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अमेरिकी सरकार युद्ध का कारोबार कर रही है

americaअमेरिका का वार्षिक युद्ध खर्च 682 बिलियन डालर है। जिसे पूरा करने के लिये अब यह युद्ध का कारोबार और हमलों का करार कर रही है। जो हथियार उत्पादक निजी कम्पनियों के लिये किसी बेलआउट पैकेज से कम नहीं है, जिससे बाजार में तेजी आती है, और सरकार हमले का करार कर अपने लिये भी लाभ बटोर लेती है। मौजूदा दौर में एशिया और अफ्रीका उनके लिये अच्छा बाजार हैं। जहां आतंकवादियों के जरिये राजनीतिक अस्थिरता पैदा की जा चुकी है, हंथियारों की मांग है, और कर्इ अरब देश हमले का प्रस्ताव भेज रहे हैं। कुछ करार निश्चय ही पहले भी हुए हैं, जिसका परिणाम सीरिया का संकट है। इराक, अफगानिस्तान और लीबिया की वारदातों को भी इस नजरिये से देखा जा सकता है।

इस लिये हम कह सकते हैं, कि सीरिया में जो पिछले दो सालों से हो रहा है, हमले की जैसी बेचैनी ओबामा सरकार और यूरोपीय संघ के नेतृत्वकर्ता देशों में है, वह इन्हीं कारोबार और करार को पूरा करने की उनकी र्इमानदार कोशिशें हैं। बराक ओबामा समझौतों की पेशकश के दौरान भी यह कहते हुए नहीं थक रहे हैं, कि ”सीरिया पर हमले का विकल्प खुला हुआ है।” संभवत: उनका सीमित युद्ध इसी करार को पूरा करने की घातक नीति है। वो कारोबार को घटने और करार को टूटने देना नहीं चाहते हैं। मंदी के इस दौर में वो मुनाफा से नजरें नहीं हटा पा रहे हैं। उन्हें अल कायदा और उससे जुड़ अल-नुसरा की बड़ी फिक्र है, कि शैतान यदि बेकार हो गया, तो क्या होगा? तीसरी दुनिया के देश यदि महाद्वीपीय स्तर पर भी एकजुट हो गये, तो यूरोपीय-अमेरिकी वर्चस्व और अमेरिकी एकाधिकार का क्या होगा?

ओबामा की मुश्किलें आसान नहीं हैं। न तो वो घर संभाल पा रहे हैं, ना बाहर संभाल पा रहे हैं। वो समझ नहीं पा रहे हैं, कि अमेरिकी साम्राज्य यदि दशकों से हमलावर रहा है, तो मौजूदा दौर में उसका युद्धउन्मादी होना, उनके लिये कितना खरतनाक है? वो खबरों के खुलासा से परेशान हैं, जो धंधे के बीच मुश्किलें खड़ी कर रही हैं।

अमेरिका के खोजी पत्रकार वेन मैडसेन ने जानकारी दी है, कि ”सउदी अरब के गुप्तचर इकार्इ के प्रमुख प्रिंस बन्दर बिन सुल्तान बिन अब्दुलाजीज अल सउद ने अमेरिका और फ्रांस के विधिनिर्माता -सरकार में शामिल- प्रतिनिधियों को इस बात के लिये भुगतान किया है कि वे सीरिया के खिलाफ हर संभव सैन्य कार्यवाही का समर्थन करें।” वेन मैडसेन की यह जानकारी डा0 जेम्स एच. फेटज़र के 11 सितम्बर को प्रेस टीवी के वेब साइट पर जारी आलेख में आया है।

फेटज़र ने लिखा- वेन मैडसेन ने वाशिंगटन, लन्दन, बेरूत और पेरिस के गुप्त स्त्रोतों से यह जानकारी हासिल की है, कि सउदी गुप्तचर एजेन्सी प्रमुख प्रिंस बंदर बिन सुल्तान ने अमेरिका के सीनेट और सीनेट के महत्वपूर्ण सदस्यों को भुगतान किया है, साथ ही फ्रांस सरकार के भी कर्इ महत्वपूर्ण मंत्रियों को भुगतान दिया गया है। जिसके तहत इन्हें सीरिया के खिलाफ सैन्य कार्यवाही को ही समर्थन नहीं देना था, बल्कि लेबनान में हिजबुल्ला के ठिकानों को निशाना बनाने के लिये समर्थन करना था।”

उन्होंने आगे कहा है, कि मैडसेन के स्त्रोतों के अनुसार सीनेटर हैरी रीड, सीनेटर जान मैकिलन, सीनेटर लिण्डसे ग्राहम, सीनेटर बारबरा बाक्सर और सीनेटर राबर्ट मीनीनडेज, सीनेट के स्पीकर जान बोइहनर, मिनिस्ट्री लीडर नैन्सी पीलोसी, हाउस इण्टेलिजेन्सी कमेटी चेयरमेन मिक रोजर, न्यूयार्क के पीटर किंग, माइनरटी विप स्टेनी हेयर और अन्य सभी कम्पेनिंग, बंदर-बिन-सुल्तान की इसी वित्तीय उदारता की वजह से इतनी तेज हो गयी है।

गये महीने सीनेट के सामने दिये वक्तव्य में अमेरिकी विदेश मंत्री जान कैरी ने सीरिया पर हमले के लिये अरब देशों के द्वारा खर्च उठाने की और इस बाबत उनसे ‘मोल-भाव’ करने का जिक्र किया था। जिसे उन्होंने अमेरिका के प्रति उनके विश्वास के रूप में प्रस्तुत किया। जो वास्तव में एक पेशेवर हत्यारे के प्रति विश्वास के अलावा अन्य किसी सच को सामने नही लाता। अमेरिका की ओबामा सरकार इसे अपनी पेशेवर र्इमानदारी करार दे सकती है। यदि हम इस परिदृश्य में तीसरी दुनिया और मध्यपूर्व तथा सीरिया के संकट को देखें तो अमेरिकी सरकार और यूरोपीय तकतों के द्वारा रचे गये सभी तर्क आधारहीन नजर आते हैं। यहां तक कि बशर-अल-असद सरकार के द्वारा रासायनिक हथियारों का उपयोग भी। जिसे विश्व जनमत और रूस ने पहले ही खारिज कर दिया है। मास्को जी-20 शिखर सम्मेलन में भी बराक ओबामा सदस्य देशों के प्रतिनिधियों से हाथ भर दूर ही खड़े नजर आते हैं। उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए, कि वो अमेरिकी सेना का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। उसे पेशेवर सामूहिक हत्यारा बना रहे हैं, जिसने न जाने कितने ही सामूहिक नरसंहारों को अब तक अंजाम दिया है। जिसकी वजह कभी न प्रमाणित होने वाला अमेरिकी आरोप एवं तर्क है। बराक ओबामा सीरिया के साथ भी यही कर रहे हैं, इस यकीन के साथ, कि उनके झूठ के साथ जमाना होगा। मगर जमाना बदल गया है। हालात और औकात बदल गयी है। अमेरिकी सैन्य क्षमता विवादहीन रूप से बड़ी ताकत है, मगर उसके पास अपने सही होने का तर्क नहीं है। जिस पर करोड़ों-करोड़ डालर का खर्च आता है।

अमेरिका को भू-मध्य सागर में अपनी नौसैनिक क्षमता को बढ़ाने और उसे व्यवस्थित करने में हर हफ्ते लगभग 27 मिलियन डालर अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। अमेरिकी नौसैनिक अधिकारी के अनुसार- पेण्टागन को लगभग 25 मिलियन डालर हर सप्ताह दो अमेरिकी एयरक्राफ्ट केरियर स्ट्राइक ग्रुप्स का खर्च आता है, और 2 मिलियन डालर हर हफ्ता डिस्ट्रायर, जो इस्टर्न मेडिटेरियन में तैनात है, का खर्च आता है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर ऐसे खर्च इतने भारी हैं, कि सदियों से दुनिया को लूटने के बाद भी, अब उसकी वित्त व्यवस्था न सम्भल पाने के मुकाम पर है। लूट के उसके स्त्रोतों का घटना भी लगातार जारी है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की सबसे ला-इलाज बीमारी यह है कि युद्ध और हथियारों के कारोबार का मुनाफा निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों के पास पहुंच जाता है। अमेरिकी सरकार की हिसस्ेदारी अब निर्णायक नहीं है। अमेरिकी कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली सदन- सीनेट में ऐसे सीनेटरों की तादाद ही अधिक है, जो कारोबारी हैं, या निजी कम्पनियों के हितों के लिये काम करते हैं। वास्तव में कांग्रेस वालस्ट्रीट के दलालों का राजनीतिक अडडा बन गया है। जहां विश्व शांति विकास और मानवाधिकार की बातों की ओट में युद्ध, हथियार और शोषण-दमन की योजनायें बनायी जाती हैं।

व्हार्इट हाउस में बैठे राष्ट्रपति के हाथों में परमाणु हथियार, जैविक, रासायनिक और घातक हाथियारों का जखीरा है। पेण्टागन एक हजार से अधिक सैनिक अडडों को देखता है। सीआर्इए और एफबीआर्इ जैसी कर्इ अघोषित गुप्तचर एजेनिसयां हैं। सेटेलार्इट और सर्विलांस प्रोग्राम है। सुरक्षा के नाम पर अमेरिका के इन विध्वंसक योजनाओं का खर्च यदि अमेरिकी सेना के खर्च के साथ जोड़ा जाये, तो अमेरिका का रक्षा बजट आज जितना है, उससे दस गुणा ज्यादा होगा। फिर उसे आतंकी संगठनों और पेशेवर विद्रोहियों का भी खर्च उठाना पड़ता है।

एक नये रिपोर्ट के अनुसार- हाल ही में इराक, लीबिया, पाकिस्तान और सउदी अरब में जेलों पर हमले हुए हैं। जिसमें बड़ी संख्या में अल-कायदा के आतंकी फरार हुए। इन अल-कायदा आतंकियों को जेलों से फरार कराने के पीछे एक क्षेत्रीय देश की गुप्तचर एजेन्सी का हाथ है।

आसिट्रयन डेली, डेर स्टैण्डर्ड में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है, कि ”खाड़ी के एक देश की मदद से -नाम का जिक्र नहीं किया गया है- जिन अल-कायदा आतंकवादियों को भगाया गया है, उसका मकसद सीरिया में मौजूद अल-नुसरा की मदद करना है।” रिपोर्ट में कहा गया है, कि ”कैदियों को इसी शर्त पर भागने में मदद की गयी है, कि वहां से निकलने के बाद उन्हें सीरिया भेजा जायेगा, जहां उन्हें असद सरकार के खिलाफ लड़ना है।”

उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान में 29 जुलार्इ को दो दर्जन से ज्यादा आतंकी जेल तोड़ कर फरार हुए।

22 जुलार्इ को इराक में ताजी और अबु गरेब में ऐसी ही घटना घटी और जेल से सैंकड़ों कैदी फरार हो गये।

अनुमान है कि इनमें से ज्यादातर लोगों को सीरिया में विद्रोही बने अल नुसरा आतंकवादियों की मदद करने के लिये सीरिया भेज दिया गया। पाकिस्तान, उससे पहले लीबिया और उससे पहले इराक में ऐसी घटनायें घटी, जहां अमेरिकी सरकार का वर्चस्व है। सीरिया की बशर-अल-असद सरकार सैकड़ों प्रमाण के साथ विदेश समर्थित विद्रोहियों को आतंकवादी करार देती रही है। इसी महीने पाकिस्तान को असद सरकार ने 360 ऐसे पाकिस्तानियों की लाशें सौंपी हैं, जो सीरिया में विद्रोही के रूप में मारे गये। जिनमें से ज्यादातर शव पाकिस्तान की जेल से भागे हुए कैदियों के थे। जिसका प्रचार पश्चिमी मीडिया ने इस रूप में किया, कि पाकिस्तान की आम जनता भी सीरिया की असद सरकार के खिलाफ विद्रोहियों के साथ हैं।

इस रिपोर्ट में खाड़ी के जिस देश का नाम के बिना उल्लेख किया गया है, उसके नाम का अंदाज लगा पाना मुश्किल नहीं है। अपने देश की आवाम के खिलाफ अमेरिका समर्थक तुर्की, जार्डन, कतर और सउदी अरब ऐसे देश हैं, जो अपने हित में सीरिया में तख्ता पलटना चाहते हैं। जो विद्रोहियों के मददगार और अमेरिकी हितों से संचालित हैं। सउदी अरब के जरिये ही सीरियायी विद्रोहियों को आर्थिक मदद मिलती है, ओर वही अमेरिकी सीनेटरों की खरीदी कर रहा है। कतर के प्रस्ताव पर ही बि्रटिश हथियार उत्पादक कम्पनी ‘बि्रटम’ ने रासायनिक हथियारों की आपूर्ति की। जिसका खुलासा मलेशियायी हैकर ने किया। इन रासायनिक हथियारों की आपूर्ति-समझौते को वाशिंगटन की स्वीकृति मिली थी। जिसे बराक ओबामा सीरिया पर हमले का मुददा बना रहे हैं।

हथियार और युद्ध के कारोबार से लगी अमेरिकी सरकार तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सैनिक हस्तक्षेप का अभियान चला रही है। उसने अमेरिकी सेना को पेशेवर बना कर दुनिया की शांति और स्थिरता को खतरे में डाल दिया है। वह युद्ध और हमलों के लिये समझौते और करार कर रही है।

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