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आम जनता को धोखा खाना है, और वह धोखा खायेगी

rashtriya muddaभारत की राजनीतिक बुनावट बदल गयी है। साल भर पहले से 2014 के लिये चुनाव अभियान शुरू हो गया हैं जिस बारे में बहस की गुंजार्इश नहीं है, उस बारे में बहस हो रही है। ऐसा लग रहा है, जैसे हम, अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव देख रहे हैं। जहां द्विदलीय पद्धति है। रिपबिलकन और डेमोक्रेट है। एक ही शराब दो बोतल में भरी है। आप चाहे जिसे चुनें, जो चल रहा है, वही चलता रहेगा। जहां आम अमेरिकी मतदाता सीधे तौर पर राष्ट्रपति चुनता है।

भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं- ”2014 के आम चुनाव के बाद राहुल गांधी जी प्रधानमंत्री पद के आदर्श उम्मीदवार होंगे। मुझे उनके नेतृत्व में काम करने में बेहद खुशी होगी।” मतलब, वो राहुल गांधी से आगे नहीं, उनके पीछे हैंं। सुशील कुमार शिंदे ने, उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया। दिगिवजय सिंह जैसे लोग, राजस्थान चिंतन शिविर में राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाये जाने के साथ ही, उन्हें अगला प्रधानमंत्री मानना शुरू कर दिया है। आम कांग्रेसी ऐसे नारे लगाता ही रहा है।

प्रधानमंत्री या कांग्रेसी नेताओं से यह पूछना बेकार है, कि राहुल गांधी कैसे आदर्श उम्मीदवार हैं? वो नारा लगाने के आदी हैं, कोर्इ नहीं मिला तो वो आपके कंधे पर चढ़ कर नारा लगाने लगेंगे। राहुल गांधी का नेहरू-गांधी परिवार में जन्म लेना ही उनके लिये सबसे बड़ी योग्यता है, और इस योग्यता पर शक करने का कोर्इ आधार नहीं है। योग्यतायें नाकामियों से घिरी हों, मगर वो सोलहों आने योग्य हैं, तो हैं।

बहर हाल, बहस यह नहीं है, कि राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री पद के लिये योग्य हैं या नहीं हैं? बहस कुछ और है। जिस पर आने से पहले हम भारतीय जनता पार्टी के घमासान पर भी नजर डाल लें। विवशता है, गुजरात के वर्तमान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी देखना ही होगा। जिनके पक्ष में पर्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख भागवत हैं। विरोध में तो कर्इ हैं, मगर लाल कृष्ण आडवाणी का चेहरा बना दिया गया है। महीनों से नाटक जारी है। आडवाणी की नाराजगी, इस्तीफा, मान मनउवल, धमकी-प्रदर्शन, दबाव और फिर जो जहां है, उसकी वहीं पर वापसी। अंतत: जो पहले से तय था, उसकी घोषणा। नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। समता पार्टी एनडीए से अलग हो गयी, तो हो गयी।

इन राजनीतिक दलों ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारी को दबाव अपने ऊपर खुद ही बनाया। बड़ी सोची-समझी चाल है। आम जनता को इस बात से कुछ खास लेना-देना नहीं है, कि राहुल गांधी विराजते हैं, कि नरेंद्र मोदी की ताजपोशी होती है? इन राजनीतिक दलों को आम जनता की फिक्र भी नहीं है। वो ‘प्रधानमंत्री’ बनाने वाली ताकतों, को इस उम्मीदवारी से अपने पक्ष में करना चाहते हैं। उनकी फिक्र निजी राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इ और वो कारपोरेशन हैं, जिनके बिना सरकारें नहीं चलतीं। वित्तीय संकट झेल रही सरकारें तो बिल्कुल नहीं चलतीं। चीन और रूस की सरकारों को, ये बना या बिगाड़ नहीं सकतीं। क्यूबा और लातिनी अमेरिकी देशों की सरकारों पर इन ताकतों का बस नहीं चलता। मगर, यूरोपीय संघ के सदस्य देश और अमेरिका, तथा तीसरी दुनिया की अविकसित और विकासशील देशों की सरकारों के बनने बिगड़ने में इनकी दखल होती है।

मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार इनके हितों के लिये ताबड़ तोड़ फैसले ले रही है। ढ़हती वित्त व्यवस्था और पिघलते रूपये को बचाने की कोशिशें कर रही है। वो विश्वस्निय हैं, कि उनके रहते इन निजी वित्तीय ताकतों का हित सुरक्षित है। इसलिये, वो राहुल गांधी के पीछे खड़े हो रहे हैं।

नरेंद्र मोदी ने बड़ी होशियारी से मिशन 2014 को भाजपा की ओर से पेश कर दिया और यह समझा दिया कि ”महानुभव! हम उनसे पीछे नहीं हैं।” लगे हाथ उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी को भी नेपथ्य में डाल दिया कि श्रीमान, आप बूढ़े हो गये हैं। बूढ़ा शेर पिंजड़े में ही अच्छा लगता है।” पिंजड़ा देश सेवा और वर्दीधारी आदर्श का है।

देश में यह पहला चुनाव होगा, जिसमें आम जनता को पहले से ही बताया जा रहा है, कि ”हम आपके प्रधानमंत्री हैं।” जबकि आम जनता संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर प्रधानमंत्री को चुनती ही नहीं। बहुमत दल के नेता को प्रधानमंत्री बनाया जाता है। सामूहिक जिम्मेदारियों के तहत वह अपने मंत्रीमण्डल का गठन करता है। वह चाहे तो बाद में भी सांसद का चुनाव लड़ सकता है। जनतंत्र के संसदीय प्रणाली में यही संवैधानिक प्रावधान है।

केंद्र में लगभग तीन दशक से ज्यादा संयुक्त मोर्चे की सरकार है। किसी भी राजनीतिक दल को न तो स्पष्ट जनादेश मिला, ना ही संसद में स्पष्ट बहुमत हासिल है। सरकार कर्इ खिंचे रस्सी पर नटों की तरह करतब दिखाती हुर्इ, अपना कार्यकाल पूरा करती है। जिसके पास अपनी नाकामियेां के लिये अच्छा तर्क होता है। यह भी तर्क होता है, कि गठबंधन की सबसे बड़ी राजनीतिक दल अपनी नीतियों को भीतरी दबाव की वजह से, पूरा नही कर पाती है। मनमोहन सिंह के मुक्त बाजारवाद की असफलता पहले से तय थी, मगर उन्होंने इसका ठिकरा वैश्वीकमंदी और संयुक्त मोर्चे की सरकार के सिर पर फोड़ने का काम किया।

पश्चिम बंगाल में 33 सालों तक शासन करने वाली वाम मोर्चा की सरकार का अधिकार समान विचार रखने वाली राजनीतिक दलों का मोर्चा था। सत्ता से बेदखल होने के बाद भी उन्होंने एक-दूसरे पर पराजय का आरोप नहीं मढ़ा और वाम मोर्चा आज भी है। किंतु यूपीए और एनडीए के साथ ऐसा नहीं है। सरकार बनाने के लिये एक-दूसरे के विरोधी दल आपस में जुड़ जाते हैं। न्यूनतम कार्यक्रमों को कोर्इ मोल नहीं होता। मोलभाव होता है। मान-मनउवल होता है। खरीद-फरोख्त नगद और रूतबे की शक्ल में होता है। सबसे बड़े राजनीतिक दल के पास संतुलन बनाने के लिये लम्बा सा डंड़ा होता है, मगर तने हुए रस्से को हिलाने और खड़े हुए खमाची को उखाड़ने वाले लोग भी तलवार लिये खड़े होते हैं। कंेंद्र की यूपीए सरकार बाहर से मिले समर्थन पर टिकी है। समर्थन के लिये समझौतों का रूप बार-बार बदलता रहा है। संसद की गरिमा का खणिडत होना और सरकार भदद आम बात हो गयी है। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के पास मौके का लाभ उठाने का तर्क है।

कुल मिला कर देश में तीन दशक से ज्यादा से ऐसी सरकार है, जिसे अपने को बचाये रखने के जोड़-तोड़ को वरियता देनी पड़ती है, जो खुद के प्रति प्रतिबद्ध है। और शेष बची प्रतिबद्धता उन वित्तीय ताकतों के लिये है, जो उसे बचाने की गारण्टी देते हंैं। जिसके पास न तो स्पष्ट जनादेश है, ना ही स्पष्ट बहुमत है। आम मतदाता इन राजनीतिक दलों के तिकड़म को अस्वीकार कर चुकी है। उसकी स्पष्ट सहमति कहीं नहीं है।

पहले से घोषित प्रधानमंत्री का यह गैर-संवैधानिक प्रावधान इन्हीं अनिवार्यताओं से बन रहा है। एक ऐसी राजनीतिक परिपाटी बनायी जा रही है, जिसमें संसद और मंत्री मण्डल से ज्याद महत्व प्रधानमंत्री का होगा। क्षदम लाल किला से नरेंद्र मोदी भाषण देते हैं। 13 तारीख को पार्टी संसदीय बोर्ड की सहमति और राजनाथ सिंह के द्वारा घोषणा के बाद उन्होंने कहा- ”भाजपा को विजयी बनाने के लिये जी-जान से परिश्रम करेंगे।” उन्हें लगता है, कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक, लोग कमल खिलाने की तैयारी कर रहे हैं। एनडीए के सहयोगी दलों ने भी इस निर्णय का स्वागत किया।

rashtriya mudda (2)2014 का चुनावी समिकरण अब तेजी से बदलेगा। वाम मोर्चा या तीसरे मोर्चे के विकल्पों को हासिये पर जगह मिलेगी। संसदीय प्रणाली में अध्यक्षात्मक प्रणाली का बीज डाला जा चुका है। मनमोहन सिंह नहीं मानेंगे, और उनके समर्थकों को भी खास अच्छा नहीं लगेगा, मगर, अर्थव्यवस्था के निजीकरण का प्रभाव देश के संसदात्मक व्यवस्था और उसकी राजनीतिक संरचना पर पड़ने लगा है। किसी भी क्षेत्रीय दल या तीसरे मोर्चे के पास ऐसी उम्मीदवारी का खाना खाली रहेगा। मीडिया खुले दिल से प्रचार यह करेगी, कि कांटे की टक्कर भाजपा और कांग्रेस के बीच है। एनडीए और यूपीए के बीच है। शेष, बस शेष ही हैं। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, बंगाल की तृणमूल कांग्रेस, बिहार में समता और राजद और अन्य क्षेत्रीय दलों के अलावा देश के वामपंथी दलों के सामने मुश्किलें बढ़ेंगी। माना यही जायेगा, कि या तो वो विपक्ष में बैठेंगी या इन्हीं गठबंधनों को हिस्सा बनेंगी। उनकी लिये अब स्वतंत्र अस्तित्व बचाना आसान नहीं होगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति अपने चार साल के कार्यकाल में एक साल चुनाव प्रचार अभियानों के हवाले कर देता है, भारत में पांच साल का एक साल अब चुनाव प्रचार के हवाले होगा। जिसमें पूरी मसक्कत करने के बाद भी बमुश्किल 35 से 40 प्रतिशत मतदाता ही भाग लेंगे। देश की वयस्क आम जनता सीधे तौर पर प्रधानमंत्री को नहीं चुनती, मगर प्रधानमंत्रियों की उम्मीदवारी घोषित की जा रही है। मीडिया और प्रचारतंत्र ने कहना शुरू कर दिया है, कि 2014 का चुनाव राहुल बनाम नरेंद्र मोदी है। क्या वास्तव में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी ही हमारे राष्ट्रीय मुददे हैं? मुददों को धत्तता बताने की बिसात बिछ गयी है। आम मतदाता को धोखे में आना है, और वह धोखा खायेगी।

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