्य अरब देशों पर अमेरिका के द्वारा की गयी कार्यवाही की तरह, इसका खर्च भी उठा सकते हैं। उन्होंने इसे उन देशों का अमेरिका के प्रति प्रतिबद्धता और विश्वास के रूप में प्रमाणित किया और कहा, कि अमेरिका युद्ध के खर्च पर मोल-भाव भी कर सकता है।” मतलब सीरिया पर हमला कर अमेरिका न सिर्फ अपने हितों को साध सकता है, बल्कि युद्ध के खर्च के रूप में लाभ भी कमा सकता है। मतलब, यह घाटे का सौदा नहीं है। मतलब, अमेरिकी सेना भाड़े के हमलावर हैं। इस कार्यवाही का सीधा प्रसारण किया गया।

अमेरिका की ओबामा सरकार इस बात को समझने में अब तक नाकाम रही है, कि सीरिया पर सीमित हमला संभव नहीं है। लीबिया के अुनभव ने यह समझ दे दी है, कि युद्ध के विस्तार के खतरों को रोकने के लिये की गयी अनदेखी बड़ी भूल है। कि सीरिया को इराक और लीबिया बनाने की छूट नहीं दी जा सकती।

4 सितम्बर को इण्टरफैक्स ने एक सैन्य स्त्रोत के हवाले से जानकारी दी है, कि मध्य-पूर्व में रूस के राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखने के लिये मास्को मिसाइल क्रूजर को इस क्षेत्र में रवाना कर चुका है। जो स्ट्रीट आफ जिब्राल्टर की ओर बढ़ रहा है। जो लगभग 10 दिनों में वहां पहुंच जायेगा, जहां रूस का नेवल टास्क फोर्स है, जिसकी वह अगुवार्इ करेगा। इस मिसाइल क्रूजर के साथ दो और युद्धपोत हैं। एक बालिटक क्षेत्र से और दूसरा ब्लैक सी क्षेत्र से। दोनों युद्धपोत वहां 6 सितम्बर तक पहुंच जायेंगे।

1 सितम्बर को मास्को ने प्रियाजोव टोही पोत सीरिया के समुद्री तट पर तैनात कर दिया है, जो उस तनावग्रस्त क्षेत्र की जानकारियां भेजेगा। यह टोही पोत उसके नौसैनिक युद्धपोतों से अलग रह कर अपना काम करेगा।

इस बीच संयुक्त राष्ट्र महासचिव के कार्यालय से जारी बयान में कहा गया है, कि ”रासायनिक हथियार जांचकर्ताओं ने संदिग्ध घटना स्थल की जांच की और नमूने जमा किये। इन नमूनों की यूरोप की प्रयोगशालाओं में जांच होगी।” जिसकी कोर्इ समय सीमा तय नहीं है।

रूस ने अमेरिका, फ्रांस और बि्रटेन द्वारा रासायनिक हथियारों के उपयोग से जुड़े सभी सबूतों को एक सिरे से असिवकार कर दिया है। रूसी विदेशमंत्री सर्गेर्इ लोवारोव ने मास्को में कहा कि ”अमेरिकी, बि्रतानी और फ्रांसिसी सहयोगियों ने हमें जो भी सबूत दिखाये हैं, वे हमें संतुष्ट नहीं करते।” उन्होंने इन्टरनेट पर जारी तस्वीरों को भी संदेहास्पद करार दिया।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एसोसियेट पे्रस और रसियन स्टेट चैनल-1 से कहा कि ”मैं पहले भी आप लोगों से कह चुका हूं, कि मेरे विचार से वह बिल्कुल बकवास है कि सीरिया की सेना ने रासायनिक हथियारों का उपयोग किया है।” उन्होंने कहा- ”जो सेना कुछ क्षेत्रों में पहले से ही विद्रोहियों को घेर चुकी है, और आक्रामक अभियान चला रही है, और विद्रोहियों का सफाया कर रही है, वह सेना प्रतिबंधित रासायनिक हथियारों का उपयोग कर सकती है- यह मैं सोच तक नहीं सकता।” रूस ने इस बात की स्पष्ट घोषणा कर दी है कि सीरिया पर हमले की स्थिति में रूस उसके साथ है। उधर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग ली ने कहा है कि ”हम इस बात से चिंतित हैं, कि कुछ देश एकतरफा सैन्य कार्यवाही कर सकते हैं।” र्इरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड सीरिया में हैं। हिजबुल्ला लेबनान और सीरिया की सीमा पर बशर-अल-असद के साथ है। तुर्की के कुर्द का समर्थन भी सीरिया की सरकार के पास है। फिलिस्तीनी विद्रोही सीरियायी सेना के साथ होंगे। अमेरिका जमीनी लड़ार्इ नहीं चाहता और हवार्इ हमला सीरिया के रूसी डिफेन्स सिस्टम की वजह से आसान नही है। सीरिया पर अमेरिकी हमला होने की स्थिति में तुर्की की सरकार तो उसके साथ होगी -जिसका विश्वास मिस्त्र में मुर्सी को अपदस्त करने की वजह से हिल गया है- मगर तुर्की की आम जनता सीरिया के पक्ष में होगी।

अमेरिका की ओबामा सरकार अपनी फासिस्ट हरकतों से बाज नहीं आयेगी, मगर, वह कूटनीतिक पराजय से बच नहीं सकती। ‘रासायनिक हथियारों का उपयोग करने पर हमले’ के लिये तय ‘रेड लार्इन’ की अपनी घोषणा से वह उलझ गयी है। सीरिया पर हमला करने की स्थिति में उसके पास कांग्रेस के द्वारा 60 दिन और 30 दिन की समय सीमा है। यदि लीबिया के कर्नल गददाफी बिना किसी सरकार के अंतर्राष्ट्रीय समर्थन के 6 महीना लड़ सकते हैं, तो सीरिया के लिये निर्धारित समय सीमा ओबामा के लिये नाकाफी है। रूस और चीन उसके लिये ऐसी बाधा हैं, जिसे पार करना आसान नहीं। स्वीडन की तरह ही दुनिया के लोगों के लिये बराक ओबामा ‘युद्ध अपराधी’ हैं। माना यही जा रहा है, कि भूमध्य सागर में अमेरिका और रूस की मौजूदगी विश्व युद्ध की परिस्थितियां बना रही हैं। विश्व कारपोरेट जगत संभवत: ओबामा के साथ है, और हथियार उत्पादक कम्पनियां युद्ध चाहती हैं, मगर मौजूदा विश्व की स्थितियां ऐसी नहीं हैं। मुक्त बाजार के नये क्षेत्र की रचना हो रही है, और समाजवादी ताकतों की वापसी उनके लिये जी का जंजाल है। अमेरिकी एकाधिकारवाद का अंत करीब है।

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