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रूस का युद्ध विरोधी शक्ति के रूप में उभरना

europeसीरिया के संकट का राजनीतिक समाधान निकालने की कोशिशों के साथ सैन्य अभ्यास और अपनी सामरिक सक्रियता से रूस का महत्व बढ़ गया है। वह साम्राज्यवादी ताकतों के विरूद्ध राजनीतिक धु्रवीकरण के उस केंद्र के रूप में उभरा है, जो चीन के साथ मिल कर मुक्त बाजारवाद के नये क्षेत्र की रचना कर रहा है। उसकी आर्थिक, कूटनीतिक एवं सामरिक स्थिति मजबूत हुर्इ है। अमेरिका और यूरोपीय देश इस बात का प्रचार कर रहे हैं, कि ”रूस की वजह से शीतयुद्ध की वापसी हो गयी है।” यह कहा जाने लगा है, कि एकध्रुवी अमेरिकी विश्व का अंत हो गया है। एकाधिकारवादी ताकतों के सामने नयी चुनौतियां खड़ी हो गयी हैं।

राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर, सैन्य हंस्तक्षेप की नीतियों को सीरिया में रोका जा सका है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने पूर्व राष्ट्रपतियों की नीति पर चलते हैं। सीरिया के बहाने वो तीसरी दुनिया के देशों को धमका रहे हैं, कि ”उनकी शांति और सदभावना और मानवता के लिये उनकी हमलावर नीतियों को रोका गया, तो अच्छा नहीं होगा।” वो अमेरिका के कूटनीतिक पराजय को बर्दास्त नहीं कर पा रहे हैं। दुनिया के बदलते हुए समिकरण ने उनकी बेचैनी बढ़ा दी है। वो न तो रूस और चीन को अपनी राहों से हटा पा रहे हैं, ना ही उसकी अनदेखी कर पा रहे हैं। बराक ओबामा की लाचारी रोज बढ़ती जा रही है।

सोवियत संघ और समाजवादी देशों के पतन के बाद, साम्राज्यवादी यूरो-अमेरिकी ताकतों ने यह मान लिया था, कि नवउदारवादी वैश्वीकरण की राह में अब कोर्इ बाधा नहीं है, कि मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था का वर्चस्व दुनिया भर में कायम हो जायेगा। मगर उन्हें अब तक के सबसे बड़े वैश्विक मंदी का सामना करना पड़ा। अमेरिकी साम्राज्य वित्तीय संकट से घिर गयी और यूरोपीय अर्थव्यवसथा पर कर्ज का इतना बोझ लद गया, कि उनकी वैश्विक वित्तव्यवस्था ही चरमरा गयी। राजनीतिक संकट बढ़ता चला गया। आज स्थिति यह है, कि पूंजीवादी विश्व पर निजी कम्पनियां, विशालतम कारपोरेशन और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों का अधिकार है। व्हार्इट हाउस और यूरोपीय संघ के कार्यालय पर उन सटटेबाजों का कब्जा है, जिनके खिलाफ विश्व जनमत है। अमेरिका की हालत रूस से बदत्तर है, और यूरोपीय संघ के देशों की हालत अमेरिका से भी बदत्तर है।

व्लादिमीर पुतिन ने जब से रूस के राष्ट्रपति का पद संभाला है, तब से रूस की अर्थव्यवस्था में भारी विकास हुआ है। उनके 8 साल के पहले कार्यकाल के दौरान रूस के औधोगिक विकास में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुर्इ। पूंजी निवेश में 125 प्रतिशत का इजाफा हुआ। आम रूसी के वेतन में आठ गुणा वृद्धि हुर्इ। वह 80 डालर से बढ़ कर 640 डालर हो गया। समाज में मध्यम वर्ग की तादाद 8 मिलियन से बढ़ कर 55 मिलियन हो गयी। 2000 में गरीबी की सीमा रेखा पर जीने वालों की जनसंख्या 30 प्रतिशत थी, जो घट कर 2008 में 14 प्रतिशत हो गयी। दुनिया के किसी भी शहर से ज्यादा बिलिनियर अब मास्को में रहते हैं।

यदि इस अनुपात में हम अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश और बराक ओबामा के पहले कार्यकाल को देखें, तो अमेरिका की स्थिति में भारी गिरावट आयी है। औधोगिक पलायन, बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी, वेतन में भारी कमी, सामाजिक कार्यक्रमों में की गयी कटौतियां, आवासहीन लोगों और फूड स्टैम्प पर जीने वालों की तादाद लगातार बढ़ी है। उसका घरेलू उत्पादन इस सीमा तक घट गया, कि अमेरिकी बाजार में विदेशी सामानों की भरमार है। उसका सबसे बढ़ा औधोगिक नगर डेट्रायट दिवालिया हो गया है, और संघीय कर्ज के अलावा राज्यों पर भी भारी विदेशी कर्ज है।

अमेरिका का कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद का 101 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है। जिसे भरने की क्षमता उसमें नहीं है। वहीं रूस पर उसके सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 8 प्रतिशत कर्ज है। अमेरिका और रूस के व्यापार घाटा का यदि हम जिक्र करें तो रूस की वित्त व्यवस्था और वित्तीय नीति के सामने अमेरिकी वित्त व्यवस्था और वित्तीय नीतियां पूरी तरह नाकाम नजर आयेंगी। पिछले साल अमेरिका का व्यापार घाटा आधा टि्रलियन डालर से ज्यादा था, जिसमें अब तक किसी सुधार की गुंजार्इश नहीं बन सकी है, जबकि रूस का व्यापार अतिरिक्त है, वह किसी भी घाटे से कोसों दूर है। जिस चीन के साथ व्यापर में अमेरिका को सबसे बड़े व्यापार घाटे को सहना पड़ा है, उसी चीन के साथ रूस का व्यापार समकक्ष है, और रूस चीन को सुरक्षा देने की सिथ्ति में है। रूस और चीन के बीच के सामरिक समझौतों का लाभ भी उसे मिल रहा है।

आज की तारीख में रूस दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस उत्पादक देश है और यूरोप की जरूरतों का 34 प्रतिशत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करता है। और यूरोप में उसकी योजना इसे विस्तार देने की है, वह पूर्वी यूरोप के पूर्व समाजवादी देशों को आधार बना कर उजबेकिस्तान में सबसे बड़े संयंत्र की स्थापना कर रहा है। जिसके खिलाफ यूरोपीय संघ चाह कर भी घेराबंदी नहीं कर पा रहा है। अमेरिका दूसरे नम्बर का प्राकृतिक गैस उत्पादक देश है। जिस खनिज तेल से अमेरिका की विदेश नीति संचालित होती है, और जिस पेट्रो डालर की वजह से डालर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा का दर्जा मिला हुआ है, जिसे समानांतर मुद्रा व्यवस्था के प्रतिरोध का सामना भी करना पड़ा रहा है और चीन की दावेदारी सबसे बड़ी एवं मजबूत है। रूस दुनिया में सबसे ज्यादा तेल उत्पादन कर रहा है और अमेरिका तीसरे स्थान पर है। रूस तेल का निर्यात करने वाला दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा देश है, जिसके विपरीत अमेरिका सबसे ज्यादा तेलों का आयात करता है।

रूस और अमेरिका तथा यूरोपीय देशों की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। पुतिन भले ही अमेरिका से रूस के अपने सम्बंधों को महत्व देते हैं, मगर उनकी नीतियां स्नोडेन के मामले में जिस तरह राष्ट्रीय हितों से जुड़ती चली गयीं और यह कहने के बाद भी कि ”दोनों देशों के सम्बंधों को वो स्नोडेन के मुददे से ज्यादा तरजीह देते हैं”, आज स्नोडेन रूस के अस्थायी नागरिक हैं। अमेरिकी सरकार की आपतितयों और स्नोडेन को सौंपने की मांग को रूस ने तरजीह ही नहीं दिया। यह बात बिल्कुल साफ है कि अमेरिका रूस के सम्बंधों के बीच सीरिया का मुददा अहम है।

सीरिया के मुददे पर रूस की नीतियां बिल्कुल साफ हैं। वह इस बात को मानता है कि सीरिया में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिये अमेरिका और पश्चिमी ताकतों ने विपक्ष को एकजुट किया और विद्रोहियों के नाम से आतंकवादियों ने सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद के खिलाफ विद्रोह की घोषणा की। उसे गृहयुद्ध में बदल दिया। उसके पास इस बात की ठोस जानकारी है, कि सीरिया की असद सरकार के द्वारा न तो रासायनिक हथियारों के उपयोग की अनुमति दी गयी है, ना ही ऐसी स्थितियां थीं और ना ही सीरिया की सेना के द्वारा उनका उपयोग किया गया है। अमेरिका, पश्चिमी देश, और उनके सहयोगी अरब देशों के समर्थन पर टिके विद्रोहियों के द्वारा ही रासायनिक हथियारों के उपयोग से हमले की वजह बनार्इ गयी है। रूस सीरिया के पक्ष में आर्थिक, सामरिक एवं कूटनीतिक रूप से है।

रूस के द्वारा अमेरिकी साक्ष्यों को पहले ही बकवास करार दिया गया था, और जारी विडियो में भी संदेहास्पद बताया गया था, जो अब भी अप्रमाणित है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की जांच टीम को रूस ने निष्कर्षहीन राजनीति से प्रेरित करार दिया है। राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में रूस के उपविदेशमंत्री सर्गेर्इ रयाबकोप ने कहा कि ”इस बात के कोर्इ पुख्ता सबूत नहीं हैं, कि रासायनिक हमले के लिये असद सरकार जिम्मेदार है।” उन्हाेंने इसे अधूरा और निराशापूर्ण करार दिया। जबकि सीरिया के खिलाफ अमेरिका और पश्चिमी देश सीमित हमले की सख्त कार्यवाही चाहते हैं। सुरक्षा परिषद के ऊपर इस बात का गहरा दबाव है। जबकि रूस की सहमति के बिना यह संभव नहीं है। जिसके पास विटो पावर है। राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में अमेरिकी एवं पश्चिमी देशों के प्रस्ताव को सफलता, अब तक, रूस और चीन की वजह से नहीं मिली है, और यह तय है, कि सीरिया के खिलाफ कोर्इ भी प्रस्ताव पारित होना संभव नहीं है।

सीरिया के मुददे पर ओबामा सरकार और पश्चिमी देश अपनी गलत औपनिवेशिक- साम्राज्यवादी नीतियों का शिकर हो गये हैं। उन्होंने अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था और किसी भी युद्ध का खर्च न झेल पाने वाली स्थितियों को न समझने की भूल की है। जिसके खिलाफ उनके देश की आम जनता भी है। जो चाहती है कि युद्ध के आत्मघाती खर्च के बजाये सरकारें जन समस्याओं का समाधान करें। उनके लिये युद्ध अन्यायपूर्ण और गलत है।

जिस समय यूरोप की आम जनता कर्ज के बढ़ते हुए बोझ और सरकारी सुविधाओं में कटौतियों के प्रस्ताव से नाराज है। जिसके सामने बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी और भूखमरी की समस्या है, ठीक उसी समय सीरिया के खिलाफ युद्ध की घोषणां के प्रस्ताव को वह स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है। वह सिर्फ अपनी समस्याओं का समाधान चाहती है। वह चाहती है कि सरकारें आम जनता के प्रति जिम्मेदार हों और जन-समस्याओं का स्थायी समाधान करें। यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के खिलाफ व्यापक जन-असंतोष है। आर्थिक मंदी झेल रहे यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में रोज नये प्रदर्शन हो रहे हैं। यूरोपीय देशों की सरकारें भले ही अमेरिकी प्रस्तावों के साथ हों, मगर उन देशों की आम जनता किसी भी हमले के खिलाफ है। अमेरिकी विरोध भी बढ़ता जा रहा है। मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था जिसमें वैश्विक मंदी और युद्ध का होना तय है, यूरोप और अमेरिका की आम जनता ऐसी व्यवस्था को बदल देना चाहती है। युद्ध उन्माद को बढ़ा कर जन-समस्याओं को स्थगित करने की नीतियां बेअसर प्रमाणित हो रही है।

अमेरिकी सरकार जिन युद्धाभ्यासों के जरिये अपने देश की आम जनता और यूरोपीय देशों की आम जनता के मन में अपनी श्रेष्ठता और दुनिया के मन में अपना भय बैठाना चाहती है -खास कर तीसरी दुनिया के देशों में-, रूस और चीन के संयुक्त युद्धाभ्यास और रूसी सेना के युद्धाभ्यासों ने, एक सीमा तक उसे असफल कर दिया है। उसने यह स्पष्ट कर दिया है, कि अब इराक, अफगानिस्तान या लीबिया जैसी दुर्घटनायें संभव नहीं है। चाह कर भी अमेरिका और यूरोपीय देशों की सरकारें सीरिया को लीबिया नहीं बना सकती। ‘युद्ध के विस्तार को रोका नहीं जा सकेगा, की स्थितियों ने अमेरिकी सेना और ओबामा सरकार की सोच को अलग-अलग कर दिया है। अमेरिकी सेना सीरिया पर हमले से पहले उसकी समय अवधि जानना चाहती है, जिसे बता पाना, ओबामा सरकार के बस में नहीं है, क्योंकि युद्ध में रूस की सम्बद्धता का मतलब तात्कालिक रूप से चीन और र्इरान की सम्बद्धता है, और इन देशों की सम्बद्धता का मतलब धीरे-धीरे अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय शक्तियों के खिलाफ राजनीतिक एवं सामरिक ध्रुवीकरण का होना तय है।

युद्ध के विस्तार का आंकलन कर पाना अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतों के बस में नहीं है, क्योंकि दुनिया का बंटवारा हो गया है। और यह बंटवारा उनकी एकाधिकारवादी नीतियों की वजह से है। एक बड़े युद्ध की आशंकाओं से हमारा पीछा नहीं छूटा है। मगर, रूस का युद्ध विरोधी शक्ति के रूप में उभरना और शीतयुद्ध की वापसी, निश्चय ही थोड़ी सी राहत है।

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