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मतपत्रों के पक्ष में

A polling officer waits for transport after collecting the Electronic Voting Machines (EVM) ahead of state assembly elections in Ayodhyaभारतीय जनतंत्र में अब, चुनाव से पहले, मुददों से हट कर बहंस होती है। राजनीतिक दलों को, या उनके गठबंधन को आम जनता से पांच साल के लिये सरकार बनाने और देश को चलाने के लिये जनादेश चाहिये। इसके लिये वो अपनी बात, अपनी योजनायें और अपने कार्यक्रमों को आम जनता के सामने रखती है। चुनाव से पहले घोषणा पत्र जारी करती है। और आम जनता मतदान करती है। चुनाव आयोग करोड़ों-करोड़ के खर्च और ढेरों तैयारियों के बाद, सेना, सुरक्षा बल और पुलिस प्रशासन तथा प्रशासन तंत्र के साथ इसका आयोजन करता है। और मान लिया जाता है, कि ”जनादेश मिल गया।”

यह जनादेश कितना नकली होता है, या कितना असली होता है? का जिक्र हम नहीं करेंगे। इसकी जरूरत ही नहीं है, क्योंकि देश की आधी से अधिक आबादी अपने मताधिकार का उपयोग नहीं करती। यह अपने आप में मौजूदा जनतंत्र का अधूरापन है।

वह अपने अधिकारों का उपयोग क्यों नहीं करती? इस बारे में कभी सोचा ही नहीं गया। जनतंत्र के लिये जागरूकता अभियान चलाने वाले लोग, जनतंत्र के लिये ज्यादा से ज्यादा मतदान करने का आग्रह करने वाले विज्ञापनों और विज्ञापनों से झांकने वाले बड़े-बड़े लोगों ने यह सोचा ही नहीं। सरकार, चुनाव आयोग या राजनीतिक कार्ययकर्ताओं और राजनीतिक दलों ने भी नहीं सोचा, कि इतना पसीना बहाने के बाद भी, आम जनता वोटिंग मशीनों का बटन दबाने का वक्त क्यों नहीं निकालती?

यह मान लिया गया है, कि आम जनता, देश के मतदाता राजनीतिक रूप से जागरूक नहीं हैं। शायद ‘भेंड़-बकरी’ ही हैं। किसी पूर्व न्यायाधीश ने अपने मतदान न करने के सवाल के जवाब में यह कहा था। उन्हें अपने होने का कुछ खास एहसास था, और वो भेंड़-बकरियों की लार्इन में खड़ा हो कर मतदान नहीं करना चाहते थे।

मैंने भी अपने जीवन में सिर्फ दो बार मतदान किये हैं। एक, जब मतपत्रों का जमाना था। मुहर लगाने के स्थन पर मैंने लिखा- ”कोर्इ इस लायक नहीं है।” जिसे विवादहीन रूप से कूड़े में डाल दिया गया होगा। दूसरी बार हंसिया-बाली पर मुहर लगाया था। वह भी बेकार गया। तीसरी बार मैंने बटन दबाने की जहमत नहीं उठार्इ। मगर, जब से लातिनी अमेरिकी देशों के बारे में मैंने सुना है, जहां ’21वीं सदी के समाजवाद’ की अवधारणायें जन्म ले रही हैं, मुझे लगता है- ‘मैं गलत था।’ सभी को मूर्ख समझना और बेकार गये मतपत्रों को कारगर बनाने की लड़ार्इ न लड़ना, गलत है। और यह गलती पूरे हिंदुस्तान में दशकों से होती रही है।

उन लोगों ने भी यह गलती की है, जिन्हें बहुत पहले समझ जाना चाहिये था, कि जो वर्ग राजनीतिक अज्ञानता की बुनियाद पर जनतंत्र की र्इमारत खड़ी कर रहा है, वह वर्ग वास्तविक जनतंत्र नहीं चाहता। उसके लिये, जनतंत्र का दिखावटी होना ही उसके हित में है। यही कारण है, कि साठ से अधिक लम्बे साल गुजर गये और सरकारें देश की आम जनता के पक्ष में खड़ी नहीं हो सकीं। और अब तो, खड़ा होने की जगह भी घट गयी है। एक ऐसा जनतंत्र खड़ा हो गया, जहां मतदान का ढिंढ़ोरा तो पीटा जाता है, मगर मतदाता यह मान कर चलते हैं कि उनके मतदान का कोर्इ महत्व नहीं है। जनतंत्र के लिये यह अच्छी बात नहीं है, मगर ऐसा हो चुका है। और ऐसा भी कुछ हो रहा है, जिसे दशकों पहले होना चाहिये था। मगर आप तो जानते ही हैं, कि देश की राजनीति में ‘अच्छा’ के पीछे-पीछे, ‘बुरा’ भी चलता ही चलता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने ‘नकारात्मक मतदान’ को मंजूरी दी है। तर्क यही है कि यह अभिव्यकित की स्वतंत्रता के पक्ष में है, और राजनीतिक दल सही प्रत्याशी को ही चुनाव में उतारने के लिये बाध्य होंगे। चुनाव आयोग ने भी आवश्यक सुधार को अपनी स्वीकृति दी है और उसने मतपत्र एवं र्इवीएम मशीन में भी ‘उपयर्ुक्त में से कोर्इ नहीं’ का विकल्प को भी शामिल कर लिया है। वैसे सरकार की स्वीकृति अभी बाकी है।

जिस याचिका के तहत यह निर्णय आया है, उसके अधिवक्ता का कहना है कि ”मतदाता निजी तौर पर भले ही सभी उम्मीदवाराें को नकार दें, लेकिन इससे चुनाव और उसके परिणाम पर कोर्इ प्रभाव नहीं पड़ेगा। ऐसे मतदान के अलावा शेष हुए मतदान के आधार पर प्रत्याशी की जीत तय की जायेगी।” भले ही यह अनुपात 80 और 20 प्रतिशत का हो। वैसे होना यह चाहिये कि यदि नकारात्मक मतदान ज्यादा है, तो उस क्षेत्र में फिर से मतदान हो। मतदान में मतपत्रों का महत्व होना ही चाहिये।

हमने कहा है, कि मुक्त बाजारवादी वैश्वीकरण और मनमोहन सिंह के उदारीकरण ने भारत के राजनीतिक दलों से उनके मुददे छीन लिये हैं। आज देश के हर एक राजनीतिक दल का मुददा बाजारवादी वैश्वीकरण और अर्थव्यवस्था का उदारीकरण है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, या यूपीए और एनडीए, में कोर्इ फर्क नहीं है। उनकी नीतियां और कार्यक्रम एक हैं। जो आम जनता के पक्ष में नहीं, बल्कि, निजी राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, कारपोरेशनों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के पक्ष में काम कर रही है। देश में, वामपंथी राजनीतिक दलों के हाथ-पांव फूले हुए हैं। वो तीसरा मोचा बनते नहीं, चुनाव से पहले उसे बनाने का जिक्र करते हैं।

आज आम जनता के पक्ष में खड़ा होने की स्थितियां कमजोर पड़ गयी है। यह बात किसी भी तरह से, गले के नीचे नहीं उतरती है, कि सरकार और राजनीतिक दल यदि र्इमानदारी से चाहें, तो राजनीतिक जन-चेतना का जन्म नहीं होगा, खास कर तब, जब कि आम आदमी के जीने की स्थितियां रोज बिगड़ती जा रही हों। भूख, गरीबी और बेकारी में इजाफा हुआ हो, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक दूरियां पहले से ज्यादा बढ़ गयी हों। आम जनता अपनी समस्याओं का समाधान चाहती हो। देश में राजनीतिक अनास्था का विस्तार हुआ हो। वाम दलों ने यह समझाने और खुद समझने की कोशिश ही नहीं की कि मतपत्रों को कारगर बनाया जा सकता है।

राजनीतिक अनास्था को हम राजनीतिक चेतना से पहले की स्थिति में देख सकते हैं। मौजूदा व्यवस्था से असहमति और अपनी नाराजगी व्यक्त न कर पाने की राजनीतिक हताशा के रूप में देख सकते हैं। इस लिये यह सोचना, कि ‘भेंड़-बकरियों’ के पास अपनी कोर्इ सोच नहीं है, पूरी तरह सही नहीं है। सही यह है, कि यह सोच संगठित नहीं है और वह राजनीतिक दल नहीं है, जिससे वह सहमत हो सके। आम जनता अंजाने ही, अब इस बात पर यकीन करना छोड़ती जा रही है, कि मौजूदा समाज व्यवस्था और उसकी राजनीतिक संरचना में, उसकी समस्याओं का समाधान संभव है।

आज जनता की यह सोच गलत भी नहीं है। इसके बाद भी, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तन की सकारात्मक परिस्थितियां नहीं हैं। सरकार से लेकर सरकार बनाने वाली शक्तियां आम जनता और जनसमस्याओं को धोखा देने में लगी हैं। लोगों के पास कोर्इ विकल्प नहीं है। जिस जरिये समाजव्यवस्था और उसकी राजनीतिक बुनावट को बदलने की राह दिखार्इ गयी है, उससे सिर्फ सरकारें बदलती हैं, व्यवस्था नहीं।

इस तरह, ऊपर से देखने पर हम दो विपरीत निष्कर्षों के सामने खड़े हैं-

1. आम जनता में स्पष्ट राजनीतिक चेतना का अभाव है। और

2. राजनीतिक अनास्था की वजह, उसका मोह भंग है।

वह अपनी समस्याओं का समाधान चाहती है। वह देश की सरकार को अपने पक्ष में खड़ा, देखना चाहती है। और जब ऐसा होता हुआ नजर नहीं आता, वह जो है, उससे हाथ खींच लेती है। पूरी व्यवस्था को, उसकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना को बदलने की सोच नही है।

मोह भंग, राजनीतिक अनास्था और पूरी समाज व्यवस्था को बदलने की सोच का न होना, हमारा राजनीतिक परिदृश्य है।

हम कह सकते हैं, कि आम जनता विकल्पहीन है।

हम कह सकते हैं, कि जनतंत्र के प्रति उसकी आस्था जीवित है।

और हम समझते है, कि जनतंत्र के प्रति आस्था का होना बड़ी बात है। ऐसे लोग हैं, जो डंडे के जोर पर जनतंत्र का पाठ पढ़ाना चाहते हैं। वो जर्बदस्त राष्ट्रीय चेतना के लिये, आम जनता को एक वर्दी पहनाना चाहते हैं, ताकि देश दुनिया में अपनी पहचान बना सकें। उसे अपने राष्ट्रीय होने का गर्व हो। वो राज्य और उसकी सरकार की ताकत पर यकीन करते हैं। मगर मुक्त बाजारवादी ताकतों ने जनतंत्र का अपहरण कर लिया है। और जनतंत्र के नाम पर वित्तीय तानाशाही को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने एक ऐसी राजनीतिक संरचना विकसित कर ली है, कि मतपत्र तो आम जनता के हाथों में होता है, किंतु वह मतपत्र का उपयोग अपने हित में नहीं कर सकता। उसके सामने एक ही समाज व्यवस्था के अलग-अलग मुखौटे होते हैं। आम जनता इन्हीं मुखौटों को अपना प्रतिनिधि चुनती है। और आम चुनाव के जरिये परिवर्तन की राहें बंद हो जाती हैं।

इसके बाद भी, न तो यथास्थिति है, ना ही राजनीतिक जड़ता है, क्योंकि मौजूदा समाज व्यवस्था अपनी ही विसंगतियों से घिरी है। उसकी सामाजिक एंव आर्थिक विसंगतियां उसके लिये भी बोझ बन गयी हैं। उसकी राजनीतिक बुनावट उधड़ रही है। वह अपना बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है। सिर्फ भारत में ही नहीं, दुनिया भर में वह टूट और बिखर रही है।

मौजूदार दौर में, समाज और दुनिया की बुनावट जटिल हो गयी है। वित्तीय ताकतें और एकाधिकारवादी शक्तियां देश की सीमाओं को लांघ गयी हैं। आज कोर्इ भी देश अपनी घरेलू समस्याओं का समाधान अकेले नहीं कर सकता। दुनिया की ज्यादातर चुनी हुर्इ सरकारों को आम जनता के विरूद्ध खड़ा किया जा चुका है। मतपत्रों को अपने को बनाये रखने का जरिया और जनतंत्र को उन्होंने अपना राजनीतिक हथियार बना लिया है। उन्होंने राज्य और उनकी सरकारों को अपने पक्ष में खड़ा कर लिया है।

यही कारण है, कि चुनाव से पहले, भारतीय जनतंत्र में भी, मुददों से हट कर बहंस की शुरूआत हो गयी है। चुनाव को राजनीतिक प्रक्रिया का दर्जा दे, उसमें आम जनता की हिस्सेदारी के अनुपात को दर-किनार कर दिया गया है। जन समस्याओं के समाधान की तरह ही आम जनता के मोहभंग और राजनीतिक अनास्था से राजसत्ता और राजनीतिक दलों का वास्ता घट गया है। फिर भी उन्हें जनतंत्र की चुनावी औपचारिकतायें निभानी पड़ती हैं। आम जनता के बिना उनका काम नहीं चलता।

हम यकीन के साथ यह कहने की स्थिति में हैं, कि आम जनता के बिना, सिर्फ वित्तीय ताकतों से जनतंत्र की बुनावट नहीं की जा सकती। आम जनता के पक्ष में सरकार को खड़ा करने के लिये मतपत्रों पर हमें यकीन करना ही होगा। उन विकल्पों की रचना करनी ही होगी, आम जनता की जिसमें गहरी हिस्सेदारी हो। जिन्होंने अपने को बनाये रखने के लिये जनतंत्र में हमारे मतों को अपना जरिया बना रखा है, उनका उपयोग अपने हक और अपने हितों में करना होगा और यह संभव है।

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