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कम्यून और जनवाद के बारे में

soch ki jameenवेनेजुएला में जब ‘विकास के जरिये समाजवाद’ के निर्माण की अवधारणां विकसित की गयी, हयूगो शावेज ने 2013 में, राष्ट्रपति का आखिरी चुनाव जीतने के बाद, तात्कालिक विदेशमंत्री निकोलकस मदुरो से पूछा था- ”हमारे कम्यून कहां हैं?” मतलब लेनिन के जनवाद की तरह कम्यूनों के बिना समाजवादी समाज का निर्माण संभव नहीं है। और उनका लक्ष्य समाजवादी समाज का निर्माण था। आज वेनेजुएला हयूगो शावेज के न रहेने के बाद भी, कम्यून को राष्ट्रीय कार्यक्रम बना रहा है और राष्ट्रपति निकोलस मदुरो ‘कारखानों पर मजदूरों के नियंत्रण’ के साथ, कम्यूनों के निर्माण को राष्ट्रीय मुददा बना चुके हैं।

इतिहास में हमारा पहला वास्ता ‘पेरिस कम्यून’ से पड़ता है। जिसमें कम्यून जैसी कोर्इ बात ही नहीं थी। उसे एक असफल क्रांति मान लिया गया। जिसे समय ही नहीं मिला और जिसके सामने सोच की साफ तस्वीर नहीं थी। इसलिये, अपनी तमाम सदभावना के बाद भी, पेरिस कम्यून की गलितयों को न दुहराने की हिदायत ही दी जा सकती है। जो क्रांतिकारी कम्यून के दायित्वों का निर्वाह नहीं कर सकी।

वास्तव में कम्यून अपने शुरूआती दौर में, एक सीमा तक गडमड सोच है, जो अस्थायी सरकार की तरह फौरी जरूरतों से संचालित होती है, मगर जिस पर स्थायित्तव की गहरी जिम्मेदारियां होती हैं। इसलिये, कम्यून को न तो हल्के में लिया जा सकता है, ना ही फौरी जरूरत के नजरिये से आंका जा सकता है। वास्तव में, कम्यून राज्य की जिम्मेदारियों का ऐसा विभाजन भरा विस्तार है, जो राज्य का विकल्प बन सकती है।

लेनिन ने क्रांतिकारी कम्यून के बारे में कहा है कि ”क्रांतिकारी कम्यून को, अर्थात क्रांतिकारी सत्ता को, चाहे वह एक ही शहर तक सीमित क्यों न हो, अनिवार्य रूप से राज्य के सभी कार्य पूरे करने पड़ेंगे।” उन्होंने जोर दे कर कहा है कि ”इस बात की ओर से मुंह फेरना या इसे देखने से इंकार करना मूर्खता की हद होगी। उस सत्ता को आठ घंटे के काम का कानून बनाना पड़ेगा, कारखानों पर मजदूरों का निरीक्षण (नियंत्रण) स्थापित करना होगा, नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था करनी होगी, न्यायाधीशों के निर्वाचन की पद्धति चालू करनी होगी, किसान समितियां स्थापित करनी पड़ेगी। उसे कर्इ सुधार करने पड़ेंगे।” ऐसे सुधार जिससे समाज के सबसे कमजोर -सर्वहारा- वर्ग की एकजुटता और वर्गगत राजनीतिक तथा सामाजिक स्थितियों में बदलाव आये। उन्होंने सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की अनिवार्यता की बातें की है। जो समाज के शोषक वर्ग की तानाशाही के स्थान पर शोषितों की तानाशाही है। जो वास्तव में ‘सीमित जनवाद’ के स्थान पर ‘अधिकाधिक जनवाद’ है।

उन्होंने खुले तौर पर इस बात को स्वीकार किया है, कि जनवाद के बिना समाजवादी क्रांति सफल नहीं हो सकती। जिसका अर्थ राजसत्ता में आम जनता की हिस्सेदारी को बढ़ाना भी है।

सीमित जनवाद और अधिकाधिक जनवाद शोषक और शोषितों का विभाजित जनवाद है। पूंजीवादी जनतंत्र में जनवाद और समाजवादी जनतंत्र में जनवाद सामाजिक विकास की संक्रमण कालीन अवस्था है। यह समाजवादी क्रांति की तरह ही पूंजीवादी समाजव्यवस्था की विसंगतियों से जन्म लेती है। ”राज्य और क्रांति” में लेनिन ने विश्लेषित किया है, कि ”पूंजीवादी समाज में हमारे पास कटा-छंटा, निकृष्ट और झूठा जनवाद होता है, केवल धनवानों के लिये, अल्पसंख्यक लोगों के लिये जनवाद होता है। अल्पसंख्या के शोषकों के आवश्यक दमन के साथ-साथ सर्वहारा अधिनायकत्व ही, कम्युनिज्म में संक्रमण काल ही जनता के लिये, बहुसंख्या के लिये पहली बार जनवाद की सृषिट करेगा। वास्तविक रूप में पूर्ण जनवाद की स्थापना केवल कम्युनिज्म ही कर सकता है, और यह जनवाद जितना ही अधिक पूर्ण होगा, उतनी ही तेजी से अनावस्यक बन जायेगा और अपने आप विलुप्त होता जायेगा।”

मतलब सीधा है, कि जनवाद वर्ग विभाजित समाज और उसकी राजनीतिक संरचना में ही जीवित रहता है, और क्रमश: कम लोगों से ज्यादातर लोगों की ओर बढ़ता है, और जैसे ही समाज में वर्गों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, वह भी उसके साथ धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। राज्य जब तक दमन की इकार्इ है, तब तक ही जनवाद है। जनवाद का स्वरूप राजसत्ता पर किस वर्ग का अधिकार है(?) से तय होता है। इसलिये, राजसत्ता में आम जनता की हिस्सेदारी का वास्तविक या अवास्तविक होना, जनवाद के अनुपात को तय करता है। इस तरह, जनवाद का विस्तार और जनवाद का लोप राजसत्ता पर किस वर्ग का अधिकार है(?) से निधार्रित तो किया जा सकता है, किंतु राजसत्ता पर कामगर -मजदूर, किसान- वर्ग को शासक वर्ग में संगठित करने का परिणाम केवल जनवाद का विस्तार नहीं हो सकता। जनवाद का विस्तार मुटठी भर संगठित लोगों से बहुसंख्यक वर्ग में होता है। जहां पहली बार शोषकों, उत्पीड़कों और पूंजीपतियों के जनवाद के विरूद्ध गरीबों का जनवाद अस्तित्व में आता है। और वह अपने वर्गहितों से संचालित होता है। वह शासक वर्ग में बदल जाता है। और राज्य का उपयोग अपने हित में करता है। नब्बे प्रतिशत लोगों का जनवाद समाज के पूर्व शासक वर्ग -10 प्रतिशत- लोगों पर भारी पड़ता है। स्वतंत्रता प्रतिबंधित रहती है।

बेबेल को लिखे अपने पत्र में एंगेल्स ने कहा था- ”सर्वहारा जब तक राज्य का उपयोग करता है, स्वतंत्रता के हितों में नहीं करता, वह राज्य का उपयोग अपने वर्ग शत्रुओं को दबाने के लिये करता है, और जैसे ही स्वतंत्रता की बात करना संभव हो जाता है, वैसे ही राज्य का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है।”

यह ऐतिहासिक विकास की ऐसी अवस्था है, जिसे आज तक पाया नहीं जा सका है। माक्र्स समाजवादी क्रांति के बाद सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व का जिक्र करते हैं। समाजवादी समाज के निर्माण के लिये उसे आवश्यक प्रमाणित करते हैं। जिसके विकास की दिशा शोषण विहीन एवं वर्गविहीन समाज के निर्माण की होती है। समाजवाद से साम्यवाद की ओर ऐतिहासिक संक्रमणकाल के बाद ही राज्यविहीन समाज व्यवस्था का निर्माण संभव है।

कम्यून, राज्य के स्थान पर समाज व्यवस्था का संचालन केंद्र होते हैं। माक्र्स ने कम्यून के अनुभवों का विश्लेषण करने के दौरान कहा था, कि ”उत्पीडि़तों को चंद वर्षों में एक बार यह तय करने की इजाजत दी जाती है, कि उत्पीड़क वर्ग के कौन से विशेष प्रतिनिधि संसद में जा कर उनका प्रतिनिधित्व करें, और उनका दमन करें।” यही पूंजीवादी जनवाद का सार तत्व है। इसे ही राज्य की सरकार में आम जनता की हिस्सेदारी के रूप में प्रचारित किया जाता है। जिसके निर्धारण के लिये चुनावी प्रणाली के तहत आम चुनाव को उत्सव की तरह मनाया जाता है। जिसमें आम जनता की वास्तविक हिस्सेदारी या तो नहीं होती, या होती है, तो इतनी सीमित होती है, कि उसका कोर्इ निर्णायक महत्व नहीं होता।

राज्य को एक शोषक इकार्इ ही मानते हैं- माक्र्स, एंगेल्स और लेनिन। उन्होंने सर्वहारा वर्ग की तानाशाही को समाजवादी समाज के निर्माण के लिये भले ही अनिवार्य माना है, जहां जनवाद का विस्तार भी होता है, किंतु राज्य के शोषक स्वरूप का वह अंत नहीं है। आज के संदर्भ में हम कह सकते हैं, कि यह राज्य को आम जनता या समाज के शोषित वर्ग के पक्ष में खड़ा करने की नीति है। लातिनी अमेरिकी महाद्वीप के समाजवादी देशों में आज यही किया जा रहा है। हां! परिभाषित रूप में यह सर्वहारा वर्ग की तानाशाही नहीं है। ना ही, समाजवादी क्रांति की अवधारणाओं के तहत उन देशों की राजसत्ता पर सर्वहारा वर्ग पूरी तरह काबिज है।

यदि क्यूबा की समाजवादी क्रांति को हम छोड़ दें -जहां समाजवादी समाज अस्तित्व में आ चुका है- तो शेष समाजवादी देशों में विकास के जरिये समाजवाद की नयी अवधारणायें विकसित हो रही हैं। जिसके तहत मौजूदा समाज व्यवस्था और उसकी राजनीतिक संरचना में प्रतिक्रियावादी ताकतें हैं। सरकारें समाजवादी समाज के निर्माण के लिये सामाजिक विकास योजनाओं के जरिये काम कर रही हैं। अर्थव्यवस्था का समाजीकरण हो रहा है, और खनिज, कारखानों को मजदूरों के नियंत्रण में देने की नीति पर अमल हो रहा है। उधोगों का राष्ट्रीयकरण और कृषि का सामूहिकरण किया जा रहा है। आम जनता के पक्ष में खड़ी सरकारें वर्गगत राजनीतिक चेतना एवं राजनीतिक संस्कृति का निर्माण कर रही है। गैर पूंजीवादी सामाजिक ढांचे में समाजवादी समाजव्यवस्था के निर्माण के लिये जनवाद और कम्यूनों को वेनेजुएला में राष्ट्रीय मुददा बनाया जा रहा है। जिसे माक्र्सवादी आधार पर, हम अपरिपक्व अवस्था कह सकते हैं, इसके बाद भी यह सच है, कि ‘विकास के जरिये समाजवाद’ नवउदारवादी वैश्वीकरण और मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था के जनविरोधी नीतियों के बीच, समाजवादी विकास की संभावनाओं को सकारात्मक दिशा रही है। पूंजीवादी विश्व में, समाजवादी नये विकल्पों की रचना कर रही है।

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