Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / भारत, चीन और रूस के बीच सहयोग की संभावनायें!

भारत, चीन और रूस के बीच सहयोग की संभावनायें!

rashtriya antarrashtriyaमास्को में, जी-20 सम्मेलन से ठीक पहले, बि्रक्स देश- ब्रजील, भारत, रूस, चीन और द0 अफ्रीका- आपस में मिले। यूं तो मुददा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में डालर की वजह से, विकासशील देशों की लड़खड़ाती मुद्रा व्यवस्था था, मगर सीरिया का मुददा छाया रहा। उस समय की घोषणा के आधार पर बराक ओबामा सीरिया पर हमले के लिये, विश्व समुदाय के देशों का समर्थन ढूंढते फिर रहे थे। मगर, अमेरिकी आरोपों पर किसी को यकीन नहीं था, कि सीरिया की बशर-अल-असद सरकार ने रासायनिक हथियारों से हमला किया है।

सीरिया पर हमले की स्थिति में साथ देने के वायदों से बंधे फ्रांस और बि्रटेन में राष्ट्रपति होलांदे और प्रधानमंत्री कैमरन की हालत अपने देश में आज भी खराब है। बि्रटिश संसद ने प्रधानमंत्री के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। और होलांदे की लोकप्रियता फ्रांस में इतनी घट गयी है, कि चुनाव होने पर उनका सफाया हो जायेगा। जी-20 के देशों में भी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। रूस और चीन की स्थिति अमेरिका के बजाये मजबूत थी। रूस ने स्पष्ट घोषणां कर दी, कि राष्ट्रसंघ -सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना, किसी भी सैन्य कार्यवाही का रूस विरोध करता है। ऐसी स्थिति में वह सीरिया के साथ है।

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, शायद अपने जीवन में पहली बार, किसी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर, अमेरिका के विरूद्ध खड़े नजर आये। जी-20 शिखर सम्मेलन में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ”सीरिया के मामले में संयुक्त राष्ट्रसंघ की जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जाना चाहिये, और कोर्इ भी कदम संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले ही उठाया जाना चाहिये।” उन्होंने अमेरिकी हमले की योजना को एक सिरे से खारिज कर दिया। यही नहीं अतीत से कतराने वाले मनमोहन सिंह ने इराक में अमेरिकी सैन्य कार्यवाहियों की ओर संकेत करते हुए कहा कि ”अतीत के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले तथ्यों के बारे में पूरी सावधानी बरतनी चाहिये।”

प्रधानमंत्री की यह समझदारी रूपये की चरमराती स्थितियों की वजह से है, या बि्रक्स देशों की एकजुटता का दबाव उन पर है, या उनकी समझ वास्तव में विस्तार पा रही है? यह कहना मुश्किल है। मगर उन्होंने वह कहा, जिसकी अपेक्षा हमें नहीं थी। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और विश्व समुदाय को भी भारत के इस प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं थी। उनकी आर्थिक समझ अमेरिकी स्कूल की रही है, उनका उदारीकरण भी अमेरिकी अर्थशास्त्र का ऐसा सिद्धांत है, जो संकटग्रस्त है। वो दशकों से अमेरिकी अर्थशास्त्र के प्रभाव में हैं, और एक दशक लम्बे प्रधानमंत्री के कार्यकाल का उनका हासिल भारत को अमेरिकी खेमें में खड़ा करना है।

सोवियत संघ के पतन के बाद, बदलते हुए विश्व परिदृश्य में उन्होंने भारत को अमेरिका और यूरोपीय संघ के करीब पहुंचा दिया। जिसका सीधा प्रभाव रूस, चीन और भारत के पड़ोसी देशों पर पड़ा। भारत की अंतर्राष्ट्रीय विश्वस्नियता घटी और गुटनिर्पेक्ष देशों के बीच उसकी शाख भी गिरती चली गयी। यदि वह बि्रक्स देशों का सदस्य देश नहीं होता, तो रूस और चीन से उसके रिश्ते ना के बराबर ही रह जाते। हालांकि, आज भी भारत की सामरिक सुरक्षासामान और हथियारों की खरीदी 75 प्रतिशत रूस से होती है, इसके बाद भी सच यही है, कि भारत और रूस के बीच मनमोहन सिंह ने अमेरिका को खड़ा कर दिया है। जिस समय इराक पर अमेरिका सहित बहुराष्ट्रीय सेनाओं के हमले से तबाही के बाद, सारी दुनिया में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को लोग शैतान मान रहे थे, और अमेरिका लोकतंत्र के लिये भारी खतरा बन गया था, मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार को खतरे में डाल कर, अमेरिका से परमाणु करार किये।

जिस समय रूस और चीन के आपसी रिश्ते मजबूत हो रहे थे, भारत अमेरिका से अपने रिश्तों को मजबूत करने में लगा था। इराक, र्इरान, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे मुददे पर भी वह अमेरिकी नीतियों का समर्थन करता रहा। अपने इन पूर्व मित्र देशों के प्रति उसने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभार्इ। वह अमेरिकी दबाव में रहा। सोवियत संघ के समय बने गुटनिर्पेक्षिता की नीतियों को उन्होंने बदल दिया। मनमोहन सिंह ने भारत को अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान जैसे देशों के इतने करीब खड़ा कर दिया, कि उसकी दूरियां रूस जैसे भारत के परम्परागत स्वाभाविक मित्र देश से बढ़ गयी।

हम जानते हैं, कि रूस सोवियत संघ नहीं है, और चीन के विकास की दिशा बदल गयी है। मुक्त बाजारवाद के नये क्षेत्र का निर्माण और अमेरिकी एकाधिकार के विरूद्ध संतुलन की नीतियों के तहत रूस और चीन के सम्बंधों का विकास हुआ। आज सारी दुनिया में वो एकमात्र ऐसी वित्तीय एवं सामरिक शक्तियां हैं, जो अमेरिकी मनमानी को नियंत्रित कर सकते हैं। यदि सीरिया के मुददे पर रूस और चीन की आपसी एकजुटता नहीं होती, तो र्इरान और सीरिया के शेष सहयोगी देश और हिजबुल्ला जैसे संगठनों को अमेरिका एवं पश्चिमी देशों सहित इस्त्राइली हमले का सामना करना पड़ता।

स्थितियां जटिल आज भी हैं, किंतु बराक ओबामा को सीरिया में कूटनीतिक पराजय मिल चुकी है।

यदि भारत, रूस और चीन से अपने रिश्तों को मजबूत करता है, तो अमेरिकी नीतियों -वित्तीय एवं सामरिक संतुलन को बदलने की नीतियों- को गहरा आघात लगेगा। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को बढ़ाने की उसकी नीतियों को खारिज करना संभव हो सकेगा। अमेरिकी रणनीतिकार इस बात को अच्छी तरह जानते हैं, इसलिये भारत, चीन और रूस के संयुक्त समिकरण के खिलाफ वो भारत का उपयोग कर रहे हैं। पेण्टागन सीनेट में भारत से सामरिक रिश्तों को बढ़ाने की पेशकश करता है, और व्हार्इट हाउस वालस्ट्रीट के इशारे पर अपने वित्तीय सम्बंधों को बढ़ाने, भारत को मुक्त बाजार का अमेरिकी क्षेत्र बनाने की नीतियों पर चल रहा है। भारत और चीन के बीच सीमाविवाद के मुददे से तलिखयां बढ़ाने में लगा है।

यह बात खुल कर सामने आ गयी है, कि अमेरिका एशिया प्रशांत क्षेत्र, चीन सागर और कोरिया प्रायद्वीप में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने के लिये जापान और द0 कोरिया पर चीन से अपने विवादों को बढ़ाने का दबाव बढ़ाता जा रहा है। इस बात की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत पर भी ऐसा दबाव है। इस बीच भारतीय सीमाओं में चीनी घुसपैठ और पाकिस्तान के द्वारा गोला-बारी सहित सीमाओं के उल्लंघन के प्रति भारत सरकार का रवैया अपेक्षाकृत संतुलित रहा है। भारतीय मीडिया ने अपुष्ट खबरों को जितना तूल दिया और जिस तरह प्रचार अभियान सा चलाया, उससे इस आशंका को बल मिलता है, कि सरकार की नीतियों को प्रभावित करने के लिये ‘कुछ तो हुआ है।’

चीन और भारत के रिश्ते स्वाभाविक नहीं हैं। इसके बाद भी सच यह है, कि भारत के प्रति चीन का नजरिया निश्चय ही बदला है। चीन अपने पड़ोसी देशों से सम्बंधों को बेहतर बनाने की नीति पर चल रहा है। उसने कोरिया प्रायद्वीप और चीनी सागर के देशों से अपने सम्बंधों में नयी पहल की है। उसने अपनी वित्तीय मजबूती को आशियान देशों के लिये अवसर करार दिया और इस क्षेत्र के खनिज एवं तेल सम्पदा के दोहन के लिये आपस में मिल-जुल कर काम करने का प्रस्ताव रखा। गये महीने भारत की राजकीय यात्रा पर आये चीन के प्रधानमंत्री ने इस क्षेत्र की शांति, स्थिरता और विकास के लिये दोनों देशों के अच्छे सम्बंधों को आवश्यक बताया। उनकी मान्यता है कि दोनों देश महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका अदा कर सकते हैं। उन्होंने औपनिवेशिक ताकतों के द्वारा खड़ा किये गये, सीमा विवाद को सुलझाने का जिक्र किया। भारत के प्रति चीन का रूख आज जितना सकारात्मक है, इससे पहले कभी नहीं रहा।

जिस समय चीन के प्रधानमंत्री ने भारत की यात्रा की, उसी महीने चीन के नये राष्ट्रपति ने रूस की राजकीय यात्रा की। रूस चीन की स्थिरता, वैकलिपक वैश्विक मुद्रा व्यवस्था और सामरिक सुरक्षा के लिये जितना अनिवार्य है, भारत का महत्व भी कम-ओ-बेश उतना ही है। हमारी मान्यता है कि अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय शक्तियों से दुनिया की सुरक्षा के लिये भारत, चीन और रूस का ध्रुवीकरण जरूरी है।

रूस और चीन के हित आपस में जुड़ गये हैं। शंघार्इ सहयोग संगठन में चीन और रूस के अलावा पूर्व सोवियत संघ के देश बने सदस्य देश हैं। जिसका महत्व तेजी से बढ़ा है। ‘बिखरा हुआ र्इंट’ कहने वाले अमेरिका और यूरोपीय देशों को भी ‘बि्रक्स’ देशों के संगठन का महत्व समझ में आने लगा है। रूस और चीन ने अपने वित्तीय एवं सामरिक रिश्तों को द्विपक्षीय समझौतों से भी मजबूत कर लिया है। उनकी पकड़ तीसरी दुनिया के देशों में अच्छी है। दोनों देशों की वित्तीय क्षमता अमेरिका और यूरोपीय संघ की लड़खड़ाती वित्त व्यवस्था के अनुपात में जरूरत से ज्यादा मजबूत है और सामरिक दृष्टि से दोनों की क्षमता, अमेरिका की क्षमता से कम नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय संघ ने अपनी विश्वस्नियता खो दी है, जबकि रूस और चीन की विश्वस्नियता में भारी इजाफा हुआ है। सीरिया के मुददे पर अमेरिका और यूरोपीय देशों की छवि युद्धउन्मादियों की है, जबकि रूस और चीन युद्ध विरोधी छवि के साथ उभरे हैं। अमेरिका और कर्इ यूरोपीय देश आज भी सीरिया के खिलाफ हमले की बकवास कर रहे हैं। जबकि विश्व जनमत और विश्व समुदाय किसी भी युद्ध के खिलाफ है। वो अपने देश की सरकारों से जन-समस्याओं का समाधान चाहती है।

सीरिया के मुददे पर मनमोहन सिंह ने जो पहल की है, उसका प्रभाव भारत-अमेरिकी सम्बंधों पर कोर्इ खास नहीं पड़ेगा, ना ही इस बात की अपेक्षायें पाली जा सकती हैं, कि अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में मनमोहन सिंह भारतीय नीतियों में कोर्इ खास बदलाव कर पायेंगे। अमेरिका से परमाणु करार से लेकर अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और एशिया प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी युद्धपोतों की तैनाती की रणनीति से लेकर सर्विलांस प्रोग्राम तक की गलत नीतियों के समर्थक वो ही हैं।

इसी महीने वो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से व्हार्इट हाउस में मिलें और अभी वो वहीं हैं। पहले दौर की वार्ता के बाद मनमोहन सिंह को छोड़ने बराक ओबामा पोर्टिको तक आये, जिसका प्रचार भारतीय मीडि़या ने जोर-शोर से किया। ऐसे किया जैसे मनमोहन सिंह बराक ओबामा के लिये खास हैं। खास हैं भी। इस बात पर गौर नहीं किया गया, कि अमेरिका से सम्बंधों को बढ़ाने या सम्बंधों को घटाने की स्थितियां बनती हैं, भारत पर पाकिस्तान की ओर से आतंकी हमला हो जाता है। इस मर्तबा भी कश्मीर पर दो हमले हुए। अमेरिका में ही मनमोहन सिंह ने नवाज शरीफ को कड़े संदेश दिये। बराक ओबामा ने भी कहा कि ”वो पाक प्रधानमंत्री पर दबाव बनायेंगे।” जिस देश का राष्ट्रपति दुनिया के ज्यादातर आतंकी हमलों का सूत्रधार है, उसकी मंसा भारत को, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में शामिल करने की है। अच्छे सम्बंधों को बढ़ाने की है। मनमोहन सिंह अच्छे सम्बंधों के पक्षधर रहे हैं। मगर, कुछ लोगों का अनुमान है, कि अमेरिका समर्थक अपनी छवि को बदलने के लिये वो रूस की राजकीय यात्रा पर जायेंगे, और उसके बाद चीन की राजकीय यात्रा भी तय है। यदि वास्तव में भारत की सरकार रूस और चीन से अपने सम्बंधाेंं में निर्णायक सुधार कर लेती है, तो सिर्फ भारत के लिये ही नहीं, रूस, चीन और एशिया के लिये भी यह महत्वपूर्ण घटना होगी। राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर साम्राज्यवादी हस्तक्षेप को रोका जा सके और सामरिक असंतुलन एवं हथियारों की होड़ पर भी रोक लगेगी। एशिया की शांति, स्थिरता और विकास की संभावनाओं की सकारात्मक पहल आसान हो सकेगी, जहां अमेरिकी साम्राज्य गंभीर खतरा बन चुका है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top