Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / मुजफ्फर नगर- साम्प्रदायिक दंगों से उपजे सवाल

मुजफ्फर नगर- साम्प्रदायिक दंगों से उपजे सवाल

saval dar savalभारत में मुसलमान पाकिस्तान ही नहीं, किसी भी इस्लामी देश से ज्यादा सुरक्षित हैं, अब यह सवाल नहीं सच है। यदि ऐसा नहीं होता तो, हर एक आतंकी हमले के बाद साम्प्रदायिक दंगे होते। और इतने दंगे होते, कि उन्हें रोक पाना कठिन होता। मगर, अब ऐसा नहीं होता। देश के विभाजन की कडुवाहट घुल गयी है। यह भी मान लिया गया है, कि ‘फूट डालो और राज करो’ की नीतियों का राजनीतिक परिणाम विभाजन था। खूनी दंगों के बाद भी देश की आम जनता विभाजन के पक्ष में नहीं थी। मुल्कों की हुकूम के प्रति अविश्वास से उपजा हुआ डर ही दंगों का कारण था।

सामाजिक रूप से यह खौफ घटते-घटते खत्म भले ही नहीं हुआ है, मगर, पूरी तरह घट गया है। जिसे गुजरात में उभारा गया। लम्बे अंतराल के बाद उत्तर प्रदेश में उसे फिर से जमीन दी गयी। मुजफ्फर नगर का जो सच उभर कर सामने आ रहा है, प्रदेश की सपा-अखिलेश सरकार कटघरे में है।

समाज के जिस संतुलन को आतंकी हमलों से नहीं तोड़ा जा सका, उसे राजनीतिक नेतृत्व और सरकार की नाकामियां तोड़ देती हैं। यह सवाल तो है।

सवाल यह भी है, कि देश के ज्यादातर राजनीतिक दल साम्प्रदायिक वातावरण के गरमाने में अपना फायदा क्यों देखते हैं? जबकि सामाजिक संतुलन को बनाये रखने की जिम्मेदारी उन पर है। यदि आम जनता का यकीन टूट जायेगा और ‘चेन रिएक्शन’ की शुरूआत हो जायेगी, तो वह कहां जा कर रूकेगी? क्या देश को बाजार बनाने के लिये उसे शरणार्थी शिविरों में बदलना जरूरी है?

हमें यह रिपोर्ट पढ़ने को मिली, कि ”यदि सभी राजनीतिक दल दंगे पर सियासत करने के स्थान पर, मिलकर स्थितियों को सामान्य बनाने के लिये प्रयत्न करें, तो शहर सें गांव तक फैली दंगे की आग को जल्द ही बुझाया जा सकता है।”

यह निष्कर्ष कितना सही है, कितना गलत?

या, यह निष्कर्ष कितना कारगर प्रमाणित होगा?

शायद, इस पर बहस इसलिये गैर जरूरी है, कि ‘ऐसी कोशिशें कामयाब होती हैं’ में संभावनायें हैं। सामाजिक संतुलन और विश्वासों की बहाली पूरी तरह से ना सही, थोड़ा ही सही कारगर हो सकती थी, मगर राजनीतिक दलों ने इन संभावनाओं को बनने नहीं दिया।

प्रदेश की सपा सरकार यदि नकारा सिद्ध हुर्इ है, और ऐसा भी हुआ है कि, उसने स्थितियों की गंभीरता को समझने में अक्षम्य अपराध किया है, तो शेष राजनीतिक दलों ने क्या किया?

प्रदेश की प्रमुख विपक्षी दल बसपा ने अखिलेश सरकार को बर्खास्त करने की मांग की।

भाजपा के अघ्यक्ष राजनाथ सिंह ने राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की। जिसने गुजरात में दंगे के दौरान नरेंद्र मोदी के लिये कुछ और कहा था।

कांग्रेस केंद्र में सत्तारूढ़ और उसने दंगे को बड़ी फिक्र की। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुख्यमंत्री अखिलेश से भी चर्चा की। उन्होंने सियासी लाभ उठाने वाले राजनीतिक दलों का भी जिक्र किया, मगर जब वो दंगा प्रभावित क्ष़ेत्रों का दौरा किये तो सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी भी थे। जिनकी आंखें दंगा पिड़ीतों की कहानियां सुन कर भरी और शरणार्थी शिविर में रहने वालों से कहा- ”देश उनके साथ है।” मगर दंगा-फसाद और आतंकी हमलों के दौरान आम आदमी हमेशा अकेला पड़ जाता है। और उसका यूं अकेला पड़ना ही, सबसे बड़ी दूर्घटना है। वह खतरा है जिसे वह झेलता है। सरकारें और राजनेता जिसे और बढ़ा देते हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा- ”लोगों की जान-माल की हिफाजत करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।” बस! सियाशत शुरू हो जाती है। भाजपा के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी इसे ‘सेक्युलर टूरिज्म’ कहते हैं। प्रधानमंत्री सहित कांग्रेस का कुनबा केंद्र सरकार की दरियादिली और राज्य सरकार को कमदिली से भी आगे बढ़ जाते हैं। वो राज्य की सरकार को दोषी ठहराते हैं, कि ”केंद्र ने साम्प्रदायिक तनाव की जानकारी राज्य सरकार को दी थी, किंतु राज्य सरकार दंगा रोकने में नाकाम रही है।” केंद्रीय गृहराज्य मंत्री भी यही कहते हैं। पहले राज्य सरकार पर अल्पसंख्यक समुदाय के पक्ष में एकतरफा कार्यवाही का आरोप लगा, अब केंद्र सरकार भी उसी कतार में खड़ी हो गयी है।

50 हजार से अधिक लोग राहत शिविरों में पहुंच गये, और संवेदनाओं का प्रदर्शन केंद्र भी यही बन गये। प्रधानमंत्री, कांग्रेसी अध्यक्ष-उपाध्यक्ष ने अपनी संवेदना और चिंताओं को वहीं उड़ेला। वह भी हिंसा पीडि़त लोगों के विशेष तबके से। इससे भी बड़ी तादाद, जो दहशतज़दा गांवों में पड़ी है, वहां की राह किसी को सूझी ही नहीं, जिसके बारे में केंदि्रय रिपोर्ट है, कि शहरों की हिंसा को तो रोका जा सकता है, किंतु गांवों की सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं होने की वजह से इस हिंसा को रोकने में महीनों लग जायेंगे।” मतलब? सरकार का वजूद नहीं होगा, और लोग अपनी समस्याओं का समाधान खुद निकालेंगे, या हालात बेकाबू ही रहेंगे, लोग मरते-कटते रहेंगे। मजदूरों-किसानों का दर्द सुनने वाला कोर्इ नहीं है।

काकड़ा के जवाहर सिंह का कहना है कि ”प्रदेश और केंद्र सरकार वोटों के हिसाब से आंसू पोछने का काम कर रही है। मजहब, वोट और दंगे को भुलाकर इन नेताओं को सबका दर्द सुनना चाहिये था। मगर, वो ऐसा नहीं कर रहे हैं।”

सरकारें और राजनीतिकबाज नेता वह कर रहे हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिये। ऐसे में आम आदमी जो वास्तव में हिंदू है, न मुसलमान है, वह राज्य और सरकार और उसे चलाने वालों पर भरोसा कैसे करेगा?

क्या यह अजीब नहीं है, कि कटघरे का दायरा रोज बढ़ जाता है। प्रदेश के राज्यपाल ने केंद्र को भेजे अपने रिपोर्ट में लिखा- ”सूबे में साम्प्रदायिक तनाव के लिये प्रदेश सरकार का रवैया जिम्मेदार है। हालात काबू से बाहर दिखार्इ दे रहे हैं।”

एक लड़की से छेड़-छाड़ और तीन युवकों की हत्या के बाद एक महा-पंचायत से शुरू हुर्इ वारदातों की कडि़यां जुड़ती चली गयी हैं। यह सवाल तो पूछना ही चाहिये, कि जहां साम्प्रदायिक सदभावनायें दशकों से रची-बसी, जहां दो सम्प्रदाय के लोगों के बीच तनाव तक नहीं था, वहां इतना जहर आया कहां से? ऐसा क्यों हुआ कि आग बेकाबू होती चली गयी?

पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आर0के0 सिंह का मानना है कि ”कुछ पार्टियां वोटों के ध्रुवीकरण की वजह से एक खास समुदाय के पक्ष में ज्यादा झुकी हुर्इ हैं। इससे दूसरे समुदाय में असुरक्षा की भावना व्याप्त होती है। प्रतिस्पर्धा वाले राजनीतिक दल इस असुरक्षा की भावना को हवा दे कर आग फैलाने में अपना हित देख रहे हैं।” आर0के0 सिंह मानते हैं, कि ”एक समुदाय में, सरकार से न्याय की ना-उम्मीदी ने उन्हें हथियार उठाने की वजह दी।” और यह ना-उम्मीदी खौफ से खौफ को बढ़ाती चली गयी। आर0के0 सिंह वोट की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों को ही दंगे के विस्तार की वजह मानते हैं।

गृहमंत्रालय को सौंपे गये गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट से इस बात की जानकारी मिलती है, कि दंगा पूरी तरह से सुनियोजित था। कवाल में तीन लड़कों की मौत के बाद यदि पुलिस उन्हें हिरासत में ले ली होती, तो मामला इतना नहीं बढ़ता।” रिपोर्ट के तहत ”सरकार में नम्बर दो हैसियत वाले एक मंत्री ने पुलिस प्रशासन को कोर्इ कार्यवाही न करने के आदेश दिये थे। सात सितम्बर तक लखनऊ से कोर्इ आदेश न मिलने की वजह से कोर्इ कार्यवाही नहीं की गयी और दंगा भड़का गया।” अब भड़के हुए दंगे को नियंत्रित करने के लिये सेना उतार दी गयी है। सरकार चौकस हो गयी है। अखिलेश यादव के पीछे से मुलायम सिंह यादव निकल आये हैं।

क्या एक ही समुदाय पर दो राजनीतिक दलों की उम्मीदों के बीच दंगे की कड़ी है?

यह सवाल आसान नहीं। इसका जवाब हमें आसानी से नहीं मिलेगा। भाजपा कांग्रेस पर राजनीतिक तुष्टीकरण का आरोप लगाती रही है। प्रदेश की सत्तारूढ़ सरकार अल्प संख्यक समुदाय को केंद्र में रख कर जातीय समिकरण से अपने ‘वोट बैंक’ का आंकलन करती है। बसपा दलितों के साथ अब सवर्णों को अपने साथ ले कर चल रही है। अंत में भाजपा अल्प संख्यक के बजाये बहुसंख्यक वर्ण की राजनीति कर रही है। सरकार बनाने का गणित वर्ण, धर्म, जाति और साम्प्रदायिक आंकड़ों से तय होता है। जाति और साम्प्रदायिक चेतना का लाभ, मतपत्रों की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों को मिलता है। इस तरह जो निष्कर्ष सामने आता है, वह संगीन है।

यह सही है या गलत? हम नहीं जानते। हम इतना जानते हैं, कि सभी राजनीतिक दलों के सामने 2014 का आम चुनाव और उससे पहले कर्इ राज्यों में होने वाले विधानसभाओं का चुनाव है। वर्ण, जाति और सम्प्रदाय की बढ़ती चेतना का लाभ सिर्फ मतपत्रों का धु्रवीकरण नहीं है, बल्कि उन ताकतों के खिलाफ यह धु्रवीकरण भी है, जो देश की बाजारवादी वित्त व्यवस्था को, देश की आम जनता के विरूद्ध मानते हैं। जो धर्म, जाति एवं सम्प्रदाय की राजनीति के खिलाफ हैं। दंगे और जातीय हिंसा जिनकी राहों को रोकती है।

क्या आप को ऐसा नहीं लगता कि धर्म, जाति और सम्प्रदाय के जो खिलाफ है, मुक्त बाजारवादी ताकतों के खिलाफ भी वही है?

दंगे-फसाद, जातीय हिंसा चाहे जहां भी हो, समाज की जनवादी भावनायें ही आहत और विकलांग होती हैं। इस बात की तलिखयां और नाराजगी बहुत है।

Print Friendly

One comment

  1. उपयोगी जानकारी के लिए धन्यवाद। बुकमार्क करने के लिए अपने ब्लॉग को जोड़ने की जरूरत

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top