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मिस्त्र की रजानीतिक अस्थिरता का अंत कहां है?

APTOPIX Mideast Egyptमिस्त्र की आम जनता एक बार फिर धोखा खा चुकी है।

मुसिलम ब्रदरहुड़ के राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी अपदस्त हैं।

होस्नी मुबारक जेल से रिहा मगर नजरबंद हैं।

मिस्त्र की राजसत्ता सेना के कब्जे में है।

तहरीर चौक से शुरू हुआ जन आंदोलन फिर तहरीर चौक पर है, मगर अब वहां ‘लाखों लोगों की तादाद नहीं है। जनतंत्र के लिये जारी जनसंघर्ष यूं तो बाढ़ के पानी की तरह, राजपथ से गलियों और सड़कों में उतरा हुआ, कहीं न कहीं जमा और थमा सा है, मगर जनसंघर्षों के ध्रुविकरण की अनिवार्यता धीरे-धीरे अब साम्राज्यावादी ताकतों के खिलाफ महाद्वीपीय होता जा रहा है। यदि मध्यपूर्व एशिया और अरब जगत में घर रही घटनाओं को हम देखें तो कहा जा सकता है, कि साम्राज्यावाद के खिलाफ बढ़ती जनचेतना महाद्वीप की सीमाओं को लांघ गयी है।

सीरिया के खिलाफ यदि अमेरिकी सरकार युद्ध की घोषणा करती है, तो मिस्त्र की मौजूदा सरकार की मुश्किलें बढ़ जायेंगी। अमेरिकी एवं पश्चिमी देशों के समर्थन पर टिकी मिस्त्र की सैन्य सरकार मुसिलम ब्रदरहुड़ को कतर से मिल रही वित्तीय सहयोग से सख्त नाराज है, और उसने सीरिया पर हमले में अमेरिका को किसी भी तरह का सहयोग देने के लिये इंकार कर दिया है। मतलब साफ है, कि जिन उददेश्यों के लिये अमेरिका और पश्चिमी देश, किसी भी कीमत पर मिस्त्र में सैनिक शासन की पक्षधर रही है, वह मकसद सवालों के दायरे में है। मगर, मिस्त्र के सेना की यह असहमति किसी काम की नहीं है, क्योंकि कैम्प डेविड समझौते की बेडियों को व तोड़ने की स्थिति में नहीं है, जो अमेरिकी मध्यस्तता में उसने इस्त्राइल के साथ की है, और इस्त्राइल का हित अमेरिकी हितों से अलग नहीं है। अरब जगत में ‘इस्त्राइल की सुरक्षा’ अमेरिकी नीतियों की वरियता में सबसे आगे है। जिसे अरब जगत आज तक स्वीकार नहीं सका है।

मिस्त्र की राजनीतिक अस्थिरता का अंत कहां है? या साम्राज्यवादी हस्तक्षेपों के बिना उसे अपनी समस्याओं का समाधान निकालने की स्थितियां कब बन पायेंगी? तय नहीं है। अनवर सादात के बाद, मिस्त्र का इतिहास साम्राज्यवादी हस्तक्षेपों का इतिहास है। जिसे अमेरिकी सरकार अपने हिंसाब से बनाती और बिगाड़ती रही है। होस्नी मुबारक की तानाशाही हो या आज की ‘सुप्रिम काउसिंल आफ द आमर्ड फोर्स’ की सरपरस्ती, या जन प्रदर्शनों के बाद मुसिलम ब्रदरहुड़ के राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी का एक वर्षीय कार्यकाल, मिस्त्र की आम जनता को धोखे में रखने की अमेरिकी नीति है। उसने ‘अरब क्रांति’ को गलत रास्ते पर डाल दिया है, और नकली जनतंत्र के बैनरों को यहां-वहां टांग कर सेना की वरियता को बढ़ा दिया है। अमेरिकी सरकार यह समझती है, कि तीसरी दुनिया के देशों को आतंकवादी या गैर-आतंकवादी, लोकतांत्रिक या गैर-लोकतांत्रिक तानाशाही को खिताब देने का अधिकार उसे है।

1 अगस्त को अमेरिकी विदेशमंत्री जान कैरी ने हैरत में डालने वाला वक्तव्य दिया कि ”मिस्त्र की सेना देश के निर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी को सत्ता से बेदखल करके, वहां लोकतंत्र को फिर से बहाल कर रही है।” पाकिस्तान में बोलते हुए जान कैरी ने एक टेलीविजन इण्टरव्यू में कहा कि ”लाखों लाख लोगों ने सेना से हस्तक्षेप करने को कहा था। वे सभी मिस्त्र की अव्यवस्था और हिंसा से तंग आ चुके थे।” उन्होंने आगे कहा कि ”हमारे अब तक के निष्कर्षों के अनुसार हम यह कह सकते हैं, कि मिस्त्र में मिस्त्र की आम जनता की सरकार है, जो वहां लोकतंत्र को पुन: स्थापित कर रही है।”

सेना, लोकतंत्र और सेना के द्वारा लोकतंत्र की स्थापना के बारे में अमेरिकी विदेशमंत्री की सोच अमेरिकी हितों के चेहरे हैं। मिस्त्र की आम जनता ने सेना का समर्थन कभी नहीं किया, मगर जान कैरी ऐसा मानते हैं। सेना ने कभी भी लोकतंत्र की स्थापना नहीं की, मगर जान कैरी की अपनी अमेरिकी सोच है। शोषण, दमन और जनविरोधी सरकार के खिलाफ मिस्त्र की आम जनता सड़कों पर थी, मगर, जान कैरी मानते हैं, कि आम जनता अव्यवस्था और हिंसा के खिलाफ सेना से हस्तक्षेप की मांग कर रही थी। सच तो यह है कि मिस्त्र की आम जनता अपने देश की जनविरोधी सरकार और साम्राज्यावादी ताकतों के हस्तक्षेप के खिलाफ जनसंघर्ष कर रही थी, वह इस्लामी कटटरता और एकाधिकारवादी ताकतों के खिलाफ आम जनता के पक्ष में खड़ी सरकार की मांग कर रही थी, जिसे जान कैरी न जाने क्या समझते हैं?

अमेरिकी सरकार ने जनतंत्र के विरूद्ध सैन्य सरकार को हमेशा से अपने हितों के लिये जरूरी माना है। पाकिस्तान में भी उसने लोकतंत्र के विरूद्ध सेना की सरकार को ही अपना समर्थन दिया है। मिस्त्र में होस्नी मुबारक दशकों अमेरिकी सहयोग से टिके रहे और मोहम्मद मुर्सी से अमेरिकी नाराजगी की वजह यह थी कि वो अरब जगत में अमेरिका के पीछे चलने के बजाये, उससे आगे चलना चाहते थे। अपनी स्थिति मजबूत कर सेना की सत्ता से साझेदारी को घटाना चाहते थे।

मिस्त्र की मौजूदा कार्यकारी सैन्य सरकार से वार्ता के लिये मुसिलम ब्रदरहुड ने कहा है कि ”मोहम्मद मुर्सी को पहले रिहा किया जाये, इसके बाद ही वार्ता होगी।” उधर मोहम्मद मुर्सी ने तख्तापलट को स्वीकार करने से इंकार कर दिया है। मुसिलम ब्रदरहुड और मुर्सी समर्थक अब हिंसक संघर्ष पर उतर आये हैं। प्रदर्शन और हिंसा रोज की बात हो गयी है।

जान कैरी के वक्तव्य की तीखी प्रतिक्रिया मुसिलम ब्रदरहुड के प्रवक्ता जीहाद-अल-हददाद ने दी है। उन्होंने कैरी के वक्तव्य की निंदा करते हुए सवाल किया है- ”यदि अमेरिका में कोर्इ बड़ा विरोध प्रदर्शन हो तो कैरी डिफेन्स सेक्रेटरी चक हेगल द्वारा राष्ट्रपति बराक ओबामा के तख्तापलट को समर्थन करेंगे?”

अमेरिकी सरकार उसके राष्ट्रपति बराक ओबामा और उसके विदेशमंत्री जान कैरी और इन बड़े-बड़े नामों के प्रवक्ताओं को यह गलतफहमी हो गयी है, कि उनके हर एक बकवास को सिर आंखों पर लिया जाना चाहिये। कैरी के इस वक्तव्य पर व्हार्इट हाउस को भी आश्चर्य हुआ। उसके अधिकारी ने वाल स्ट्रीट जनरल में कहा कि ”वो -जान कैरी- अपने वक्तव्य में सिक्रप्ट के साथ नहीं बने रहे।” सिक्रप्ट क्या था? यह सवाल नहीं किया गया, ना ही बताने की जहमत उठार्इ गयी। जान कैरी के शब्द चाहे जो हाें, अमेरिकी सरकार की सोच यही है। ओबामा सरकार मिस्त्र की सैन्य परिषद को मान्यता दे कर चल रही है।

31 जुलार्इ को ओबामा सरकार ने मिस्त्र में हर दो साल में होने वाले सैन्य अभ्यास ‘आपरेशन ब्रार्इट स्टार’ को इस साल करने का निर्णय लिया। यह आपरेशन सितम्बर के दूसरे सप्ताह में होना है। जिसमें 11 देशों की 90,000 ट्रूप्स भाग लेंगे। यह दुनिया के सबसे बड़े सैन्य अभ्यास में से एक है।

सैन्य अभ्यास से युद्ध की पृष्टभूमि बनाने का काम अमेरिका दशकों से करता रहा है। निजी क्षेत्र में पनपे हथियार उत्पादक कम्पनियों के लिये यह बाजार भी बनाता है, क्योंकि हथियारों की होड़ इन कम्पनियों और कारपोरेशनों के लिये जरूरी है। वैसे भी, यह दौर अमेरिका के लिये सामरिक दबाव बढ़ाने का है, क्योंकि वह विश्व समुदाय और विश्व जनमत की अनदेखी कर सीरिया पर हमले की तैयारियां पूरी कर चुका है।

अमेरिकी सीनेट ने मिस्त्र की सेना को दिये जाने वाले सहयोग राशि को 13 के मुकाबले 83 मतों से पास कर दिया है। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों से प्रशिक्षित मिस्त्र की सेना अपने देश की आम जनता और सरकार से ज्यादा अमेरिकी हितों के लिये काम करती रही है। आज भी वह यही कर रही है। गाजा टर्मिनल को खोल दिया गया है, और उन नहरों में पानी भर दिया गया है, जहां से लोगों की आवा-जाही होती थी। कहने को मिस्त्र की मौजूदा सरकार ने यही कहा है कि सीरिया पर हमले की स्थिति में, वह स्वेज नहर से हथियारों की खेप जाने नहीं देगी, मगर अभी यह प्रमाणित होना बाकि है।

वैसे यह तय है कि सीरिया पर अमेरिकी हमले से उसके सहयोगियों के बीच नयी समस्यायें जन्म ले लेंगी। अमेरिकी सरकार की विश्वस्नियता तेजी से घटेगी। सरकारें भले ही कसमसा कर दबावों से बंधी रहें, मगर उनकी स्थिति अपने देश की आम जनता के विरोध और संघर्षों का सामना करने के लिये पूरी तरह अनुकूल नहीं है। मिस्त्र में पहले से जारी जनसंघर्ष का बढ़ना लगभग तय है। न चाहते हुए भी मध्य-पूर्व का तनाव अफ्रीकी देशो ंको भी गंभीरता से प्रभावित करेगा। वैसे भी मिस्त्र की अंतरिम सैन्य सरकार जो कर रही है, वह साम्राज्यवादी ताकतों और उनकी वित्तीय इकार्इयों के हित में है।

africa (2)मोहम्मद मुर्सी ने 4.5 बिलियन डालर का पैकेज पाने के लिये अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के सामने जो प्रस्ताव रखा था, सैन्य सरकार उसके लिये उन शर्तों को पूरा करने की नीति पर चल रही है, जिससे मिस्त्र की अर्थव्यवस्था में कोर्इ सकारात्मक बदलाव आयेगा या नहीं? यह सवाल हो सकता है, किंतु जन असंतोष का बढ़ना तय है। राजनीतिक अस्थिरता के बीच उसकी नीतियां कटौती के प्रस्ताव को लागू करने की है।

29 जुलार्इ को उन्होंने घोषणा की है कि ”सरकार ‘स्मार्ट कार्ड’ लागू करेगी, जिसका उपयोग फ्यूलिंग स्टेशनों पर किया जायेगा। ताकि व्यकितगत, कारखाना, बेकरी, और किसानों द्वारा प्राकृतिक गैस, गैसोलिन और अन्य र्इधन के उपयोग और उसके मूल्य को नियंत्रित किया जा सके।”

अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष र्इधन के साथ खाध पदार्थों में दी जा रही छूट में भी कटौती करने का दबाव बना रहा है। मिस्त्र के वित्त मंत्री अहमद गलाल ने इस बात के संकेत दिये हैं, कि वो इस सब्सीडी में कटौती का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा- ”हम, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के साथ इस ढांचागत परिवर्तन के खिलाफ नहीं हैं। क्योंकि ऐसा करने पर ही हमारी विश्वस्नियता बढे़गी और हमें नया कर्ज मिल पायेगा। तब ही हम अपने निर्धारित उददेश्य को पा सकेंगे।” उन्होंने कहा, कि ”हम अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के दबाव के बिना भी, सचमुच परिवर्तन चाहते हैं।”

जो परिवर्तन यूरोपा को संभाल नहीं सका, जिस परिवर्तन ने अफ्रीकी देशों को चरागाह बनाने का काम किया, वह परिवर्तन मिस्त्र की राजनीतिक अस्थिरता के बीच और क्या करेगा? अनुमान लगाया जा सकता है, खास कर तब जबकि युद्ध की स्थितियां सिर पर सवार हैं, और जन असंतोष की नयी व्याख्या हो रही है।

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