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अमेरिकी कारनामों का कोर्इ अंत नहीं!

vishesh aalekhअखबारों में रोज कर्इ झूठ छपते हैं, उनमें से एक मैं अपने लिये चुन लेता हूं, कि इससे बड़ा कोर्इ नया झूठ, शायद कल सामने न आये, मगर ऐसा होता नहीं, होता वह है, जो दुनिया के बड़े-बड़े लोग, बड़ी-बड़ी कम्पनियां और कारपोरेशन चाहते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी सरकार चाहती है। दुनिया की सबसे बड़ी सरकार झूठ और फसाद की जड़ है। झूठ बोलना उसकी नीति, और फसाद खड़ा करना उसकी आदत है। उसकी नीतियां और आदतें बुरी हैं, मगर क्या कीजियेगा, बुरी आदतें मरते दम तक नहीं छूटतीं। दशकों से अमेरिकी सरकार यही करती रही है।

राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्रीय तनाव, तख्तापलट, सैन्य कार्यवाही और तीसरी दुनिया के देशों के लिये स्थायी खतरा बने रहना ही उसकी नीति है, ताकि अमेरिकी समृद्धि और अमेरिकी वर्चस्व कायम रहे। सदियां गुजर गयीं, विध्वंसक सोच और विध्वंसक समाज व्यवस्था को बनाने, बचाने और उसे वैश्विक लिबास पहनाने में। अमेरिकी सरकार आज भी यही कर रही है। हम चाहें तो कह सकते हैं, कि ”आंख मूंद कर यही कर रही है।” दुनिया को धोखे में डालने की उसकी नीतियों में कोर्इ बड़ा बदलाव नहीं आया है, जबकि अमेरिकी सरकार की वक़त बदल गयी है। उसकी औकात बदल गयी है। अब यह सोचने का कोर्इ आधार नहीं है, कि अमेरिकी सरकार जो कहेगी, दुनिया उसे मान लेगी। मगर, व्हार्इट हाउस में बैठे बराक ओबामा सीरिया के बारे में कुछ ऐसा ही सोचते और मानते हैं। वो मानते हैं, कि जिस देश के खिलाफ पिछले दो सालों से उन्होंने अपने यूरोपीय समर्थक देश और चंद अरब देशों के सहयोग से, आतंकी-विद्रोहियों के जरिये, गृहयुद्ध की स्थितियां बना रखी है, वह देश उनका इस्तकबाल करे। सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद खुद को सत्ता से बेदखल कर अल कायदा और अल नुसरा जैसे आतंकी संगठनों को सीरिया की कमान सौंप दें। नहीं तो बे-बुनियाद रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के आरोप के एवज में अमेरिकी हमले को बर्दास्त करें।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी कांग्रेस के सामने सीरिया पर सीमित हमले की स्वीकृति के लिये जो बयान दिये, वह अपने आप में अमेरिकी नीतियों के लिये जबर्दस्त बकवास है।

बराक ओबामा ने कहा-

• ”सीरिया में जो भी हो रहा है, उस पर अमेरिका अपनी आंखे बंद नहीं कर सकता। रासायनिक हमले पर चुप्पी नहीं साधी जा सकती।”

• ”सीरिया में हुए हमले की जिम्मेदारी राष्ट्रपति बशर-अल-असद की सरकार की है। उन्हें इसका परिणाम भुगतना होगा।”

• ”हम सीरियायी सरकार को उनके ही नागरिकों को मारने की इजाजत नहीं दे सकते। इसलिये, मैं कांग्रेस के सभी सदस्यों से आग्रह करता हूं, कि वे व्हार्इट हाउस का साथ दें।”

• ”हमें आने वाली पीढि़यों के लिये बेहतर भविष्य का निर्माण करने दें।”

• ”हम सीरिया को इराक या दूसरा अफगानिस्तान नहीं बनने देंगे।”

• लगे हाथ उन्होंने यह भी कहा कि- ”मैं जानता हूं कि अमेरिकी जनता एक दशक के युद्ध से नाराज है।”

• ”अफगानिस्तान में हमारी लड़ार्इ खत्म होने को है।”

• ”सीरिया में, सीरिया की जमीन पर कोर्इ अमेरिकी सैनिक कदम नहीं रखेगा।”

यह आप क्या कह गये बराक ओबामा जी।

देश की आम जनता युद्ध के पक्ष में नहीं है।

देश की सेना इराक और अफगानिस्तान की तरह कहीं फंसना नहीं चाहती है।

कांग्रेस को विश्वास में लेने के लिये आप एड़ी से चोटी का जोर लगा रहे हैं।

ऐसे वायदे कर रहे हैं, जो आपके बस में नहीं है।

विश्व समुदाय और विश्व जनमत आपके खिलाफ है।

लीबिया को भूल कर, आपने इराक और अफगानिस्तान का जिक्र किया कि ”आप सीरिया को दूसरा इराक या अफगानिस्तान नहीं बनने देंगे।” मगर हमला आप जरूर करेंगे। किसी भी देश की आम जनता को मारने का अधिकार शायद व्हार्इट हाउस को है?

कभी सोचा आपने, कि इराक के खिलाफ जिन आरोपों को अमेरिकी सरकार और अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने हमले की वजह बनायी और एक समृद्ध देश की प्राचीन सभ्यता को नेस्तनाबूद कर दिया, वो सारे आरोप निराधार प्रमाणित हुए। 16,90,903 इराकियों की हत्या की गयी और सददाम हुसैन को युद्ध अपराधी करार दे, फांसी के फंदे से टांग कर, शर्मनाक मौत दी गयी, वह विश्व इतिहास का काला पन्ना है। क्या इराक इस जख्म को कभी भूल पायेगा? क्या विश्व जनमत अमेरिकी सरकार की बातों पर यकीन कर पायेगी?

नहीं, बराक ओबामा जी! दुनिया की आम जनता अमेरिकी सरकार पर यकीन नहीं करती। उसे करना भी नहीं चाहिये।

अफगानिस्तान के बारे में आप कहते हैं, कि अमेरिकी सेना वहां से वापस हो रही है, और लड़ार्इ खत्म होने को है। मगर, अफगानिस्तान से वापस होने से पहले आपकी अमेरिकी सेना और बहुराष्ट्रीय फौजों ने 48,644 अफगानों की हत्या की है। आपके अमानवीय कारनामों का कोर्इ अंत नहीं है। यहीं आपके राष्ट्रपतियों ने समाजवादी क्रांति को असफल करने के लिये ओसामा बिन लादेन और अनगिनत आतंकवादियों को जन्म दिया। अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों की नींव रखी गयी, आज तो एशिया और अफ्रीकी देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर आपकी सेनाओं की अगुआर्इ करते हैं, आप आतंकवादियों के नाम पर आतंकवादियों के लिये, उस देश की सरकार और आम जनता के खिलाफ लड़ते हैं। उसे मारते हैं। आपने सोचा इन आंकड़ों के बाद आपने कितने अफगानों की और हत्यायें की है?

लीबिया में कर्नल गददाफी ने आप जैसों के खिलाफ तीस साल लम्बा संघर्ष किया। जिसे आपके आतंकवादियों ने सिर्फ इसलिये मौत के घाट उतार दिया कि वो सिर्फ लीबिया की नहीं अफ्रीकी महाद्वीप की समृद्धि चाहते थे। अफ्रीकी महाद्वीप को औपनिवेशिक साम्राज्यवादी शिकंजे से निकालना चाहते थे। हुजूर आपने कर्नल गददाफी और लीबिया की ही नहीं, अफ्रीकी महाद्वीप के आने वाले अच्छे कल की भी हत्या की है। इस हत्या के अपराधी, वो भी हैं, जिन्होंने आज सीरिया के लिये खड़ा होना कुबूल किया है। जो सोवियत संघ और समाजवादी विश्व तो नहीं बन सकते, मगर जिन्होंने आपके खिलाफ खड़े होने की एकजुटता दिखार्इ है, जो मानते हैं कि शीत युद्ध की वापसी हो गयी है। आप यकीन करें, इस वापसी से हमें इस बात की खुशी मिली है, कि एक पांव पर खड़ी दुनिया के पास दूसरा पांव भी है। जमाना अब तैमूर लंग का नहीं रहा। हम जानते हैं कि नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवाद का खतरा बढ़ा है। उसका सामरिकरण हो गया है, और आने वाला कल आज भी सुरक्षित नहीं है, फिर भी यह अच्छी बात है, कि एकाधिकारवाद का अंत हो रहा है।

हम कर्इ चीजों के अंत की ओर बढ़ रहे हैं।

एक ऐसी व्यवस्था, जो बार-बार संकट से घिर जाती है, जिसे बचाने के लिये एक बड़ी लूट, एक बड़े युद्ध की जरूरत पड़ती है, जिसके पास जन-समस्याओं का कोर्इ समाधान नहीं है, वह कब तक टिकी रह सकती है?

अफसोस होता है, कि आपको एक बड़े लूट की जरूरत है।

अफसोस होता है, कि आपके हाथ से मौका फिसल रहा है।

मगर, क्या कीजियेगा, स्थितियां आपके अनुकूल नहीं है, विश्व परिदृश्य बदल गया है। आप सीमित युद्ध चाहते हैं, जिसमें युद्ध के विस्तार की असीम संभावनायें है। चीन के पास वित्तीय शक्ति है और रूस के पास सामरिक ताकत है, और उन दोनों ने हाथ मिला लिया है। जिनसे कर्इ हाथ जुड़े हैं। लीबिया के बाद सीरिया, सीरिया के बाद र्इरान और र्इरान के बाद वेनेजुएला और वेनेजुलएला के बाद लातिनी अमेरिकी देशों के समाजवादी दिशा को बदलने की आपकी योजना ध्वस्त है।

लीबिया अमेरिकी सरकार के लिये ऐसा चेकपोस्ट है, जहां वह पूरी तरह बेपर्द है। यह तो आपका ही कारनामा है न, कि जिस लीबिया को बनाने में मुअम्मर गददाफी ने अपनी जिंदगी खपा दी, उसे आपने खण्ड़हरों में बदल दिया। उन आतंकवादियों को सौंप दिया, जिन्होंने उन्हें गोली मारी। जरा सोचिये, बराक ओबामा जी कितनी कडुवाहट होगी, गददाफी के मन में, आखिरी पलों में आप जैसे लोगों के लिये, जो आम जनता के मुल्क को तबाह करते हैं?

आप सीरिया को इराक या अफगानिस्तान बनाना नहीं चाहते, मगर रूस ने कहा था- ”हम सीरिया में लीबिया के अनुभव को दुहराने की इजाजत नहीं देंगे।” नो फ्लार्इ जोन, बहुराष्ट्रीय सेनाओं का हवार्इ हमला, टीएनसी विद्रोही और आतंकवादियों के पक्ष में कतर की सेना को घुसाने का रास्ता, और संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा एवं सुरक्षा परिषद से प्रस्ताव पारित कराने की कूटनीतिक दरवाजे बंद हैं। सीरिया में आपके लिये कूटनीतिक पराजय तय है। रासायनिक हथियारों के उपयोग का मुददा लंगड़े के जिदद से अच्छी वक़त नहीं रखती। रूस के राष्ट्रपति कहते हैं- ”यह अमेरिकी बकवास है।” आप बकवास क्यों कर रहे हैं?

सीरियायी विद्रोहियों तक रासायनिक हथियारों की आपूर्ति बि्रटिश हथियार उत्पादक कम्पनी ‘बि्रटम’ के द्वारा की गयी। कतर के प्रस्ताव की आपकी स्वीकृति थी। आप सारी दुनिया की खुफियागिरी और निगरानी करते रहे, मगर मलेशियायी हैकर्स ने उस मेल को हैक कर लिया। यह भी खुलेआम है, कि हमले का धंधा आप चलाते हैं। आपके विदेशमंत्री सीनेट को बताते हैं कि ‘मोल-भाव से धंधे का मुनाफा बढ़ाया जा सकता है।’ अरब जगत की राजनीतिक अस्थिरता, सैन्य हस्तक्षेप और तख्तापलट आपकी सरकार का पेशा है। अमेरिकी कांग्रेस तो आपके साथ हो सकती है, ओबामा जी, मगर विश्व समुदाय और विश्व जनमत आपका यकीन कैसे करेगी? हम तो समझते हैं कि आम अमेरिकी भी अब आपके साथ नहीं है।

यदि बशर-अल-असद की सरकार दोषी है, तो आप उन्हें सजा देंगे। मगर, वियतनाम में अमेरिकी सेना ने ‘एजेन्ट आरेंज’ (रासायनिक हथियार) का उपयोग किया था, यह तय है, तो आप सजा किसे देंगे?

सीरिया में यदि असद की सेना ने रासायनिक हथियारों का उपयोग नहीं किया, तो सारे साक्ष्य विद्रोही-आतंकियों के खिलाफ हैं, जो आपके खैरख्वाह हैं, आपके इशारे पर चलते हैं, आपके रसद-पानी और हथियारों से लड़ते हैं, आपके कूटनीतिक समर्थन और आपके सहयोग से जीते हैं, उनके खिलाफ आप क्या करेंगे? क्या उन्हें सजा देंगे? उनके सफाया के लिये, सीरिया के लिये सीरिया की सरकार का साथ देंगे?

बड़ा ही गंदा इतिहास है अमेरिकी साम्राज्य का, इसे आप कैसे साफ करेंगे?

आप कहते हैं, कि ”सीरिया की सरकार को आप अपने ही नागरिकों को मारने का अधिकार नहीं दे सकते।”

बड़ी अच्छी बात है। यही तर्क आपने लीबिया में कर्नल गददाफी के लिये दिया था। जहां आपकी सेना और समर्थकों ने कत्लेआम किया। जहां आतंकवादियों को सत्ता सौंपी गयी, जिसके खिलाफ आम लीबियायी आज भी लड़ रहा है।

क्या दुनिया के आम लोगों को -खास कर तीसरी दुनिया के आम लोगों को- मारने का लार्इसेन्स आपके पास है? कि कत्लेआम आप ही करेंगे? आपके समर्थक सरकारें और आपके आतंकी ही लोगों को मारेंगे?

आपकी समाज व्यवस्था -जिसे आप दुनिया पर थोपना चाहते हैं- आम आदमी के लिये बड़ी बेरहम है। आम अमेरिकी भी अब भूखा और बेरोजगार है। आपकी वित्त व्यवस्था की तरह ही, उस पर कर्ज का बड़ा बोझ है। लाभ के लिये आपने उसे कर्जखोर बना दिया। आपका औधोगिक शहर डेट्रायट दिवालिया हो गया है। फूड स्टैम्प पर जीने वाले और बेघर-बार लोगों की तादाद बढ़ गयी है, जिनके खिलाफ खर्च घटाने के नाम पर कटौतियां हो रही हैं। डालर की मजबूती वित्तीय बुलबुला है। आप एक गंभीर वित्तीय संकट के शिकार हैं। जिससे उबरने के लिये ही न, आप लड़ रहे हैं? क्या एक अपराधी व्यवस्था आने वाली पीढ़ी को बेहतर कल दे सकती है?

क्या-क्या बतायें हम आपको? आप तो खुद ही समझदार हैं। हथियारों के जखीरा पर बैठे है। युद्धाभ्यास कर रहे हैं। लोगों को मारने के हथियार बना रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और कारपोरेशनों के जाल में फंसे, उन्हें पाल और पल रहे हैं। सर्विलांस प्रोग्राम चला रहे हैं, और एफ-35 लड़ाकू बमवर्षक बना रहे हैं, जिसकी अनुमानित लागत 1 टि्रलियन डालर से ज्यादा है। यदि आज, आप लूट-मार छोड़ दें, तो आपको सैकड़ों सैनिक अडडे, लाखों सैनिक और रोज नये हथियारों की जरूरत नहीं पड़ेगी। आप को डर नहीं लगेगा। मगर आपने इतना बुरा बोया है, कि डरना और डराना आपके लिये जरूरी है। कमाल के करिश्माबाज हैं आप, खुद पर हमला करके (911) आप अपनों को डरा देते हैं, और दूसरों को डराने की मंजूरी हासिल कर लेते हैं।

मगर, इस बार, आम जनता ही नहीं, दुनिया की सरकारें भी आपके धोखे में नहीं आयीं। राष्ट्रसंघ के महासचिव बान की मून को भी यकीन नहीं हुआ। आप तो सबकी निगरानी करते हैं, इसलिये आपको पता होगा, कि 911 -वल्र्ड ट्रेड सेण्टर पर हुए आतंकी हमले का 12 साल पुराना प्रचार फीका, फीका था। इण्टरनेट की दुनिया और सोशल मीडिया में उसकी धूम नहीं मची, चंद लोगों ने ही याद किया। मगर, 40 साल पहले लातिनी अमेरिकी देश चिली में हुए तख्तापलट को लोगों ने याद किया। अलेंदे को लोगों ने सलाम किया। फिर…? तीसरी दुनिया के देशों में आम जनता की सरकार का तख्तापलट हो, और वहां अमेरिका न हो(?) यह भला कैसे हो सकता है। …कुछ समझे आप?

आपसे बस एक ही गुजारिश है- लबारीपन छोड़ कर, अपनी सरकार को, आम जनता के पक्ष में खड़ा करें। आपकी मुश्किलें खत्म हो जायेंगी, और आपके बिना दुनिया अपने आप आज से बेहतर बन जायेगी। अखबारों से एक नया झूठ मुझे अपने लिये चुनना नहीं पड़ेगा, कि शायद, यह आखिरी है। मगर ऐसा नहीं होता। अमेरिकी कारनामों की फेहरिश्त इतनी बड़ी है, कि रेड इणिडयनों से लेकर जापान पर परमाणु बम गिराने से होते हुए, यदि हम सीरिया तक, आपके कारनामों की फेहरिश्त बनायें, उसका जिक्र करें, तो दुनिया पर कागज की एक खोल चढ़ जायेगी और ढेर बचा रहेगा।

जी तो चाहता है ओबामा जी, कि इसे खत की शक्ल दें और आपके नाम भेज दें। अंत में लिखें- ”थोड़ा कहा, ज्यादा समझियेगा।” मगर आपकी समझदारी पर हमें शक है। यकीन है, कि आप अपनी हरकतों से बाज नहीं आर्इयेगा।

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